तुलसी कृत राम काव्य का अभिप्रेय

विदुषी आमेटा1, डॉ. दयानिधि पाठक2

1सह आचार्य, हिन्दी-विभाग, उच्च अध्ययन शिक्षा संस्थान (मानित विश्वविद्यालय) सरदारशहर

2सहायक आचार्य, हिन्दी-विभाग, उच्च अध्ययन शिक्षा संस्थान (मानित विश्वविद्यालय) सरदारशहर

मेल- vidusheeameta@gmail.com/ dayanidhipathak06@gmail.com


विदुषी आमेटा
शोध सार:

राम काव्य का आदि स्रोत ‘रामायण’ में प्राप्त होता है। इससे पूर्व जनश्रुतियों में राम चरित्र का वर्णन उपलब्ध होता है। बौद्ध साहित्य की जातक कथाओं में भी राम का उल्लेख है। जानकीहरण, कुमार संभव, रघुवंशम, जानकी हरण, रामचरित, रामायण मंजरी आदि संस्कृत महाकाव्यों एवं स्वयंभू कवि के पउम चरिउ में राम की वंश परम्परा, राम चरित, राम जीवन आदि का वर्णन उपलब्ध है। भारत में हिन्दीतर भाषाओं में भी राम कथा विद्यमान रही है, कम्बन कृत तमिल रामायण, तेलुगु में रंगनाथ रामायण, बुद्ध राजकृत भास्कर रामायण, मलयालम में वाल्मीकि रामायण के अनुवाद- कण्ण्श्श रामायण’ व केरल वर्मा रामायण, बांगला में कृत्तिवास रामायण इस सम्बन्ध में लोकप्रिय रचनाएँ हैं। हिन्दी में तुलसीदास ने रामकथा को जन मन का कंठ हार बनाया है। तुलसीदास ने राम कथा व राम चरित के माध्यम से मध्यकालीन भारतीय जनता को जीवन यापन के विविध सूत्र दिए है।

बीज शब्द:

तुलसीदास, राम, राम काव्य, काव्य का अभिप्रेय, भारतीय परिप्रेक्ष्य।

आलेख:

दयानिधि पाठक
राम कथा को आधार बनाकर कई काव्य ग्रंथों की रचना हुई है जिनमें, संस्कृत कीवाल्मीकि रामायण’, अवधी भाषा में रचित तुलसी कृतरामचरितमानस’, ब्रजभाषा में रचित रीतिकालीन कवि केशवदास कीरामचन्द्रिका’, छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत कासाकेत’, प्रगतिवादी कवि निराला कीराम की शक्तिपूजाऔर नरेश मेहता कीसंशय की एक रातविशेष ख्यात है। रामचरित काव्य की भाषा चाहे कोई भी रही हो लेखकों का मंतव्य राम के लौकिक-अलौकिक स्वरूप को प्रत्यक्ष करना रहा। राम कथा व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र सभी स्तरों पर आदर्श स्थापना की प्रेरणा देती है।

तुलसीदास ने रामचरितमानस, कवितावली, विनयपत्रिका, दोहावली आदि रचनाओं के माध्यम से राम के चरित्र को नये स्वरूप में गढ़ा है। ग्रियर्सन ने कहा था कि ‘‘महात्मा बुद्ध के बाद भारत ही नहीं एशिया भर में यदि किसी को इतनी लोकप्रियता मिली है, तो वे हैं तुलसीदास।“ तुलसी का उद्देश्य सिर्फ रामकथा कहना नहीं था। यद्यपि उनमें कथा कुशलता सराहनीय है परंतु, रामकथा यहाँ कई संदेशों को जीवंत करती है। तुलसी के राम इसी कारण जनमानस को जीतने में सफल रहे हैं।

रामचरितमानस के अंग्रेजी अनुवादक एफ. एम. ग्राउज अपने ग्रंथ की भूमिका में लिखते हैं- ‘‘यह ग्रंथ झोंपडी से लेकर महल तक सभी हाथों में पाया जाता है और हिन्दु (हिंदुस्तान के निवासी), समाज में छोटे-बड़ें, अमीर-गरीब, बच्चे-बूढें सभी वर्गों में इसे समान भाव से पढ़ा-सुना और पंसंद किया जाता है। (दि रामायण ऑफ तुलसीदास, रामनारायणलाल पब्लिशर्स एण्ड बुक सेलर, इलाहाबाद)

ज्ञान, नीति, सदाचार का जितना प्रचार राम कथा करती है, उतना आज तक किसी नीति ग्रंथ में भी नहीं मिलता। राम का आचरण नैतिकता और आदर्श का संदेश है जिससे समाज में मर्यादाएं स्थापित होती हैं और वे मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते हैं।सिया राम मय सब जग जानी, करऊं प्रनाम जोरि जुग पानीकहने वाले तुलसीदास ने मानस में सीताराम की कथा के साथ सामाजिक-राष्ट्रीय जीवन जीने की आचार संहिता भी दी। उनकी राम कथा समाजवाद की स्थापना करती है, जहाँ सामाजिक मूल्य व्यक्ति हित और स्वार्थ से ऊपर होते हैं।

‘स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा- जो रघुनाथ गाथा लोकमंगलकारी है, लोक के लिए ही लिखी गई है, उसे स्वान्तः सुखाय घोषित करना मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण है। मानव मन व्यक्तिगत सुख-दुख को जानने-समझने का अभिलाषी अधिक रहता है। तुलसी राम कथा कोस्वान्तः सुखायघोषित कर प्रकारांतर से जीवनोपयोगी उपदेश जनता में खिसका देते हैं।जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिहुँ तैसी।के अनुसार मात्र आध्यात्मिक क्षेत्र में ही नहीं अपितु जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मनुष्य आत्मगत भावनाओं की ही अनुभूति करता है। तुलसी स्पष्ट कहते हैं किकवित विवेक एक नहीं मोरे।‘ जब कोई कवि विनम्रता से स्वीकार कर रहा है कि मुझमें तो कविता लिखने का ही विवेक नहीं है, बस कोरे कागद को भर दिया गया है। उस पर आरोप-प्रत्यारोप कर अलग-अलग विचारधाराओं में घसीटना स्वयं की बौद्धिक संकीर्णता का परिचय देना है।

कवितावली में तुलसी कलियुग के प्रभाव की दुखद स्थिति का जो चित्रण करते हैं, वह समय की माँग थी। उन्होंने राम कथा का आश्रय लेकर सगुण-निर्गुण, शैव-वैष्णव, राजा-प्रजा, धनी-निर्धन, अभिजात-लोक, शास्त्र-लोक, नागर-ग्रामीण, स्त्री-पुरुष, वर्ण व्यवस्था आदि के भेद समाप्त कर दिये। इसके लिए राम नाम का उपयोग जरूर किया, पर ये तात्कालिक समय की परिस्थिति थी और तात्कालीन जनता की भावधारा को उद्वेलित करने का माध्यम भर थी। जैसे आज किसी फिल्मी अभिनेता-अभिनेत्री या किसी प्रसिद्ध खिलाड़ी को विज्ञापन का माध्यम बना लिया जाता है।सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे, अरथ अमित अति आखर थोरे।‘ कहकर तुलसी ने अपने काव्य ग्रंथ की सुगमता, दुर्गमता, मधुरता, मंजुलता, कठोरता और कम अक्षरों में अमित अर्थ को संकेतित किया है।

सो सब हेतु कहब में गाई। कथा प्रबंध विचित्र बनाई।

राम कथा के मिति जग नाहिं। अस विचार तिन्हकें मन माहिं।

यह पंक्ति पाठक से निवेदन करती है कि जन सामान्य के लिए मेरे द्वारा इस प्रबंध रचना का निर्माण किया गया है। आधुनिक फिल्मों की प्रथम उद्घोषणा के समान कि- यह घटना काल्पनिक है। किसी जीवित या मृत व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं है। हर रचनाकार अपनी कृति को शाश्वत बनाना चाहता है। तुलसी का उ़द्देश्य यदि धर्म या अध्यात्म मात्र होता तो उन्हें किस्सागोई के सिद्धांत के अनुरूप राम कथा रचने की आवश्यकता नहीं होती। वे मंगलाचरण में कहते हैं-

वर्णानामर्थसंघानां रसानां छंदसामपि।

मंगलानां कर्तारौ वंदे वाणी विनायकौ।।

औरबंदउ गुरु पद पदुम परागा’ हाँ वर्ण और अर्थ के देवता तथा सांसारिक देवता गुरु की वंदना की गई है। ज्ञान-दाता के प्रति यह समर्पण सामंती प्रवृत्ति का प्रतीक नहीं माना जा सकता। कविता की रचना प्रक्रिया के लिए भी जब तुलसी लिखते हैं-

हृदय सिंधु मति सीप समाना। स्वाति सारदा कहहि सुजाना।

जौ बरषइ बर बारि विचारा। होहि कवित मुकुतामनि चारू।

इसका आशय यही है कि राम काव्य आन्तरिक भावनाओं की अभिव्यक्ति है, किसी बाहरी साम्प्रदायिक प्रभाव की परिणति नहीं है।

उनका उद्देश्य भी स्पष्ट है कि- मेरे मन में ज्ञान रूपी प्रकाश से जो अभिव्यक्ति हुई वह राम काव्य है- ‘मोरे मन प्रबोध जेहि होई।जो मंगल करने वाला है और कलियुग के दुष्प्रभाव को कम कर जनता के दुःखों को समाप्त करने वाला है- ‘मंगल करनि कलिमल हरनी’, यह सकल लोकहितकारी कथा है जो सती भी शिव से सुनना चाहती है। तुलसीसुरसरी सम सब कर हित होईकहकर इसकी समाजोन्मुखता का परिचय देते हैं। इतने महत् उद्देश्य को लेकर रचा गया काव्य सगुण राम भक्ति का साम्प्रदायिक साहित्य मात्र नहीं हो सकता। जो धर्म धुरन्धर इस पर एकाधिकार जमाकर बैठे हैं, वे भी उतने ही अज्ञानी हैं, जितने इसे साम्प्रदायिक करार देकर जलाने वाले हैं।

बालकाण्ड़ के एक प्रसंग में लिखा है-

नहिं कलि करम भगति विवेकू।

राम नाम अवलंबन एकू।।

अर्थात कलियुग में तो कर्म का भरोसा है, भक्ति का, ज्ञान का। सिर्फ राम नाम ही एकमात्र सहारा है। इस राम नाम का विस्तार यदि राम के कर्म तक हो जाए तो युगों-युगों तक हर काल, हर स्थान पर अवलंबन मिल सकता है।

राम लोक के आराध्य हैं परन्तु, वे पुत्र, भ्राता, सखा, राजा, पति, जामाता आदि सभी रूपों में आम व्यक्ति है। वेद, उपनिषद, श्रुतियां, पुराण आदि में व्यक्त सगुण-निर्गुण ईश्वर को राम के स्वरूप में ढालकर लोक का अंग बना दिया और राम के व्यक्ति चरित्र को तराशकर, शास्त्र की सीमा में लाकर प्रभु पद पर प्रतिष्ठित कर दिया।नेति नेति जेहि बेद निरूपा, निजानंद निरुपाधि अनूपा।‘ के अलौकिकत्व से युक्त राम जब सामान्य पुरुष के रूप में आते हैं तो व्यक्ति जीवन के नए आदर्श गढ़ते हैं। सामान्य व्यक्ति का जीवन जीते हुए राम प्रभु पद पर आसीन होते हैं तो मर्यादा पुरुष को सिद्धि मिलती है।

राम कथा में भाईचारा, प्रकृति-पर्यावरण की रक्षा, दलितों-आदिवासियों के साथ समभाव, पक्षियों के प्रति संवेदनशीलता, वन्य जीवों के लिए दया, नारियों का सम्मान, ऋषि-मुनियों के प्रति आभार, सामाजिक सौहार्द्र और श्रेष्ठ राज व्यवस्था पग-पग पर परिलक्षित होती है। राम का चरित्र शक्ति, शील, सौंदर्य के समन्वय के साथ भारतीय संस्कृति की चिरन्तन चिंतन की चेतना का निरुपण और मर्यादाओं का विश्लेषण है।राजीव लोचन राम चले तजि बाप को राज बटाऊ की नाईं’ में भौतिकता के प्रति निवृत्ति और भावनात्मक संबंधों के प्रति प्रवृत्ति वंदनीय है। वनवास प्रसंग में मानस के राम कहते हैं-

पिता दीन्ह मोहिं कानन राजू, जँह सब भाँति ओर बड़ काजू।

आयसु देहि मुदित मन माता, जेहि मुद मंगल कानन जाता।।

जहाँ वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण जैसी प्रसिद्ध रचनाओं में राम का वक्तव्य इस प्रसंग पर पारिवारिक विभेद उत्पन्न करने वाला लगता है, वहीं तुलसी के राम कितने उदारमना है? वे सरल स्वभाव से कहते हैं- ‘‘पिता ने मुझे वन का राज्य दिया है। जहाँ मेरे लिए सबसे अधिक काम है। इसलिए हे माता ! मुझे प्रसन्नचित्त होकर आज्ञा दीजिए ताकि मैं भी आनंदित होकर हितकारी जंगल में प्रस्थान करूँ। कोई विद्वेष, विरोध, विभेद, दुःख। मात्र आनंद के साथ आज्ञा की स्वीकृति। धन्य राम, धन्य तुलसी, इतना उदारमना व्यक्तित्व गढ़ने का औदार्य, गहन चिंतन, मनन और अनुभव का परिणाम है।

तुलसी के राम में भरत के प्रति प्रेम एक अद्भुत रूप में सामने आता है। चित्रकूट प्रसंग में भरत के आगमन पर लक्ष्मण राम के अनिष्ट की आशंका से क्रुद्ध हो उठते हैं, वहाँ राम कहते हैं-

कही तात तुम्ह नीति सुनाई। सबतें कठिन राम पद भाई।।

जो अँचवत मातहिं नृपतेई। नाहिंन साधु समाजिहिं सेई।।

सुनहु लषन भल भरत सरीखा। विधि प्रपंच महँ सुना दीषा।।

भरतहिं होई राज मद, विधि हरिहर पद पाई।

कबहुँ कि कांजी सीकरनि छीर सिन्धु बिनसाई।।

तिमिर तरून तरिनिहि मकु गिलई। गगन मगन मकु मेघहि मिलई।।

गोपद जल बूड़ति घट जोनी। सहज क्षमा बरू छाड़इ छोनी।।

मसक फूँक मकु मेरू उड़ाई। होई नृप पद भरतहि भाई।।

लषन तुम्हार सपथ पितु आना। सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना।।

सगुन क्षीर अवगुन जल ताता। मिलइ रचइ परपंच विधाता।।

भरत हंस रवि बंस तड़ागा। जनमि लीन्ह गुन शेष विभागा।।

गहि गुन पय तजि अवगुन बारी। निज जस जगत कीन्ह उजियारी।।

कहत भरत सुन सील सुभाऊ। प्रेम पयोधि मगन रघुराऊ।।

गुरु वशिष्ठ को भी राम इसी प्रकार का प्रत्युत्तर देते हैं-

गुरु अनुराग भरत पर देखी। राम हृदय आनंद विसेषी।।

भरतहिं धरम धुरन्धर जानी। निज सेवक तन मानस बानी।।

बोले गुरु आयसु अनुकूला। बचन मंजु मृदु मंगल मूला।।

राम के लिए भरत के समान और कोई भाई हो ही नहीं सकता-

नाथ सपथ पितु चरन दोहाई। भयउ भुवन भरत सन भाई।।

जो गुरु पद अंबुज अनुरागी। ते लोक हूं वेदहूं बड़भागी।।

लखि लघु बंधु बुद्धि सकुचाई। करत बदन पर भरत बड़ाई।।

भरत कहहिं सोई किये भलाई। अस कहि राम रहे अरगाई।।

जिसके कारण दण्डकारण्य के भागीदार हुए उसी के प्रति इतना स्नेह, इतना विश्वास और इतना गर्व, क्या किसी साधारण हृदय में इसका लेशमात्र भी जाग्रत हो सकता है? यदि हम इतना सोच भर लें तो व्यक्ति स्तर पर क्या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई विवाद स्वतः समाप्त हो जाएंगें, विवाद उभरेंगें ही नहीं।

राम राज्य हर भारतीय के मन की कामना है जिसमें, ‘बयरू कर काहू सन कोई। राम प्रताप विषमता खोई।‘   तो किसी का किसी के प्रति वैर है और ही किसी प्रकार की विषमता है। जिस प्रकार राम राज्य में शक्ति के केन्द्र राम है उसी प्रकार लोकतंत्र मेंलोकस्थापित हो जाए तो राजनीति की पवित्रता स्वयं स्थापित हो जाएगी।

शहरी अभिजात्य संस्कृति के खोखलेपन को समाप्त करने का प्रयास भी यहाँ दृष्टव्य है। तर्क और अहंकार प्रधान नागर संस्कृति की मानस में आलोचना की गई है। सुंदर राजकुमार और राजकुमारी को वनवास दिये जाने पर ग्रामीण आश्चर्यचकित हैं, व्यथित हैं और कह उठते हैं- ‘सुनि सविषाद सकल पछिताही, रानी राम कीन्ह भल नाहिं।‘ इन कठोर कलेजे वालों के कारण राम-सीता की यह दुर्दशा है तो उनका ज्योतिष आदि ज्ञान थी व्यर्थ है- ‘ज्योतिष झूठ हमारे भाए।नगरीय संस्कृति का सारा ज्ञान धज्जियाँ उड़ाने योग्य है। ज्योतिष शास्त्र की वैज्ञानिकता समझ में आती है, पर नगरीय संस्कृति का पाखण्ड़ नहीं समझ आता। यहाँ ग्रामीण राम को बचाने के लिए उतावले हो जाते है। यह प्रसंग स्पष्ट इंगित करता है कि मानस का मर्म भक्ति नहीं है, धर्म-अध्यात्म नहीं हैं। यहाँ लोक संस्कृति के संरक्षण का संदेश हैं, जो संस्कृति प्रेम पगे भाव से किसी का बचाव करती है, सबको बसाती है और नागर संस्कृति अपनी बौद्धिकता से भटकाव का कारण बनती है। यह लोकदर्शन रामकथा को लोक कथा बनाकर त्रासदी के मानकों तक ले जाने का प्रयास है।

यद्यपिढोर बंवार शूद्र पशु नारी, ये सब ताड़न के अधिकारीकहने वाले तुलसी को नारी और शूद्र विरोधी घोषित किया गया परंतु, मानस की ये अर्द्धाली समुद्र की सीमा उल्लंघन के प्रसंग में आई है। जब कोई मर्यादा उल्लंघन का प्रयास करता है तो सामाजिक संदर्भों में वह ताड़न का अधिकारी ही रहेगा। शूर्पणखा, ताड़का जैसी स्वच्छंद-दुराचरण करने वाली स्त्रियां इस दायरे मे जरूर आती होंगी। रावण और बालि जैसे झोर, गंवार, शूद्र, पशु भी इस ताड़न के दायरे में गये।

स्वयं तुलसी के मानस में काकभुशुण्डि जो राम कथा के मुख्य वक्ता है, उत्तरकाण्ड में वे शिव से भी बडे़ समादृत वक्ता हैं, वे शूद्र ऋषि हैं। शबरी आदिवासी स्त्री है। सीता के लिए शिव धनु भी टूटता है और राम रावण युद्ध भी होता है। केवट के जैसा राम भक्त और कहाँ मिलेगा? राम के सेवक हनुमान और वानर-भल्लुक की सेना के बिना राम की विजय कैसे संभव थी? इसी प्रकारपूछती ग्रामवधू सिय सो, साँवरे से सखि रावरे को है?’ में ग्राम वधुओं की स्नेहासिक्त करुणा क्या त्याज्य है? यहाँ काकभुशुण्डि और शबरी शूद्र, सीता- नारी, केवट- ग्रामीण, और हनुमान के साथ पूरी सेना ढोर-पशु में सम्मिलित की जा सकती है। जिसको ताड़न के अधिकारी कहा, उसी के माहात्म्य का वर्णन भला तुलसी जैसा सुश्रुत लेखक कैसे कर सकता था?

यह अर्द्धाली भावावेश की प्रतिक्रिया भी हो सकती है और लंघन करने वाले पर कोप की परिणति भी। यदि आध्यात्मिक चश्मा हटाकर मानस का पुनर्पाठ किया जाए तो इस विवादित पंक्ति का प्रचलित भावार्थ परिवर्तित हो जाएगा। जैसा कि संस्कृति विज्ञ अजहर हाशमी कहते हैं कि - ‘‘रातचरित मानस मानवीय मूल्यों के मंड़प में अन्त्योदय का अनुष्ठान है।“

रावण वध का प्रसंग भी यहाँ उल्लेखनीय होगा- जामवंत रात के समय भालुओं वानरों की सेना लेकर रावण को मारने जाते हैं। रावण जब मूर्छित होकर गिर पड़ता है, जामवंत अचेत रावण पर पाद प्रहार करते हैं। उनके लौटने पर राम उनके प्रति कृतज्ञता प्रदर्शित करते हैं। क्या त्रेतायुग के किसी भगवान के लिए यह शोभनीय है कि धर्मयुद्ध का उल्लंघन करने वाले पर प्रसन्न हो? चेतना आने पर रावण पुनः मैदान में आता है, रावण को ललकारता है आकर राम उसे मार गिराते हैं। यहाँ रावण राम के हाथों मुत्यु पाने पर भी प्रसन्न नहीं होता। ये दोनों दृश्य तुलसी के राम की प्रभुता का खण्ड़न करते हैं और राम काव्य को धार्मिक भूमि से लौकिक भूमि पर स्थापित करते हैं।

राम कथा में सीता का चरित्र तो प्रणमय है ही परंतु, कौशल्या, सुमित्रा, सुनयना, कैकयी, उर्मिला, तारा, मैना और मंदोदरी के चरित्र भी पारिवारिक और सामाजिक चरित्र हैं। इनके द्वारा नारी के विविध स्वरूप आकार ग्रहण करते हैं। स्वयं भगवान को प्रेरणा देने वाली माँ, पुत्रों के वनवास गमन पर शोकाकुल माताएँ, पति के धर्म को स्वीकार कर विरही जीवन की करुणा को सहने वाली पत्नी, अंहकारी पति को तर्कों द्वारा सद्मार्ग पर लाने की चेष्टा करने वाली सहधर्मिणी और पुत्र प्रेम में स्वयं के जीवन को अभिशप्त बना देने वाली माँ के रूप में नारी यहाँ उपस्थित होती है। समस्त राम काव्य में समाज निर्माण करने वाली स्त्री को प्रतिष्ठित करने, पुरुषों की स्त्रियों के प्रति सामंती उपभोगवादी मनोवृत्ति पर अंकुश लगाने और महिला सशक्तीकरण की आधार भूमि बनाने की चेतना व्याप्त है।

वर्तमान सामाजिक-राष्ट्रीय परिस्थितियों में जब भ्रष्ट्राचार, स्वार्थ, पदलोलुपता, दिखावा अपनी चरम सीमा पर है, तुलसी के राम प्रासंगिक हो उठते हैं। तुलसी की मुख्य समस्या थी कलियुग और निराकरण का एकमात्र विकल्प था रामराज्य। यहाँ कलियुग वह अवस्था है जहाँ, ‘कलि बारहि बार दुकाल परै, बिन अन्न दुखी सब लोग मरै।‘ कलि की पहचान है- भूख, गरीबी, मृत्यु। यह दैवीय प्रकोप होकर समाज की भौतिक स्थिति है जिसके लिए सत्ताधारी उत्तरदायी है। इसके लिए तुलसी घोषणा करते हैं- ‘जासु राज प्रिय प्रजा दुखारि, सो नृप अवस नरक अधिकारी।‘ यदि उनकी भक्ति का उत्स प्रेम मान लिया जाय तो प्रेम आत्मानुभव है, जो सामाजिक विषमता समाप्त करता है और व्यक्ति अपमान को आत्म गौरव में तब्दील करता है।

एडविन ग्रीव्स भी तुलसी के मानस को हिंदी भाषियों की बाईबिल की संज्ञा देकर कहते हैं- ‘‘गोस्वामी जी ने इसे काव्य कौशल का प्रदर्शन करने या मनोविनोद के लिए नहीं लिखा है बल्कि सर्वसाधारण के लिए लिखा है। इंग्लैण्ड़ का कोई भी कवि जनसाधारण के बीच कभी इतनी लोकप्रियता नहीं प्राप्त कर सका है, जितनी तुलसीदास ने अपने देश के लोगों के बीच प्राप्त की है।”


संदर्भ सूची:

1. तुलसीदास, श्रीरामचरितमानस, सटीक मझला साईज, गीता प्रेस, गोरखपुर

2. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, गोस्वामी तुलसीदास, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी

3. डॉ. कैलाश कौशल, गीता से कम नहीं रामचरितमानस, आलेख-अगस्त 21, 2015, स्पॉटला (इंटरनेट से साभार)

4. प्रो. रमाकांत पाण्डेय, विश्व मंगल के कवि तुलसीदास, (आलेख- इंटरनेट से साभार)

5. विश्वनाथ त्रिपाठी, लोकवादी तुलसीदास, राधाकृष्ण प्रकाशन, 2007

6. अजहर हाशमी, सर्वजनहिताय लेखनी, (आलेख- इंटरनेट से साभार)

7. रमेश कुंतल मेघ, तुलसीः आधुनिक वातायन से, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, 1973

8. रामचरितमानसः तुलनात्मक अध्ययन, मई, 19, 2016 (आलेख- इंटरनेट से साभार)

9. रामायणः जीवन प्रबंध का श्रेष्ठ ग्रंथ (आलेख- इंटरनेट से साभार)

10. नंदकिशोर नवल, तुलसीदास, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2012

11. जीवन में आदर्शों की कहानीः रामायण (आलेख- इंटरनेट से साभार)

12. प्रगतिशील आलोचना और हमारा समय, हमारे रचनाकार, हिंदी लेखक पुरानी प्रविष्ठि विशेषांक, ब्लॉग समय

13. डॉ. राजलक्ष्मी कृष्णन, राम की प्रासंगिकता (आलेख- इंटरनेट से साभार)

14. केशव मोहन पाण्डेय, वर्तमान में राम की प्रासंगिकता

15. प्रभात कुमार राय, जनकवि तुलसीदास, लोकमंगल एवं समन्वय के प्रबल प्रतिपादक, अगस्त, 25, 2012, NVC NEWS


No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।