दो रचनाएँ: कवि इन्द्र बहादुर खरे

धरोहर
प्रो. इन्द्र बहादुर खरे
(1922-1953)
दीवाली आ गई!

द्वार द्वार दीप दान, हर दीप की ज्योत बलवान
आजाद दीपों से रोशन हैं भारत माँ के परिधान,
चौबारो के संग झोपड़ों में भी खुशहाली आ गई!

देश में गुलामों की दीवाली नहीं है आज
दीपहीन, स्नेहहीन निशि काली नहीं आज,
युग अंधकार चीर आज उजियाली आ गई!

युग बदला, बदल गई परिभाषा जीवन की,
फिर लौटी हरियाली अपने इस नन्दन की;
कली-कली नन्दन की वनमाली पा गई!

आज मुक्त-दीप दान, नगर-नगर, घर-घर में
नवल कण्ठ, नवल गीत, नवल शक्ति स्वर स्वर में,
भारत की क्षितिजा पर युग-लाली छा गई!

दीवाली आ गई!

(12 नवम्बर 1947)
***


बापू के प्रति

आपत्ति अन्याय संघर्ष में भी
रहे देव अपनी अलख तुम जगाए।

प्रात: किरण से उगे तुम जगत में
(मुकुलित कमल सा हुआ मुग्धनत मैं)
रंजित हुआ विश्व - आलोक आया
भँवर - ग्रस्त नैया ने मल्लाह पाया॥

प्रगति को प्रभा का दिया छन्द तुमने
मुझे निज विभा में किया बन्द तुमने।
समय ताल देता तुम्हारी प्रगति पर
तुम्हें देख बहते सरल स्नेह निर्झर॥

तुम्हीं ने मरुस्थल में नन्दन बसाए
धरा की तपन पर करुणा मेघ छाए।
तुम्हें रोक पाईं न काली घटाएँ
तुम्हें टोक पाईं न नन्दन छटाएँ॥

नई आग ले तुम चले आ रहे हो
नई राग बन विश्व में छा रहे हो।
जहाँ तुम चले पंथ अपना बनाया
जहाँ तुम जले, तम स्वयं तिलमिलाया॥

वहीं सृष्टि फूली, नई ले कहानी
वहीं दानवों को मिली नम्र वाणी।
उतरना वहीं स्वर्ग को भी सुहाया
वहीं तार सुषमा का फिर झनझनाया॥

अंकुर वहीं पर नए फूट आए
वहीं ‘फूट’ ने फिर मिलन गीत गाए।
बसी राजधानी वहीं पर प्रणय की
तरल हो बही क्रूर जड़ता हृदय की॥

वहीं हो गई शक्ति स्नेहाभिरंजित
वहीं हो गई भक्ति श्रध्दा निमज्जित।
आसक्ति बेली खिली ले समर्पण
वहीं झरेंगे आत्म विकृति के कण॥

वहीं बुध्द का बोध जागा सजग हो
वहीं ज्ञान शतदल खिले मुस्कराए।
लगी आग विव्देश पशुता की भारी
जली जा रही बंग कविता हमारी॥

फुँका जा रहा पंचनद प्रान्त प्यारा
भूना जा रहा हाय ! भारत हमारा।
लिखी जा रही रक्त से है कहानी
चरण चिन्ह रक्तिम बने युग निशानी॥

ये नीलाभ अम्बर, ये हरिताभ धरणी
हे हिमगिरि, ये सागर, पवन पुष्पकर्णी।
तुम्हारे पुजारी; इन्हें मुक्ति दो तुम
विनय में खड़े हैं ये आँखें बिछाएँ॥

आपत्ति अन्याय संघर्ष में भी
रहे देव अपनी अलख तुम जगाए।

(“जय हिन्द” में प्रकाशित 2 अक्टूबर 1947)





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