अहिंसा एवं मानवाधिकार

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

लेखक भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं एवं सेतु संपादन मंडल के सम्मानित सदस्य हैं। आप अहिंसा आयोग के समर्थक एवं अहिंसक सभ्यता के पैरोकार भी हैं।

सभ्यता के जिस शिखर पर हम आज पहुंचे हैं उस पर हमें गर्व है। इसके पीछे एक अहम तर्क है कि पृथ्वी के प्रत्येक भाग में रहने वाले लोगों ने ऐतिहासिक रूप से विकास किया है और इसे हम अपने सांस्कृतिक, राजनितिक, धार्मिक और आर्थिक विकास में परिवर्तन देखकर महसूस भी करते हैं। हम अपने वर्तमान पर जितना गर्व करते हैं, अतीत उससे भी ज्यादा रोमांचक और गौरवशाली रहा है। रोम, यूनान या मिस्र की सभ्यताओं पर पश्चिम और पूरब में अनेकों साहित्य मिलेंगे। हड़प्पा और मेसोपोटामिया की सभ्यताएँ हमारे अतीत का बखान करती हैं। भारत अपनी सनातन पर श्रेष्ठताबोध का आंकलन करता है और उसे आत्मसात करने का प्रयास करता है। इन सबका साहित्य बहुत विपुल है। इस समृद्ध मानवीय यात्रा का इतिहास अगर हमारे पीछे है और वर्तमान हमारे लिए रोमांचक बना हुआ है तो उसके पीछे महान विरासत में मिली हमें अहिंसक जीवन पद्धति है। युद्धों और हिंसाओं के बीच अहिंसा की सभ्यता मनुष्यता और मानव अधिकारों को जितना बचा पाई, सच कहा जाए तो उसी के कारण हमारा गौरवबोध है, श्रेष्ठताबोध है। पूरब से लेकर पश्चिम तक जो कुछ बचा है वह अहिंसा की वजह से है, वरना यदि अहिंसा जैसे मूल्य न होते तो संभवतः हम शेष न होते। यह इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि हमारे चिंतकों और पूर्वजों ने स्पष्ट कहा कि हिंसा से हिंसा बढ़ती है, और युद्ध से मैत्री की कामना नहीं की जा सकती है। 
विश्व के मानव अधिकारों के संदर्भ में अहिंसा की पड़ताल करना इसलिए आवश्यक है क्योंकि इसके जरिये हम कहीं न कहीं हिंसा से मुक्ति और सबकी गरिमा की प्रतिष्ठा के प्रति आग्रही होते हैं। अहिंसा का अर्थ ही है लोगों के सर्वोत्तम मानवाधिकार की सुरक्षा। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि पूरी सभ्यता में अहिंसा को बहुत महत्त्व नहीं दिया गया, इसलिए अहिंसा आंदोलन और जीवन के लिए विमर्श में भी अहिंसा उस तरीके से शामिल नहीं है जिस तरीके से आज ह्यूमन राइट्स-मानव अधिकार के लिए बहस होती है। सन 1945 में संयुक्त राष्ट्र बनने के बाद जब मानव अधिकारों के लिए एलीनर रूज़वेल्ट के नेतृत्व में मानव अधिकारों का सार्वभौम घोषणा पत्र तैयार करने की शुरुआत हुई, और जब 10 दिसंबर, 1948 को घोषणा-पत्र स्वीकार किया गया, तब से कम से कम मानव अधिकारों पर बातचीत हो रही है, और लगातार हो रही है। घोषणा पत्र की स्वीकृति के बाद जितने और भी संदर्भ हो सकते थे, उसे भी उच्चायोग द्वारा स्वीकार किया गया है। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक अधिकारों पर भी मसौदे आए, और उसे स्वीकार किया गया लेकिन महिला, आदिवासी, थर्ड जेंडर, निःसक्त और वृद्धों के अधिकारों को जानने की कोशिश और पॉलिसी बनाने की कोशिश हुई। पहले पानी के अधिकार की बात गंभीरता से नहीं हुई थी, लेकिन अब हो रही है। यह संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार उच्चायुक्त कार्यालय की ओर से हमें पता चलता है कि न्याय और कानून प्रवर्तन प्रशासन, रंग, व्यापार, बच्चे और युवा, नागरिक स्थान को उच्चायुक्त और उच्चायोग अधिकारों के रूप में देखता है। इसके अतिरिक्त उच्चायोग विश्व के राज्यों के साथ जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण, कोई भी जबरदस्ती, संघर्ष, चेतावनी और असुरक्षा, मृत्यु दंड, लोकतंत्र, चुनावी प्रक्रिया में भाग लेने का अधिकार, कैद, डिजिटल स्पेस, गायब होने की घटना, शिक्षा और सांस्कृतिक, जबरन बेदखली, विदेशी और बाहरी ऋण संबंधी, सभा और संघ की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति और राय की स्वतंत्रता, धर्म की स्वतंत्रता, लैंगिक समानता और महिलाओं के प्रश्न, स्वास्थ्य, मानवीय आपात स्थिति और संघर्ष की स्थिति, एक ही स्थान के लोग के सवाल, एक ही क्षेत्र या जन-समूह के मुद्दे, एलजीबीटीआई लोग, भूमि और आवास, श्री, प्रवास, अल्पसंख्यक, वृद्ध व्यक्ति, विकलांग व्यक्ति, गरीबी, भोजन और सामाजिक असुरक्षा, जातिवाद, जेनोफोबिया और असहिष्णुता, पत्रकारों की सुरक्षा, गुलामी और तस्करी, मानव अधिकारों के माध्यम से सतत विकास, आतंकवाद और हिंसक उग्रवाद, यातना, विषाक्त अपशिष्ट, व्यापार और निवेश, संक्रमणकालीन न्याय और संघर्ष के बाद शांति व्यवस्था, पानी और सफ़ाई व्यवस्था आदि पर ध्यान केन्द्रित कर दुनिया के लोगों को सौंदर्यपूर्ण जीवन प्रदान करने की कोशिश में संलग्न है।
मानव अधिकार के उपरोक्त मुद्दे सदस्य देशों द्वारा सुरक्षित और संरक्षित करने की कोशिश हो रही है फिर भी युद्ध जैसी स्थितियों के सामने सारे मकैनिज़्म कमजोर हो जाते हैं। शरणार्थी लोगों के लिए अलग से कोशिशें हैं कि उनके मानव अधिकार सुरक्षित किए जा सकें। यह एक श्रेष्ठ प्रयास है। लेकिन अहिंसा के लिए कोई भी इस तरीके की कोशिश नहीं हुई। अहिंसा तो अंतस में जगह बनाने वाली एक शील है, जिससे ज्यादा लोग संवेदनशील होते पर इसको ज्यादा महत्व नहीं मिला। यद्यपि उसका स्वरूप मनुष्यों में किसी न किसी रूप में विद्यमान है। पृथ्वी के प्रत्येक क्षेत्र में विद्यमान है, और उसे लोगों ने किसी न किसी रूप में अपनाया भी, लेकिन अहिंसा मकैनिज़्म कैसे हो सकता है इस पर विचार नहीं हुआ। 
अहिंसा जिस प्रकार सत्य और प्रेम का प्रतीक है, उसी प्रकार मानव अधिकार सत्य और प्रेम का निरूपण है। परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से दुनिया में जहां कहीं भी मानव अधिकार की बात की जा रही है वहाँ सत्य और प्रेम की प्रतिष्ठा की जा रही है। किन्तु मानव अधिकार को अहिंसा के पूरक या एक सिक्के के दूसरे के पहलू के रूप में कभी परिभाषित नहीं किया गया। यह संवेदनशील समाज का दायित्व है कि वह इसे रेखांकित करे। इसे समझाये। इसे व्याख्यायित करे कि दरअसल, अहिंसा और मानव अधिकार एक दूसरे के पूरक हैं और मानव अधिकार की आत्मा अहिंसा है। 
प्रो। जेने शार्प जो कि अहिंसक कार्यवाई की राजनीति विषय पर सृजन कर चुके हैं उनका मानना है कि, अहिंसा को अक्सर शांतिवाद के पर्याय के रूप में प्रयोग किया जाता है, बीसवीं शताब्दी के मध्य से अहिंसा शब्द को सामाजिक परिवर्तन के लिए कई आंदोलनों द्वारा अपनाया गया है, जो युद्ध के विरोध पर ध्यान केंद्रित नहीं करते हैं।‘ (द्रष्टव्य: https://www।un।org/en/observances/non-violence-day) लेकिन इसके पीछे के उद्देश्य मानव अधिकारों का संरक्षण ही था। शांतिवादियों के लिए मानव अधिकार प्रमुख विषय हैं, लेकिन इसके पीछे यह उनकी मंसा रही कि सभी अहिंसक हों। सभी सह-अस्तित्व के साथ जीवन-यापन करें, किन्तु इसकी कमी खलती है, जिससे मानव अधिकारों के हनन भी हो रहे हैं, और लोगों के भीतर डर भी है और अनिश्चितता भी। 
सबसे ज्यादा इस मानव अधिकार हनन को रोकने के लिए राज्य जिम्मेदार हैं। वे अगर अहिंसक होकर अपनी सीमाओं में रहकर अहिंसक बर्ताव करें तो यह इतनी खूबसूरत दुनिया बन जाए, जिसकी कल्पना हम असीम शांति में देखते हैं। पृथ्वी और नभ-मण्डल की शांति में देखते हैं। जिन राज्यों के हिंसक होने की बात यहाँ पर की जा रही है, वह मिथ्यालाप नहीं है, अपितु जॉर्ज वाशिंगटन विश्वविद्यालय के योनतन लुपु और वाशिंगटन विश्वविद्यालय के जेफ्री पी। आर। वालेस के आलेख ‘हिंसा, अहिंसा और अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून इसके प्रभाव’ को पढ़ें तो यह उन्होंने बताया है अपने आलेख में कि कैसे सरकारों की हिंसा और अहिंसा की संकल्पना है, और उसे अंतरराष्ट्रीय कानून के साथ किस प्रकार जोड़कर बेहतर दिशा में बढ़ा जा सकता है।
वालेस और लुपु ने लिखा है- हम अहिंसक और हिंसक रणनीति के बीच सामान्य अंतर पर ध्यान केंद्रित करते हैं। जबकि इसके बीच व्यापक विकल्प हिंसा और अहिंसा एक प्रमुख निर्णय है, जो शासन करता है।‘ (http://yonatanlupu।com/Lupu%20Wallace।pdf)। इसको यदि मनोवैज्ञानिक स्तर पर राज्य स्वीकार कर लें, और प्रेम के नियम पर आधारित, सह-अस्तित्व के नियम पर आधारित, सरकार चलाएँ तो स्थितियाँ सुधरेंगी। 
मानव अधिकारों के लिए 10 दिसंबर एक दिवस है, जिस दिन इसके सार्वभौम घोषणा-पत्र को अंगीकृत किया गया था, और दुनिया भर में इस अवसर पर मानव अधिकारों के संरक्षण की बातचीत होती है। मानव-अधिकारों को अहिंसा का विषय कैसे बनाया जा सकता है, इस पर विचार आवश्यक है। मेरी दृष्टि से सार्वभौम घोषणा-पत्र में अहिंसक समाज बनाने की बात की जानी चाहिए थी। संयोग से हमारी देश की एक महिला नेत्री हंसा मेहता इस सार्वभौम घोषणा पत्र की मसौदा समिति की सदस्य भी थीं। वे चाहतीं तो अहिंसा मानवाधिकार के विमर्श का केंद्रीय तत्व होता, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इस विषय पर विचार आवश्यक है कि हम संवेदनात्मक गतिशीलता में कैसे मानव अधिकारों को समाहित करें, जिससे लोग अपने आचार-विचार में ही अहिंसक हों। यदि अहिंसक मन होगा, तो निःसन्देह मनवाधिकारों का संवर्धन होगा। 
मानवाधिकार की सुरक्षा की गारंटी देने वाले लोग इस दिशा में कब नया अध्याय लिखेंगे, यह तो आने वाला वक़्त बताएगा। लेकिन यदि इन दोनों को एकीकृत करके हम मानव सभ्यता का विकास करें, तो शांति की संभावनाएँ निःसन्देह समृद्ध होंगी। 

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