पल्लवी :एक हरी कोमल पत्ती


कहानी: इला सिंह


अभी सुबह पूरी तरह नही हुई थी। सर्दी की सुबह वैसे भी थोड़ा आलसी हो जाती है धीरे-धीरे ही उठती है। 
 पूरब का चेहरा भी अभी लाल कहाँ हुआ था। रोज-रोज आने वाले सूरज से भी यह पूरब का चेहरा न जाने क्यों शर्म से लाल हो जाता है। 

सर्दी की सुबह जैसी ही, पल्लो भी आलसी हो उठी है। माँ की पुकार का उस पर कोई असर नहीं हो रहा। पुकार अब चिल्लाहट में बदल चुकी थी। आवाजों से बचने के लिए कथरी मुँह तक खीच ली है उसने, मगर... कथरी अब छोटी पड़ने लगी है। 

कथरी चेहरे पर खींचते ही पैर कथरी से बाहर निकल पड़े, पैरों में ठंडी हवा लगी तो घुटने पेट की तरफ मुड़ गए और चेहरा भी छाती में घुसा गुड़ीमुड़ी हो पड़ गयी, जिससे माँ की आवाजें कानों में अब थोड़ी कम हो गईं और थोड़ी देर में अपनी साँसों से ही कथरी भी गरम हो उठी तो वह फिर अपने अधूरे सपने में डूब मीठी नींद में खो गई। मगर कितनी देर …

जमना ने थेगलियों, पैबंदों से भरी कथरी एक झटके से उतार दूर फेंक दी, “पल्लो की बच्ची! उठती क्यों नहीं है? कुंभकरण की नीद सो रही, मरी। देख जरा, दो चार घड़ी मे उजियारा हो जाएगा, मैं निकल रही। जल्दी उठके निकल, नहीं तो कुच्छों नहीं मिलेगा।" यूरिया खाद की प्लास्टिक बोरियों से बनी बड़ी-सी थैली उठा जमना नीली प्लास्टिक के पर्दे से बने खोली के दरवाजे से निकलने लगी कि तीखी, बर्फीली हवा जैसे परदा हटने का ही इंतजार कर रही थी। जमना निकली और हवा जगह बना सर्र से अंदर घुस आई। बर्फीली हवा ने अंदर आ पल्लो को एक पल को ठंडी झुरझुरी से भर कँपकँपा दिया।

  फटे फ्रॉक को नीचे खींच-खींच कर अपनी नंगी टांगों को ढकती, बाँहों से घुटनों को घेरे मुँह बिसूरती उकड़ूँ बैठी पल्लो को देख ठिठक उठी जमना एक पल को ... , फिर गहरी साँस ले आगे बढ़ गई।

आज रात की बची सूखी रोटी भी नहीं, क्या खाकर निकलेगी, जनम जली? जमना के स्वभाव में गाली देना नहीं है, मगर कलेजे में पीड़ा की हूक-सी उठ आई है। पल्लो को सुबह कुछ खाकर निकलने की आदत है। पल्लो तो बच्ची है अभी, जमना तो मुँह धोया और निकल ली कबाड़ बीनने।

अपनी निरुपायता, असहायता पर एक खीज हो आई उसे और आई उस कमबख्त की याद जो इस नन्ही सी, मासूम जान को उसके अंदर पेबस्त कर न जाने किस कुआं खाई में डूब मरा। दस साल हो गए, कभी बंदे ने शक्ल नहीं दिखाई। कैसे-कैसे रास्तों से होकर ज़िंदगी गुजरी है सोचती है तो काँप जाती है। 

 पल्लो होने को थी और वह निर्लज्ज उसे ऐसी असहाय, लाचार अवस्था में छोड़ न जाने कहाँ गायब हो गया था। कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि उसे उस सेठ ने ही मरवा दिया जिसके यहाँ वह ड्राइवर था। सेठ की बेटी से टांका जो भिड़ा था उसका। जमना का दिल नहीं मानता मगर, उन दिनों तो कैसा दीवाना हुआ पड़ा था उसका। मगर हो भी सकता है, सेठ की गाड़ी तो चलाता ही था, बेटी को भी रोज ही स्कूल छोड़ने जाता रहा। 

गाँव से भागकर जब उसके साथ इस शहर आई थी, कैसे सोने-से दिन थे, चाँदी-सी रातें। उन दिनों को याद करती है तो आज नौ-दस साल की बच्ची की माँ होने के बावजूद भी उसका दिल अजब डूबा-डूबा हो जाता है। दिल में तितलियाँ उड़ने वाले उन दिनों की यादों को परे झटक एक गंदी गाली उस हरामी के लिए मुँह से निकलती है। और सर झटक तेजी से गली में अपने कदम बढ़ा देती है जमना। 

ठंड तो गज़ब है। हाँ तो ...महीना भी तो कौन है!पूस की जवानी उफान पर है। भोर होने में ज्यादा देर नहीं अब, बल्कि हो ही चुकी, यदाकदा कौओं की कांव-कांव से अंदाजा हो रहा था। शाल को और कसकर लपेटते हुए सोचती है जमना। अच्छा, ठंड का पक्षियों की संगीत साधना पर कोई असर नहीं होता क्या, उनकी चहचहाहट थोड़ा-थोड़ा तो चालू हो चुकी। गर्मियों जितनी भले न हो. गर्मियों में तो पक्षियों संग टहलने वाले अमीरों का शोर भी बहुत जल्द शुरू हो जाता है. अभी तो इस ठिठुरती सर्दी में सड़क भी कोहरे की चादर तन पर लपेटे घुन्ना बनी पड़ी है। 

क्या सही में पक्षियों को मौसम नहीं सताता ...फिर ताल पर सर्दी भर उन सुंदर पक्षियों के झुंड के झुंड कहाँ से चले आते हैं। पल्लो जमना की इस बात पर हंस पड़ती है। ठंड क्यों नहीं लगेगी माँ-ठंड से बचने ही तो यहाँ आते हैं। ये सब प्रवासी पक्षी हैं, दूर देश से आए खंजन पक्षी। और भी तो न जाने क्या-क्या नाम बताती है पल्लो-...धोबन, भूरी, पीली, खरैया, पिनाकी ये तो फिर भी ठीक है, कुछ तो बड़े बेढंगे नाम बताती है ...खिंडरिच, खंडलिच, खंडरीट, जिन्हें मन में तो जमना फिर भी उच्चारित कर लेती है, बोलने में तो जबान बुरी तरह लड़खड़ा जाती है. पल्लो तो कैसे साफ-साफ बोलती है. और कैसा तो साफ, खुले गले से गाती है, 
‘जानि सरद रितु खंजन आए
पाइ समय जिमि सुकृत सुहाए’

"सर्दियों में अपने यहाँ उतनी ठंड नहीं होती न माँ! जितनी इनके देश में होती है। सो ठंड से बचने को ही यहाँ आते हैं।"

"लो बताओ ...इतनी दूर से उड़कर यहाँ आते हैं।"

वैसे, पल्लो उसकी है बड़ी दिमाग दार और उससे भी बढ़कर उसकी नीती मैम। कितना कुछ बताती-सिखाती रहती हैं।

पल्लो को ताल के किनारे इन पक्षियों को देखना कितना भाता है, मगर समय ही कहाँ मिलता है उस बेचारी को। पल्लो का सोच जमना का दिल रंज और लगाव से एकसाथ भर उठा।

काम से पैसे मिलने में तो देर है, कबाड़ का भी चार दिन से पैसा नहीं मिला। मगर राशन की दुकान वाला थोड़ा बहुत उधार दे देता है। बस ये कबाड़ी सेठ अजीब है दस बीस रुपये देने में भी आनाकानी रहती है उसकी, जबरदस्ती टालता रहेगा। आज लेकर ही आएगी वह। भले बड़े गोदाम ही जाना पड़े। आते वक्त पल्लो के लिए डबलरोटी भी ले आएगी। कितनी पसंद है उसे। स्कूल के लिए टिफिन में भी रख देगी। पल्लो के चेहरे की खुशी का ध्यान आते ही जमना के चेहरे पर भी मुस्कान आ गयी और हाथों में भी तेजी आ गयी कबाड़ चुनने-छांटने में। 

माँ के जाते ही पल्लो फिर से कथरी को सिर तक खींच मुँह कथरी में छिपा लेती है। मगर नींद टूट चुकी थी और पेट की गुड़गुड़ से भी मजा किरकिरा हो चुका था कथरी की गरमाई का। अचानक रमेसा की याद हथोड़े सी दिल पर पड़ी और भकभका कर आँख पूरी खुल गयी। अरे बाप रे रमेसा तो अब तक आधे कागज़, कबाड़ पर हाथ साफ कर चुका होगा। 

यह रमेसा भी पूरा भूत ही है, कबाड़ के मारे रात को भी सोता है या नहीं, क्या पता। वो कितनी भी जल्दी उठ ले पर ये मरा उससे पहले मौजूद होता है। मगर... रमेसा दिल का अच्छा है, कभी पल्लो देर से पहुँचती है तो वो उसे अपने बीने कागज़, प्लास्टिक का एकाध डिब्बा या कोई बोतल पकड़ा देता है। मगर पल्लो को अच्छा नहीं लगता, किसी से मदद लेने को उसका दिल गवारा नहीं करता। बस रमेसा का वहाँ होना, अपने साथ उसका होना अच्छा लगता है। भोर की उजास में वह साये सा उसके साथ रहता है, भले वो उससे कितना भी उखड़ी रहे। उसकी वजह से पौ फटने से पहले के अंधेरे में उन सुनसान गलियों मे डर नहीं लगता। 

पल्लो कथरी एक तरफ फेंक उठ खड़ी हुई . पानी से भरी प्लास्टिक की बोतल ले खोली के पीछे जाती रेलवे लाइन पर फारिग होकर आई तो बजते दाँतों पर काबू करना मुश्किल हो गया। गरम चाय की चाह में माँ की लकड़ी के पट्टे पर सजी रसोई की तरफ ताका-बर्तन सब धुले औंधे एक पंक्ति में सैनिकों की टुकड़ी से सावधान मुद्रा में खड़े थे। नहा धोकर परेड को तैयार मगर बिना हथियार। चाय का भगौना, कप, रोटियों का कटोरदान सब खाली, धुले पुंछे। दिल बुझ गया पल्लो का, ऊपर से ठंड कंपकपी दिए जा रही थी।

 चाय का डब्बा खोला तो चेहरा खिल उठा, आँखों में चमक कौंध गयी, हाँ काम भर की चाय की पत्ती पड़ी थी। उल्टे पड़े भगौने को सीधा कर, पानी डाल एक बर्नर वाले चूल्हे पर चढ़ा दिया। गनीमत थी जल गया वरना गैस का तो रोना ही रहता है। ये चूल्हा और छोटा सिलेंडर पिछले साल घर में आया था। पिछले साल कुछ नेता टाइप लोग बस्ती में आए थे। बड़ी-बड़ी बातें कर रहे थे। लग रहा था जैसे बस्ती का सारा दुख-कष्ट अब मिट चला।

खास तो कुछ नहीं बदला हां, गैस का जरूर आराम हो गया। मगर गैस भी तो, महीनों-महीनों भरवा ही नहीं पाती माँ। 

बिना दूध, काली चाय गरम कोकाकोला समझ गटक ली तो शरीर में गर्मी दौड़ गई। लेकिन वो गर्मी ज्यादा देर रहने वाली नहीं ये अब अनुभव से पल्लो जानने लगी है। फ्रॉक के ऊपर पुरानी-सी, जगह-जगह सीवन उधड़ी, अपने नाप से दोगुना बड़ी जैकेट और टांगों में मोहरी और घुटनों से घिसी, ढीली, बेढब सी पैंट जो माँ ‘नेकी की दीवार’ से उठा लाई थी, और अब पल्लो का कबाड़ बीनने का ड्रेस कोड बन चुकी थी, को चढ़ा लिया और सिर, गले में काला मफलर लपेट लिया, जिसकी हालत भी पतली ही थी लेकिन उसके छोटे से सिर और गरदन पर दो लपेटे अच्छे से आ ही गये। 

काले आवरण से घिरा सफेद चेहरा कुछ ज्यादा ही सफेद लग रहा था। सफेद चेहरे पर जड़ी दो काली चमकदार आँखें मानो चाँद पर दो काले डिठौने लगा दिए हों किसी ने|

सर्दी को हराने के जबरदस्त ख्याल से भरी पल्लो ने टूटे आइने में अपनी सजधज जरा गर्व से ही देखी. हाँ, कोई नहीं पहचानेगा अब, अगर स्कूल या माँ जहाँ काम करती है में से कोई मिल गया। वैसे इतनी सुबह-सुबह सर्दी में कौन निकलता है, जी! मजबूर किस्मत के मारों के अलावा। 

पल्लो बोरा उठा बाहर निकली तो चारों तरफ बिखरे ठंडे अँधेरे को गरमाने की बेजान कोशिश करती स्ट्रीट लाइट की पीली, फीकी रौशनी चारों तरफ फैली थी।

"माँ को भी बहुत जल्दी रहती है, साथ नहीं ले सकती थी। कहीं दिखाई भी नहीं दे रही," पल्लो बड़बड़ाते हुए सड़क के इधर-उधर नजर दौड़ाती आगे बढ़ती जा रही थी।

 ठंडी हवा चेहरे पर गीला पोछा सा मार जाती है बार बार. और पल्लो बोरे को कंधे पर संभाल दोनों हथेलियों से चेहरे को बार-बार रगड़ लेती है.ठंडी नाक को अंगूठे-उंगलियों के बीच ले दबा मुँह से फू-फू कर भाप का धुंआ उड़ाती है, कभी तेज-तेज चलकर शरीर में गरमी पैदा करने की कोशिश करती है।

आज रमेसा भी नजर नहीं आ रहा। बस्ती से निकल बाजार को जाती चौड़ी सड़क पर निकल आई है वह। कोहरे की धुंध सड़क पर उसके आगे-आगे चल रही थी। स्ट्रीट लाइट के उजाले में भी सड़क थोड़ी दूर तक ही दिख रही थी आगे गहरी धुंध ने सड़क को रहस्यमय तरीके से अपने आगोश में छुपाया हुआ था, वरना दिन में यही सड़क दूर तलक सांप सी लहराती नजर आती है।

 थोड़ी दूर जाने के बाद स्ट्रीट लाइट भी बंद हो गई। बाजार की लम्बी लहरदार सड़क मानो दिन भर की अपना सीना रोंदती भागदौड, चीख पुकार से निजात पा कुछ पल कोहरे के चादर में छुप, सुकून की नींद ले रही थी। कोई नजर भी नहीं आ रहा। गर्मियों की सुबह तो इस समय तक सुख से अघाए लोगों के टहलने से सड़क गुलज़ार होने लगती है।

कभी-कभी किसी वाहन की चीखती आवाज उसे और शायद शांत सोती सड़क को भी चिहुँका देती है। दुकानों के सामने पड़े कचरे के ढेरों के समक्ष थोड़ा रुकती है। अब ठंड भूल अपनी छड़ी से लगे कांटे से ढेर को टटोलती है। कोई बोतल, कोल्ड ड्रिंक कैन, प्लास्टिक का टुकड़ा, पौलेथिन बैग्स, कागज, गत्ते के टुकड़े आ छड़ी से टकराते हैं और वह उन्हें सहेज लेती है अपनी बोरी में। 

चौराहे के पास से ही गुजरती एक पतली गली का ध्यान आता है। बड़ी-बड़ी दुकानों का पिछवाड़ा, वहां दुकानदार लोग रात को दुकान से निकला कचरा फेंक देते हैं। काफी काम का कचरा मिल जाता है। यह ख्याल सर्दी की चुभन थोड़ा कम कर गया। 
 पतली संकरी गली में दूर छोटे घेरे में जलती आग की रोशनी नजर आई। वह तेजी से दौड़ते हुए पहुंची। कागजों के ढेर में आग लगाए एक आदमी जिसकी पीठ पर बड़ा-सा कुबड़ उभरा था, अपने हाथों को आपस में रगड़-रगड़ कर बार-बार हाथ आग के सामने कर सेंक रहा था। आँच के पास खड़ी हो उसे शरीर में गरमी की लहरें दौड़ती महसूस हुईं। मगर इतने कागज-गत्ते जलने का अफसोस भी था।

"अरे… सारा कागज जला दिया तुमने।" आँच से तप और थोड़ा चलने से भी शरीर की थरथराहट पर रोक लग गई थी सो थोड़ा तमक कर ही बोली। 

कुबड़े ने चौंक कर देखा। 

"अब क्या ले जाऊंगी बीनकर, ऐसे सारे कागज कौन जलाता है?" वह बिसुर रही थी। 

अचानक कुबड़े की आँखों में कुछ जल उठा, "कबाड़ बीनती है क्या? "

"और नहीं तो क्या! " एक उलाहना तैर गया पल्लो की आवाज में। 

"आ, देता हूँ… कबाड़ की कौन कमी? जितना चाहे ले ले।” 

लगभग बुझ चुकी आग को हाथ में पकड़ी लकड़ी से ठकठकाया, थोड़ा कुरेदा मगर कागज की आग में कितनी जान होती? पल्लो को बुझे कागजों में न जाने क्यों दीवाली पर साँप की गोली से बने, जानदार लगते बेजान साँपों की याद हो आई। उन फैले कागजी साँपों पर एक बार और जोर से लकड़ी ठकठका वह सतर उठ खड़ा हुआ। उसे खड़े होते देख पल्लो को लगा, नहीं वह कुबड़ा तो नहीं। मगर आगे एक कदम बढ़ाते ही उसके कंधे से नीचे का हिस्सा एक फुटबॉल-सा बाहर निकल पड़ा और शरीर झुक गया जैसे पीठ पर बोरी लादे चल रहा हो। वह चिहुँक उठी। न जाने क्यों मन हुआ चल पड़े, मगर कबाड़ के लालच में बोल उठी, 

"कहाँ है कागज, कबाड़?"
“अरे, थोड़ी दूर है बस...आ तो”

पौ फट चुकी थी, उजास फैलने लगा था। स्ट्रीट लाइट में पता नहीं चल रहा था, आसमान की तरफ देखा तो हल्का उजाला फैला नजर आने लगा था। 

कुबड़े के पीछे एक आस में बंधी खिंची जा रही थी पल्लो। 
 “बाबा! तुम भी कबाड़ बीनते हो क्या?”
“अरे नहीं रे...पर मेरे पास बहुत कबाड़ है. और बच्चों को मैं ऐसे ही दे देता हूँ।”

उसका ध्यान अभी गया कुबड़ा लंगड़ा भी था। लंगड़ाकर चलते हुए उसका कूबड़ समेत शरीर का ऊपरी हिस्सा अजीब ढंग से चक्की के पाट जैसा घूम जाता। लंगड़ा होने के बाबजूद वह कुछ ज्यादा ही तेजी से चल रहा था। उसकी तेज चाल से पल्लो के अंदर एक डर सर उठाने लगा था, जिसे अनदेखा कर वह उसके पीछे खिची जा रही थी। 

 नजरें रमेसा को खोज रही थीं, आज वह भी कहीं नजर नहीं आया। वरना वह उसको भी अपने साथ ले जाती और उसका आजतक का सारा अहसान उतार देती। 

कुबड़ा गली के अंतिम छोर पर पहुँच ऊँची पुरानी इमारतों के जंगल में खो गया। वह गली के छोर पर उलझी खड़ी थी। तभी तूफान-सा ही पलट कर वह आया और उसका हाथ पकड़ आंधी जैसा गली के अंदर घुसता चला गया। पल्लो तिनके सी उड़ी जा रही थी। सोचने का वक्त भी नहीं था , क्यों उसके संग ऐसे तिनका बन गयी है वह। दौड़ी जा रही उसके पीछे, दिमाग के एक कोने में यह राग बजने के बाबजूद कि पल्लो क्यूँ जा रही इसके साथ? छोड़ कबाड़, कागज का लालच! 

इमारतें पीछे छूट गयीं। चौड़ी सड़क पर कुबड़ा आगे ही आगे दौड़ा जा रहा था। जहाँ पल्लो के कदम रुक जाते, वह पीछे मुड़ उसका हाथ पकड़ खींच लेता और भरोसा देता ‘बस थोड़ी दूर और’। 

सड़क के किनारे बहुत दूर तक चली गयी एक लम्बी-ऊँची दीवार और उसमें थोड़ी-थोड़ी दूरी पर लगे विशालकाय गेट शायद कोई फैक्ट्री थी। उसी के पीछे एक बड़े मैदान के सामने जा कुबड़े ने उसे ला खड़ा किया। शहर लगभग खत्म हो चुका था। इक्के-दुक्के घर, इमारत दूर नजर आ रहे थे। 

मैदान में पल्लो अवाक खड़ी थी। चारों तरफ़ कबाड़ ही कबाड़ ..., प्लास्टिक की सीट से बने छोटे-छोटे तंबुओं में प्लास्टिक बैग, डिब्बे, बोतलें, टूटे फूटे सामान, रद्दी ...कबाड़ ही कबाड़...प्लास्टिक, काँच, लोहा, शीशा...। कुबड़ा एक तंबू से दूसरे तंबू में उसे खींचे जा रहा था। 

 पल्लो ख़ुशी से हँसने को हुई मगर जबान पर ताला लग गया। माँ अक्सर कहती तो थी कि रोज़ कबाड़ बीन कर वह जहाँ बेचने जाती है चारों तरफ़ इतना कबाड़ है कि समझ नहीं आता इस कबाड़ का ये करेंगे क्या? लोग जिन चीज़ों को घर से बाहर फेंक देते हैं उन्हें हम जैसे लोग बीनते हैं और अपना पेट पालते हैं। और उसी कबाड़ को हम से ख़रीद कर ये सेठ धन्ना सेठ बना बैठा है। 

माँ से पल्लो ने कितनी बार कहा भी कि उसे भी वहाँ जाना है, इतना कबाड़ एकसाथ देखना है। लेकिन माँ हमेशा मना कर देती, 'तू तो बस स्कूल जा, ये कबाड़ तो सुबह-सुबह का काम है तो मैं तुझे बीनने भेज भी देती हूँ, बस एकाध साल और भेजूंगी फिर यह भी बंद। तुझे तो पल्लो पढ़ना है, देख तेरी नीती मैम भी कहती हैं ना कि जमुना, अपनी बेटी को ख़ूब पढ़ाना...पल्लवी बहुत होशियार है, देखो कक्षा में हमेशा प्रथम आती है सभी एक्टीज़् (ऐक्टिविटीज) में भी अव्वल रहती है। जबकि तुम्हारे साथ बेस्ट पिक ('वेस्ट पिकिंग') भी करती है, घर का भी सब काम करती है। 

 माँ अब वेस्ट पिकिंग, ऐक्टिविटीज और ऐसे ही न जाने कितने अंग्रेजी के शब्द खूब बोलने की कोशिश करती है। यह सोच पल्लो के चेहरे पर मुस्कान आ गयी। यह सब भी नीति मैम का ही कमाल है। अक्सर घर आ जाती हैं उसको पढ़ाने। उसके साथ माँ भी सुन-सुन कर काफी कुछ सीख गयी है।

मगर माँ यह नहीं चाहती कि उसके कचरा बीनने की बात किसी को पता चले। नीति मैम को भी माँ मना करती है कि मैडम आप ये कचरा बीनने की बात किसी से मत कहना, अगर मेरे मालिकों को पता चल गया तो वो मुझे काम से निकाल देंगे, कचरा बीनने वालों को कॉलोनी में सब चोर जैसा समझते हैं। ' 

नीति मैम का ध्यान आते ही पल्लो को आज के टैस्ट का ध्यान आया और टैस्ट के साथ ही ध्यान आया नमिता का। ओह...आज उसे कचरा बीनने नहीं आना था, टैस्ट की तैयारी तो कुछ हुई नहीं है। आज वह नमिता ही टैस्ट में बाजी मार लेगी। 

नमिता भी पल्लो की कक्षा में है। पढ़ाई में, खेल-कूद में, स्कूल की हर गतिविधि में अव्वल। पल्लो और नमिता की टक्कर कांटे की रहती है हर प्रतियोगिता में। कक्षा में प्रथम आने को लेकर भी रस्साकशी चलती है। कभी नमिता एक नम्बर ज़्यादा कभी पल्लो कुछ नंबर आगे कूद जाती है उससे। 

बस पल्लो एक बात में ही नमिता से मात खा जाती, जब नमिता झक सफ़ेद, साफ़ यूनिफॉर्म, काले जूते, सफ़ेद मोजे, कमीज़ में स्कूल के ‘लोगो' के साथ ही एक साफ़ सुथरे पिनअप किए रुमाल के साथ, अपने पापा की मोटरसाइकिल से पीछे की सीट से उतरती, तब वह उसे देखती रह जाती। पापा, मोटरसाइकिल, साफ़ सफ़ेद यूनिफॉर्म सब कुछ कितना सपनीला था। 

 मां उसकी यूनिफॉर्म को कितना भी साफ़ करे, मगर उसका पीलापन जाता ही नहीं। पहन भी तो तीन साल से रही है। दूसरी कक्षा में जब वह पढ़ती थी माँ ने वह ड्रेस ली थी, तीसरी कक्षा में भी वही पहनी, अब चौथी में भी वही ...। माँ के आगे बिसूरती है तो रोज़ आजकल कर देती है। तीसरी कक्षा में तो फिर भी आ ही जा रही थी यूनिफॉर्म, मगर अब तो उसे बहुत झेंप लगने लगी है। कमीज़ कितना कस गई है। ढंग का कुछ खाने पीने को नहीं तब भी शरीर कैसा अजीब सा बढ़ रहा है। स्कर्ट की नीचे की तुरपन उधेड़ दूसरा कपड़ा जोड़ माँ ने अंदर मोड़ दिया है मगर, फिर भी घुटनों से ऊपर चढ़ती जा रही है। अच्छा नहीं लगता पल्लो को। खिसिआती है बुरी तरह। अपने लंबे होते शरीर को स्कूल में हमेशा थोड़ा झुका कर रखने की आदत हो गई है उसकी। शरीर बड़ा धोखा दे रहा है। 

 माँ कितना समझाती है, "बिटिया... तू ही तो है मेरी ज़िंदगी का एक सहारा, एक दिन तू बहुत बड़ी बनेगी देखना। तू नमिता से कम है क्या? कपड़े-लत्ते पे ज्यादा ध्यान न दिया कर। आदमी की पहचान लत्तों से नहीं उसके काम से होती है।"

वह माँ को तुरंत टोक देती, ‘तो काम भी तो क्या, कचरा बीनने का। '

‘अरे काम कोई छोटा-बड़ा नहीं होता, बिट्टी ! असल बात है इंसान में इंसानियत होना। और, काम का अपना मोल है। जिस इंसान का जो काम है... वह चाहे कचरा बीनना हो या अफ़सरी करना... वह अगर उसे छोड़ दे तो कैसे चलेगा। वह काम तो रुकेगा नहीं, तुम नहीं करोगे तो कोई और करेगा, मगर हमारा काम हमारा घर चलाता है, बिटिया! कचरा बीनना बंद कर दूँ, घरों में काम करना बंद कर दूँ तो कैसे घर चलेगा, बोल? हाँ, अपनी मेहनत से अपने दिन सुधर सकते हैं। जैसे तू नमिता जैसे कपड़े-लत्ते चाहती है तो हमें और मेहनत करनी पड़ेगी, तू पढ़ाई मेहनत से करेगी तो सब एक दिन पा जाएगी, रानी!

आस है तू मेरी, पल्लवी! देख तेरी नीती मैम ने तेरे नाम का कितना अच्छा मतलब बताया ... नयी पत्ती, ... हरी कोमल नयी-नयी निकली पत्ती... तू तो मेरे इस बंजर दिल में उग मेरे जीवन को हरा-भरा करने ही आई है, बिटिया। '

इतनी बातें पल्लो न समझती हो ऐसा नहीं है, और खूब मेहनत भी करती है वह इस सबसे निकलने के लिए... मगर उसे सुबह-सुबह कचरा बीनना बिलकुल पसंद नहीं। 

 सुबह-सुबह उसे तो पसंद है ताल के किनारे बैठकर उगते सूरज को देखना, चिड़ियों के...कोयल के...पक्षियों के गीत सुनना और ...और तालाब किनारे बैठकर खूब-खूब पढ़ना। मगर सुबह-सुबह यह सब न कर, वह कचरा बीनती है... स्कूल जाने से पहले घर का काम भी करना पड़ता है। 

 कचरा... कबाड़... कूड़ा, सब के घरों से निकले गन्दे, सड़े-गले कचरे से अपने काम का कचरा निकालना क्या इतना आसान है ?कभी-कभी तो उसका जी इतना मिचला जाता है कि उल्टी आने लगती है। 

एक बार एक रेस्टोरेंट के सामने ही नाली में उसे ख़ूब प्लास्टिक की बंधी हुई थैलियाँ दिखाई दी, इतनी सारी प्लास्टिक देख वह अपनी छड़ी छोड़ हाथ से उठाने को लपक पड़ी और उसका हाथ पॉलीथिन के साथ अंदर धँस गया तो एक लिसलिसे अहसास के साथ बदबूदार भभका उठा। वह छी-छी करती पीछे हटी तो रमेसा हँस-हँस कर दोहरा हो गया था, पर उसके रुआंसे चेहरे को देख गंभीर हो बोला था, ‘अरे पगली, कचरे में कभी भूल कर भी हाथ मत डाला कर, यह छड़ी किसलिए है? बड़े लोग इतना समय नहीं पाते कि खाना बाकी कचरे से अलग कर दें, जानवरों को डाल दें या गरीबों में बाँट दें। प्लास्टिक की थैलियों में भरभर कर खाना यूँ ही नालियों में सड़कों के किनारे सड़ने को छोड़ देते हैं और खाना सड़-गल कर आदमी तो क्या जानवरों के लायक भी नहीं बचता। ' सच ही, कभी-कभी अखबार, प्लास्टिक, पोलीथिन में लिपटा बचा, बासी खाना कचरा बीनने वाली छड़ी से टकरा जाए या कुरेद बैठो तो दुर्गंध, सड़ांध का कैसा जबरदस्त भभका उठता है। 

रमेसा सच ही तो कहता है लेकिन उसकी माँ तो इस बात का बड़ा ख़याल रखती है, जो भी सब्ज़ियों के छिलके, बचा खाना होता है वो अलग से गाय को डालकर आती है...वैसे तो, बचता ही कितना हैं … हमेशा तो लाले पड़े रहते हैं। 

नीति मैम भी तो कहती हैं, कचरा हमेशा सूखा और गीला अलग-अलग फेंकना चाहिए। सूखा कचरा, गीला कचरा को अलग-अलग न करने की वजह से गीले और सूखे कचरे के लाभ पूरे नहीं मिल पाते. एक साथ मिला देने से सूखे कचरे की रीसाइक्लिंग नहीं हो पाती और गीले कचरे का खाद नहीं बन पाता.कितने जानवर मर जाते हैं, पॉलीथिनों में लपेटकर या भर कर जो हम बचा खाना सड़क पर फेंक देते हैं या कचरे के डिब्बे में डाल देते हैं उसे जानवर अलग नहीं कर पाते हैं और पॉलिथीन समेत उसको खा जाते हैं। कचरे को अलग-अलग डालेंगे तो कचरा बीनने वालों को भी कितनी आसानी हो जाएगी ...कचरा बीनने वाले भी तो इंसान ही होते हैं न...और फिर, नगर स्वच्छता में उनका कितना बड़ा सहयोग रहता है यह कभी सोचा है। अगर वे कचरा न बीनें तो कचरे की मात्रा और बढ़ेगी ही। शहरों में घरों से, फैक्ट्रियों, अस्पतालों, स्कूलों, रेलवे स्टेशनों आदि-आदि जगहों से निकला हुआ बेशुमार कचरा। इस मामले में हम सबको जागरूक होने की जरूरत है। कचरा कम से कम करें, और कचरे को इस तरह डिस्पोज करें कि सरकार भी उसकी रिसाइक्लिंग सही तरीके से कर सके और वेस्ट पिकर्स का काम भी थोड़ा इजी, सरल, सुभीते का हो सके। '

नीति मैम कितना अच्छा बोलती हैं, उनकी बातों से कभी-कभी उसे भी इस सड़े काम पर गर्व होने लगता है। 

“किस दुनिया में खो गयी...ले ले कबाड़... जितना कबाड़ चाहे।” कुबड़े ने सोच में पड़ी पल्लो से सटकर उसकी कमर में हाथ डाल झटका दिया।

 पल्लो अपनी सोच की दुनिया से निकल कुबड़े के हाथ के स्पर्श और झटके से चौंक, भौंचक्क हो चारों तरफ देखने लगी। जिस टेंट में कुबड़े ने उसे ला खड़ा किया है, बहुत छोटा, जिसका नीचा-सा दरवाजा, बस उसके सिर तक। चारों तरफ कबाड़ ही कबाड़। पल्लो को बेतरह घुटन लगने लगी। चारों तरफ बंद, दरवाजा भी इतना नीचा कि कुछ बाहर का नजर नहीं आ रहा। पल्लो घबरा उठी।

घबराहट में कुबड़े को धक्का मार अलग हटाने के चक्कर में प्लास्टिक की बोतलों के ढेर पर लुढ़क गई। 
बोतलें ही बोतलें ...अनगिनत ...अम्बार था बोतलों का, जिनके ऊपर लुढ़की पल्लो संभाल नहीं पा रही थी अपने को। उसके वजन से बोतलें पट-पट, चट-चट की आवाज़ें करतीं पिचक-फूल रही थीं। वह इन आवाजों से बुरी तरह घबरा कर बोतलों के ऊपर से उठने की कोशिश करती, मगर उसकी छोटी-छोटी हथेलियाँ टिक ही नहीं पा रही थी। कुबड़ा ठठाकर हँस पड़ा और अपना हाथ बढ़ा दिया उसकी तरफ। 

पल्लो ने काँपते हुए उसका हाथ पकड़ लिया। कुबड़े ने उसे तेज़ी से खींचा और लगा, ख़ुद ही नही संभल पाया और बग़ल ही में पॉलीथिनों, प्लास्टिक बैगों, बोतलों के ढेर पर उसे लिए-लिए लुढ़क पड़ा। पल्लो चीख उठी, और कुबड़ा ...ठठा उठा…। 

पल्लो उठने की कोशिश करती और कुबड़ा उसे फिर गुदगुदी-सी कर लुढ़का देता। कैसी भयानक हँसी थी कुबड़े की...। 

पल्लो मुलायम, चिकनी, रंगबिरंगी, गंदी प्लास्टिक के ढेर में उलझी उठने की, हाथ-पैर चलाने की नाकाम कोशिश कर रही थी और कुबड़ा उसके ऊपर और पॉलीथिनों का ढेर डाले जा रहा था| कभी गाल, कभी शरीर के हल्के उभरे हिस्सों पर कुबड़े की गंदी, खुरदरी, बेढब, पीले-गंदे, मैल भरे नाखूनों वाली उंगलियाँ जिज्ञासु हो बेतरतीबी, विकलता, उतावलेपन से बढ़ती जा रही थीं। क्रूर हँसी हँसता कुबड़ा उसपर झुकता जा रहा था किसी पर्वत जैसा, “ले कबाड़ ... जितना चाहे, लेले… कबाड़ की क्या कमी… हाहाहा"

पल्लो चीखकर, आर्त स्वर में माँ को पुकार उठी, रमेसा को बुला रही थी। कुबड़े ने अपनी राक्षसी हथेली से पल्लो के छोटे से मुँह को दबा, एक हाथ से उसके मफलर को खींच कर दूर फेंक दिया। मफलर खींचने से पल्लो की गरदन रगड़ खा छिल गयी। बाल खुलकर चेहरे पर फैल गये। चेहरे पर फैले बालों को कुबड़े ने कसके मुट्ठी में भर पीछे की तरफ झटका दिया तो गरदन पीछे पीठ से छूने लगी, चेहरा ऊपर की तरफ तन गया, आँखे दर्द से कानों तक फैल गयीं। उसकी आँखों में आँसू चमकने लगे। मगर मुँह दबा होने से पल्लो की चीखें दब गईं थीं, सांसें घुट गईं। वह हाथ-पैर मार रही थी, अपने नन्हें-नन्हें पैरों को सतरंगी पॉलीथिनों के ढेर पर बेबसी में फेंक रही थी। उसकी ढीली बेढब-सी पेंट और नाप से दुगुनी बड़ी जैकेट कुबड़े ने एक झटके में उतार दूर उछाल दी। कुबड़ा पल्लो के वजूद पर काले बादल सा छाता गया। और काला बादल पल्लो के हाथ-पैर फेंकने को प्रतिबंधित कर अपनी गिरफ्त में लेता चला गया| काले बादल तले पल्लो सांस भी नहीं ले पा रही थी.उसका दम घुटने से आँखें फटने लगी। अचानक कोई गरम सलाख जैसे कुबड़े ने उसके अंदर पैवस्त कर दी. गाय जैसी डकरा उठी पल्लो। तड़पती पल्लो राक्षस के पंजों की गिरफ्त से निकलने के लिए बेतरह कसमसा रही थी.मगर दर्द ने हरा दिया। दर्द से पस्त , निढाल अपने होश गंवाती जा रही पल्लो का हाथ पॉलीथिन थैलियों के नीचे किसी चीज़ से टकराया। उसने हाथ से छूकर महसूसा कोई नुकीली-सी चीज थी.

 जाते होश को संभालने की भरसक कोशिश करते हुए पल्लो ने उस नुकीली चीज़ पर किसी तरह अपने ताकत खत्म होते हाथ की कसकर पकड़ बनायी और अपनी अंतिम शक्ति जुटाकर, दम साध कर सीधे कुबड़े की आँख में वह नुकीली चीज घुसेड़ दी। 

 चीखने की बारी अब कुबड़े की थी।” ऐ… साली, हरामखोर, हराम की औलाद.. .बड़ी आग है?"उसके ऊपर से उठ गंदी गालियाँ देते हुए कुबड़ा उसके दोनों गालों पर थप्पड़ दर थप्पड़ मारता चला गया। मगर पल्लो का निशाना भी बड़ा सटीक बैठा था। कुबड़े की आँख से रक्त की धारा बह चली थी।

निढाल और पस्त हो चुकी पल्लो की आँखें मुंदती जा रही थी ...कि कुबड़े की एक और भयंकर चीख से चौंक, उसकी झिपती आँखों में लोहे की रॉड ऊपर को पकड़े रमेसा और रमेसा के पीछे खड़ी चीखती माँ की तस्वीरें झिलमिला उठीं।

पल्लो की आँखें कैमरा बनी धड़ाधड़ तस्वीरें खींचे जा रही थीं, रमेसा की आँसू-दर्द से भीगी, माँ की फटी आँखों वाली अवाक तस्वीर, स्कूल, नीति मैम, नमिता ...। 
***


परिचय: इला सिंह
शिक्षा: एम. ए. (इतिहास), बी. एड.
कथादेश, परिकथा, अक्षरपर्व, कथाक्रम, विभोम स्वर, संस्पर्श, त्रिवेणी में कहानी प्रकाशित। लघुकथा.काम में लघुकथा। के.बी.एस.प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित सांझा संग्रह में कहानी प्रकाशित। 
निवास: लखनऊ
चलभाष: +91 783 904 0416
ईमेल: ilasingh1967@gmail.com 

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