खेमकरण ‘सोमन’ की कविताएँ

खेमकरण सोमन
01. मासूम भावनाओं की किताब
 
डॉक्टर बनूंगा- वैज्ञानिक बनूंगा
महान चित्रकार बनूंगा मैं
पुलिस बनकर चोर-गुंडों को पकड़ूंगा
सब देखेंगे जब बुद्ध, बृहस्पति, 
शुक्र, शनि-मंगल ग्रह को
उतार दूँगा धरती पर
खूब जोरदार पढ़ूंगा मैं
फर्स्ट आऊँगा रोज-रोज
बड़ा होकर-
बहुत बड़ा सब्जीवाला बनूंगा मैं

ऐसी कुछ आवाजें जब अमीर कानों में पहुँचीं
तब गरीब नन्हे तारों,
उनके तन- गंदे कपड़ों को देखकर
शहर के बच्चे हँसे
बच्चों के माता-पिता हँसे
गाइड हँसा- ड्राइवर हँसा
तमाम पर्यटक हँसे
खूब जोर-जोर से हँसे-हँसे !

यह देख 
सूरज का गुस्सा बढ़ने लगा यकायक,
बढ़ने लगा यकायक धरती का तापमान,
तारे भी दिखने लगे दिन-दहाड़े,
बवंडर का रुप धारण करने लगीं हवाएँ
पेड़-पौधे भी बनाने लगे मुँह
कि इसमें हँसने वाली क्या बात
कि इतना हँस रहे हैं ये लोग!

गरीब बच्चों की 
मासूम भावनाओं की किताब का
ऐसा कुपाठ देख-जानकर
बादलों ने भी बदल दिए-
ऐसे लोगों के लिए-
बरसने का ख़याल अब।
***


02. ढह गया उसी क्षण

बच्चा जब पैदा हुआ-
उसने देखा-
पिता द्वारा माँ की पिटाई
बुआ-बहनों की पिटाई
दादा-दादी की पिटाई,
नाना-नानी,
मामा-मामी की पिटाई
भाइयों की पिटाई,
पड़ोसियों की पिटाई!
बात-बात में लड़ाई-झगड़े

ढह गया-
उसी क्षण 
बच्चे का विश्वास

ढह गया-
उसी क्षण 
कार्यपालिका,
 न्यायपालिका 
और व्यवस्थापिका का 
स्तंभ भी।
***


03. किसी योद्धा ने लिखा

बुरे वक्त में 
ठहर जाता है आदमी एक जगह 
न वह खुद को समझ पाता है-
न दुनिया उसे,
उसकी छवियाँ ही अब उसे
रह-रहकर डराने-धमकाने लगती हैं

इसी बीच
चीटियाँ इंतजाम कर लेती हैं भोजन

चिड़िया लौट जाती है
मुँह में अन्न दबाकर अपने घोंसलों में

पृथ्वी कर लेती है
हजारों किलोमीटर की यात्रा

नदियों का पानी
समुद्र में पहुँचकर
तब्दील हो चुका होता है लहरों में

जीवन के चौराहे पर खड़ा
एक भूला-भटका भी
खोज लेता है अंततः अपनी राह

लेकिन बुरे वक्त में 
ठहर जाता है आदमी एक जगह 
उसकी स्थिति हो जाती है-
इतनी दुःखद-दयनीय 
कि पेड़ से गिरा एक पत्ता भी
कर देता है उसे बुरी तरह लहूलुहान

चेहरे पर गिरा
पानी का एक कतरा भी उसे
करा देता है भारी चोट का एहसास!

द्वितीय विश्व की 
कमान संभाल रहे एक योद्धा ने लिखा-
केवल बुरे वक्त में।
***

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