आदिवासी भाषा, संस्कृति तथा विकास की चुनौतियाँ

पुनीता जैन

पुनीता जैन

प्राध्यापक (हिन्दी), शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भेल, भोपाल

भाषा में लोक की ज्ञान-संपदा, संस्कृति, कला-शिल्प, गीत, संगीत, साहित्य तथा मानव विकास के चरण व उनका अनुभव- संसार स्वाभाविक रूप से संचित होता है। इसलिए किसी भी विशिष्ट समाज की मातृभाषा उसके लोकमानस में मौलिक दृष्टि और समझ विकसित करने में सर्वाधिक सहयोग करती है। उत्तरआधुनिक काल में विविध वैमर्शिक आंदोलनों ने हाशिए के लोगों में उस चेतना का बीजारोपण किया, जिससे वे अपनी अस्मिता की रक्षा के साथ सम्मानजनक उपस्थिति दर्ज करा सकें। स्त्री, दलित, आदिवासी, तृतीय लिंगी समुदायों की उपस्थिति को इसी दृष्टि ने अपने अधिकारों के प्रति सचेत किया। किन्तु इन वंचित वर्गों में आदिवासी समुदायों की सर्वथा भिन्न पहचान रही है। उनका जीवन-दर्शन, संस्कृति, पुरखा साहित्य कथित मुख्यधारा से अलग विचार को पोषित करता है। सृष्टि व प्रकृति के साथ सहजीविता का विचार अर्थात् मानव अस्तित्व के साथ जीव-जंतु, पहाड़, नदियों, जल, जंगल, जमीन के स्वाभाविक सहअस्तित्व को केन्द्र में रखकर विकसित जीवन-शैली का अनुकरण करने वाले आदिवासी समूह वस्तुतः एक अत्यंत उदार और व्यापक विचार दृष्टि को अपनाते हैं। जो आदिवासी समूह स्वाभाविक रूप से जंगल और प्रकृति के सान्निध्य में जीवनयापन करते हुए पर्यावरण के अद्वितीय संरक्षक के रूप में सम्मुख आते हैं, उन्हें कथित मुख्यधारा द्वारा स्थापित जीवन व्यवस्था में प्रवृत्त करने को ही उनका विकास मान लिया जाना विचारणीय है। 
 आदिवासी समुदाय का प्रकृति, जीवन विषयक परंपरागत ज्ञान व पुरखा साहित्य उनकी मूल भाषाओं में संचित है। किन्तु मुद्रण, टंकण की समस्या, रोजगार का अभाव, सरकारी संरक्षण की उदासीनता जैसे कई कारणों से भारत की आदिवासी भाषाएँ विलुप्ति के संकट का सामना कर रही है। ‘‘औपनिवेशिक समय में अंग्रेजी और स्वतंत्रता के बाद हिंदी इन दोनों ही भाषाओं का रिश्ता आदिवासी समाज के साथ सम्मानजनक और न्याय पूर्ण नहीं रहा है। इन भाषाओं के जरिए एक ऐसी राजनीति और संस्कृति हम पर हमलावर रही है। जिसके चलते आज देश की 198 भाषाएँ जिनमें से अधिकांश आदिवासी भाषाएँ है, खत्म हो जाने के कगार पर पहुँच गई हैं। इनमें से सात झारखंड की आदिवासी भाषाएँ हैं- हो, खड़िया, कुडुख, मुंडारी, मलतो, बिरहोरी और असुरी। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण हैं कि भारतीय संविधान जहाँ आदिवासी अस्मिता, स्वशासन, रीति-रिवाज, भाषा, संस्कृति की रक्षा के लिए संकल्पबद्ध है वहीं हमारे राज्य और देश नहीं।’’1 यहाँ स्थापित विचार है कि मातृभाषा में शिक्षा व्यक्ति के स्वाभाविक विकास का प्रथम चरण है। मध्यप्रदेश में अत्यंत पिछड़े सहरिया आदिवासी समुदाय को विलुप्ति के संकट से बचाने तथा उन्हें शिक्षित करने का जब प्रयास किया गया तो यह देखने में आया कि उनके बच्चे हिंदी में दी जाने वाली शिक्षा से स्वयं को जोड़ नहीं पा रहे हैं। किन्तु जैसे ही उनकी मूल भाषा में अध्यापन की व्यवस्था की गई, वे शिक्षा के साथ धीरे-धीरे जुड़ने लगे। यह छोटा सा उदाहरण दर्शाता है कि मातृभाषा से जुड़ाव एक बालक को शिक्षा देने का सबसे सहज माध्यम बन सकता है।
आदिवासी भाषाओं का संरक्षण उनके संचित ज्ञान और संस्कृति के संरक्षण तथा स्वाभाविक विकास की नींव तैयार करता है। आदिवासी समुदाय को उनकी जीवनचर्या और विचार से विच्छिन्न करके यदि मुख्यधारा के भौतिक विकास को ही उनका विकास मान लिया जाए तो यह कई तरह के प्रश्नचिह्न खड़े करता है। यह ध्यान रखना होगा कि संताली को संविधान की आठवीं सूची में शामिल करने से इसका लाभ संताली समाज को मिला है। झारखण्ड में राज भाषा का दर्जा प्राप्त 8 भाषाओं मुंडारी, हो, खड़िया, कुडुख, नागपुरी, खोरठा, पंचपरगनिया, कुरमाली मे ंप्राथमिक शिक्षा दिए जाने का निर्णय वहाँ के आदिवासी समुदाय को आगे ले जाने का महत्वपूर्ण कदम है।2 आज झारखंड के कई आदिवासी रचनाकार अपनी मूल भाषा के साथ हिन्दी में भी कहानी, उपन्यास और कविताएँ लिखकर अपनी महत्त्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। यह स्थिति मध्यप्रदेश की आदिवासी भाषाओं से कहीं बेहतर है। यह भी देखा गया है कि मध्यप्रदेश की आदिवासी भाषा और पुरखा-साहित्य पर कथित मुख्यधारा की संस्कृति का प्रभाव पड़ने से उन आदिवासी भाषाओं के स्वतंत्र वैशिष्ट्य पर प्रभाव पड़ा है। आदिवासी समाज की शिक्षा में उनकी भाषा के साथ उनके सांस्कृतिक वैशिष्ट्य को सम्मिलित करने से उत्पन्न जुड़ाव उन्हें शिक्षा की ओर आकर्षित करने में सक्षम और उनके सर्वांगीण विकास की राह प्रशस्त करने में सहायक है।
वर्तमान शिक्षा-व्यवस्था और लादी गई भाषा से आदिवासी समुदाय का समुचित विकास संभव नहीं है। यह स्थिति हिंदी और वर्तमान शिक्षा प्रणाली के विषय में भी विचारणीय है।‘‘ एक तरफ मातृभाषाओं की नाकाबिलियत का सतत् अहसास और दूसरी ओर शिक्षा के माध्यम के रूप में पराई भाषा के व्यवहार ने हमें एक अजब तरीके से दुविधाग्रस्त बना दिया । यह दुविधाग्रस्तता हमारी शिक्षा व्यवस्था को खोखला करती जा रही है। गगगग देशज भाषाओं में मौजूद पारंपरिक ज्ञान की अवहेलना और मौलिक ज्ञान के सृजन में विफलता के नाते शिक्षा प्रणाली लगातार प्रश्नांकित हुई ।’’3 जिस शिक्षा व्यवस्था पर मौलिक दृष्टि मूल्य संवर्धन और रोजगार संबंधी कई सवाल उठाए जा रहे हो उसको आदिवासी समुदाय पर लादना उन्हें सांस्कृतिक दृष्टि से विपन्न करना है । आदिवासी समुदाय के लिए उनकी मातृभाषा में शिक्षा के पक्ष में यह विचार भी उल्लेखनीय है ...‘‘ (यहा) भाषाई स्तर पर पूरी सोच का अंतर है। ऐसे हमारी मुख्यधारा की भाषाएँ कहीं दलित बन जाती है तो कहीं सवर्ण ! कहीं सर्वहारा है तो कहीं कारपोरेट जगत की उद्घोषक। दरअसल यह भाषाएँ वर्चस्ववादी प्रवृत्ति की पोषक हैं और उपनिवेशवाद का हथियार भी हैं। अंग्रेजी विदेशी उपनिवेशवाद का हथियार है तो हिंदी या क्षेत्रीय भाषाएँ आदिवासी क्षेत्रों के आंतरिक उपनिवेशवाद का औजार है । इसलिए उनमें शासन सत्ता की गंध भरी है- भाई चारे की महक कम है।’’4
यह विचारणीय है कि विकास की जिस अवधारणा को कथित मुख्यधारा ने आत्मसात किया है क्या वह वास्तव में समूची सृष्टि और प्राणिजगत के लिए हितकारी है! इस पर विचार किए बिना सह-अस्तित्व और सहजीवी दर्शन को जीने वाले आदिवासी समुदायों को ठेलकर इस ओर लाना कहाँ तक औचित्यपूर्ण है। क्या कभी किसी आदिवासी से पूछा गया है कि वह क्या चाहता है! या वर्चस्ववाद की मनोवृत्ति के श्रेष्ठताबोध ने स्वयं ही यह तय कर लिया है कि वह श्रेष्ठता अंतिम विचार है और हाशिए के समाज को उसमें सम्मिलित करके वह अपनी उदारता और संवेदनशीलता का उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है। 2010 के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित लेखक ‘मारियो वार्गास ल्योसा’ के उपन्यास ‘एल आब्लादोर’ (हिंदी अनुवाद - किस्सागो) का यह संवाद कई प्रश्न उत्पन्न करता है-’’ क्या हमारी कारें, बंदूके, जहाज और कोकाकोला हमें अधिकार देते हैं कि हम उन्हें खत्म कर डालें क्योंकि उनके पास ये तमाम वस्तुएँ नहीं है या कि तुम ‘जंगलियों को सभ्य बनाने में विश्वास करते हो, दोस्त ? कैसे ? उन्हें सैनिक बनाकर ? या उन्हें फिदल परेरा की तरह क्रिओल के खेतों में बंधुआ मजदूर बनाकर ? उन्हें अपनी भाषा, धर्म, रीति-रिवाज बदलने को मजबूर करके जैसा कि मिशनरी करने की कोशिश कर रहे हैं? इस सब से क्या मिलेगा? सिर्फ इतना ही ना कि हम उनका दोहन आसानी से कर सकेंगे। ऐसा करके हम उन्हें मानव जाति के चलते फिरते विद्रूप में बदल देंगे।’’5 यह उपन्यास आदिवासी संस्कृति के उस सार्वभौमिक वैशिष्ट्य को भी रेखांकित करता है जिस को आधार बनाकर उनके प्रति विचार दृष्टि को नियत किए जाने की जरूरत है।’’... उनकी जीवन चर्या को कौन सी चीज संतुलित करती थी- प्रकृति के प्रति एक ऐसी दृष्टि, जो उसे इन संस्कृतियों का एक अद्वितीय गुण लगता था। यह एक ऐसी चीज थी जो सभी आदिवासियों में तमाम विभिन्नताओं के बावजूद समान रूप से पायी जाती थी। उस दुनिया की गहरी समझ, जिसमें वे आद्योपांत डूबे थे, एक ऐसी समझ जो अनंत काल से चले आ रहे रिवाजों, संस्कारों, निषेधों, भय, नित्य कर्मों के गझिन जाल के रूप में पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती आई थी। ...... ये आदिवासी आज तक इसलिए बचे हुए हैं क्योंकि उन्होंने अपनी आदतों, रीति रिवाजों को प्रकृति की लय के साथ एकात्म कर लिया हैं, उसके प्रति बिना हिंसा किए, उसमें बिना कोई विचलन पैदा किए, उसे जीवित रहने के लिए जो कम से कम जरूरी है उतना भर लेकर । ताकि पलटकर वह उन्हें ही नष्ट न कर डाले। उससे बिल्कुल उलट जो आज हम सब लोग कर रहे हैं, उन तत्वों को आमूलचूल नष्ट करते हुए जिनके बिना हम वैसे ही नष्ट हो जाएँगे जैसे बिना पानी के फूल सूख जाता है।’’6 निश्चित ही उक्त पंक्तियाँ स्पष्ट करती हैं कि आदिवासी समुदाय की शिक्षा का विचार उनकी भाषा में, उनकी सहभागिता और विचारों को प्राथमिकता देकर ही उनके अस्तित्व व अस्मिता की रक्षा हो सकती है। जबकि हमारी विकास की अवधारणाओं के निर्माण में उनकी उपस्थिति व विचार, दर्शन को महत्त्व देने की प्रवृत्ति न्यूनतम है। 
 आदिवासी संस्कृति, गीत, संगीत, नृत्य व वेशभूषा को बाजारवाद ने प्रदर्शन की वस्तु बना दिया है। आदिवासी संस्कृति व कला के नाम पर उनके भौतिक प्रदर्शन से इस संस्कृति को क्या उपलब्ध हुआ है, यह भी बड़ा प्रश्न है। हाँसदा सौभेंद्र शेखर की कहानी ‘आदिवासी नहीं नाचेंगे’ का एक पात्र मंगल मुर्मू विशिष्ट आयोजन में नृत्य के लिए इंकार करते हुए कहता है-‘‘ मैंने सिर्फ इतना कहा, हम आदिवासी अब और नहीं नाचेंगे - इसमें क्या गलत है ? हम खिलौनों की तरह है- कोई हमारा ऑन का बटन दबाता है या पीछे की चाभी घुमाता है और हम संथाल हमारे टामाक् और तुमदाक् पर संगीत बजाने लगते हैं या हमारे तिरियों पर धुन बजाने लगते हैं जबकि कोई हमारे नाचने की जमीन ही छीन लेता है । मुझे बताएँ क्या मैं गलत हूँ ?’’7 उपर्युक्त पंक्तियाँ एक आदिवासी समुदाय के जल, जंगल, जमीन से विस्थापन, सांस्कृतिक उच्छेदन, प्रदर्शन की वस्तु बन जाने की पीड़ा का बयान है। ऐसे बयान उनके लिए बनाई जाने वाली तमाम नीतियों के निर्माण में आधारभूत विचार के रूप में प्रयुक्त किए जाने की जरूरत है। आदिवासी कला, शिल्प, संगीत, गीत, नृत्य को प्रदर्शन मात्र की वस्तु बना दिए जाने की पीड़ा के पीछे उनके गंभीर तर्क भी हैं - ‘‘हमारे सारे सर्टिफिकेट और शील्ड, उन्होंने हमें क्या दिया ? दिकू बच्चे स्कूल और कॉलेज जाते, शिक्षा और नौकरी पाते हैं। हम संतालों को क्या मिलता है ? हम संथाल गा सकते हैं, नाच सकते हैं और हम अपनी कला में अच्छे हैं। फिर भी हमारी कला ने हमें क्या दिया है ? विस्थापन, तपेदिक । ’’8 वस्तुतः कथित मुख्य धारा द्वारा आदिवासी कला का दोहन उन्हें पीड़ा पहुंचाता है। आदिवासी समुदाय अपनी संस्कृति, भाषा, कला के प्रति समर्पित रहते हैं उदाहरण के लिए, पूर्वोत्तर राज्यों के आदिवासी समूह सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा हेतु सदैव सजग रहे हैं। उनके विविध प्रदर्शनों में सांस्कृतिक गीत, संगीत और वाद्य यंत्रों का सार्थक प्रयोग और उनकी प्रतिरोध की संयमित शैली इस सांस्कृतिक विरासत का सुंदर नमूना प्रदर्शित करती है। अतः आदिवासी शिक्षा तथा विकास के विचार में उनकी संस्कृति, दर्शन, भाषा को आधार बनाए जाने की आवश्यकता स्पष्ट है। इसकी जरूरत इसलिए भी है क्योंकि कथित स्थापित सभ्य समाज के इनके प्रति गहरे पूर्वाग्रह है। भारतीय समाज के मध्य वर्ग के मानस में बैठी छवि से इसे समझा जा सकता है। 
आदिवासी समाज में जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के अतिरिक्त उपभोक्तावादी प्रवृत्ति नहीं है। इसलिए विकास के स्थापित मानदंडों के बीच आदिवासी संस्कृति, मनोविज्ञान को समझने की जरूरत है। उनके पास सुदृढ़ सामाजिक, सांस्कृतिक व आर्थिक व्यवस्था रही है तथा उनका धार्मिक ढांचा सर्वथा भिन्न प्रकृति पर आधारित है। बाह्य हस्तक्षेप ने उनकी समूची जीवन व्यवस्था को प्रभावित या खंडित किया है। अतः आदिवासी समाज की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक संरचना और मान्यताओं के गहन विश्लेषण व आदिवासी सहभागिता के साथ ही उनके जीवन में बदलाव तय किए जाने की आवश्यकता है। 

संदर्भ ग्रंथः-
1. आदिवासी साहित्य विमर्श-गंगा सहाय मीणा, (लेख-भाषा, साहित्य और आदिवासी स्त्रियाँ -वंदना टेटे) अनामिका पब्लिशर्स पृष्ठ 193-194
2. आदिवासी भाषा और शिक्षा- रमणिका गुप्ता, स्वराज प्रकाशन, पृष्ठ 14-15
3. मातृभाषा की नागरिकता जरूरी है - सदानंद शाही, जनसत्ता, 23 फरवरी, 2020 पृष्ठ 7
4. आदिवासी भाषा और शिक्षा - रमणिका गुप्ता, पृष्ठ 8-9
5. किस्सागो - मारियो वार्गास ल्योसा, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ 36
6. वही, पृष्ठ- 36-37
7. आदिवासी नहीं नाचेंगे - हाँसदा सौभेन्द्र शेखर, राजपाल एण्ड संस, पृष्ठ 172
8. वही, पृष्ठ 178-179
 

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