आत्महीनता एवं अहिंसा

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

लेखक भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं एवं सेतु संपादन मंडल के सम्मानित सदस्य हैं। आप अहिंसा आयोग के समर्थक एवं अहिंसक सभ्यता के पैरोकार भी हैं।

भारत की वैचारिकी और सोच को समझना और उसमें हिंसा की पृष्ठभूमि को रेखांकित करना कितना कठिन है। एक विशाल आबादी वाले देश में प्रत्येक जगह प्रेम और आनंद की इसलिए पृष्ठभूमि की खोज को रेखांकित करके उसकी तह तक जाना भी एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। यह नैतिक शोध और बोध हिंसा की तह में देखने से यह पता चलता है कि पूरी कोशिशें कभी-कभी सबकुछ पर पानी फेरने वाली हैं। 
शाम एक रेस्तरां में खाने की टेबल पर जब कोई यह कहते हुए सुनेगा कि हमने सैकड़ों लोगों को मारा और उसके बाद उनकी गर्दन और सीने पर पैर रखकर खाना खाया। यह एक वीभत्स सी बात थी और कोई भी इसे सुनते हुए सिहर जाएगा। लेकिन यह क्या सच हो सकता है? क्या ऐसे भी क्रूर लोग इस जगत में जी रहे हैं? यह एक बहुत भयावह बातचीत है। वह कौन थे और कहाँ से आये थे किसलिए आए थे और वे कहाँ गये इसका कुछ पता नहीं। लेकिन वे जो भी थे अपने आप में एक क्रूर दिल इन्सान थे। 
क्रूरता उन्हें अपने ही समाज से मिली होगी। कोई अचानक ऐसी चीजों का सूत्रपात नहीं होता। यह तो क्रमिक रूप से उनके अपने परिवार और संस्कृति-सभ्यता से मिली चीजें होंगी या तो उनकी ऐसी संगती होगी जहाँ ऐसे लोग होंगे जो हिंसा की अग्नि की आंच सेंकते होंगे। लेकिन इसकी धपस तो दूर तक पड़ती है। अगली पीढ़ी तक फैलती है यह आंच। और सच कहें तो उस हिंसा में विश्वास करने वाले लोग अपना नाश कर लेते हैं।
भारत में हिंसाओं का इतिहास बहुत पुराना है जबकि भारत एक अमन पसंद देश है। शांति इसके आकाश-पृथ्वी-नभ मण्डल में है फिर ऐसे शब्द कैसे किसी की जुबान पर आते हैं और किसी को भी क्यों कंपकपी पैदा कर देते हैं? इस सवाल के सन्दर्भ में जो अज्ञात है वह है मनुष्य की प्रवृत्तियों में भारी परिवर्तन। सोशल मीडिया ने तो इस तरीके की घटनाओं को और प्रवृत्तियों को बहुत बड़े पैमाने पर बढ़ाया है।
सोशल मीडिया से जो भी हिंसक प्रवृत्तियों का प्रसार हो रहा है वह किसी भी राज्य के लिए ठीक नहीं है। इसमें जन-धन की हनी होती है लेकिन भारत का सम्मान भी गिरता है। एक सहिष्णु राष्ट्र की रूपरेखा भारत में और हमारी कल्पना में शामिल रहा है। 
देश के तमाम कोने में भ्रमण कर रहे शैलानियों ने यह महसूस किया है कि भारत जैसा देश दुनिया में नहीं है। यहाँ के रग-रग में और हर कोने में जो रौनक है वह यहाँ की आध्यात्मिक शक्तियां हैं। भारत अध्यात्म और दर्शन की वजह से दुनिया में पूज्य हुआ है। इसलिए उसकी प्रतिष्ठा भी अब उसी के हाथ में है। राष्ट्र को एक ऐसी छवि बनाकर भारत को दुनिया के सामने प्रकट करना हर भारतीय की जिम्मेदारी है।
भारत में दंगों का इतिहास रक्तरंजित लगता है। सहिष्णुता का इतिहास हमारे शुभत्व का इतिहास है। हम शुभ और अशुभ के सौन्दर्यबोध को समझ पायें तो हमारे लिए यह बहुत अच्छी बात होगी। यदि शुभ और अशुभ में आज अंतर नहीं समझ आ रहा है तो इसमें भारतीयों की कमी है। इसके पीछे सबसे अहम् कारण है कि हमारा खान-पान, रहन-सहन और सोच में भरी बदलाव हो चुका है। हमारी आध्यात्मिकता और सोच में बदलाव है। इसकी वजह से शुभ और अशुभ में अंतर हम नहीं कर पा रहे हैं। 
शुभ तभी हमारे द्वार खटखटाते हैं जब हम नैतिक और सहनशील होकर सबके शुभ के बारे में सोचते हैं। दूसरों के लिए त्याग की भावना की बात पूर्व में किया जा चुका है। वह त्याग ही सबके शुभत्व की डोर है। उससे लोग बंध नहीं पा रहे हैं बल्कि उन डोर से दूर-दूर तक कोई रिश्ता ही नहीं बन पा रहा है, यह सबसे बड़ी समस्या है।
हमारे देश की संत परम्परा में हम यह पाते हैं कि वे सत्यानुगामी थे। वे योगी थे। वे त्यागी थे। वे मोहमाया से दूर थे, वे किसी प्रकार की लिप्सा नहीं रखते थे। धन संचय नहीं करते थे। उनमें मनोविकार नहीं होते थे क्योंकि ब्रह्मचर्य का वे पालन करते थे। शीलता और संसर्ग से पूरी सृष्टि का कल्याण होता था। यदि धर्म के नाम पर व्यापार होने लगे तो उस देश का क्या होगा? वहां अहिंसक सभ्यता का विकास कैसे होगा? वहां शील लोगों की भी अपनी पीड़ा कैसी होगी, इसकी कल्पना करके देखें, हमारे भारत के संतों की लम्बी परम्परा को हम पुनर्जीवित कैसे करें और कैसे अध्यात्म और दर्शन से दुनिया को आश्चर्य में डाल दें, यह भारतीयों को तय करना है। हमारी प्रतिष्ठा, हमारे पूर्वजों की कमाई हुई प्रतिष्ठा से बढ़कर है। यदि उनकी श्रेष्ठताबोध में अपने गौरव की खोज भारतीय नहीं करते हैं तो यह भारत के हर नागरिक के लिए एक अंतहीन दुस्कर यात्रा की ओर प्रस्थान है।
जे कृष्णमूर्ति ने भारतबोध  और मनुष्यबोध पर विचार किया तो यह पाया कि बोधत्व तनाव से नहीं मिलते। प्रेम और आनंद में बोधत्व होते हैं। स्व-बोध हो सकता है दुःख के समय होना लोग मानते हों लेकिन प्रेम और आनंद में ही यह वास्तव में विद्यमान है। प्रेम की अनुभूति तो प्रेम से ही की जा सकती है। सहजीवी लोग प्रेम की अनुभूति तभी कर पाते हैं जब तात्विक रूप से दुसरे से प्रेम करें और उसे आनंदानुभूति दिलाएं।  निश्छल और निष्कलुष, लिप्सारहित और अनुभवजन्य प्रेम के माये क्या हैं, यह एक अहिंसक व्यक्ति अच्छे से जानता है। भारत के धर्माचार्यों ने इसे टाक पर रख दिया। भारत का पतन इस कारण भी हुआ क्योंकि यहाँ प्रेम को भी एक टूल्स के रूप में प्रयोग करने लगे। त्याग की भावना प्रेम में कभी उपस्थित नहीं रहती तो वह स्व-बोध नहीं करा सकती। हमारे अध्यात्म और संस्कृति में यह बदलाव आज का समाज महसूस कर रहा है।
आत्महीनता ने मनुष्य को ज्यादा हिंसक बनाया, आप देखेंगे कि महावीर, बुद्ध और दूसरे जो बड़े संतों की परम्परा है उनमें आत्महीनता नहीं थी। किसी रेस्तरां में बैठे व्यक्ति के भीतर आत्महीनता का बोध उसे हिंसा के लिए सोचने को बाध्य करती होगी। अन्यथा वह ऐसा नहीं सोचता और न करता और न ही आसपास बैठे लोगों को आतंकित करने का यत्न करता। आखिर जो हमारे पूर्वज अहिंसक हुए उनमें ख़ास बात क्या थी? यदि हम इस पर विचार करें तो निःसंदेह किसी सही परिणाम तक पहुँच सकते हैं। आत्महीनता एक मनोवैज्ञानिक रसायन को उत्पन्न करते हैं जो व्यक्ति को हिंसा की ओर ले जाते हैं। इस रसायन का नाश कैसे हो इसको हमें अवश्य विचार करना चाहिए। किसी भी राष्ट्र में समय रहते यदि सही बातें सोच ली जाती हैं तो वह राष्ट्र विकास करता है। वहां के लोग तरक्की के नए कीर्तिमान स्थापित करते हैं।
पृथ्वी पर मानव और मानवेतर प्राणियों की रक्षा के भी हम दम्भ भरते हैं। हो सकता है कुछ स्तर तक यह बात सही हो लेकिन जो जीव मनुष्य के संसर्ग में न आकर केवल प्रकृति के सम्पर्क में हैं उनका भी अपना जीवन है। लेकिन मनुष्य-धर्म तो उसके सबसे ज्यादा विकास की गाथा है। मानवीय संवेदना यदि हमारी आत्महीनता से मुक्ति पा जाएँ तो हिंसा की कोई जगह नहीं होगी। वैर से वैर बढ़ते हैं और प्रेम से प्रेम का प्रकीर्णन होता है, ऐसा बुद्ध ने बहुत पहले कहा था। किन्तु हमारे आसपास का समाज हिंसा की जिस दहलीज़ पर कदम रख चुका है वह भयावह है। आत्महीनता के मनोविज्ञान को समझते हुए हमारे मस्तिष्क को स्फूर्त बनाने वाले आध्यात्मिक लोगों की इस पर मिलीजुली प्रतिक्रिया आ सकती है लेकिन यह बदलाव उन्हें ही करना है जिससे हिंसा को कोई स्थान न मिले।
स्वतंत्र और परिपक्व संस्कृति के आध्यात्मिक पृष्ठभूमि भारत से ज्यादा गहरी किसी और देश में नहीं है। इसलिए उम्मीद हम केवल अभिव्यक्त नहीं कर सकते अपितु पूर्ण विश्वास कर सकते हैं कि हमारी सांस्कृतिक परिवर्तन की दिशा हमारे पूर्वजों के संकल्प को धोखा देने वाली न हों। इसलिए सहजीवी प्रेम और आनंद की भावभूमि निर्मित करने के लिए हमारी कोशिश आवश्यक है।

पता: यूजीसी-एचआरडीसी, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर-470003 (मध्य प्रदेश),
चलभाष: +91 981 875 9757, ईमेल: hindswaraj2009@gmail.com

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