व्यंग्य: इसे दस लोगों को फॉरवर्ड करें

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

इन दिनों विचारों का प्रवाह बिजली-सा है। माँ गंगा लाशों की खदान बन गई है, वहाँ रेत उड़ती है तो आदमी निकल आते हैं। मैं वाट्सऐप में भरी मिट्टी हटा भी नहीं पाता हूँ कि दस-बीस विचार एक साथ और आ जाते हैं और धड़ाधड़ मेरे नाम से फॉरवर्ड हो जाते हैं। विचार, विचार है; उनमें ज्ञान हो यह जरूरी नहीं। फिर भी, चारों दिशाओं से ज्ञान आ रहा है और शेष छहों दिशाओं में फॉरवर्ड हो रहा है। इसके बावजूद मैं ज्ञान के ‘ओवरफ्लो’ को रोक नहीं पा रहा। ज्ञान को रोक कर रखने में खतरा है। खोपड़ीनुमा बांध कमजोर हो चुका है, ओवरलोड होकर कभी भी फट सकता है। दिमाग की क्षमता सिकुड़ कर ईमानदारों जितनी रह गई है। इसलिए ज्ञान को बाहर निकालने के लिए मैंने सारे ‘फ्लड गेट’ खोल दिए हैं। ज्ञान का स्तर खतरे के निशान से ऊपर पहुँच जाए तो दिमाग की कच्ची पुलिया का क्या भरोसा!

अधिकांश परिवार शोक में हैं, बस मेरा सोशल मीडिया परिवार अशोक मुद्रा में है। उन्होंने मुझे ज्ञान के सागर में डाल दिया है, उसी में डूब रहा हूँ। हाथ-पाँव मार रहा हूँ पर तैर नहीं पा रहा। ज्ञान का बोझ इतना है कि मैं रसातल में जा सकता हूँ। जान है तो जहान है, इसलिए ज्ञान उलीच-उलीच कर थक गया हूँ। एक निर्मल व्हाट्सएप समूह में उच्च कोटि का ज्ञान लाद कर मैं हॉट समूह में आता हूँ। यहाँ कचरा-बगदा श्रेणी के ज्ञान का भी स्वागत है। मैंने यहीं से तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशज और अपशब्द सीखे हैं। कई बार प्रतिज्ञा की कि मैं सोशल मीडिया ओपन यूनिवर्सिटी के पत्राचार पाठ्यक्रम से बाहर निकल कर मुक्ति पा लूँ। पर मैं ऐसा नहीं कर पाता। यश पाने की मृगतृष्णा इतनी सबल है कि मैं फॉरवर्ड खेलने में लगा रहता हूँ। लोग कारों में नोट गिनने की मशीनें लगाकर जन्म सार्थक कर रहे हैं, एक मैं हूँ कि लैपटॉप पर अधूरे व्यंग्य के शब्द गिनता रहता हूँ। सौ करोड़ रुपए तो छोड़िए, महीने में सौ हजार शब्द भी इकट्ठे हो जाएँ तो एक लाख बन जाएँ। मतलब दो नई किताबें, एक का लोकार्पण पूर्णिमा को और दूसरी का अमावस्या को। कहीं अधिक मास आ जाए तो बल्ले-बल्ले हो जाए। लेखक होने का यही सुख है, अपनी किताबों की आँच का अलाव खुद ही तापते रहो।

कोई तिथि क्षय हो जाए तो हो जाए, मैं कभी ज्ञान का क्षय नहीं होने दूँगा। विश्वगुरु देश का उत्पाद हूँ। उत्पात मचाऊँगा और सारा ज्ञान आपको बाँट कर जाऊँगा। चलते रास्ते ज्ञान बिखेरता जाऊँगा। ज्ञान ‘ओवरफ्लो’ होकर आप तक पहुँच जाए तो मुझे खुशी ही होगी। दुष्यंत कुमार ने कहा था- मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए। ज्ञान फारवर्ड करते हुए उदारमना मैं ऐसा ही सोचता हूँ- मेरे दिमाग में नहीं तो तेरे दिमाग में सही, हो कहीं भी ज्ञान लेकिन ज्ञान बचना चाहिए। जिस तरह बिना उचित अंतिम विदाई के यह काला काल प्रियजनों को ले जा रहा है, ज्ञान को बनाए रखना और बचाए रखना जरूरी है। घर खाली बैठे व्यवस्था को कोस-कोस कर कुछ हासिल होना नहीं है। इसलिए आप जो ज्ञान मुझे भेजते हैं मैं उसे तन-मन से फैला रहा हूँ। ज्ञानदाता मित्रों से कहना चाहूँगा, ज्ञान फॉरवर्ड करते हुए आप लोग चेतावनी क्यों देते हैं कि इसे दस लोगों को फॉरवर्ड नहीं किया तो अनर्थ हो जाएगा। फॉरवर्ड कर तो रहा हूँ, डराइए मत, मुझे साँस तो लेने दीजिए। वैसे भी आजकल हवा में से ज्यादा ऑक्सीजन निकाली जा रही है और सिलेंडरों में भरी जा रही है। पेट के बल लेट कर अधिक ऑक्सीजन पाने की कोशिश में मेरा पेट पिचक गया है। ऐसी ज्ञान भरी पोस्ट फॉरवर्ड करने से मुझे अब तक कोई लाभ नहीं हुआ। उल्टे कुछ प्रगतिशील लेखक मुझे ठेठ और गाँवड़ेल मानने लग गए। सोशल मीडिया पर मेरी छवि अंधविश्वासी की हो गई, पर प्रसिद्ध होने के लिए मैं लगा हुआ हूँ। काल, कोरोना-काल में असमय उठा ले जाए उसके पहले मैं आपका सारा ज्ञान फॉरवर्ड कर देना चाहता हूँ।

हमारे फेकबुक गुरु का ताजा संदेश सचित्र वायरल हुआ है। वे कह रहे हैं, हवा की ऑक्सीजन कालाबाजारियों ने अपने गोडाउनों में भर ली है। उन्होंने ज्ञान, अज्ञान और अल्पज्ञान फॉरवर्ड कर हिंदी की निष्काम सेवा की है। उनकी अपूर्व सेवा पर प्रसन्न होकर विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट. की मानद उपाधि दी है। उनकी नई नेम प्लेट नेपथ्य में झाँक रही है, उनके नाम के आगे उन्होंने ‘डिलीट’ जोड़ दिया है। चहुँ ओर से उनके लिए बधाइयाँ टपक रही हैं, मैं असमंजस में हूँ कि क्या करूँ। सोचता हूँ आँगन में दो पौधे रोप आऊँ तो भावी पीढ़ियों को कुछ ऑक्सीजन मिलेगी। अब बाय-बाय, हाँ आप इस संदेश को दस लोगों को जरूर फॉरवर्ड कर देना।

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