समीक्षा: सफेद तितली (रमाकांत शर्मा)

समीक्षा: गिरिराज शर्मा गुंजन

सफेद तितली (प्रेम कहानियाँ) – डॉ. रमाकांत शर्मा
प्रकाशक: अद्विक पब्लिकेशन, पटपड़गंज, दिल्ली-110092
पृष्ठ: 161
मूल्य: ₹ 350.00

सफेद तितली' मुंबई वाले डॉ. रमाकांत शर्मा का छठा कहानी संग्रह है। उन्होंने अब तक कुल बयासी कहानियाँ लिखी हैं जो विभिन्न कहानी संग्रहों में संकलित हैं। उनमें शामिल प्रेम कहानियों को एक जिल्द में पाठकों के सम्मुख लाने के उद्देश्य से यह संकलन लाया गया है। इसमें हाल ही में लिखी कुछ ऐसी प्रेम कहानियाँ भी शामिल हैं, जो किसी संकलन में सम्मिलित नहीं हैं।

‘अपनी बात’ में लेखक ने प्रेम को एक ऐसी भावना के रूप में निरूपित किया है जो जीवन को जीवन देता है। प्रेम की कोई सीमा नहीं है। जब कोई सच्चा प्यार करता है तो उसमें इस कदर डूब जाता है कि उसकी थाह नहीं मिलती। प्रेम कैसे होता है, किससे होता है, कब होता है, क्यों होता है और उसका स्वरूप क्या होता है, यह कोई विश्वासपूर्वक नहीं कह सकता। एक अनजान रास्ता है, जिस पर चलने वाले की अनुभूतियाँ ही उसे प्रेम के रसायन से आप्लावित कर सकती हैं। यूँ तो सभी संबंध प्यार की नींव पर टिके होते हैं, पर प्रेमी-प्रेमिका का प्यार उन्हें ऐसे अद्भुत संसार में ले जाता है, जिसे वे खोना नहीं चाहते। उनके प्यार में आकर्षण होता है, आसक्ति होती है और एक-दूसरे के लिए कुछ भी कर गुजरने की प्रेरणा-शक्ति भी।

रमाकांत शर्मा
प्रेम ने दुनिया को अनगिनत और बेहतरीन कहानियाँ दी हैं। “सफेद तितली" संग्रह भी ऐसी कुछ बेहतरीन कहानियों से सजा है जो प्यार के अलग-अलग रंग बिखेरती हमारे सामने आती हैं। प्रिय की प्राप्ति से ज्यादा प्रेम के अधूरेपन ने विश्व की महानतम प्रेम कहानियों को जन्म दिया है। “सफेद तितली” में संकलित डॉ. रमाकांत शर्मा की कहानियाँ भी इसका अपवाद नहीं हैं। इस संग्रह में कुल बीस कहानियाँ शामिल हैं और हर कहानी प्रेम के किसी ना किसी नए आयाम को उद्घाटित करती है। 

कहानी 'सफेद तितली' अभिषेक की एक कार्यालय में नियुक्ति से शुरू होती है। कहानी की नायिका अनीता एक चंचला युवती है और प्रथम दृष्टि में ही अभिषेक उससे प्रेम करने लग जाता है। अभिषेक का मित्र अनीता की वास्तविकता से परिचित है और वह उसे सचेत कर देता है। स्वयं अभिषेक ने भी देखा कि अनीता ने अपने माँ-बाप की जिद रखने के लिए जिस आदमी से शादी कर ली थी, उससे हनीमून से लौटने के दो-तीन माह के भीतर ही अलग रहना शुरू कर दिया और आखिर में एक दिन उन दोनों के बीच तलाक की खबर भी मिल गई।

गिरिराज शर्मा 'गुंजन'
अनीता ने अपने एक पत्रकार मित्र रवि से दूसरी शादी कर ली जिसके बाद उसका व्यवहार पूरी तरह से बदल गया। पति के बीमार होने पर ऑफिस से छुट्टियाँ लेकर उसकी सेवा में लग जाती है। उसने अपने पति से सच्चा प्यार किया था। अब वह पहले वाली तितली नहीं रही थी। पति की मृत्यु के बाद विवाह नहीं किया और एक विधवा की तरह अपना शेष जीवन व्यतीत किया।

'वह सच बोल रहा था' कहानी की मानवी ने शुभम से प्रेम विवाह किया था। एक शक के आधार पर वह शुभम से दूरी बना लेती है। उससे अलग रहने के दौरान जब वह मन की शांति के लिए मंदिर जाने लगती है और अनजाने में जवान और सुदर्शन कथा-वाचक के आकर्षण में खुद को डूबा पाती है तो उसे शुभम के सच बोलने का अहसास होता है और वह शुभम के पास लौट आती है।

संकलन की तीसरी कहानी 'खाली कोना' विधवा विवाह की समस्या पर आधारित है। सुमन बाल विधवा-है। रघुनाथ से प्रेम करती है। सुमन के माता-पिता रूढ़िवादी हैं और समाज के भय से विधवा विवाह के खिलाफ हैं। वे सुमन की जिद से परेशान होकर उसे मारकर फांसी पर लटका देते हैँ। उसे इस हालत में देखकर रघुनाथ पागल हो जाता है। सुमन का भाई रघुनाथ को भी तलवार से मारना चाहता है किन्तु उसके पिता ने आकर उसका हाथ पकड़ लिया, "यह क्या कर रहा है तू? सुमन के बारे में सभी को बताया जा सकता है कि उसने विधवा-विवाह का पाप करने के बाद फांसी लगा ली, पर इसकी हत्या का कोई बचाव नहीं होगा हमारे पास। ... इसे गाड़ी में डाल कर उसी लाइब्रेरी के पास पटक आ।" विक्षिप्त हालत में रघुनाथ हमेशा एक मंदिर के बाहर बैठा मिलता है।

"मैसेज बॉक्स" कहानी में संजना और कहानी का नायक एक ही कार्यालय में कार्य करते हैं। संजना बहुत ही कम बात करती है किंतु मन ही मन नायक से प्रेम करती है। कहानी का नायक भी उसे चाहता है। नायक का ट्रांसफर अन्य शहर में हो जाता है। आठ वर्ष बाद संजना का मैसेज आता है। दोनों के बीच प्रतिदिन गुड मॉर्निंग मैसेज से बातचीत का सिलसिला चल निकलता है। मैसेजों के माध्यम से वे एक-दूसरे को समझने की कोशिश करते हैं। कहानी इस बात को रेखांकित करती है कि बंद किताब और लोग समझ में नहीं आते, उन्हें खोलकर पढ़ना पड़ता है। कहा भी गया है कि अगर आप किसी की परवाह करते हैं तो उसे बताएँ अवश्य क्योंकि अनकही बातें अकसर अनसुनी रह जाती हैँ।

‘एक पत्र की मौत‘ रवि और किरण की प्रेम कहानी है। लगभग पच्चीस साल पहले किरण ने हमेशा के लिए देश छोड़कर जाने से पहले जो प्रेमपत्र रवि के थमाया था उसे रवि ने अभी तक संदूक में संभाल कर रखा है। वह चाहकर भी उसे नष्ट नहीं कर पाया। कभी-कभी उसे निकाल कर देख लेता है और पुरानी यादें ताजा कर लेता है। कई साल बाद किरण उसे अप्रत्याशित रूप से एक पार्क में बैठी दिखाई देती है। वे दोनों ही एक-दूसरे को देखकर चौंक जाते हैं। 

किरण बताती है कि न्यूजीलैंड में ही उसका विवाह उसके पिता के मित्र के लड़के से हो गया है, बेटा और पोते भी हैं और वह उनके साथ बहुत खुश है। उसे यह जान कर दुःख होता है कि रवि ने अभी तक शादी नहीं की। किरण का यह कहना कि, "वह पत्र लिखना अगर मेरी नादानी थी तो उसे अब तक संभाल कर रखना तुम्हारी नादानी है," रवि को सोचने पर विवश कर देता है और वह उस पत्र को नष्ट कर देता है जिसे उसने इतने समय से संभालकर रखा था। इस कहानी का संदेश स्पष्ट है, प्रेम मनुष्य के जीवन की सच्चाई है, पर यह अंतिम लक्ष्य नहीं। प्रेम जीवन को रोकता नहीं क्योंकि जीवन का धर्म आगे बढ़ना है। यह कहानी पढ़ते समय हिंदी फिल्म 'सरस्वती चंद्र' की याद ताजा हो जाती है जिसमें नायिका कहती है, "छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए, ये मुनासिब नहीं आदमी के लिए, प्यार से भी ज़रूरी कई काम हैं, प्यार सब कुछ नहीं ज़िंदगी के लिए।"

'जवाब' हायर सैकण्डरी स्कूल में सहपाठी रहे ऐसे युवक (दीपक उपाध्याय) और युवती (ज्योति गिडवानी) की कहानी है जो कई वर्ष बाद एक ट्रेन में सहयात्री के रूप में मिलते हैं। स्कूल के दिनों में ज्योति अधिकतर चुप रहना पसंद करती थी। स्कूल के लड़के मजनू की तरह उसके पीछे पड़े रहते थे और वह किसी को घास नहीं डालती थी। वह दीपक को भी अच्छी लगती थी। शायद वह अकेला ऐसा लड़का था जिससे वह खुल कर बात कर लेती। ज्योति का परिवार भारत-पाक विभाजन की त्रासदी से गुजर चुका है। वह दो बार शादी कर चुकी है। दीपक को याद आता है कि ज्योति उस परिवार से संबंधित थी जो उनके ऑफिस में माल सप्लाई करता था और रिश्वत देने के बहाने उसके बॉस श्रीवास्तव साहब को ताश खेलने के लिए घर बुलाता था। ताश के खेल में ज्योति के पिता जान-बूझकर रुपये हारते थे। शराब भी परोसी जाती थी और श्रीवास्तव जी ज्योति को अपने पास बिठा कर उसके साथ अश्लील हरकतें भी करते थे जिसका ज्योति विरोध नहीं करती थी। दीपक इस सबका 'जवाब' ज्योति से लेना चाहता है। ज्योति बंटवारे के दिनों में लाहौर की उस रात की यंत्रणा और बेइज्जती के सामने श्रीवास्तव जी की हरकतों को बहुत हल्का मानती है। परिवार की भूख, गरीबी और वितृष्णा से बचाव का उसके पास यही एक मात्र उपाय था। कहानी के अंत में अपने आँसू पोंछ कर ज्योति दीपक से कहती है, "मिल गया ना तुम्हें जवाब?"

"मंदिर की सबसे ऊँची सीढ़ी" मीता और धीरज की प्रेम कहानी है। ये दोनों एक ही कंपनी में काम करते हैं किंतु अलग-अलग शहरों में। धीरज एक सेमिनार के सिलसिले में उस शहर में जाता है जहाँ मीता काम करती है। नए शहर में धीरज को कोई परेशानी न हो, इस बात का ख्याल रखने का जिम्मा कंपनी की ओर से मीता को सौंपा गया है। तीन दिन तक कंपनी के कार्य के पश्चात साथ-साथ शहर में घूमने, होटल में भोजन करने और मीता के घर में उसके हाथ का बना खाना खाने के दौरान उनके बीच प्रेम का अंकुर फूट पड़ता है। 

मीता ने सुशांत नाम के एक व्यक्ति के साथ प्रेम-विवाह किया था किन्तु सुशांत के शक्की स्वभाव के कारण वे केवल छह महीने ही साथ रह सके। उनका तलाक हो गया था। धीरज और मीता का एक साथ समय गुजारने का प्रिय स्थान कृष्ण मंदिर की सबसे ऊँची सीढ़ी थी। सेमिनार के बाद धीरज अपने शहर लौट गया किंतु दोनों की फोन पर बात होती रहती थी। फिर, अचानक मीता की ओर से फोन आने बंद हो गए। वह ऑफिस से लंबी छुट्टी ले लेती है। तलाक के बाद भी वह अपने पूर्व पति सुशांत को भूल नहीं पाती है। वह इस बात को लेकर भी सशंकित रहती है कि तलाकशुदा के रूप में धीरज उसे पूरे मन से स्वीकार कर भी पाएगा या नहीं। धीरज मीता को खोजने उसके शहर में जाता है। शाम के झुटपुटे में मंदिर की उसी सबसे ऊँची सीढ़ी पर दोनों की मुलाकात होती है और दोनों एक साथ जीवन व्यतीत करने का निर्णय ले लेते हैं।

कहानी 'ब्लैक आउट' नंदलाल और पुष्पा के प्रेम की अद्भुत कहानी है। पुष्पा को लिखी नंदलाल की चिट्ठी उसकी मां के हाथ में पड़ जाने से जो बवाल उठता है, उसने दोनों को एक-दूसरे से अलग रहने पर विवश कर दिया। युद्ध के समय शहर में ब्लैकआउट का फायदा उठाकर पुष्पा नंदलाल से मिलने आती है और उसकी बातें नंदलाल के मन में ऐसा अंधेरा बो जाती हैं जिसे सूरज की रोशनी भी नहीं हटा पाती।

'बहूजी और वह बंद कमरा' कहानी में बहूजी के चरित्र के माध्यम से प्रेम और मर्यादा का तालमेल दर्शाया गया है तो 'सजा' कहानी अपनी उस पत्नी को दी गई सजा से बेतरह चौंकाती है जो शादी की रात को ही अपने प्रेमी के साथ भाग गई थी। 

कहानी 'सत्ताइस साल बाद' में अभिजीत को इतने लंबे समय बाद आया मधुरिमा का फोन उस अतीत में ले जाता है जिसे वह जतन करके भूला हुआ था। मधुरिमा के साथ जो कुछ घटा था, उसमें वह खुद को अपराधी समझता था और अपराध बोध से ग्रसित रहा करता था। लेकिन, सत्ताईस साल बाद मधुरिमा से बात करने के बाद उसका बेवजह का अपराध बोध तिरोहित हो गया। वह बहुत हल्का महसूस करने लगा। उसने मन ही मन सोच लिया कि वह अब दादी बन चुकी मधुरिमा से मिलने जरूर जाएगा।

'1968 – ए लव स्टोरी' प्रेम की अतल गहराइयों से उपजी ऐसी कहानी है जिसमें प्रेम का भोलापन अपनी पूरी शिद्दत से उभर कर सामने आया है। प्रेम किससे और क्यों हो जाता है, यह ऐसा प्रश्न है जिसका जवाब नहीं मिलता। कहानी का अंत बहुत ही मार्मिक बन पड़ा है। सरिता के सम्मुख अपना प्रेम प्रकट न कर पाने की अपनी कमजोरी के प्रति कहानी के नायक को बहुत पश्चाताप होता है और वह हमेशा के लिए शहर छोड़कर जा चुकी सरिता के खाली कमरे में जाकर उस अखबार पर बैठकर बेआवाज़ रोता है, जिसे सरिता जाने से पहले बिछाकर बैठी हुई थी।

'खुला पिंजरा' कहानी प्रेम के पागलपन की कहानी है। यह प्रेम के उफनती नदी के उस रूप को सामने लाती है जो अपने उतावलेपन में अच्छे-बुरे सबको समेटकर चलते हुए किनारों के बंध तोड़ देता है।

“उतरती धूप' प्यार में धोखा खाने वाली उस लड़की की कहानी है, जिसका विश्वास मर चुका है और वह अविवाहित रहकर जिंदगी जीने का संकल्प ले चुकी है। लेकिन, सर्दी से कांपती उसकी देह को जब मुंडेर से उतरती धूप यह अहसास कराती है कि जिंदगी की धूप भी इसी तरह उसके हाथों से धीरे-धीरे फिसल रही है तो वह निश्चय कर लेती है कि अपने हाथ से जिंदगी की धूप पूरी तरह सरक जाने से पहले माँ के स्नेह और उसे जी-जान से प्यार करने वाले विकास के प्यार की गर्मी को अपनी मुट्ठी में बंद कर लेगी।

कहानी 'कोई रास्ता है तुम्हारे पास' मदन का पड़ोस में रहने वाली विवाहित आँटी के प्रेम-जाल में फँसकर रह जाने की कहानी है। यह कहानी उसकी जिंदगी को एक ऐसे मोड़ पर लाकर छोड़ देती है, जहाँ से उसे आगे कोई रास्ता नजर नहीं आता। 

"गहरे तक गड़ा कुछ" कहानी प्रेम के उस रूप से परिचित कराती है जहाँ प्रेम हादसों का बयान बन जाता है। पाठक कहानी के साथ बहता चला जाता है और जब कहानीकार अमर के मुख से कहलवाता है, "... आज सोचता हूँ, माँ एक औरत भी तो थी। उसकी जरूरतों और मज़बूरियों को न तो समाज समझ रहा था और न ही मुझे समझने दे रहा था" तब पाठक की आत्मा उसे झकझोरने लगती है। वह इस तथ्य को स्वीकार करने लगता है कि जब असमय किसी ने अपने जीवन साथी को खो दिया हो तब उसे अकेलापन मिटाने और दु:ख-दर्द बाँटने के लिए किसी साथी और सहारे की जरूरत होती ही है। यह जरूरत उम्र के अंतिम पड़ाव में शिद्दत से उभरती है। मन की घुटन, घबराहट और मानसिक उलझन दूर करने के लिए उसे किसी का साथ मिलता है तो उसे अपराध क्यों माना जाना चाहिए।

“अमली” कहानी पढ़ते समय पाठक के सामने उस माहौल का स्पष्ट चित्र उभरने लगता है जिसका बयान कहानीकार द्वारा 'अमली' को सशक्त एवं प्रभावशाली चरित्र प्रदान करने के लिए किया गया है। यह इस कहानी की जबरदस्त सफलता है। प्यार में एक औरत किस सीमा तक जा सकती है, इसे देखकर पाठक स्तंभित होकर रह जाता है। प्रेम का यह ऐसा रूप है जो अमली के मर्दाना शरीर के भीतर छुपे नारी हृदय को सामने ले आता है।  
'असहमत' कहानी उस लड़की की कहानी है जो अपनी गुरु साध्वी के कहने पर शरीर को गंदा मानती है और विवाह को घृणित समझकर उससे जीवन भर दूर रहने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध है। लेकिन, ऐसा कुछ घटित हो जाता है कि विवाह के लिए उसकी असहमति सहमति में बदल जाती है। कहानी के नायक और नायिका के बीच के सशक्त संवाद बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देते हैं। एक बानगी देखिए – “कैसी बातें कर रही हो तुम? हमारा शरीर ही हमारी पहचान है, हम इसे खुद से अलग नहीं कर सकते। यदि यह शरीर न हो तो हमारा अस्तित्व ही क्या रह जाएगा। यह सुंदर शरीर हमें ईश्वर ने बख्शा है। फिर जिस शरीर में हमारी आत्मा रहती है, वह गलत, गंदा या अश्लील कैसे हो सकता है?”

कहानी 'हर सवाल का जवाब नहीं होता' मानव मन की अतल गहराइयों में उतरकर कुछ ऐसे प्रश्नों का जवाब खोजने लगती है, जिनके जवाब नहीं मिलते। कहानी की शुरूआत उदय और वंदना के वार्तालाप से होती है। वंदना नौवीं में पढ़ती है और उदय दसवीं में। दोनों मन ही मन एक दूसरे को पसंद करने लगे है। बारहवीं के बाद उदय इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए दूसरे शहर चला जाता है। काफी समय तक दूर रहने के कारण वंदना के मन में उदय के प्रति प्रेम की गहरायी कम हो गई। इस बीच वह उदय के पिताजी की ओर आकर्षित होती है। उन्हें भी वंदना की समीपता अच्छी लगती है।

उदय जब गर्मियों की छुट्टियों में घर लौटा तो उसे घर का माहौल बहुत बदला-बदला सा लगा। एक दिन उदय की माँ उसे कहती है, "इनका मन मुझसे भर गया है और यह अब अपनी बेटी की उम्र की वंदना से इश्क लड़ा रहे हैं।" उदय को एकाएक इस बात पर विश्वास नहीं हुआ। वह वंदना के घर जाता है। जो वंदना कभी भागकर उसके पास आ जाती थी, छुपकर अपने कमरे में बैठी रही और बाहर नहीं निकली। वंदना के व्यवहार से यह साफ हो गया कि माँ ने जो कुछ बताया, वह ग़लत नहीं था और वंदना इसमें पूरी तरह शामिल थी।

उस माहौल से बाहर निकलने की दृष्टि से उदय के पिताजी ने एक दूसरे शहर में अपने एक घनिष्ठ मित्र के साथ साझेदारी में एस्टेट एजेंसी का काम शुरू कर दिया। वहाँ जाकर भी उदय को सब-कुछ सामान्य नहीं लगा। क्या हो गया था उसके हँसते-खेलते परिवार को!

इस बीच वंदना की शादी हो जाती है। ... उदय का इंजीनियरिंग का कोर्स पूरा हो जाता है और हापुड़ की एक बड़ी कंपनी में उसे नौकरी मिल जाती है। उसकी शादी हो जाती है। वह बहुत खुश था और उसने सोच लिया था कि अब वह माँ-बाबूजी को अपने पास हापुड़ ले आएगा। पर, भगवान को कुछ और ही मंजूर था, माँ अचानक चल बसी।
काफी दिनों बाद किसी शादी समारोह में उदय और वंदना की मुलाकात होती है। उदय के मन में हमेशा से घुमड़ते कुछ सवालों के जवाब तो मिलते हैं, पर हर सवाल का तो जवाब नहीं होता। वह वंदना और उसके पति को अपने घर आमंत्रित करता है। वृद्ध कृशकाय बाबूजी और बुढ़ापे की दहलीज पर खड़ी वंदना की मुलाकात पाठक को भीतर तक भिगो देती है। 

कहानी 'दूध की धुली' पाठक को शुरू से अंत तक बांधे रखती है। यह कहानी प्रेम के विश्वास और मर्यादा के निर्वाह की कहानी है।

“सफेद तितली” संग्रह की कहानियाँ काफी रोचक और उद्देश्यपूर्ण तो हैं ही, जीवन के सबसे जरूरी पहलू को जानने-समझने के लिए नई दृष्टि भी देती हैँ। लगता है, कहानियों के पात्र वास्तविक जीवन से उठाए गए हैं। कोई भी पात्र, कोई भी घटना बनावटी नहीं लगती। हरेक के जीवन में कभी ना कभी प्यार का अंकुर फूटता है। कहानियाँ पढ़ते समय पाठक के सामने अपने खुद के साथ या अपने किसी जानने वाले के साथ घटी घटनाएँ चलचित्र की भांति उभरने लगती हैं और वह कहानी के साथ जुड़ाव महसूस करने लगता है। यह कहानीकार की बड़ी उपलब्धि है।
भाषा की दृष्टि से देखा जाए तो उसे अलंकारिक होने से बचाया गया है। हिंदी से इतर शब्दों का भी बेहिचक प्रयोग किया गया है किन्तु कथा-प्रवाह में रुकावट महसूस नहीं होती। कहानियों में कहावतों-मुहावरों का भरपूर प्रयोग हुआ है। उनकी वजह से भाषा-सौंदर्य में वृद्धि ही हुई है।

कहते हैं कि हर लेखक अपने लेखन का प्रारंभ कविता से करता है। इसीलिए लेखक के भीतर बैठा कवि गद्य लेखन में भी यदा-कदा कविता करता प्रतीत होता है। यह बात आलोच्य कहानियों के लेखक पर भी सटीक बैठती है। कुछ उदाहरण देखिये - उस दुधिया रोशनी में उसका दूध का धुला चेहरा बादलों में घिरे चांद सा दिखाई दे रहा था, धूप की चिड़िया फुदक कर मुंडेर पर बैठ गई, यादों के बुझे दिये फिर से जल उठे, भावनाएँ खुशबुओं की पतंगें बन कर पुष्पा तक पहुँचने लगी, काग़ज के कलेजे में भी दर्द पैदा कर रहे थे, गले तक उछलती दिल की धड़कने, इत्यादि।
प्यार के विभिन्न रंगों में डूबी इन कहानियों में पाठक को अपने साथ बहा ले जाने की अद्भुत ताकत है। इसके लिए लेखक और प्रकाशक को दिल से ढेर सारी बधाइयाँ।
***

समीक्षक परिचय: डॉ. गिरिराज शर्मा गुंजन
जन्म: अप्रैल 1948
शिक्षा: एम. ए. पीएच. डी (हिंदी)
प्रकाशित ग्रंथ: हिंदी नाटक: मूल्य संक्रमण, साठोत्तरी हिंदी नाटक (आलोचना), बरसों अंधेरे के बाद (काव्य)। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में शोधपरक आलेख, कविताएँ, कहानियाँ और एकांकी नाटक प्रकाशित। आल इंडिया रेडियो के उदयपुर, गुवाहाटी और पुणे केंद्रों से क्रमश: कविताएँ, आलेख और समूह चर्चा प्रसारित।
भारतीय रिजर्व बैंक से सेवा निवृत्त।

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