प्रवासी भारतीय और मीडिया

डॉ. अंगदकुमार सिंह
अंगदकुमार सिंह

असिस्टेण्ट प्रोफ़सर (हिन्दी), जवाहरलाल नेहरू पी.जी. कॉलेज, बाँसगाँव, गोरखपुर (उ.प्र.), भारत - 273403

शोधालेख  सार:
विश्व के डायस्पोरा (प्रवासी) में सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय भारतीयों का है तथा 3 करोड़ से अधिक संख्या में ये भूमण्डल के 48 देशों में फैले हुए हैं। अपना भारतीय समाज जैसे बहुधर्मी है वैसे ही यहाँ का डायस्पोरा समाज भी बहुधर्मी, बहुजातीय और बहुभाषी है। भारतीय डायस्पोरा प्रमुख रूप से विभाजित डायस्पोरा-उत्पीड़ित डायस्पोरा, श्रमिक डायस्पोरा और तिज़ारती डायस्पोरा का प्रतिनिधित्व करते हैं। जहाँ-जहाँ ये भारतीय प्रवासी निवास कर रहे हैं वहाँ वे उस देश के आर्थिक तन्त्र को मज़बूत किये हुए हैं। इतना ही नहीं ये अपनी भाषा और सांस्कृतिक विरासत को अक्षुण्ण बनाये हुए हैं इसलिए उनकी अलग पहिचान बरकरार है तथा भारत से गहरा लगाव भी। आज विकसित तथा विकासशील अनेक देशों में भारतीय प्रवासी समाज के लोग बहुसंख्यक रूप में निवास कर रहे हैं। उन्हें अपनी संस्कृति, भाषा, सभ्यता एवं परम्परा तथा मूल्यों पर पूर्ण विश्वास भी है इसलिए वे उन पर गर्व की अनुभूति करते हैं और मुक्त कण्ठ से आधुनिक हिन्दी साहित्य के पितामह भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के दोहे को कह उठते हैं कि, “निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल।” भारत सरकार ने 21-23 जनवरी, 2021 को 17वाँ प्रवासी दिवस मनाने का कार्य किया जिसमें अनेक देशों से प्रवासी इकट्ठा होकर अपनी संस्कृति और सभ्यता पर विधिवत विचार-विमर्श किये। भारत सरकार डायस्पोरा की सुविधा-हेतु पासपोर्ट तथा वीजा के नियमों को सरल बनाने का कार्य कर रही है। उत्तर-आधुनिक मीडिया भारतीय डायस्पोरा लोगों को भारत से जुड़ा रहने का एक सशक्त माध्यम के रूप में उभर रहा है और वही उनके स्वतन्त्र अभिव्यक्ति का मज़बूत माध्यम भी है। मीडिया भारत सरकार को डायस्पोरा की  गतिविधि से हमेशा अवगत कराता रहता है। सोशल मीडिया ने भारतियों एवं भारतीय डायस्पोरा लोगों के बीच की दूरी कम करके एक-दूसरे को नज़दीक लाने का काम किया जो दोनों के लिए बेहतर है। मीडिया द्वारा ही भारतीय डायस्पोरा कि स्थिति की जानकारी राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर मिलती है।

बीज शब्द: डायस्पोरा, मीडिया, भारतीय संस्कृति, प्रवासी साहित्य।

साहित्य-समीक्षा:
‘डायस्पोरा’ का मुख्यार्थ है- अपनी मातृभूमि से दूर विदेश में निवास करना अथवा ‘प्रवासन’ तो भारतीय डायस्पोरा से तात्पर्य उन भारतीय लोगों से है जिनका मूल स्थान भारत है किन्तु किसी कारण से अन्य देशों में निवास कर रहे हैं। इतिहास की ओर दृष्टिपात करने पर पता चलता है कि रोमानी लोगों या जिप्सियों के भारत से दूसरे देशों में बसने से भारतीय डायस्पोरा का आरम्भ हुआ, वही भाषाई और जेनेटिक प्रमाण से भी पता चलता है कि जिप्सियों का उद्गम मध्य भारत ही रहा है। ये लोग 11वीं सदी के करीब यहीं से उत्तर-पश्चिम की ओर गये तथा ईसा से 250 वर्ष पूर्व पंजाब के क्षेत्र में कई सदियों तक निवास किया एवं  500 से 1000 ई. के मध्य कई बार में ये लोग विश्व के पश्चिमी हिस्सों में प्रस्थान किये। मध्य एशिया के डोम और भारत के बंजारे रोमानी समाज के बचे हुए प्रतिनिधि माने जाते हैं। चोल राजाओं और बौद्ध अभियानों के कारण भारतीय लोग दक्षिण-पूर्वी एशिया तक पहुँचे और सुमात्रा, मलय द्वीप तथा बाली में भारतीय डायस्पोरा का आधार-स्तम्भ बने तो 16वीं सदी के मध्य में भारतीय व्यापारी मध्य एशिया और फ़्रांस के इलाकों में गये और 18वीं सदी तक मास्को और सेण्ट पीटर्सबर्ग में भी अपनी उपस्थिति दर्ज़ करायी। 1834 में ब्रिटिश संसद द्वारा जब दासप्रथा समाप्त करने के कारण  मॉरीशस, गुयाना, कैरीबियाई द्वीपों, फ़ीज़ी, सूरीनाम, पूर्वी अफ़्रीका, श्रीलंका, बर्मा और ब्रिटिश मलाया के चाय बागानों में मज़दूरों की कमी हो गयी। तब अंग्रेज़ उन्नीसवीं सदी में भारतीय श्रमिकों को छल-बल से करारबन्द करके बँधुआ मज़दूरों के रूप में काम करने के लिए ले गये। कालान्तर में ये सभी मज़दूर जिस देश में गये उसी देश को अपना समझ लिया और वहीं बस गये। भारतीय मूल के आप्रवासियों की संतति में अब भी अपने पितृदेश के प्रति लगाव और देशभक्ति दिखलायी पड़ती है।

विश्व के प्रवासी समुदाय की बात की जाय तो सबसे बड़ा डायस्पोरा भारतीयों का है तथा 3 करोड़ से अधिक संख्या में ये भूमण्डल के 48 देशों में फैले हुए हैं। अपना भारतीय समाज जैसे बहुधर्मी है वैसे ही यहाँ का डायस्पोरा समाज भी बहुधर्मी (हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, इसाई, बौद्ध, जैन, पारसी आदि), बहुजातीय (प्राय: सभी जातियाँ) और बहुभाषी (हिन्दी, बंग्ला, कन्नड़, उड़िया, मलयालम, गुजराती, मराठी, तेलुगु आदि) है। भारतीय डायस्पोरा ही हैं जो प्रमुख रूप से विभाजित डायस्पोरा- उत्पीड़ित डायस्पोरा, श्रमिक डायस्पोरा और तिज़ारती डायस्पोरा का प्रतिनिधित्व करते हैं। विश्व के 11 ऐसे देश हैं जहाँ भारतीय डायस्पोरा 5 लाख की संख्या से अधिक निवास करते हैं और वे वहाँ कि आर्थिक, राजनीतिक दशा एवं दिशा तय करने में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करते हैं। यहाँ पर इन डायस्पोरा की शैक्षणिक, व्यावसायिक और आर्थिक दशा काफ़ी मज़बूत है। जहाँ-जहाँ ये भारतीय प्रवासी निवास कर रहे हैं वहाँ वे उस देश के आर्थिक तन्त्र को मज़बूत किये हुए हैं इतना ही नहीं ये अपनी भाषा और सांस्कृतिक विरासत को अक्षुण्य बनाये हुए हैं इसलिए उनकी अलग पहिचान बरकरार है तथा भारत से गहरा लगाव भी। इन भारतीय डायस्पोरा लोगों में मज़दूर, व्यापारी, शिक्षक, अनुसन्धानकर्ता, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रबन्धक आदि आते हैं, इनके सफल होने में इनकी परम्परागत सोच, सांस्कृतिक मूल्य और शैक्षिक योग्यता ने प्रमुख भूमिका का निर्वाह किया। विश्व-पटल पर सूचना तकनीक को प्रभावी बनाने में भी इनकी प्रमुख भूमिका को देखा जा सकता है। भारत में 09 जनवरी, 2003 से प्रवासी भारतीय दिवस मनाया जा रहा है क्योंकि इसी दिन महात्मा गाँधी दक्षिण अफ्रीका से अपने देश वापस आये थे। भारतीय डायस्पोरा को विदेशों में अनेक कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है, क्योंकि प्रत्येक देश के अपने-अपने क़ानून हैं तथा वहाँ पर प्रवासियों के प्रति अलग-अलग दृष्टकोण भी। यदि अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर डायस्पोरा का मूल्यांकन किया जाय तो पता चलता है कि इनके द्वारा किया गया विकास विश्व में महत्त्वपूर्ण योगदान कर रहा है। 18वीं शताब्दी में भारत से प्रवासी लोग गिरमिटिया मज़दूर बनकर दक्षिणी अफ्रीका गये तो वहाँ के शासकों द्वारा इनके लिए अनेक भेदभावपूर्ण नियम बनाये गये जिसका इन लोगों ने भरपूर विरोध किया और अपनी आवाज़ को बुलन्द किया जिसमें वकील, पत्रकार और नेता के रूप में महात्मा गाँधी जी ने प्रमुख रूप से सहारा देने का कार्य किया। वर्तमान समय में कुछ देशों में भारतीय डायस्पोरा कि स्थिति वहाँ के निवासियों के समान हो गयी है और वे शासन सत्ता में अपनी महत्वपूर्ण भागीदारी कर रहे हैं, जैसे- मॉरीशस, सूरीनाम, फ़िजी तथा ट्रिनिडाड आदि।

आज विकसित तथा विकासशील अनेक देशों में भारतीय प्रवासी समाज के लोग बहुसंख्यक रूप में निवास कर रहे है और उनका अपनी संस्कृति, भाषा, सभ्यता एवं परम्परा तथा मूल्यों पर पूर्ण विश्वास है इसलिए वे उन पर गर्व की अनुभूति करते हैं और मुक्त कण्ठ से आधुनिक हिन्दी साहित्य के पितामह भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के दोहे को कह उठते हैं कि, “निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल।” भारत सरकार ने 21- 23 जनवरी, 2021 को 17वाँ प्रवासी दिवस मनाने का कार्य किया जिसमें अनेक देशों से प्रवासी इकट्ठा होकर अपनी संस्कृति और सभ्यता पर विधिवत विचार-विमर्श किये। आज भी उनके भीतर भारत के प्रति लगाव है, उनको अपने देश की मिट्टी अब भी अच्छी लगती है। वे अपने पूर्वजों की यादों को संजोये रखना चाहते हैं इसलिए इस भारत देश का वे उत्थान करने के लिए अपनी थोड़ी-सी आहुति देना चाहते हैं। भारत सरकार डायस्पोरा की सुविधा-हेतु पासपोर्ट तथा वीजा के नियमों को सरल बनाने का कार्य कर रही है।

भारत सरकार अब भारतीय प्रवासी समुदाय को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए ‘अपने भारत को जाने’ जैसी योजना संचालित कर रही है तथा युवाओं के लिए अनेक छात्रवृत्ति स्कीम भी। इतना ही नहीं भारतीय सांस्कृतिक केन्द्र का नेटवर्क भी अब अपने पाँव तेजी से फैला रहा है तो वहीं अनेक देश के अनेक विश्वविद्यालय में सांस्कृतिक पीठ का भी सृजन भारतीय सरकार कर रही है। उत्तर प्रदेश और बिहार की सरकार ‘जड़ों की खोज’ कार्यक्रम द्वारा अपने प्रवासी नागरिकों को रिझाने का कार्य कर रही हैं। डायस्पोरा इतिहास और संसाधनों के न्यास तथा डायस्पोरा की क्षमताओं और नेटवर्क को प्रदर्शित करने के लिए भारत की राजधानी दिल्ली में ‘प्रवासी भारतीय केन्द्र’ की स्थापना इस दिशा में महत्त्वपूर्ण क़दम है। अनिवासी भारतियों तथा भारतीय राष्ट्रिकों के वैवाहिक सम्बन्ध के टूटन की समस्या विशेषकर दिल्ली, पंजाब, आन्ध्रप्रदेश, हरियाणा आदि राज्यों में आजकल देखने को मिल रही है इसके समाधान के लिए भारत सरकार द्वारा शादियों का अनिवार्य पंजीकरण और अनिवासी भारतीयों के साथ शादियों पर एक पुस्तिका का प्रकाशन किया तो डायस्पोरा कामगारों के लिए ‘प्रवासी बीमा योजना’ की शुरूआत भी हुई।

भारत में मीडिया चौथे स्तम्भ के रूप में स्वीकृत है। मीडिया, वास्तव में मीडियम का बहुवचन है, अर्थात् संचार के जितने माध्यम इस समय उपलब्ध हैं, उन सबका संयुक्त रूप मीडिया है। जब हम अपने विचारों का आदान-प्रदान जन-जन तक करना चाहते हैं या दूसरों के विचारों को ग्रहण करना चाहते हैं, तो इसके लिए हमें किसी न किसी माध्यम की आवश्यकता पड़ती है, तभी हम अपनी बात दूसरों तक पहुँचा सकते हैं। मिडिया दो प्रकार की होती है- प्रिण्ट मीडिया और इलेक्टॉनिक मीडिया। प्रिण्ट मीडिया में हमारी पत्र-पत्रिकाएँ, समाचार-पत्र तथा अन्य लिखित सामग्री आती हैं तो इलेक्टॉनिक मीडिया  में हमारे रेडियो, टी. वी., इण्टरनेट आदि। इन्हीं माध्यमों के द्वारा हम देश-विदेश में घटित हो रही घटनाओं की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं, यही मीडिया है।1 मीडिया किसी भी देश और समाज के लिए ऐसे-ऐसे कार्य करता है जिसके कारण वह महत्त्वपूर्ण हो जाता है। वह प्रहरी के समान कार्य को अंजाम देते हुए संवाद वहन करता है तथा विभिन्न वर्गों, सत्ता केन्द्रों, व्यक्तियों और संस्थाओं के बीच सेतु का कार्य भी करता है। किसी देश कि उन्नति और प्रगति में मीडिया महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। चाहे स्वतन्त्रता आन्दोलन का दौर रहा हो, चाहे देशभक्ति की भावना का जोश लोगों में भरने की बात हो या जनजागरूकता फ़ैलाने की बात सभी में मीडिया ने बढ़-चढ़कर अपनी भूमिका का निर्वहन किया तो भारतीय डायस्पोरा को लेकर भी मीडिया ने अपना काम ख़ूबसूरती से किया।

भारतीय भाषा और सांस्कृतिक विविधता हमें प्रत्येक जगह मिल जाती है जिसका सीधा सा प्रमाण यह कहावत है कि, “कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर बानी।” भारत की जनसंख्या 125 करोड़ के जादुई आंकड़े को पार कर गयी है और यहाँ पर प्रमुख रूप से लगभग 121 भाषाएँ बोली और समझी जाती हैं जिनमें से 22 भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में मान्यता मिली हुई है।

मीडिया द्वारा भारतीय डायस्पोरा के समाचार को बख़ूबी प्रस्तुत किया जाता है। मीडिया द्वारा उनकी समस्याओं को उजागर कर सरकार का ध्यान त्वरित गति से खींचा जाता है और उसका समाधन भी प्रस्तुत किया जाता है। प्रवासी भारतीय लेखकों एवं पत्रकारों का हिन्दी पत्रकारिता के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान है। हिन्दी पत्रकारिता को वैश्विक पहिचान दिलाने में इन लेखकों के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। विदेशों में रह रहे भारतीय डायस्पोरा अपने साथ केवल संस्कृति और सभ्यता लेकर ही गये पर उन्होंने अपनी लेखनी द्वारा भारतीय संस्कृति को नयी पहिचान दिलाने का कार्य किया। वे अपनी भाषा एवं संस्कृति को बचाने के लिए लगातार संघर्ष करते रहे और उनके इसी संघर्ष का ही परिणाम है कि आज हमारे सामने प्रवासी साहित्य नये कलेवर में आकर अपनी उपस्थिति दर्ज़ कर रहा है। भारतीय अवधारणा ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और ‘सत्यं शिवं सुन्दरम्’ को डायस्पोरा साहित्य ने विश्व के कोने-कोने में फ़ैलाने का कार्य किया तथा इनके लेखन में प्राचीन एवं अर्वाचीन का समन्वित रूप भी हमें दिखायी देता है। विदेशों में हिन्दी पत्रकारिता को बढ़ावा देने में भारतीय डायस्पोरा लोगों का महत्त्वपूर्ण योगदान है।

भारतीय संचार माध्यम के अन्तर्गत पत्र-पत्रिकाएँ, समाचार-पत्र, रेडियो, टी. वी., सिनेमा, सोशल साइट, इण्टरनेट आदि आते हैं। वर्तमान समय में भारत विश्व का सबसे बड़ा समाचार-पत्र बाज़ार के रूप में उभर रहा है। इण्टरनेट के प्रभाव से मीडिया का स्वरूप बदला तो सोशल मीडिया में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ तथा भारतीय सूचना व्यवस्था को तीव्र गति से संचालित करने के लिए भारत सरकार ने अनेक नये क़दम उठाये। इसी कड़ी में नयी दिल्ली में 24 अगस्त, 2013 को ‘राष्ट्रीय मीडिया-केन्द्र’ की स्थापना की गयी, जिसका उद्घाटन डॉ. मनमोहन सिंह ने किया, जिसे वाशिंगटन और टोक्यो में स्थित मीडिया केन्द्रों की तर्ज़ पर विकसित किया गया है। इसी प्रकार भारत सरकार का पत्र सूचना कार्यालय भारत सरकार की नीतियों, कार्यक्रमों और उपलब्धियों के बारे में समाचार-पत्र एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को सूचना देने वाली एजेंसी है। यह प्रेस विज्ञप्तियों, प्रेस नोट, विशेष लेख, सन्दर्भ-सामग्री, प्रेस ब्रीफिंग, फ़ोटोग्राफ़, संवाददाता सम्मेलन, साक्षात्कार, प्रेस दौरे आदि वेबसाइट के माध्यम से सर्वत्र त्वरित गति से सूचना पहुचाते हैं।

जनसंचार के सभी माध्यमों में हिन्दीभाषा की पकड़ बहुत ही मज़बूत हुई है। वर्तमान समय में हिन्दी का प्रयोग और हिन्दी के कार्यक्रम का बोलबाला हो रहा है जिसके कारण समाचार पत्र-पत्रिकाओं, आकाशवाणी, दूरदर्शन, अन्य निजी चैनल, विज्ञापन तथा सोशल साइट आदि माध्यमों में हिन्दी छाई हुई है। आज हिन्दीभाषा को वैश्विक बनाने में उसके बोलने वालों की संख्या, हिन्दी फ़िल्में, पत्र-पत्रिकाओं, आकाशवाणी, दूरदर्शन, निजी चैनल, विज्ञापन तथा सोशल साइट आदि का विशेष योगदान है। हिन्दी तथा हिन्दी पत्रकारिता को अन्तरराष्ट्रीय फलक पर पहिचान दिलाने में भारतीय डायस्पोरा लोगों की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। इन लोगों द्वारा हिन्दी का प्रयोग करने से इनका भारत के प्रति जुड़ाव अधिक हुआ है। उत्तरआधुनिक मीडिया भारतीय डायस्पोरा लोगों को भारत से जुड़ा रहने का एक सशक्त माध्यम के रूप में उभर रहा है और वही उनके स्वतन्त्र अभिव्यक्ति का मज़बूत माध्यम भी है। मीडिया सभी को राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर जोड़ने का कार्य करता है, इसलिए दूर रहते हर कोई भी अपनी संस्कृति, सभ्यता, परम्परा, रीति-रिवाज़, गीत-संगीत आदि से आसानी से जुड़ सकता है। वर्तमान समय में हिन्दी चैनलों की बाढ़ सी आ गयी है बाज़ार की स्पर्द्धा के कारण। आज हिन्दी में एक लाख से अधिक ब्लागर मौज़ूद हैं जो वैचारिक रूप से लोगों को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर जोड़ने का कार्य कर रहे हैं। प्रवासी भारतीय भी ब्लाग, फेसबुक, ट्विटर एव अन्य सोशल साइट के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं तथा एक-दूसरे कि गतिविधि से रूबरू हो रहे हैं। अब पत्र-पत्रिकाओं के इण्टरनेट पर उपलब्ध होने से भारत की सभी गतिविधि अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर देखी व सुनी जा रही तो सम्पूर्ण भारतीय मीडिया अनिवासी भारतीयों को जुड़ने में सहायक सिद्ध हुई हैं। हिन्दी के वैश्विक स्वरूप को गढ़ने में मीडिया ने महती भूमिका का निर्वाह किया है तो भारतीय डायस्पोरा लोगों के विचार को इसने लोगों तक पहुँचाने का कार्य भी किया। मीडिया संस्कृति के संवाहक के रूप में कार्य कर रही है तो मातृभाषा को जिन्दा रखने का भी। मीडिया द्वारा प्रसारित कार्यक्रमों से भारतीय डायस्पोरा लोगों की सोच, भारतीय लगाव, भाषा एवं संस्कृति तथा समाज की सच्चाई हिन्दीभाषा के द्वारा उजागर हो रही है। आज स्मार्ट फोन एवं सोशल मीडिया के द्वारा लोगों के विचार दूर तक पलभर में पहुँच जा रहे हैं तो तस्वीरों का भी आदान-प्रदान अब आसानी से हो जा रहा है। मीडिया ने सभी अप्रवासियों को अपनी मिट्टी की ओर आकर्षित किया है। आज प्रत्येक भारतीय अपने पर गर्व करता नज़र आ रहा है। भारतीय डायस्पोरा को लेकर मीडिया का रूख हमेशा सकारात्मक रहा है और उनकी उपलब्धियों को उसने भारतीय उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करने का काम किया है। मीडिया भारतीय डायस्पोरा की प्रत्येक गतिविधि को बारीकी से अध्ययन करके प्रस्तुत करने का प्रयास करता है ताकि लोग उसे जानना, सुनना, समझना चाहें। मीडिया भारत सरकार को डायस्पोरा की  गतिविधि से हमेशा अवगत कराता रहता है। सोशल मीडिया ने भारतियों एवं भारतीय डायस्पोरा लोगों के बीच की दूरी कम करके एक-दूसरे को नज़दीक लाने का काम किया जो दोनों के लिए बेहतर है। मीडिया द्वारा ही भारतीय डायस्पोरा कि स्थिति की जानकारी राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर मिलती है।

निष्कर्ष:
समग्रत: मीडिया भारतीय डायस्पोरा की सोच, भारतीय लगाव, भाषा एवं संस्कृति तथा समाज की सच्चाई को उजागर करके सभी अप्रवासियों को अपनी मिट्टी की ओर आकर्षित कर रहा है तो सोशल मीडिया ने निवासी भारतियों एवं भारतीय डायस्पोरा लोगों के बीच की दूरी कम करके एक-दूसरे को नज़दीक लाने का काम किया जो दोनों के लिए बेहतर है।

सन्दर्भ:
1. मीडिया शोध, ऋतु गोठी, अंसारी रोड, दरियागंज, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2004, पृष्ठ 16

संक्षिप्त आत्म परिचय: 
डॉ. अंगदकुमार सिंह, 15 अक्टूबर, 1981 को जन्म गोरखपुर में। 2003 में हिन्दी साहित्य में एम. ए.  तथा 2009 में पी-एच.डी. की उपाधि। ‘समकालीन हिन्दी पत्रकारिता और परमानन्द श्रीवास्तव’ और ‘गोरखपुर का समकालीन मीडिया-परिदृश्य’ के अलावा दो दर्जन पुस्तकों के लेखक और दर्जन भर पुस्तक/ पत्रिका का सम्पादन तथा परिकथा, मीडिया विमर्श, अक्षर वार्ता, साहित्य परिक्रमा, पतहर, मगहर महोत्सव, आज, मुक्त विचारधारा, चौमासा, कथाक्रम, सेतु, लाइट ऑफ नेशन जैसी अनेक पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित। सम्प्रति जवाहरलाल नेहरू पी. जी. कॉलेज, बाँसगाँव, गोरखपुर में हिन्दी विभाग में असिस्टेण्ट प्रोफेसर तथा पूर्वांचल हिन्दी मंच, गोरखपुर के मन्त्री।

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