प्रवासी हिंदी कविता: परिवेश और परिस्थितियाँ (योगेन्द्र सिंह)

योगेन्द्र सिंह
प्रवासी हिंदी कविता, प्रवासी साहित्य की लोकप्रिय एवं महत्त्वपूर्ण विधा है। प्रवासी हिंदी कविता का विषय क्षेत्र एवं कलेवर दोनों ही भावनात्मक रूप से भारत से जुड़े हुए हैं। चूँकि इन सभी प्रवासियों का मूल भारत भूमि ही है, अतः प्रवासी जीवन व्यथा एवं मातृभूमि से जुड़ाव ही प्रवासी हिंदी कविता का मूल भाव है किंतु इसके साथ ही प्रवासी देशों की आधुनिक जीवन-शैली एवं उससे विखंडित होते समाज की संवेदना भी प्रवासी हिंदी कविता को विशिष्टता प्रदान करती है।

प्रवासी हिंदी कविता का उद्भव गिरमिटिया देशों में गए भारतीयों के द्वारा हुआ है। इन देशों में गए गिरमिटिया मजदूर अपने साथ अपनी संस्कृति, सामाजिक मूल्य एवं लोक-परंपराओं को लेकर गए थे। अपनी मातृभूमि से हजारों मील दूर ये धरोहरें ही इनके जीवन का आलंबन बनी। मॉरीशस के प्रसिद्ध विद्वान डॉ॰ ठाकुर दत्त पांडेय ने इसी संदर्भ में लिखा है कि ”उनके भारतीय पूर्वज तुलसीकृत 'रामचरितमास' तथा 'हनुमान चालीसा' से प्रभु राम का गुणगान करते हुए अपने संपूर्ण कष्टों एवं पीड़ाओं को धैर्य के अश्रुओं से दूर करते थे और इस प्रकार की चौपाईयों से भौतिक एवं आध्यात्मिक उद्बोधन प्राप्त करते थे- "अब कह नाथ न चाहिए मेरे दीनदयाल अनुग्रह तोरे।"1 इस प्रकार गिरमिटिया देशों में लोकगीतों एवं धार्मिक गेय पदों के रूप में प्रारंभ हुई यह काव्य धारा ही कालांतर में 'प्रवासी हिंदी कविता' के रूप में विकसित हुई। आज यही काव्य परंपरा प्रवासी हिंदी कविता के रूप में जानी जाती है। गिरमिटिया देशों से प्रारंभ हुई यह काव्य परंपरा निरंतर अपना दायरा विस्तृत करती हुई प्रवासी साहित्य को हिंदी साहित्य का अंग बनाने की यात्रा कर रही है। जहाँ-जहाँ प्रवासी भारतीय गए, वहाँ-वहाँ उनके साथ स्वतः ही प्रवासी काव्य धारा भी गई।

प्रवासी हिंदी साहित्य के साथ ही प्रवासी हिंदी कविता भी भारतेत्तर देशों में रची बसी है। वह चाहे पुरा-प्रवासी देश हो या नव-प्रवासी अथवा अन्य देश हिंदी भाषा जहाँ-जहाँ बोली एवं समझी जाती हैं; प्रवासी हिंदी कविता ने भी वहाँ-वहाँ अपनी खुशबू से भारतीयता को सराबोर किया है। अलग-अलग देशों में रची जा रही यह काव्यधारा यद्यपि भाव एवं संवेदना में भिन्न है, किंतु भारतीयता से जुड़ाव ही इसका वास्तविक ध्येय है, जो कि इनके कण-कण में प्रवाहित होता है। विभिन्न देशों की प्रवासी हिंदी कविता में परिवेश एवं परिस्थितियाँ दोनों ही अलग होती हैं, जिसे कमल किशोर गोयनका इस प्रकार से स्पष्ट करते हैं, "इन सभी भारतीय प्रवासियों तथा भारतवंशियों की आजीविका की भाषा अंग्रेजी है तथा वहाँ के दैनिक जीवन में भी हिंदी भाषा का प्रयोग नहीं होता है, फिर भी ये अपने देश एवं भाषा प्रेम के कारण अपनी अभिव्यक्ति के लिए हिंदी भाषा का चयन करते हैं, परंतु इस समानता के अतिरिक्त गिरमिटिया मजदूरों और उनकी संतान-लेखकों तथा यूरोप-अमेरिका आदि पूँजीपति देशों में रहने वाले प्रवासी हिंदी-लेखकों में और कोई समानता नहीं है। इन दो प्रकार के प्रवासी हिंदी लेखकों का इतिहास, परिवेश, परिस्थिति, शिक्षा, भाषा आदि सभी में बड़ा अंतर है।"2 कमल किशोर गोयनका के उपुर्यक्त कथन के आलोक में कहा जा सकता है कि पुरा-प्रवासी एवं नव-प्रवासी देशों में प्रवासी जीवन की परिस्थितियाँ एवं परिवेश दोनों ही भिन्न हैं। यही भिन्नता इन देशों की प्रवासी हिंदी कविता में स्पष्ट रूप से झलकती है। एक ओर जहाँ पुरा-प्रवासी देशों के काव्य में गिरमिटिया जीवन का दर्द एवं संघर्ष, अपने पुरखों की यादें, अपनी मातृभूमि के प्रति लगाव की तीक्ष्ण अनुभूतियाँ उजागर होती हैं तो वहीं दूसरी ओर नव-प्रवासी देशों अमेरिका, ब्रिटेन, कनाड़ा में स्वजनों से बिछड़ने की पीड़ा, पीढ़ीगत द्वंद्व, अलगाव एवं पश्चिमी परिवेश में सामंजस्य न बिठा पाने की पीड़ा की अभिव्यक्ति हुई है। प्रवासी साहित्य के शिखर आलोचक, विश्लेषक एवं मार्गदर्शक कमल किशोर गोयनका प्रवासी साहित्य की इसी परिवैशिक भिन्नता के विषय में लिखते हैं, "यूरोप एवं अमेरिका जाने वाले भारतीयों के सम्मुख ऐसी कोई दारूण व्यथा एवं विवशता नहीं थी और वे जब चाहे अपने देश लौट सकते थे। हाँ, कभी-कभी उन्हें महात्मा गाँधी के समान गोरी चमड़ी के नस्लवाद का शिकार होना पड़ता था। इस प्रकार इन दोनों प्रकार के प्रवासी भारतीयों और भारतवंशियों के हिंदी साहित्य की प्रेरणाभूमि, परिवेश, परिस्थिति, कथानक, पात्र संवेदना, सरोकार एवं जीवन-दृष्टि भिन्न हैं।"3 

प्रवासी हिंदी कविता का परिवेश एवं परिस्थितियाँ निर्वासित देशों के परिवेश एवं परिस्थिति के अनुसार होते हुए भी उनका मूल भाव एवं संवेदना प्रवासी जीवन से ही जुड़े रहते हैं। मॉरीशस की पहली हिंदी-कविता 'होली' के लेखक 'गणेशी', 'उपनामधारी' कवि से प्रारंभ हुई। इस काव्य परंपरा में लक्ष्मीनारयण चतुर्वेदी, पं॰ जदुनंदन शर्मा, ब्रिजेन्द्र कुमार भगत 'मधुकर', पं॰ हरिप्रसाद रिसाल मिश्र, मुनीश्वर लाल चितांमणि, विष्णुदत्त मधु 'चंद्र', सोमदत्त बखोरी, ब्रजभूषण माथुर, रामदेव धुरंधर आदि अनेक कवि एवं लेखकों की समृद्ध परंपरा विकसित हुई है। जिसने प्रवासी हिंदी कविता के भाव एवं शिल्प में नए प्रयोगों से प्रवासी साहित्य में श्रीवृद्धि की है। गिरमिटिया देशों की प्रवासी हिंदी कविता के विषय-वैविध्य एवं परिस्थितियों के विषय में कमल किशोर गोयनका लिखते हैं, "इन कविताओं में विविध विषय हैं, जिनमें स्वजाति-प्रेम तथा एकता, धर्म तथा भाषा की रक्षा तथा दायित्व, गौ-रक्षा, जाति की उन्नति, शिक्षा का आंदोलन तथा अविद्या से संघर्ष, स्वदेशी एवं भारतीय महापुरुषों का गुणगान, सादा जीवन उच्च विचार, स्वतंत्रता की पुकार, देश का उत्थान, ईश्वर के प्रति श्रद्धा-भक्ति, फैशन से बचाव, कुप्रथाओं से दूर रहने आदि की प्रवृत्तियाँ मिलती हैं।"4 गिरमिटिया देशों में रची गई हिंदी कविता भारत से इन देशों तक की यात्रा का गान करती हैं। इसमें एक ओर स्वदेश प्रेम की अभिव्यक्ति है तो वहीं दूसरी ओर निर्वासित देशों में अपने अस्तित्व को बचाए रखने का संकल्प है। प्रतिकूल परिवेश में स्वयं को स्थापित करने का संघर्ष ही इस काव्य धारा की विशिष्टता है। "इस प्रकार स्वतंत्रता से पूर्व मॉरीशस की काव्य यात्रा में अनेक नए कवियों का आविर्भाव हुआ और उन्होंने भारतवंशियों के शोषण, दमन के साथ अमानवीय दुर्व्यवहारों का विरोध करते हुए स्वतंत्रता की चेतना उत्पन्न की और देश को जागृत किया। धर्म और संस्कृति तथा अस्मिता की रक्षा, समाज-सुधार, मानव-मूल्यों की स्थापना, हिंदी-भाषा का प्रचार-प्रसार आदि अनेक काव्य-प्रवृत्तियाँ इस काल की काव्य-धारा में दृष्टिगत होती है।"5 पुरा-प्रवासी देशों के हिंदी साहित्य में मॉरीशस और फ़ीजी का महत्त्वपूर्ण योगदान है। इसके साथ-साथ अमर सिंह रमण, जीत नारायण, महादेव खुनखुन, मार्तिन हरिदत्त, लक्ष्मण श्रीनिवासी, सुरजन सूरीनाम, पं॰ कमल प्रसाद मिश्रा, जोगिन्द्र सिंह कंवल, अमरजीत कौर, ईश्वरी प्रसाद चौधरी, कुँवर सिंह, बलराम विशिष्ठ, महावीर मित्र, सरस्वती देवी, काशीराम कुमुद, फीजी के महत्त्वपूर्ण काव्य हस्ताक्षर है, जिन्होंने अपनी व्यापक काव्य दृष्टि से प्रवासी हिंदी साहित्य को नई दिशा एवं नए तेवर प्रदान किये हैं।

पुरा-प्रवासी देशों मॉरीशस, फीजी, सूरीनाम आदि से विकसित होकर प्रवासी हिंदी कविता नव-प्रवासी देशों अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, इत्यादि की लंबी यात्रा तय कर चुकी है। आज यह काव्य-धारा इन देशों के परिवेश एवं परिस्थितियों के अनुकूल विस्तृत कलेवर एवं विजन के साथ नए विषयों एवं नए भाव बोध से पाठकों का परिचय करा रही है। पुरा-प्रवासी देशों के समान ही यह काव्य-धारा भी भारत प्रेम एवं स्मृति जुड़ाव के साथ-साथ प्रवासी देशों की संस्कृति एवं जीवन-शैली को समाहित करके मानवीय दृष्टि को और अधिक पैनी करने का कार्य कर रही है। यह भारतीयों के समक्ष प्रवासी जीवन की विडंबनाओं और विसंगतियों को उजागर कर आईना प्रस्तुत कर रही है। अतः प्रवासी हिंदी कविता विश्व में भारतीयता को नए सिरे से प्रभावित कर रही है, वह एक ओर जहाँ भारतीयता का वैश्विक पटल पर प्रतिनिधित्व कर रही है तो वहीं दूसरी ओर विश्व को भारतीयता से भी रू-ब-रू करा रही है।
पुरा-प्रवासी देशों के समान ही नव प्रवासी देशों में हिंदी कविता की विकसित परंपरा है, जिसमें विविध रंग-रूपों से अनेक कवियों ने अपनी रचनाओं से प्रवासी हिंदी काव्य संसार में श्रीवृद्धि की है। अमेरिका में डॉ॰ वेद प्रकाश 'वटुक, गुलाब खंडेलवाल, विजय मेहता, रामेश्वर अशांत, भूदेव शर्मा, देवी नागरानी, अंजना संधीर, सुधा ओम ढींगरा आदि महत्त्वपूर्ण काव्य हस्ताक्षर हैं, जिन्होंने केवल प्रवासी हिंदी कविता को ही नहीं अपितु हिंदी काव्य संसार को नए आयाम प्रदान किए हैं। इसी प्रकार ब्रिटेन में उषा राजे सक्सेना, कृष्ण कुमार, तितिक्षा शाह, दिव्या माथुर, पुष्पा भार्गव, प्राण शर्मा, मोहन राणा, सतेन्द्र श्रीवास्तव आदि प्रवासी हिंदी कविता के महत्त्वपूर्ण प्रतिमान है, जिन्होंने प्रवासी हिंदी कविता को नई दृष्टि प्रदान की है।

वस्तुतः प्रवासी हिंदी कवियों ने प्रतिकूल परिवेश एवं परिस्थिति में अपनी लेखनी से नया भाव एवं नई दृष्टि प्रदान की हैं। प्रवासी हिंदी कविता के इसी परिवेश एवं स्वरूपगत भिन्नता पर कमल किशोर गोयनका दृष्टिपात करते हैं, "मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, ट्रिनीडाड आदि देशों में जाने वाले गिरमिटिया भारतीय मजदूरों ने असीम यातनाएँ, अपमान तथा संघर्ष झेला था ओर उनके लिए वापस अपने देश लौटने की संभावनाएँ भी अत्यल्प ही थीं, परंतु अमेरिका और यूरोप जाने वाले भारतीयों के सम्मुख ऐसी दारूण व्यथा नहीं थी और वे कभी भी अपने देश लौट सकते थे। इन्हें भी किसी न किसी रूप में नस्लवाद का शिकार होना पड़ा। इस प्रकार इन दोनों ही प्रकार के साहित्य में प्रेरणा-भूमि और परिस्थितियाँ भिन्न हैं, उनके कथानक, पात्र, संवेदनाएँ, जीवन का दृष्टिकोण एवं सरोकार भिन्न हैं, लेकिन एक ऐसी समानता है, जिसके कारण दोनों ही प्रकार का साहित्य कहीं न कहीं एकरूप हो जाता है और वह है भारत-प्रेम, भारत की धर्म-संस्कृति-भाषा से प्रेम और भारत को एक सुखकर, समृद्धशाली एवं विश्व की एक शक्ति के रूप में देखने की कल्पना। भारत से बाहर, सौ-डेढ़ सौ वर्ष पूर्व जाने वालों तथा कुछ दशक पूर्व जाने वालों को उनका देश भारत ही उन्हें जोड़ता है और वहीं उन्हें अपने प्रेम में बाँधता है।"6 अस्तु प्रवासी हिंदी काव्य सृजन की परंपरा सदियों पुरानी है, जिसने आज विभिन्न परिवेश एवं परिस्थितियों में नई पहचान निर्मित की है। निष्कर्षतः 'प्रवासी हिंदी कविता' प्रवासी हिंदी साहित्य को वैश्विक साहित्य के रूप में प्रतिष्ठित करने वाली महत्त्वपूर्ण विधा है, जिसमें भारतीयता के वैश्विक स्वरूप को परिभाषित किया गया है।

प्रवासी हिंदी के इसी परिवेशगत भिन्नता ओर उसके वैशिष्ट्य बोध की प्रवासी कवयित्री अनिता कपूर अपने लेख 'अमेरिका के कवयित्रियों की मनोभूमि' में इस प्रकार रेखांकित करती हैं। "परिवेश कोई भी हो....देशी या परदेशी, संवेदनशील मन की छटपटाहट, जिंदगी का कभी-कभी मुस्कुराना और कभी रूठना, जीवन की लकीरें कभी पूर्ण विराम और कभी अर्धविराम, कभी प्रश्नवाचक, सभी की कलम की नोक से भावनाओं की स्याहीं में डुबोकर कविताएँ लिखी जाती रही हैं। अच्छी कविता वहीं है, जो पाठक से सीधा संवाद करे। रचनाकार की पूरी मासूमियत को प्रमाता तक संप्रेषित कर दें। ऐसी ही रचनाओं के द्वारा अमेरिका में बसी कवयित्रियों की कविताएँ साहित्य की यात्रा करने-कराने का एक अनायास माध्यम बनती जा रही हैं।"7 प्रवासी हिंदी कविता के क्षेत्र में कई ऐसे कवि है, जिन्होंने भारत ही नहीं विश्व के हिंदी-संसार में अपनी पहचान बनाई हैं। कई ऐसे कवि हैं, जिनकी काव्य रचनाएँ भारतीय संस्कृति को नए प्रतिमान से जोड़कर समसामयिक और प्रांसगिक बनाती है। इस प्रकार इन प्रवासी कवियों ने भारत से बाहर हिंदी भाषा को जीवंता को बनाए रखने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। प्रवासी हिंदी कविता के इसी वैशिष्ट्य बोध का पीयूष कुमार द्विवेदी अपने आलेख 'कविता का प्रवासी स्वर-संदर्भ: गिरमिटिया देश मॉरीशस और फीजी' में उद्घाटित करते हैं, "वास्तव में अपने देश से दूर 'विदेश' में रहकर अपने द्वारा रचित कविताओं की कुछ नितांत निजी विशेषताएँ हैं। यह 'प्रवासी साहित्य' हम जैसे भारतीय लोगों को अपने राष्ट्र के बारे में सोचने के लिए एक नया दृष्टिकोण प्रदान करता है। ये कविताएँ केवल अपनी मातृभूमि से दूर रहने की व्यथा भर नहीं बतलातीं, न ही वहाँ की सामाजिक-सांस्कृतिक भिन्नता को रेखांकित करती हैं, अपितु अपने पूर्वजों की संचित जातीय स्मृति को भी ताजा करती है।"8 अतः प्रवासी हिंदी कविता विभिन्न विचारधाराओं और विमर्शों का सामूहिक स्वर हैं, जिसका मूल स्वर 'अनेकता में एकता' का भाव है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि प्रवासी हिंदी कविता का व्यापक संसार होते हुए भी यह हिंदी के विराट संसार का ही अंग है। प्रवासी हिंदी काव्य-धारा में अनुभूतियों की व्यापकता के साथ-साथ अनुभव की प्रमाणिकता हैं, जो इसे विशिष्टता प्रदान करती है।
संदर्भ ग्रंथ सूची
1. बसंत-त्रैमासिक, महात्मा गाँधी संस्थान, मॉरीशस की पत्रिका, अप्रवासी विशेषांक, अंक 41, 1984, पृष्ठ संख्या 50-51
2. कमल किशोर गोयनका (सम्पादक), प्रवासी साहित्य, जोहान्सबर्ग से आगे, पृष्ठ संख्या 20
3. वही, पृष्ठ संख्या 20
4. प्रह्लाद, रामशरण, मॉरीशस का आदि-कानन, पृष्ठ संख्या 23
5. कमल किशोर गोयनका (सम्पादक), हिंदी प्रवासी साहित्य (गद्य-विधाएँ), पृष्ठ संख्या 21
6. वही, पृष्ठ संख्या 16
7. प्रो॰ नंदकिशोर पांडेय (प्रधान सम्पादक), प्रवासी जगत, त्रैमासिक पत्रिका, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा-252005, जुलाई-सितंबर 2018, पृष्ठ संख्या 206
8. पीयूष कुमार द्विवेदी, कविता का प्रवासी स्वर-संदर्भः गिरमिटिया देश मॉरीशस और फीजी, प्रवासी जगत, त्रैमासिक पत्रिका, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा-252005, अक्टूबर-दिसंबर, पृष्ठ संख्या 29-30
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योगेन्द्र सिंह
शोधार्थी, हिंदी विभाग, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ
ईमेल: yogendrasin77@gmail.com
चलभाष: +91 983 712 7252


प्रो॰ नवीन चंद्र लोहनी
विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग,
चौ० चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ
 

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