आचार्य श्रीराम शर्मा के जीवन-वृत्त को सहज, सरल रूप में प्रस्तुत करती महत्वपूर्ण पुस्तक: पड़ाव दर पड़ाव

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पुस्तक: पड़ाव दर पड़ाव श्रीराम शर्मा आचार्य
लेखक: श्रीमती सुषमा श्रीवास्तव
पृष्ठ: 96
मूल्य: ₹ 200.00 रुपये
प्रकाशन वर्ष: 2021
प्रकाशक: नमन प्रकाशन, लखनऊ


उ.प्र.हिन्दी संस्थान के सुभद्रा कुमारी चौहान महिला बाल साहित्य पुरस्कार सहित कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत/ सम्मानित, साहित्यकार श्रीमती सुषमा श्रीवास्तव जी आकाशवाणी लखनऊ  से सेवानिवृत्त हुई हैं। आपने हिन्दी साहित्य की कविता और कहानी, विधाओं में अपनी लेखनी चलाई है। आपकी एक दर्जन से अधिक कृतियों का प्रकाशन भी हो चुका है।

उनकी पुस्तक ‘पड़ाव दर पड़ाव श्रीराम शर्मा आचार्य मुझे पढ़ने का सुअवसर मिला।

विदुषी लेखिका ने आचार्य श्रीराम शर्मा जी के जीवन-वृत्त को 21 अध्यायों के माध्यम से पाठक वर्ग के सामने प्रस्तुत किया है। ूहान आत्माएँ समय-समय पर मनुष्यों का कल्याण करने के लिए अवतरित हुआ करती हैं।

प्रथम अध्याय-‘अवतरण’ के अन्तर्गत श्रीराम शर्मा आचार्य जी के पृथ्वी लोक पर अवतरित होने की स्थितियों एवं उनके अवतरित होने के उद्देश्य के बारे में स्पष्ट किया है-
"महाकाल ने इन्हें ही निमित्त बनाया था कि भारतीय संस्कृति का अवगाहन करें। कुव्यवस्थाओं, कुव्यवसनों में फँसे मनुष्यों को परिष्कृत सद्मानव बनायें। (पृष्ठ-2)

दिनेश पाठक ‘शशि’
पुस्तक का दूसरा अध्याय आचार्य जी की युवावस्था के क्रिया-कलापों, उनकी दिनचर्या तथा अशरीरी उनके गुरु की आत्मा के द्वारा उनको खोज लेने के बारे में जानकारी दी है।

युवावस्था में ही उन्होंने जाति-पाँति एवं भेद-भाव के विरुद्ध अपने घर से ही अभियान शुरू कर दिया था। एक दिन जब उनको ज्ञात हुआ कि उनके घर काम करने वाली बाई छपको बीमार है तो वह विह्वल हो उठे-

"उन्होंने सुना कि छपको बीमार है। श्रीराम फौरन छपको के घर चल दिए। किसी को पता नहीं।

वहाँ जाकर देखा तो वह बहुत बीमार थी। वह जमीन पर लेटी बुखार में तप रही थी। श्री राम ने माथे पर हाथ रखा तो उसने घबरा कर आँखें खोल दीं।

‘अरे बाबू, यहाँ तुम कैसे आये, जाओ, जाओ, घर जाओ। तुम हमारे घर आये, हमें छुआ, कैसा अनर्थ कर दिया।’

पर श्री राम चुपचाप उपचार में लगे रहे वहीं, जो मिला उससे  उपचार किया । पानी की पट्टी रखी और वहाँ की साफ-सफाई की फिर बाहर निकल कर वैद्य जी से दवा लाकर दी।" (पृष्ठ-11,12)

वे निरक्षरता के भी विरुद्ध थे। उनके आचार-विचार और व्यवहार को परखते हुए उनके प्रत्येक जन्म के गुरु की आत्मा ने उनसे एक दिन सम्पर्क साधा और उनके इस जन्म को लेने के उद्देश्य से श्री राम को अवगत कराया-

"बालक श्री राम, तुम्हारे इस जन्म में, मैं तुम्हारे साथ हूँ। जब तुम समर्थ रामदास थे, विवेकानन्द थे तो मैं ही तुम्हें समय की धारों के प्रति निर्देशित कर रहा था। तुम्हारी उंगली पकड़ कर तुम्हें चला रहा था और अब इस जन्म में भी तुम मेरे सामने हो।

 सुनो वत्स, तुम्हारा जन्म किसी विशेष प्रयोजन के लिए हुआ है। कोई महान कार्य..." (पृष्ठ-16)

और फिर श्री राम को अपने साक्षात्कार से उस अशरीरी आत्मा ने अभिभूत करते हुए एक-एक कर उनके कई जन्मों पर से परदा हटा दिया-

"गुरु की खोज में थे शिष्य कबीर, और यह तुम ही तो थे। ...शनै शनै नरेन्द्र से स्वामी विवेकानन्द बनने वाले सन्यासी ने भी कहा- धर्म अनुभव सिद्ध होता है। रूढ़िगत नहीं... यह आधुनिक बोध की पुकार बनी... यह भी तुम ही थे। ...एक झलक समर्थ रामदास की भी मिली जो शस्त्र और शास्त्र दोनों की उपासना करते थे।

पन्द्रह वर्ष के श्रीराम ने गुरुसत्ता का वरण किया।" (पृष्ठ- 17,18,19)

श्री राम के हृदय में अपने राष्ट्र के प्रति कितना सम्मान था इस बात की पुष्टि के लिए विदुषी लेखिका ने बनारस जाते समय का जिक्र करते हुए लिखा है कि- वह इस बात से सिद्ध होता है कि अपने गन्तव्य को जाते समय बनारस की एक गली में स्वामी विशुद्धानन्द जी से भेंट होने पर उनकी किसी भी फूल की सुगन्ध लाने की सिद्धि के बारे में ज्ञात होने पर श्री राम के मन में आया कि-

"अगर मुझे भी ऐसी सिद्धि प्राप्त होती तो मैं कहता कि मेरे देश को स्वतंत्र करा दो।" (पृष्ठ-22)

देश को स्वतंत्र कराने में श्री राम ने अहं भूमिका का निर्वहन किया था।  उन के द्वारा  एक बलिदानी की भाँति अपने गाँव आंवल खेड़ा के युवाओं को संगठित करने के बारे में लेखिका ने पुस्तक के तीसरे अध्याय 'राष्ट्र चिंतन' के अन्तर्गत विस्तृत वर्णन किया है-

"देश को स्वतंत्र कराने के लिए सारा देश एकजुट हो, इस बार उन्होंने एक बलिदानी की तरह आंवल खेड़ा के युवाओं को संगठित किया। ...श्री राम की क्रान्तिकारी गतिविधियाँ चलती रहती थीं। लेखन में भी वह सतत सक्रिय थे। श्री राम पत्रकारिता भी करते।"(पृष्ठ-23)

स्वतंत्रता आन्दोलन में चेतना स्फूर्ति के लिए आगरा से सैनिक नाम का पत्र निकलता था। सैनिक मात्र एक पत्र नहीं, वहीं से आजादी का बिगुल बजता था। आन्दोलन को धार दी जाती थी। (पृष्ठ-30)

पुस्तक के चौथे अध्याय ‘अध्यात्म चिंतन’ में लेखिका ने श्री राम के कार्यक्षेत्र की स्थापना आगरा से मथुरा करने, शांतिकुंज हरिद्वार की स्थापना और इसी दौरान श्री राम को पत्नी सरस्वती के वियोग के बारे में बताते हुए फिर माँ के आग्रह पर दूसरा विवाह भगवती देवी के साथ करने के विषय में जानकारी दी है-

"सोच रहे थे... यह सब दुबारा ठीक होग गुरुसत्ता में असीम विश्वास, भावी दृष्टा तो वही हैं। हमारे लिए यही सोचा होगा... इस विचार के साथ उनका मन शांत हो गया। ...विवाह सम्पन्न हुआ और माता भगवती श्री राम की सहधर्मिणी बनीं। (पृष्ठ-43, 44)

पुस्तक का पाँचवाँ अध्याय श्री राम के क्रिया-कलापों के बारे में जानकारी देने वाला है जिसका नाम लेखिका ने -‘स्थापना साधना’ रखा है। श्री राम ने हरिजन उद्धार की मुहिम छेड़ी, नारी जागरण की भी मुहिम छेड़ी जिसके लिए उनको कई संगठनों का विरोध भी सहना पड़ा-

"मथुरा नगरी का संत समाज, सनातनधर्मी, आर्यसमाजी संगठनों को, श्री राम की गायत्री साधना, हर वर्ग की बराबरी, यज्ञ आदि विरोध के कारण थे। एक वर्ग तो हर बात का विरोध करता ही था। नारी जागरण, हरिजन उद्धार, यह मुद्दे तो उन्हें बिल्कुल भी स्वीकार नहीं थे। (पृष्ठ-45)

अन्ततः विजय श्री राम की ही हुई। श्री राम के भागवत मास पारायण को सुनकर श्री गुलाबराय ने उनके नाम के आगे पंडित जी जोड़कर उनको पंडित श्री राम शर्मा बना दिया।

"श्री राम का राजनैतिक रूप, तपस्यारत, सिद्धान्तवादी रूप, तो सबने देखा ही था पर, भागवत पाठ का आचार्यत्व उन्होंने जिस शास्त्र सम्मत, निष्ठा से किया, वह सर्वथा नवीन था।... पंडित सच्चिदानन्द ने विद्वतसमाज के आदेश से श्री राम का आचार्य पद पर पट्टाभिषेक कर दिया था। और अब वे पं. श्री राम शर्मा आचार्य के नाम से जाने गए।" (पृष्ठ-47)

पुस्तक के अध्याय- आश्रम’ में श्रीमती सुषमा श्रीवास्तव जी ने मथुरा अखण्ड ज्योति एवं शान्ति कुंज का वर्णन किया है-

"विदित ही है कि श्री राम आचार्य के चौबीस पुरश्चरणों की समाप्ति पर 1953 में दुर्वासा ऋषि की तपस्थली रही भूमि मथुरा-वृन्दावन मार्ग पर गायत्री तपोभूमि की स्थापना की, अखंड ज्योति ज्ज्वलित की, 108 कुडीय यज्ञ किया। 1958 में सहस्त्र कुडीय यज्ञ करके एवं विलक्षण आयोजन सम्पन्न हुआ था। 1971 में आश्रम बनाओ की अंतः गुहार उन्हें हरिद्वार ले आई और शांतिकुंज की स्थापना हुई। (पृष्ठ-50)

पुस्तक का अध्याय सात ‘आर्षवाग्मय’ के नाम से आचार्य जी द्वारा 1960 में चारों वेदों, 108 उपनिषदों, 18 पुराणों और 20 स्मृतियों के सरल भाष्य प्रकाशित करने के बारे में जानकारी देता है तो अध्याय -‘यात्रापथ दक्षिण भारत’ आचार्य जी की दक्षिण भारत की यात्रा, कामांक्षी मंदिर का अवलोकन, श्रीमन से मुलाकात, श्रीमन के क्षरा संहिता के कुछ प्रपत्र आचार्य जी को देने आदि की जानकारी प्रदान की गई है। इसी अध्याय में चारों वेदों के बारे में संक्षिप्त जानकारी भी दी गई है। अध्याय ‘रमण आश्रम’ आचार्य जी द्वारा अरुणाचल में ऋषि रमन के आश्रम में जाकर उनसे भेट, सावरमती आश्रम, शांति निकेतन कलकत्ता, केरल, रामेश्वरम् आदि जगहों पर की गई यात्राओं का विवरण प्रस्तुत करता है। पुस्तक के अन्य अध्याय -‘हिमालय’, ‘शांतिकुंज’, ‘अध्यात्म और विज्ञान’, ‘तिरुपति’, ‘गोवर्धन’, ‘कैलाश मंदिर’, ‘अरविन्दो आश्रम’, ‘सावरमती आश्रम’ आदि हैं जिनमें आचार्य जी के भ्रमण और उनके प्रभाव आदि के बारे में सुरुचि पूर्ण तरीके से बतलाया गया है।

92 पृष्ठीय पुस्तक में श्री राम शर्मा आचार्य जी के बारे में एक आम आदमी के जानने योग्य सभी महत्वपूर्ण बातों को सहेजने का प्रयास विदुषी लेखिका श्रीमती सुषमा श्रीवास्तव ने किया है।

  आवरण पर परम आदरणीय श्री राम शर्मा आचार्य जी का चित्र गरिमा बड़ा रहा है। मुद्रण में कुछ त्रुटियाँ दृष्टव्य हैं। पुस्तक का सर्वत्र स्वागत होगा, ऐसी आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है।


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