पुस्तक समीक्षा: मैं आर्यपुत्र हूँ (मनोज सिंह)

समीक्षा: कमल चंद्रा


पुस्तक: मैं आर्यपुत्र हूँ
लेखक: मनोज सिंह
प्रकाशक: प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली
ISBN: 978-93-90315-15-4
संस्कारण: वर्ष 2020
मूल्य: ₹ 600 रुपये
पृष्ठ संख्या: 303

पुस्तक का शीर्षक 'मैं आर्यपुत्र हूँ' स्वयं अपनी विशेषता बता रहा है। यह पुस्तक वेदों को केंद्र में रखकर लिखी गई है। पुस्तक में आर्य और आर्या दो सूत्रधारों के माध्यम से इस कठिन विषय को सरलतम तरीके से हमारे सामने प्रस्तुत किया गया है। धर्म-संस्कृति का परिचय करवाती पुस्तक 'मैं आर्यपुत्र हूँ' पाठकों के अनेक भ्रान्तियों का समाधान करती है। इसमें दोनों सूत्रधारों के वार्तालाप के माध्यम से हमको जोड़ती है। पाषाण युग से वर्तमान तक सभी धर्म, वेद, पुराणों, उपनिषदों को सार रूप में प्रस्तुत किया है।

पुस्तक 'मैं आर्यपुत्र हूँ' में अध्याय छोटे अवश्य है पर बहुत ही सारगर्भित हैँ। ऋग्वेद से उदाहरण देकर सत्यता की प्रमाणिकता सिद्ध की गई है। पुस्तक में कुल 17 अध्याय हैँ। जिनके द्वारा मानव सभ्यता को क्रमवार आँका गया है। सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, कृषि, पशुपालन, में सभी आक्रांताओं के सिद्धांतों को बाँटा गया है। सतयुग, द्वापर, त्रेता, कलियुग तक के सभी रूपों का कथात्मक स्वरूप को प्रमाणिक करता है।

वैदिक संदर्भ संवादत्मक सत्य को भी करता है। यह भी कहा गया है कि, यह उपन्यास नहीं है, यह भाष्य है जो सतयुग के संदर्भ में आधुनिक विज्ञानं को भी जोड़ा है। कल्प मनवंतर हिमयुग पाषाण युग का भी वर्णन मिलता है, जिसके आगे वैज्ञानिक तथ्य भी सूक्ष्म है।

'मैं आर्यपुत्र हूँ' पुस्तक में  पेज क्रमांक 22 पर हिरण्यगर्भ सूक्त पूरी तरह वैज्ञानिक पृष्ठभूमि से पाठकों को परिचित करवाता है। यह वर्तमान पीढ़ी को तथ्य से जोड़ने वाला साहित्य है। लेखक ने पुस्तक के अन्त में 100 संदर्भित पुस्तकों का उल्लेख कर लेखन के सत्य को पुष्ट किया है। आर्य-आर्या दोनों सूत्रधारों के माध्यम से कथावस्तु और वर्तमान पीढ़ी के बीच सेतु का कार्य किया है।

अध्याय - *सरस्वती नदी सभ्यता का काल खंड* में लेखक के अनुसार आर्य अपने प्रारम्भिक काल में इसी नदी के तट पर बसे थे। कहा गया है कि, यह स्वर्ग से जुडी है, इसके जल मार्ग कद द्वारा स्वर्ग तक पहुंचा जा सकता है। बैकुंठ की परिभाषा देखिएगा - 'जिसे कुंठा ध्वस्त न कर सके, वही बैकुंठ है'।  स्वर्ग को सुख सम्पन्न नगरी के रूप में प्रस्तुत किया है। लेखक के अनुसार सरस्वती नदी सर्वाधिक पूज्यनीय और पवित्र नदी है। ऋग्वेद के ऋचा 2.41.18 में ऋषि गृतसमद भार्गव शौनिक ने तथा ऋग्वेद में ही 7.95.2 ऋचा में ऋषि वशिष्ठ मैत्रावरुणी के अनुसार सरस्वती नदी जनमानस को घी और धृत से पोषित करतीं थी।

अध्याय - *मेरे आंतरिक संघर्ष युद्ध* में लेखक ने जंगली पशुओं, वन्य, असभ्य कबीलों, लुटेरों, चोरों से सभ्यता की रक्षा करने की उचित व्यवस्था, हमारी मानसिक बुराइयों, व्यधियों, के लिए वैदिक सभ्यता, संस्कृति द्वारा नैतिक उत्थान का प्रयास किया गया है। लेखक ने पुस्तक में 'प्रोफेशनल स्पीकर' जैसे शब्दों का प्रयोग कर नई पीढ़ी से जोड़ने का प्रयास किया है।

अध्याय - *आर्य संस्कृति का प्रभाव* में लेखन मनोज सिंह ने आर्य सभ्यता संस्कृति का विस्तार से वर्णन किया है। उनका खान- पान, अचार- व्यवहार, रीति- रिवाज का विस्तृत वर्णन किया है.

अध्याय - *शासन व्यवस्था* में राजा के द्वारा उत्कृष्ठ शासन व्यवस्था कैसी हो इस विषय पर बजट विस्तार से वर्णन है। ग्राम का मुखिया ग्रामीणी का चयन जो ब्रजपति कहलाता था। गण का प्रमुख गणपति कहलाता था। राजा की सभा कैसी हो? शासन व्यवस्था कैसी हो? राजाओं का निर्वाचन होता था। कबिलाई सरदारों का अस्तित्व भी मिलता है। रोम, मैसोपोटामिया बेबीलोन, सुमेर की व्यवस्था को नकारते हुए देवभूमि भारत की आर्य व्यवस्था के राजाओं का चित्रण है। दंडनीति का भी उल्लेख है। अपराधों, अंधविश्वास के वर्णन भी मिलता है।

अध्याय - *वेद* की महत्वपूर्ण पंक्ति - "विश्व का प्राचीनतम ग्रंथ वेद है", "यही हमारी पहचान है", "वेद हैं, इसीलिए हम श्रेष्ठ थे, हम श्रेष्ठ थे इसीलिए हम स्वयं को आर्यपुत्र कहते हैँ"

लेखक ने इसी एक पंक्ति में बहुत कुछ कह दिया है। वे कहते हैँ कि, जिस मानव के परिवार, समाज व्यवस्था की चर्चा की गई है, वह हम ही हैँ। वेद कोई मामूली ग्रंथ नहीं है, न ही यह केवल देवताओं की स्तुति है। इसमें अनगिणित शास्त्रों के संकलन है। ऋग्वेद हम आर्यन की महान और विलक्षण संस्कृति का प्रमाणिक आलेख है। वेद सनातन जीवन का दर्शन शास्त्र है। यहाँ गूढ ज्ञान को भी रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

वेद शब्द विद धातु से बना है, जिसका अर्थ है- जानना| वेदों को वेदत्रयी भी कहा जाता है। इसमें वेद की तीन धारायों का वर्णन है - ज्ञान, कर्म और उपासना। लेखक ने इसमें ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद का ही वर्णन किया है। वेदों के व्यापक अध्ययन और व्याख्या मिलती है।

अध्याय - *दर्शन, आध्यात्म, धर्म, आस्था, ज्ञान*  में लेखक ने दर्शन आध्यात्म जैसे विषय पर प्रकाश डाला है। धर्म के रूप में आर्योँ द्वारा सभी पूजित देवी देवताओं का वर्णन मिलता है जैसे... इंद्र, काली,लक्ष्मी, शिव इनसे जुडी पौराणिक कथाओं का सफलतापूर्वक चित्रण किया गया है। ज्ञान में लेखक ने आर्योँ के वैदिक ज्ञान पर विशेष जोर दिया है, जैसे.... चींटी को भोजन स्वरूप आटा डालना, पशु पक्षीयों के लिए दाना पानी की व्यवस्था करना वैदिक संस्कृति का  हिस्सा है। मांसाहार की तुलना में शाकाहार पर बल देना, करुणा भाव को प्रमुखता से दर्शाया है।

आर्य जीवन शैली के अनुसार वेद में व्यक्ति, परिवार, समाज, देश के साथ साथ सम्पूर्ण मानवता, प्राणी जगत के हित की हित की बात कही गई है, और यही वेदों को सर्वश्रेष्ठ बनाती है।

निष्कर्षतः यही बात सामने आती है कि, लेखक मनोज सिंह जी ने  'मैं आर्यपुत्र हूँ'  पुस्तक में समस्त मानवजाति के कल्याण का मार्ग दिखाने का प्रयास किया है। पुस्तक पठनीय, संग्रहनीय, और अविस्मरणीय है।

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