काव्य: लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव

लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव
किसानों और मजदूरों के घर की औरतें

हमारे देश में अक्सर गाँवों में किसानों और मजदूरों के घर की औरतें 
घर के भीतर का काम 
निपटाने के बाद बाहर के भी कामों को देती हैं अंजाम
घर के चूल्हे-चौके से लेकर खेती-किसानी
कंडा-गोबर के साथ बीतती रहती है जिंदगानी
कभी उफ्फ नहीं करती कितनी भी परेशानी...

महीनों बीत जाते हैं चेहरे पर कभी क्रीम पाउडर
या सौंदर्य प्रसाधन का दिखता न निशान
कभी नहीं उनके चेहरों पर दिखती मुस्कान
देश-दुनिया के खबरों से वो रहती हैं अनजान
घर से बाहर तक के कार्यों में वो रहती हैं परेशान
कभी तर-त्योहार या किसी के घर हो शादी-ब्याह
तब एकत्रित होती हैं ये औरतें
एक-दूसरे को सुनाती हाल-चाल
बताती है घर की समस्याएँ और जंजाल
हँसती, बोलती और थोड़ी सा मुस्कराती हैं
अपने दिल के हाल बताती हैं
बच्चों और पति के अच्छाइयों और बुराइयों को सिलसिलेवार कहती जाती हैं...

कभी किसानों और मजदूरों के घर की औरतें
शहर या महानगरों में कुछ खरीदने जाती हैं
बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं, दुकान-माल को देखकर हैरान रह जाती हैं
पति जो कहता है, वो बिना कुछ कहे मान जाती हैं
सच में ये औरतें बिना दिखावट या आडंबर के 
कितना सरल, सहज और सुंदर जीवन बिताती हैं
यही औरतें सामान्य रूप में अपना कर्तव्य निभाती हैं
ऐसी औरतें आज भी पूज्य कहलाती हैं...
***


बेटियों को उड़ान भरने दो

सृष्टि में सूर्य प्रभा फैलाती हैं, 
घर को गुलाब-सा महकाती हैं।
नदियों के कल-कल सा बहती हैं,
स्वर्ण अक्षरों में इतिहास लिखती हैं। 
बेटियों को खूब उड़ान भरने दो...

हम इन्हे खूब संस्कार सिखाए,
पढ़ा-लिखाकर योग्य बनाएं।
ये चहचहाएँ और खिलखिलाएँ,
हर घर को स्वर्ग-सा सुंदर बनाएँ।
बेटियों को नई दिशाएं तय करने दो...

हर घर की आन-बान-शान होती हैं,
ये कुल की पहचान होती हैं।
प्रत्येक क्षेत्र में कर रहीं हैं नाम,
स्थापित कर रहीं नए आयाम।
इन्हें भी अपने सपनें सजाने दो...

बेटियों पर बंदिशों की बेड़ियाँ न डालें,
ये बेटों से कमतर नहीं, हम मान लें।
भू से लेकर नभ तक श्रेष्ठता की प्रतिमान,
बेटियों से अलोकित है सारा जहान।
इन्हे लक्ष्य पर निशान लगाने दो...

इन्हें भी कुछ कर दिखाने के होते अरमान, 
इनकी प्रतिभा को दें विस्तृत आसमान।
सफलता पर इनका करें गुणगान,
बेटियाँ भी घर, समाज औ राष्ट्र की शान।
इन्हें उन्मुक्त गगन में विचरने दो...
***


याद आने लगती हो

कुछ लिखने का मन करता है
कलम और डायरी उठाता हूँ
शब्दों को कोरे कागज पर उतारने की
कोशिश करता हूँ
सच में तुम बहुत याद आने लगती हो...

चाहता हूँ समाज और राष्ट्र के समसामयिक
परिदृश्यों पर कुछ लिखना
पर प्रेम कविताएँ आकार लेने लगती हैं शब्दों से
दिल दिमाग पर हावी हो जाता है
दिल की किताब के हर पृष्ठ पर
तुम नजर आती हो
सच में तुम बहुत याद आने लगती हो...

मस्तिष्क को केंद्रित करना चाहता हूँ
सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध लिखना चाहता हूँ
शोषण और अत्याचार से पीड़ित
दुखित व्यथित लोगों की आवाज बनना चाहता हूँ
शब्दों से नई बात लिखना चाहता हूँ
अचानक शब्दों में तुम्हारा चेहरा नजर आता है
तुम्हारे साथ बीते हुए पल याद आने लगते हैं
शब्द तुम्हारे प्रेम की खुशबू से सरोबार हो जाते हैं
सच में तुम बहुत याद आने लगती हो...

तुम्हारे प्यार की आँच
तुम्हारे हथेलियों की गर्माहट
तुम्हारे साथ बिताए वो खुशनुमा पल
और अब तुम्हारी प्रतीक्षा
सृजन के शब्द अब तुम्हारे इर्द-गिर्द घूमते हैं
वो कौन सा पवित्र दिवस होगा
जब तुम आओगी
मेरे जीवन में खुशनुमा सुबह होगी
सच में तुम बहुत याद आने लगती हो...
***


उम्मीद का इक टुकड़ा

दिल के किसी कोने में उम्मीद का इक टुकड़ा
चाँदनी रात में छत पर अभी भी
तुम्हारा इंतजार कर रहा है...

मुझे तो बिल्कुल उम्मीद नहीं है तुम्हारे आने की 
पर मेरे दिल को अभी भी उम्मीद है कि
तुम मेरे जीवन में वापस आओगी
क्योंकि दिल अभी भी तुम्हें प्यार कर रहा है...

मुझसे सवाल भी करता है
तुमने उम्मीद क्यों छोड़ दी है
मेरा जबाब न पाकर निराश हो जाता है
लेकिन आशा का दीप जलाए हुए है
उसे विश्वास है कि एक न एक दिन
तुम मेरे जीवन में रोशन करोगी
खुशियों से जीवन जगमग कर दोगी
सच में ऐसा कुछ हो रहा है 
प्रेम संपूर्ण आकार ले रहा है...

मुझे भी दिल की बातें सच लग रही हैं
मुझे भी अपने पवित्र प्रेम पर विश्वास जग रहा है
सृजन अब शब्दों में साकार हो रहा है
दिल की बातों पर मुझे भी ऐतबार हो रहा है
सच में मेरा प्यार वापस आ रहा है...
***

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