हिन्दी का गीतिकाव्य और सूर

डॉ. अंगदकुमार सिंह
अंगदकुमार सिंह

असिस्टेण्ट प्रोफ़सर (हिन्दी), 
जवाहरलाल नेहरू पी.जी. कॉलेज, बाँसगाँव, गोरखपुर (उ.प्र.), भारत - 273403

शोधालेख सार:
सूर हिन्दी-काव्यकाश के सूर्य, बालमनोविज्ञान के ज्ञाता, वात्सल्य और शृंगार के प्रणेता, रससिद्ध कवि और महान गीतिकाव्य-सर्जक हैं। उनके काव्य में गीतिकाव्य के सभी तत्त्व- आत्माभिव्यक्ति, भावप्रणता, कल्पनाशीलता, संक्षिप्तता, गेयता या संगीतात्मकता, कोमलकान्त पदावली, प्रभावान्विति आदि विद्यमान हैं। गीतिकाव्य का सृजन करने में हृदय के कोमल भाव फड़क उठते हैं इसलिए भावप्रवणता का होना महत्त्वपूर्ण है। कवि के हृदय की सुख-दुःखात्मक प्रवृत्ति ही गतिकाव्य की आधारपीठिका बनती हैं। कवि की यही अनुभूति जब एकत्रित होकर तीव्रता की चरम परिणति को प्राप्त करती हैं तब गीतिकाव्य का सृजन होता है। सूर के काव्य में अनेक रसों का परिपाक हुआ है। सूर के काव्य में वात्सल रस का सजीव वर्णन हुआ है। वे वात्सल्य रस के सम्राट के आदरपूर्ण पद को  प्राप्त किये हैं तो  वे अलंकारों का प्रयोग करने में सिद्धस्त हैं। हैं। सूर का अधिकांश काव्य मन्दिर में कीर्तन-हेतु रचा गया इसलिए इसमें गेयता का आना स्वाभाविक है। सूर के काव्य में गीतिकाव्य के सभी गुण- आत्माभिव्यक्ति, भावप्रणता, कल्पनाशीलता, संक्षिप्तता, गेयता या संगीतात्मकता, कोमलकान्त पदावली, प्रभावान्विति आदि मौजूद हैं। सूर संगीतज्ञ के गुणों से युक्त थे तो साथ ही भारतीय संगीत के उन्नायक भी। उनके काव्य शास्त्रानुसार रचित हैं तो लोकसम्मत भी, गीतिकाव्य की भावुकता में अभिवद्ध हैं तो समरसता के संचारक और भावभूमि के अनुकूल भी। भक्तमाल के प्रणेता नाभादास ने तो उनकी कवित्त्व शक्ति पर मुग्ध होकर एक काव्यात्मक प्रशस्ति की है जो सूर की काव्यकला और काव्यशक्ति के मूल्यांकन का प्रतिमान बन उठा है।

कीवर्ड / बीज-शब्द: गीतिकाव्य, बालमनोविज्ञान, श्रृंगार और वात्सल्य रस, काव्य-प्रतिभा 

साहित्य-समीक्षा:
भारत ऐसा देश है जिसमें काव्य की अनेक परम्पराएँ (रासोकाव्य-परम्परा, सन्तकाव्य-परम्परा, सूफ़ीकाव्य परम्परा, रामकाव्य-परम्परा, कृष्णकाव्य-परम्परा आदि) जन्म लेती रही हैं। ये परम्पराएँ पल्लवित और पुष्पित होकर यहाँ के लोकजीवन को छायादार आम्रमंजरी के समान सुगन्ध से भर देती हैं तो पीपल के वृक्ष से होकर गुज़रने वाली वायु की तरह प्राणवायु का संचार करती हैं और नीम की गाछ-सदृश तरोताज़ा भी। इन्हीं काव्य-परम्पराओें में एक परम्परा गीतिकाव्य की है। गीतिकाव्य का साधारण अर्थ गाये जाने वाले काव्य से लिया जाता है, पर सभी गाये जाने वाले काव्य को गीतिकाव्य नहीं कहा जा सकता है। आत्माभिव्यक्ति, भावप्रवणता, कल्पनाशीलता, संक्षिप्तता, गेयता या संगीतात्मकता, कोमलकान्त पदावली आदि का जिसमें प्रचुरता के साथ और सन्तुलित मात्रा में प्रयोग होता वही गीतिकाव्य की मान्यता को प्राप्त करता है। मानवीय सभ्यता के विकास और मानव-जीवन को सजाने तथा सँवारने में गीत या संगीत का प्रमुख स्थान है। वास्तव में गीत वह है जिसको सुनकर परेशान नौजवान प्रेरणा से भर जाय, वृद्ध को शान्ति मिले और रोता हुआ बालक हँसने लगे।

गीतिकाव्य एक नवीन, सशक्त तथा प्रभावशाली विधा है। गीतिकाव्य की उत्पत्ति के बारे में विद्वानों में मतैक्य नहीं है, कोई भारतीय साहित्य की देन मानता है तो कोई पाश्चात्य साहित्य की। लेकिन पाश्चात्य साहित्य की देन मानने वाले विद्वानों को अपनी पुरानी स्मृतियों की ओर भी ध्यान दौड़ाना चाहिए। भारतीय साहित्य में लोकगीत की परम्परा अनादि काल से संचरित है तो अनेक विद्वान सामवेद से संगीत की उत्पत्ति मानते हैं। उनके अनुसार आरम्भ में दो प्रकार के गीत थे- वैदिक गीत और लौकिक गीत। इनमें से लौकिक गीत आगे चलकर दो भागों में विभाजित हो गये- पहला, मार्ग गीत तो दूसरा, देशी गीत। मार्ग गीत में शास्त्रीय परम्परा का पालन किया गया तो देशी गीत को सभी देश अपनी रुचि और शैली में ढालकर प्रयोग किये। कालान्तर में यही देशी गीत साहित्यिक आभामण्डल को अपनाकर ‘गीतिकाव्य’ या ‘प्रगीतकाव्य’ कहा जाने लगा। पाश्चात्य काव्यशास्त्र में ‘गीतिकाव्य’ के लिए ‘लिरिक’ शब्द प्रयुक्त हुआ जो ‘लायर’ नामक वाद्ययन्त्र के सहारे गाया जाता है। ‘लायर’ पर गाये जाने के कारण इसे ‘लिरिक’ कहते हैं। आगे चलकर लायर पर इसे गाने की परम्परा समाप्त हो गयी, लेकिन गीत शब्द माधुर्य तथा लय से सम्बद्ध हो गये। गीतिकाव्य के बारे में अपना मत देते हुए महादेवी वर्मा ने ’सान्ध्यगीत’ संग्रह’ में ‘अपनी बात’ शीर्षक के अन्तर्गत पृष्ठ 4 पर लिखा है कि, ‘‘सुख-दु:ख की भावावेशमयी अवस्था विशेष का गिने-चुने शब्दों में स्वर-साधना के उपयुक्त चित्रण कर देना ही गीति है।’’ तो आचार्य गुलाब राय का विचार है कि, ‘‘गीतिकाव्य में निजीपन के साथ रागात्मकता रहती है और यह रागात्मकता भाव की एकता एवं संक्षिप्तता के साथ संगीत की मधुर लय में व्यक्त होती है। इसलिए संगीत यदि गीतिकाव्य का शरीर है तो निजी भावातिरेक उसकी आत्मा।’’1 डॉ. दशरथ ओझा ने माना है कि, ‘‘जिस काव्य में एक तथ्य या एक भाव के साथ-साथ एक ही निवेदन, एक ही रस, एक ही परिपाटी हो-वह गीतिकाव्य है।’’2  तो डॉ. नगेन्द्र का कहना है कि, ‘‘गीतिकाव्य की आत्मा है-भाव, जो किसी प्रेरणा के भार से दबकर एक साथ गीत में फूट निकलता है।’’ पाश्चात्य विद्वान अर्नेस्ट रॉयस ने “अत्यन्त प्रभावपूर्ण भावों से सम्पृक्त संगीतमय शब्दप्रवाह को ‘गीतिकाव्य’ कहा है।’’3 तो ब्रिटेन-विश्वकोश में लिखा है कि, ‘‘एक गीतिकाव्य वह है जिसमें विशुद्ध कलात्मक धरातल पर कवि के अन्तर्मुखी जीवन का उद्घाटन मुख्यतया होता है और जो उसके हर्ष-उल्लास, सुख-दुःख एवं विषाद को वाणी प्रदान करता है।’’4 सभी विद्वानों के मतों पर विचार करने के पश्चात सारांशतः कह सकते हैं कि गीतिकाव्य आत्माभिव्यंजना से कल्पना के सहारे पैदा हुआ गेयता, कोमलकान्त पदावली आदि से युक्त संक्षिप्त काव्यविधा है।

गीतिकाव्य रचने की परम्परा बहुत प्राचीन है तथा यह संस्कृत साहित्य में प्रमुख रूप से रचा गया। वेद में भी गीतिकाव्य का स्वरूप मिलता है। संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध महाकवि जयदेव का नाम गीतिकाव्यकार के रूप में लिया जाता है जिन्होंने ‘गीतगोविन्द’ जैसे काव्यग्रन्थ का प्रणयन किया। उनकी इस रचना से प्रेरणा और प्रभाव ग्रहणकर मैथिल कोकिल, अभिनव जयदेव, कवि शेखर, सरस कवि, खेलन कवि, कवि कण्ठाहार, कवि रंजन आदि की उपाधि से विभूषित हिन्दी कवि विद्यापति ने ‘पदावली’ की रचना की जो उनके अक्षय-कीर्ति का आधार है और वे ही हिन्दी के आदि गीतिकार माने जाते हैं। इनके पहले भी चन्दवरदाई कृत ‘पृथ्वीराजरासो’ (‘कनवज्ज-समय’, ‘बड़ी लड़ाई के समय’ में) तथा नरपति नाल्ह के ‘बीसलदेव रासो’ के प्रबन्ध में गीतितत्त्व मिलते हैं तो जगनिक कृत ‘आल्हखण्ड’ में भी। भक्तिकाल में कबीर, दादूदयाल, सुन्दरदास, मलूकदास, दरिया साहब, सूरदास, नन्ददास, कृष्णदास, परमानन्ददास, गोविन्दस्वामी, तुलसी, मीरा आदि गीतिकाव्य के प्रणेता कवि हुए जिन्होंने सुन्दर और मार्मिक गीतों की रचना की है।

सूर हिन्दी-काव्यकाश के सूर्य, बालमनोविज्ञान के ज्ञाता, वात्सल्य और शृंगार के प्रणेता, रससिद्ध कवि और महान गीतिकाव्य-सर्जक हैं। उनके काव्य में गीतिकाव्य के सभी तत्त्व- आत्माभिव्यक्ति, भावप्रणता, कल्पनाशीलता, संक्षिप्तता, गेयता या संगीतात्मकता, कोमलकान्त पदावली, प्रभावान्विति आदि विद्यमान हैं। कवि जब सृजन में निमग्न होता, तो जो अनुभव करता है उसको शब्दों में बाँधकर लोकमानस के समक्ष प्रस्तुत करता है। लोक के बीच जाकर अनुभवजन्य काव्य जितना ही जनमानस को प्रभावित करता है उतना ही महत्त्वपूर्ण माना जाता है। गीतिकाव्य का सृजन करने के लिए आत्माभिव्यक्ति का होना जरूरी है, क्योंकि बगैर आत्माभिव्यक्ति के कोई भी अपने भावोच्छ्वास को सही ढंग से व्यक्त नहीं कर सकता। कवि जो सुख-दुःख अनुभव करता है वही उसके काव्य का आधार बनकर लोगों तक पहुँचता है। उसकी आत्माभिव्यक्ति जब कवि की लेखनी और सहृदय पाठक या श्रोता का साथ पाती है तो सर्वानुभूति बन जाती है। गीत का रसास्वादन करने-हेतु प्रत्येक श्रोता या पाठक को कवि की अनुभूति से तादात्म स्थापित करना पड़ता है। ऐसे ही सूरदास जी ने स्वयं जो अनुभव किया उसी को आधार बनाकर अपने काव्य में व्यक्त किया है। सूर कृष्णभक्ति शाखा के प्रतिनिधि कवि और अनन्य भक्त हैं। सूरदास जी ने जो विनय के पद रचे हैं उसमें वे अपने आराध्य श्रीकृष्ण की प्रशंसा करते हुए कहते हैं-
  ‘‘चरन-कमल बंदौँ  हरि-राइ।
  जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै, अँधै को सब कुछ दरसाइ।
  बहिरौ सुनै, गूँग पुनि बोलै, रंक चलै सिर  छत्र धराइ।
  सूरदास स्वामी करुनामय, बार-बार बन्दौँ  तिहिँ पाइ।’’5

 सूरदास जी के और भी पदों में आत्माभिव्यक्ति के दर्शन होते हैं। यथा-‘‘अब कैँ राखि लेहु भगावन’’6, ‘‘मेरे मन अनत कहा सुख पावै’’7 अदि।

गीतिकाव्य का सृजन करने में हृदय के कोमल भाव फड़क उठते हैं इसलिए भावप्रवणता का होना महत्त्वपूर्ण है। कवि के हृदय की सुख-दुःखात्मक प्रवृत्ति ही गतिकाव्य की आधारपीठिका बनती हैं। कवि की यही अनुभूति जब एकत्रित होकर तीव्रता की चरम परिणति को प्राप्त करती हैं तब गीतिकाव्य का सृजन होता है। करुणा के भाव को गीतिकाव्य का उद्गम माना जाता है। छायावाद के विष्णु कहे जाने वाले प्रसिद्ध और महान कवि पन्त ने लिखा है कि- ‘‘वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान/उमड़ कर आँखों में चुपचाप, बही होगी कविता अनजान।’’ सूरदास जी के सूरसागर में भावप्रवणता के अनेक उदाहरण भरे पड़े हैं। एक नमूना द्रष्टव्य है-
  ‘‘प्रभु को देखौ एक सुभाइ।
  अति-गम्भीर-उदार-उदधि हरि, जान-सिरोमनि राइ।
  X       X    X
  भक्त-विरह कातर  करुनामय  डोलत  पाछै  लागौ।
  सूरदास  ऐसे  स्वामी कौ  देहि  पीठि  सो  अभागे।’’8

गीतिकाव्य को बेहतर बनाकर पाठक वर्ग के सामने प्रस्तुत करने के लिए कवि कल्पना का सहारा लेकर काव्य में सौन्दर्य को निरूपित करता है तो पाठक उसे आनन्दभाव से ग्रहण करता है। इसके लिए उसे रूप-विधान, भाषा, रस, अलंकार, विम्ब-विधान, प्रतीक आदि का आश्रय लेना पड़ता है। ऐसा करने से उसकी रचना में अपूर्व सौन्दर्य का आगमन होता है और पाठक उस सौन्दर्य में गोता लगाते हुए इस प्रकार खो जाता है कि उसे किसी अन्य चीज का आभास ही नहीं रहता। सूरदास जी ने अपनी रचना ‘सूरसागर’ में इसका बखू़बी निर्वाह किया है। सूर ने कृष्ण के बाल-सौन्दर्य की झाँकी प्रस्तुत करने के साथ ही राधा-कृष्ण के किशोर-सौन्दर्य का हृदयग्राही चित्र उपस्थित किया है। इसका कुछ उदाहरण-
  ‘‘सोभा कहत कही नहिँ आवै।
  अँचवत अति आतुर लोचन-पुट मन न तृप्ति कौँ पावै।
X X X
  अध मधुर  मुसुक्यानि मनोहर  करति मदन मन  हीन।
  सूरदास  जहँ  दृष्टि  परति  है  होति  तहीँ लवलीन।’’9
  अथवा 
  ‘‘बॅूझत स्याम, कौन तू गोरी?
  कहाँ रहति, काकी तू बेटी? देखी नाहिँ कबहुँ ब्रजखोरी।’’10

भाषा काव्य के शरीर-समान होती है, इसके बिना काव्य की कल्पना नहीं हो सकती। सूर के काव्य में ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है। चलती हुई भाषा को साहित्यिक ब्रजभाषा बनाने में सूरदास का नाम अग्रगण्य है। आचार्य शुक्ल ने इसी को लक्ष्य करके कहा है कि, ‘‘सूरसागर किसी चली आती हुई गीतकाव्य परम्परा का- चाहे वह मौखिक ही रही हो- पूर्ण विकास सा प्रतीत होता है।’’11 शनैः-शनैः ब्रजभाषा का काव्यभाषा के रूप में इन कवियों ने ऐसा विकास और परिष्कार किया कि सर्जनात्मक सम्भावनाएँ जनमानस को मुग्ध करने लगी। कृष्णकाव्य के ऊपर ब्रजभाषा का एकक्षत्र अधिकार हो गया। इसके अलावा सूर ने अपने काव्य में संस्कृत के शब्दों (यथा- दधि, घृत, मधु, सरस, मयूर-चन्द्रिका, रुधिर, अस्थि, चिबुक, द्विज, कपोल, पुरीष, नाभि, स्वजन, भव-मद, मृतक, कामधेनु, गज, कंजर, कपोत, उलूक, चक्रवाक, कोक, गरुड़, खद्योत, मधुप, मीन, मकराकृत, भ्रमर, कल्पना, जीविका, त्रास, प्रतिष्ठा आदि) का प्रयोग किया तो अर्द्ध तत्सम शब्द (जैसे- अगिनि, अम्रित, अस्थान, दरपन, विलम, मरजादा, रतन, पदारथ, परतीति, मरम, रिधि, अस्तुति लछमी आदि) का भी। अवधी के अनेक शब्दों (छोट, बड़, अस, आहि, इहाँ, उहाँ, कीन, दुबार, बियारी, मोर, तोर आदि ) का उपयोग किया तो कन्नौजी के शब्दों (हुतो, हुती आदि) का भी। खड़ीबोली के शब्दों (गाया, आया, लखाया, ओढ़ाया, बताया, लाया है, जाया है आदि) को अपने काव्य में सूर ने आश्रय दिया तो बुन्देली के शब्दों (जानिबी, प्रगटबी आदि) को भी। गुजराती भाषा के शब्दों (पेला, वियौ) को अपनाया तो पंजाबी भाषा के शब्दों (प्यारी -महँगी के अर्थ में) को भी। अरबी के शब्दों (अमल, अमीन, कलई, क़सब, जबाब, मुजरा, मुहकम, मुहर्रिर, मौज, मुसाहिब, कागर, ख़बर, ख़ाली, तलफ़, दग़ा, मसकत, सफ़री, मसखरा आदि) से परहेज नहीं किया तो फ़ारसी के शब्दों (कमान, गुमान, चुगली, दलाली, दरबान, दीवान, सरदार, राह, अँदेसा, आवाज़, असवार आदि) से भी। इतना ही नहीं इनके काव्य में देशज और मिश्रित शब्द भी बहुत से आये हैं। सूरदास जी ने लोकोक्ति और मुहावरों का भी प्रयोग अपने काव्य में किया है। यथा- ‘सूरदास प्रभु कामधेनु तिजि छेरी कौन दुहावै’, ‘सूरदास खल करी कामरि चढ़ै न दूजौ रंग’, ‘सूर सिकत हठि नाव चलावत ये सरिता हैं सूखी’, ‘जिय में सूल रही’, ‘गाढ़े दिन को मीत’, ‘कोउ न बात पूछता’ आदि।

सूर के काव्य में अनेक रसों का परिपाक हुआ है। इनके वहाँ यदि शृंगार का वर्णन है तो वात्सल्य का भी। हास्य रस का निरूपण है तो करुण का भी। रौद्र रस को अपनाया है तो करुण को भी। भयानक रस से खुद को वंचित नहीं कर पाये तो वीभत्स को छोड़ नहीं पाये। अद्भुत रस की छटा बिखेरी तो शान्त रस अपनाकर मन को शान्त किया। सूरदास जी ने शृंगार के दोनों पक्षों संयोग और वियोग का वर्णन बहुत ही सजीवता के साथ प्रस्तुत किया है। संयोग शृंगार के कुछ पद- 
  ‘‘बूझत स्याम, कौन तू गोरी?
   कहाँ रहति, काकी तू बेटी? देखी नाहिँ कबहुँ ब्रजखोरी।’’12
  ‘‘धेनु दुहत अति ही छवि बाढ़ी।
   एक धार दोहनि पहुँचावत एक धार जहँ प्यारी ठाढ़ी।’’13 

वियोग शृंगार की एक झलक देखी जा सकती है-
  ‘‘अँखियाँ हरि-दरसन की भूखी।
  कैसे रहैं  रूपरसराची  ये  बतियाँ  सुनी   रूखी।
  X     X    x
बारक वह मुख फेरि दिखावहु दुहि पय पिवत पतूखी।
  सूर सिकत हठि नाव चलायो यह  सरिता है  सूखी।’’14

सूर के काव्य में वात्सल रस का सजीव वर्णन हुआ है। वे वात्सल्य रस के सम्राट के आदरपूर्ण पद को  प्राप्त किये हैं। बालक श्रीकृष्ण की चेष्टाओं का जितना सुन्दर और मनोहारी चित्रण सूर ने किया है वह अवलोकनीय है-‘‘मैया कबही बढ़ैगी चोटी’’ में बाल सुलभ स्पर्धा है तो ‘‘मैया! हौं गाय चरावन जैहों’’ में बाल सुलभ उत्सुकता का भाव सुन्दर बन पड़ा है। तो कृष्ण के मथुरा-गमन पर यशोदा का यह कथन -‘‘है कोउ ब्रज मै हितु हमारौ, चलत गोपालहिं राखै’’ माँ के प्रेम की पराकाष्ठा को व्यक्त करता है। आचार्य शुक्ल ने इसीलिए कहा है कि, ‘‘वात्सल्य और शृंगार के क्षेत्र का जितना अधिक उद्घाटन सूर ने अपनी बन्द आँखों से किया, उतना किसी और कवि ने नहीं। इन क्षेत्रों का कोना-कोना वे झाँक आये है।’’

सूरदास जी अलंकारों का प्रयोग करने में सिद्धस्त हैं। इनके काव्य में अलंकारों की मनोहारी सुषमा और छटा देखी जा सकती है। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, विभावना, असंगति, प्रतीप, पुनरुक्ति प्रकाश, अर्थान्तरन्यास, अनुप्रास आदि अलंकारों का इनके काव्य में प्रचुरता से प्रयोग हुआ है (उपमा अलंकार का एक नमूना-‘‘परमारथी पुरानानि लादे ज्यौं बनजारे ठाढै’’) तो अभिधा, लक्षणा, व्यंजना शब्द-शक्तियों का भी। सूर ने बिम्ब-विधान और प्रतीक को भी अपने काव्य में समाहित किया है।

गीतिकाव्य के लिए आवश्यक है कि वह संक्षिप्त और छोटा हो, क्योंकि जब यह संक्षिप्त होगा तभी इसमें कवि अपने भाव को आसानी से व्यक्त कर सकता है। गीत में कवि अपनी ही अनुभूति को सघन और मार्मिक बनाकर अनुस्यूत करता है, यही सघनता और मार्मिकता कवि के सृजन को गीतिकाव्य के रूप में ढालता है। यदि कवि रचना करते समय अपनी भावना को विस्तारित करेगा या कल्पना को बहुत अधिक कृत्रिम बनाना चाहेगा तो उसके गीतिकाव्य में सघनता और मार्मिकता का ह्रास हो जायेगा। यही कारण है कि हिन्दी के कई रासो-ग्रन्थ, श्रीरामचरितमानस, पद्मावत आदि प्रबन्धात्मक और गेय होकर भी विस्तार के कारण गीतिकाव्य नहीं कहे जाते। सूरकाव्य इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है।

गीतिकाव्य में गेयता या संगीतात्मकता का समुच्चय होता है। क्योंकि कोई रचना यदि गाने योग्य नहीं है तो वह गीतिकाव्य नहीं हो सकती। काव्य को गेय और संगीतमय बनाने के लिए कवि को कोमलकान्त पदावली का आश्रय लेना पड़ता है। विश्व की सभी भाषाओं में रचित श्रेष्ठ गीतिकाव्य लगभग गेयता का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। सूर का अधिकांश काव्य मन्दिर में कीर्तन-हेतु रचा गया इसलिए इसमें गेयता का आना स्वाभाविक है। सूरदास जी ने अपने काव्य को विभिन्न राग-रागिनियों से समुन्नत बनाकर नाद और संगीत से भर दिया है तो संगीत-विषयक ज्ञान की कसौटी पर कसा भी। इनके पद का एक नमूना-
  ‘‘पथिक! सँदेसो कहियो जाय।
  आवैंगे  हम  दोनों   भैया,  मैया  जनि  अकुलाय।
  X X X
  यद्यपि मथुरा विभव बहुत है तुम बिनु कछु न सुहाय।
  सूरदास   ब्रजवासी   लोगनि   भेंटत   हृदय   जुडा़य।’’15

गीतिकाव्य के लिए कोमलकान्त पदावली का ही प्रयोग किया जाता है क्योंकि गीतिकाव्य में व्यक्त भावनाएँ कोमलता की प्रतिमूर्ति होती हैं। इसलिए कोमलभाव को शब्दबद्ध करने के लिए कोमल शब्दों का ही चुनाव करना पड़ता है। सूरदास जी सहज और सरलचित्त-सम्पन्न गायक थे। उनको अपनी अनुभूतियों और भक्त हृदय के मनोभावों को बिना किसी बनावटीपन के श्रीनाथ जी के सामने गाकर प्रस्तुत करना था। एतदर्थ वे अपने विचार कीर्तन के माध्यम से प्रस्तुत करते थे। उनको अपनी रचना को सुधारने और चमकाने का अवसर कहाँ उपलब्ध होता था। एक दृष्टान्त-
  चरन-कमल बंदौँ हरि-राइ।
  जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै, अँधै को सब कुद दरसाइ।
  बहिरौ सुनै, गूँग पुनि बोलै, रंक चलै सिर छत्र धराइ।
  सूरदास स्वामी करुनामय, बार-बार बन्दौँ तिहिँ पाइ।’’16

जब कवि किसी मार्मिक अनुभूति को व्यक्त करने के लिए सृजन करता है तो वह गीतिकाव्य को रचता है। इस प्रकार से रचा गया साहित्य गीत से सराबोर होता है। जिस काव्य में जितनी अधिक प्रभावान्विति का सफलतम प्रयोग होता है वह उतना ही सुन्दर माना जाता है। यह प्रभावान्विति ही है जो गीतिकाव्य को एक स्वतन्त्र और पूर्ण रचना बनाती है। गीतिकाव्य में प्रभावान्विति लाने के लिए सन्तुलित भाव और समविचार रखने पड़ते हैं। इसी भाव की एकता के फलस्वरूप गीतिकाव्य का आकार संक्षिप्त होता है तो गीति में सघनता और मार्मिकता बनाये रखा जा सकता है। सूरदास जी के काव्य में प्रभावान्विति का सफल प्रयोग हुआ है, इसलिए इनके पद इतने मार्मिक बन पड़े हैं। ‘सूरसागर’ के दशम स्कन्ध के पद संख्या 2973 को उदाहरण स्वरूप देखा जा सकता है जिसमें प्रभावान्विति का सफल प्रयोग हुआ है-
  ‘‘यशोदा बार बार यो भाषै।
  है कोउ ब्रज मै हितु हमारौ, चलत गोपालहिं राखै।’’

निष्कर्ष:
समग्रतः सूर के काव्य में गीतिकाव्य के सभी गुण- आत्माभिव्यक्ति, भावप्रणता, कल्पनाशीलता, संक्षिप्तता, गेयता या संगीतात्मकता, कोमलकान्त पदावली, प्रभावान्विति आदि मौजूद हैं। सूर संगीतज्ञ के गुणों से युक्त थे तो साथ ही भारतीय संगीत के उन्नायक भी। उनके काव्य शास्त्रानुसार रचित हैं तो लोकसम्मत भी, गीतिकाव्य की भावुकता में अभिवद्ध हैं तो समरसता के संचारक और भावभूमि के अनुकूल भी। सूरदास ने अपनी जिह्वा-द्वारा जिन गीतों की धारा को प्रवाहित किया वह सम्पूर्ण जनमानस को सराबोर करती हुई आज भी प्रासंगिक बनी हुई है।

सूर की काव्य-प्रतिभा (गीत-कला) से प्रभावित होकर आचार्य बल्लभ ने उन्हें अपने प्रमुख शिष्य के रूप में अंगीकार किया था, यह प्रमाण-पत्र देते हुए कि, ‘‘सूर ह्वै के ऐसो घिघियात काहै कौ हो, कछु भगवल्लीला वर्णन करि।’’ भक्तमाल के प्रणेता नाभादास ने तो उनकी कवित्त्व शक्ति पर मुग्ध होकर एक काव्यात्मक प्रशस्ति की है जो सूर की काव्यकला और काव्यशक्ति के मूल्यांकन का प्रतिमान बन उठा है-‘‘सूर कबित सुनि कौन कबि, जो नहि सिर चालन करै।’’ (भक्तमाल) सारांश यह कि सही अर्थों में सूरदास हिन्दी के गीत-सम्राट थे।

सन्दर्भ:
1. राय आचार्य गुलाब, सिद्धान्त और अध्ययन- काव्य के रूप, पृष्ठ 107-108
2. ओझा  डॉ. दशरथ, समीक्षा-शास्त्र, पृष्ठ 83
3. रॉयस अर्नेस्ट, लिरिक पोयट्री, प्रस्तावना, पृष्ठ 6
4. इनसाक्लोपीडिया ब्रिटानिका, वैल्यूम XVII, पृष्ठ 181
5. वाजपेयी श्री नन्ददुलारे, सं. सूरसागर, प्रथम स्कन्द, विनय के पद संख्या 1, पृष्ठ 1 नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी, सं. 2009
6. वही, पद संख्या 97, पृष्ठ 31
7 वही, पद संख्या 168, पृष्ठ 55
8. वर्मा धीरेन्द्र, सं. सरसागर-सार, भक्ति तथा विनय के पद संख्या 4, पृष्ठ 9-10, प्रथम संस्करण, साहित्य भवन लिमिटेड, इलाहाबाद, सं. 2011
9. वाजपेयी श्री नन्ददुलारे, सं. सूरसागर, दशम स्कन्द, पद संख्या 478/1096, पृष्ठ 423, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी, सं. 2009
10. शुक्ल रामचन्द्र, सं. भ्रमर-गीत सार, ‘महाकवि सूरदास’ (आलोचना), पृष्ठ 18, कृष्णदास पोरवाल एण्ड कम्पनी, वाराणसी, 1997-98
11. शुक्ल, आचार्य रामचन्द्र, हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृष्ठ 90, प्रथम पेपर बैक संस्करण, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी, सं. 2058
12. शुक्ल रामचन्द्र, सं. भ्रमर-गीत सार, ‘महाकवि सूरदास’ (आलोचना), पृष्ठ 18, कृष्णदास पोरवाल एण्ड कम्पनी, वाराणसी, 1997-98
13. वाजपेयी श्री नन्ददुलारे, सं. सूरसागर, दशम स्कन्द, पद संख्या 636/1354, पृष्ठ 556, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी, सं. 2009
14. शुक्ल रामचन्द्र, सं. भ्रमर-गीत सार, पद 42, पृष्ठ 70, कृष्णदास पोरवाल एण्ड कम्पनी, वाराणसी, 1997-98
15. वही, पद 9, पृष्ठ 59
16. वही वाजपेयी श्री नन्ददुलारे, सं. सूरसागर, प्रथम स्कन्ध, विनय के पद संख्या 1, पृष्ठ 1 नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी, सं. 2009
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अंगदकुमार सिंह: संक्षिप्त आत्म परिचय 
डॉ. अंगदकुमार सिंह, 15 अक्टूबर, 1981 को जन्म गोरखपुर में। 2003 में हिन्दी साहित्य में एम. ए.  तथा 2009 में पी-एच.डी. की उपाधि। ‘समकालीन हिन्दी पत्राकारिता और परमानन्द श्रीवास्तव’ और ‘गोरखपुर का समकालीन मीडिया-परिदृश्य’ के आलावा दो दर्जन पुस्तकों के लेखक और दर्जनभर पुस्तक/ पत्रिका का सम्पादन तथा परिकथा, मीडिया विमर्श, अक्षर वार्ता, साहित्य परिक्रमा, पतहर, मगहर महोत्सव, आज, मुक्त विचारधारा, चौमासा, कथाक्रम, लाइट ऑफ नेशन जैसी अनेक पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित। सम्प्रति जवाहरलाल नेहरू पी. जी. कॉलेज, बाँसगाँव, गोरखपुर में हिन्दी विभाग में असिस्टेण्ट प्रोफेसर तथा पूर्वांचल हिन्दी मंच, गोरखपुर के मन्त्री।
चलभाष: 7460856206
ईमेल: anagadkumarsingh01@gmail.com

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