काव्य: चंद्रमोहन भण्डारी

चंद्र मोहन भण्डारी
1. पतंगा और दीपक

भर कर आग जीवन में दीपक जला 
आग जीवन की बुझाने पतंगा चल पड़ा
यों बड़ी पुरानी है दास्तान 
बात समझा कोई, कोई न समझा
कोई पहेली में जा उलझा
पतंगे की शहादत 
कवि का बिम्ब विधान 
गहन मन-अभ्यंतर में
सवालों के हुजूम
उत्तर नदारद- चलता रहा घमासान।

इधर कुछ बदला है
पारम्परिक सोच में संभावित परिवर्तन 
नव युग को परिभाषित करती
एक पहचान
आस्था किरण का एक अनूठा अपवर्तन।

दीपक की तरफ अब
अधिकतर पतंगे नहीं जाते 
अपने सयानों के समझाने में
अब वे नहीं आते।

अब तक लुभाती आ रही लौ
आकर्षित नहीं कर पाती
बस है एक आतुर प्रतीक्षा अंधेरे की
दीवार में सिर पटक
शहीद हो जाने की।

कुछ ने कहा
पतंगा अपना धर्म भूल गया
आकर्षण एवं शहादत का खेल
मात्र खेल नहीं, एक दर्शन था जो
देखते-देखते कितना बदल गया
ऐसा अप्रत्याशित परिवर्तन
आस्था का पुराना शीशमहल 
बेरहमी से तोड़ गया।

पतंगा कुछ भी न बोला
देखा तक नहीं दीपक की ओर
और अंधेरे में गुम हो गया।

कोई समझ न सका
पर दीपक सब समझ गया
अब वह नहीं दे पाता वैसा प्रकाश
जो आकर्षित करता था
जिसकी वजह से पतंगा
उस के लिये मरता था।

उधर ठान लिया पतंगे ने
यों जल जाने से बेहतर है 
संकीर्णता की दीवारों से टकराना
जानते भी हिला न सकेगा उन्हें
विरोध का स्वर मुखर करने
दीवार पर निशान छोड़ जाना।
***


2.  अंतर्मन के साये

मेरा हमसफर साया 
मन अभ्यंतर में मेरा आत्मीय
आज मुझसे कतराने लगा 
आवाज की प्रतिध्वनि अब नहीं देता
ज्यामितीय आकार भी नहीं लेता
कहीं जाता हूं तब
कई बार वह दिशा भी नहीं लेता।

अकेला था, साथ मेरा साया था 
मन-अभ्यंतर तक प्राण में समाया था
छल हुवा मेरे साथ
अपना ही बिम्ब बगावत पर 
क्या सह पाऊंगा यह आघात?

तभी देखा 
मैत्री के दर्जनों हाथ
मेरी ओर बढ़े चले आये
आतुर रहा जिनके सामीप्य को
सदा मिला उनसे अस्वीकार
साये के बिछुड़ते ही
सहज आ मिले – परम आत्मीय!

कुछ समझ रहा था मैं
कल मेरा साथ नहीं था स्वीकार
क्योंकि उनके अपने साये
बिछुड़ चुके थे पहले ही
हर साये व साये वाले से
दूर रहना उनकी मजबूरी थी।

लेकिन निर्द्वन्द थे अब सभी
अंतर्मन के साये बिछुड़ चुके
स्वयं के विरोध का भय
अब न उभरेगा शिराओं में।

साया रहित आकृतियों का हुजूम
विचर रहा अब निर्भय स्वच्छंद
महा गठबंधन - अनैतिक सहयोग
सबके एक नाव पर होने का संयोग।

तभी दीख पड़े बगावती साये 
गुपचुप बतियाते, करते तंज
‘बिछुड़ने का नहीं हमें रंज
साये तुम्हारे भले हों
तुमसे भले हैं
आदर्श गाते नहीं फिर भी
नहीं खुद को छले हैं’।

कैसा मंजर है
भय शिराओं में उभर आता
निज अस्मिता से ‘पलायन 
खुद से भाग रहा इंसान
कहां तक भागेगा?
तलाशेगा तब एक और अंधेरा
पहले से ज्यादा घना और गहरा
जिसमें दीख ना सकें
खुद के बगावती साये।
***


3. अंदर और बाहर

लम्बी कहानी, तीन अरब साल
जीवन तपा, ढला, निखरा
धरा की गोद में पला-बढ़ा
जैविक विकास, अनूठा सफर
वह स्वयं भी शामिल था
कितनी कपि योनियों से गुजरता
क्रमश: निखरता चला आया
‘बोनोबो’ चिंपांजी का करीबी
मानव जीव का वर्तमान स्वरूप।

कुदरत का करिश्मा ही है
इंसानी दिमाग, चेतन-मन
और वह प्रज्ज्वलित कर गया
सांस्कृतिक विकास का दीप।

अंदर का दीप बाहर रोशनी लाया
गाँव की जगह नगर
उसके बाद महानगर, धरा का
कोना-कोना जगमगाया;
पर जगमगाना बाहर हो पाया
अंदर की बात, चिराग तले रात
विकास का सूरज ढलने को आया।
अंदर का अंधेरा, बाहर का सूरज 
दूर नहीं कर पाया।

यों बात छोटी है, बड़ी भी
चमक-दमक, तड़क-भड़क
बाहरी आवरण की थी
चार दिन की चांदनी थी
अंधेरी रात का परचम लहराया
मातृ रूपा धरती को दासी बना
धरती पुत्र अपनी विनाश-कथा
विकास के भ्रम में लिखता चला आया।
***   

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