व्यंग्य: कोरे कागज का आंदोलन

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

बाहर बर्फ गिर रही है और मैं घर में दुबक कर बैठा हूँ। फायरप्लेस कमरे को गर्म कर रही है और टीवी दिमाग को। ऐसा नहीं होता कि शरीर गर्म हो जाए पर दिमाग ठंडा रहे। अक्सर होता यही है कि दिमाग कुलबुलाने लगता है और शरीर ठंडा पड़ने लगता है। अभी भी यही हो रहा है। दिमाग में एक से एक क्रांतिकारी विचार उबल रहे हैं पर मैं चैनल नहीं बदलता। जब तक विज्ञापन नहीं आएँ चैनल बदलने का अर्थ नहीं है। जो खबर चल रही हो वही देख लेने में भलाई है, अन्यथा क्या भरोसा दूसरे चैनल वाले समाजसेवा के नाम पर सारा असामाजिक दिखा जाएँ। टीवी वालों को कोई ढंग की खबर मिल जाए तो वे उसे ब्रेकिंग न्यूज़ बना कर दिनभर तोड़ते रहते हैं, उसी से गर्मागर्म बहस की भाजी बनाते हैं और विशेष विश्लेषण में उसी के पकौड़े तलते हैं।

यह जो खबर आ रही है वह चीन से है। सच में आठवें आश्चर्य की बात है कि चीन से कोई खबर बाहर आ रही है, वह भी वहाँ की सरकार के खिलाफ़। खबर देख-सुन कर ऐसा लग रहा है जैसे वहाँ के नागरिकों ने शी जिनपिंग सरकार को कस कर तमाचा मारा है जिसकी गूंज दुनियाभर में सुनाई दे रही है। खबर है चीनी नागरिक अपने हाथों में कोरा कागज ले कर सड़कों पर उतर आए हैं। हाँ उन्होंने मास्क पहन रखे हैं, पर अपने मुँह के आगे कोरा कागज कर रखा है। बीजिंग से ले कर शंघाई तक हर बड़े शहर में हजारों लोगों का मौन, कोरे कागज के माध्यम से बोल रहा है।

अभिव्यक्ति की आजादी न हो, नारे लगाने की मनाही हो, प्रदर्शन कुचल दिए जाते हों तो जनता क्या करे! सरकारें किसी भी देश में हों, वे प्रबल बहुमत में हों तो मदमस्त रहती ही हैं। पाँच पांडवों के सामने सौ कौरवों की सरकार महाभारत काल से ही अंधी रही है। चीन में जो ऐसा हो रहा है तो यह नया नहीं है। कोविड महामारी के दौरान चीन को कोरोना का पितामह माना गया। दुनिया के कई देशों में चीनवंशियों को जनता के गुस्से और अभद्रता का शिकार होना पड़ा। इस कारण कोरोना को लेकर चीनी सरकार ने ज़ीरो कोविड पॉलिसी बना दी। एक व्यक्ति को कोरोना हुआ तो पूरा शहर लॉकडाउन में घर में बंद। इस सख्ती के कारण कई लोग दो-तीन साल से घर में कैद। बाहर पढ़ रहे बच्चे, बूढ़े माँ-बाप से जुदा। दैनिक सामान-सुविधाओं की पहुँच नहीं, हर ओर त्राहिमाम। शिनजियांग में और भी गजब हो गया। इक्कीस मंजिला भवन में आग लगी तो दमकलकर्मी समय पर नहीं पहुँचे और दस लोग जिंदा जल गए। इमारत में लगी यह आग चीन के नागरिकों में धधक उठी। अब वे लोग राष्ट्रपति जिनपिंग को मौन रह कर कोरा कागज बता रहे हैं। शायद वे कहना चाहते हैं कि हमें बहुत कुछ कहना है, इस कोरे कागज़ को पढ़ो और इस ब्लैंक शीट पर तुम्हारा इस्तीफा लिख दो। कोरा कागज वहाँ घर-घर का आंदोलन बन गया है।

रेलों, बसों और सरकारी सम्पत्ति में आग लगा कर, चौराहों पर खुली फायरिंग कर व निर्दोष लोगों के घर-दुकानें जला कर, बेगुनाहों को चाकू घोंपने वालों, डरा-धमका कर देशबंद और जनजीवन ठप्प करने वाले प्रदर्शनकारियों के लिए यह आंदोलन एक चुनौती है। जिस तरह काली पट्टी बांधकर खिलाड़ी मैदान में अपना विरोध जताते हैं, चीनी नागरिक शांति के प्रतीक सफेद रंग के कोरे कागज से सत्ता को झुकाने चले हैं। सुगबुगाहट है गाँधी का अहिंसक रास्ता एक बार फिर ताकतवर सत्ता को झुकाने वाला है।

ईमेल: dharmtoronto@gmail.com फ़ोन: + 416 225 2415
सम्पर्क: 22 Farrell Avenue, Toronto, M2R 1C8, Canada

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