समीक्षा: मिट्टी की खुशबू और सोंधी महक की कविताएँ

समीक्षक: विजय कुमार तिवारी



समीक्षित कृति: मिट्टी की खुशबू (कविता संग्रह)
कवि/लेखक: डॉ. विजय कुमार महारणा
मूल्य: ₹ 250/-
प्रकाशक: रश्मि प्रकाशन, लखनऊ

उड़िया साहित्य की समृद्ध परम्परा रही है और उड़िया भाषा भी अन्य भारतीय भाषाओं की तरह संस्कृत से जुड़ी हुई है। पहली बार उड़ीसा प्रान्त से, बहुचर्चित साहित्यकार, कवि डा. विजय कुमार महारणा जी का हिन्दी भाषा में काव्य संग्रह 'मिट्टी की खुशबू' मिला है। कविता के सन्दर्भ में प्राचीन समय से ही बहुत कुछ लिखा जाता रहा है और काव्य में रस-तत्व की अवश्यम्भाविता को बढ़-चढ़कर स्वीकारा गया है। रस मनुष्य के भीतर की भावनाओं को संवेदित तो करता ही है, प्रेरित और प्रतिष्ठित भी करता है। कुछ विद्वान साहित्यकारों, आलोचकों, समीक्षकों का मत है, संवेदना जगाने वाली रचनाएँ समाज में शीघ्र लोकप्रिय होती हैं। मेरा कोई जोर नहीं है, सहमत-असहमत हुआ जा सकता है और अपना स्वतन्त्र विचार रखा जा सकता है। हाँ, इतना तो मानना ही चाहिए, साहित्यिक विधाओं में काव्य सशक्त विधा है। हमारे वैदिक साहित्य से लेकर आज तक का लिखा गया सम्पूर्ण साहित्य इस तथ्य की पुष्टि करता है।

भाषा-शैली, रस, छन्द, अलंकार आदि के द्वारा पोषित, संवर्धित होते हुए, संवेदना काव्य को अद्भुत गौरव प्रदान करती है। हृदय में काव्य प्रकट होता है, वाणी सक्रिय होती है और सृजन का प्रवाह चल निकलता है। वह कोई साधारण घटना नहीं होती। यही प्रवाह आगे बढ़कर दूसरों को झंकृत करता है, आनंद और सुख प्रदान करता है। यह दायित्व प्रत्येक कवि अपने-अपने तरीके से निभाता है और हर कवि का सृजन श्रेष्ठ होता है। देश, समाज के लोग अपनी रुचि, क्षमता और आवश्यकता के अनुरूप उसकी विवेचना करते हैं।

'मिट्टी की खुशबू' काव्य संग्रह की भूमिका में डा० विजय कुमार महारणा को हिन्दी-उड़िया साहित्य के अध्येता और संभावनाशील कवि के रुप में स्वीकार करते हुए  कुमार हसन ने लिखा है, "उनकी कविता भोगे हुए यथार्थ के धरातल की कविता है, जो उनके संघर्षमय जीवन का ताना-बाना बुनती है, उनकी आशाओं-आकांक्षाओं को स्वर देती है, अन्तर्द्वन्द्व को समेटती हुई प्यार भरे जीवन-जगत के तरफ दिशा-निर्देश भी करती है। यही उनकी कविता की बरजोरी भी है और कमजोरी भी।"

विजय कुमार तिवारी
इस संग्रह में जीवन से जुड़े प्रसंगों की कुल 49 कविताएँ हैं जिनके माध्यम से कवि की भावनाएँ, सरोकार, जीवन के अनुभव और सृजन-सौन्दर्य खूब-खूब उभरे हैं। सीधी-सादी, सपाट बयानी में भी उनकी कविता अपना प्रभाव छोड़ती दिखती है और संवेदना जगाती है। उनके द्वारा प्रयुक्त शब्द आम बोलचाल के ही हैं, हिन्दी के साथ-साथ कहीं उर्दू, कहीं अंग्रेजी या स्थानीय उड़िया के हैं जिससे कविता सार्थक हो उठती है। 'मिट्टी की खुशबू' संग्रह की पहली कविता है जिसके नाम पर महारणा जी ने संग्रह का नामकरण किया है।

पहली ही कविता में, उनकी पीड़ा, परिस्थिति और तेवर देखा जा सकता है। प्रवासी जीवन की पीड़ा, संघर्ष और अपनों से दूर होने का दर्द उन्हें कचोटता है। नया घर बन रहा है परन्तु पुराने घर का लगाव उनके चिन्तन में है। खाली जेब से भरे जेब तक की यात्रा मार्मिकता प्रदर्शित कर रही है और कवि संकल्पित होता है, सेवा-मुक्त होकर वह अवश्य लौट आयेगा।'दीया जलता रहे' के सारे बिम्ब संघर्ष और उम्मीद की भावना से भरे हुए हैं। मां के द्वारा दी हुई स्लेट और खड़िया आगे चलकर कागज और कलम में बदल गये हैं और 'जीवन' के रहस्य खुलते जा रहे हैं। कवि को ज्ञात है, यदि दीया बुझ गया तो जीवन बोझ बन जायेगा, मनुष्य जीवित लाश हो जायेगा और चारों ओर अंधेरा छा जायेगा। कवि प्यार, विश्वास और ज्ञान के दीये को हमेशा जलते हुए देखना चाहता है ताकि चतुर्दिक उजाला ही उजाला हो। 'कविता लिखता हूँ' में कवि का चिन्तन स्पष्ट है। वह जीने के लिए, स्वयं को निर्जीव होने से बचाने के लिए, मन की शान्ति के लिए और जीवन को भरपूर जीने के लिए कविता लिखते हैं। कवि को चिन्ता नहीं है, कोई पसंद करे या ना करे, कहीं छपे या ना छपे, वह प्रतिष्ठित हो या न हो। 'बहुत कोशिश की है' कविता में कवि किंचित दार्शनिक चेतना में है, 'जीवन' को जान नहीं पाया, उसका रहस्य समझ नहीं पाया है। कवि अपनी नाकामी को 'जीवन' कहता है और निष्कर्ष निकालता है, जीवन को जानने का प्रयास ही 'जीवन' है। 'बहने दो' कविता में कवि को 'जीवन' झरने की तरह लगता है जो नदी बन आगे बढ़ता जायेगा और अंत में समुद्र में खो जायेगा। कवि द्रष्टा बन देखते रहने और दिल से श्रवण करने का संदेश देता है। महारणा जी अपनी कविताओं में 'जीवन' को खूब गहराई से समझना चाहते हैं और पाठकों को सहज ढंग से समझाते हैं।

जीवन में व्याप्त अन्तर्विरोध को 'सत्य और कविता' उजागर करती है। मानव जीवन और कविता का लक्ष्य एक ही है-परम सत्य की खोज करना और अपने आप से रुबरु होना। कवि को लगता है, कविता सत्य को छिपाती है। कवि जीवन-संघर्ष के उत्साह को कम करने वाले सत्य की खोज पर प्रश्न करता है। अगली पंक्तियाँ 'सत्य बोलिए, प्रिय बोलिए' के भाव को संपोषित करती हैं। आज के हालात भयानक हैं, जैसे अघोषित आपातकाल और लोग डरे हुए हैं। कवि, कलाकार के धर्म निर्वाहन पर चिन्तित है क्योंकि सत्य लिखने पर मारे जाने, देशद्रोही या लांछित होने का खतरा है। तो क्या केवल प्यार की कविता लिखी जाये? वह तो युवा है, प्रेमी है पर कवि मार्गदर्शक, कलम का सिपाही, योद्धा भी है और उसे विश्वास है-आज भी बहुत कुछ/कर सकती है कविता/इंसानियत के खातिर/लोगों से/हैवानियत से/मुक्ति दिला सकती है कविता/प्रेरित कर सकती है/एक उच्चतर और बेहतर/जीवन की ओर। 'तनावों में होती है कविता' में कवि प्रश्न करता है, ऐसे भयावह समय में क्या कोई कवि बन सकता है? कवि प्रार्थना करता है-मुझे चैन दो, प्यार दो/शांति दो/दो घड़ी मैं चैन से बैठ सकूँ/और लिख सकूँ कविता। कवि को लगता है, ऐसा तो नहीं होता। हमें इस समाज में रहना है, स्वीकारना और जीने के लिए संघर्ष करना है। सत्य मुखरित होता है-ऐसी जिन्दगी में भी/कविता हो सकती है/जैसे कीचड़ से कमल/कुरुक्षेत्र की रणभूमि से गीता/वैसे ही तनावों में ही/होती है कविता। 'संघर्ष में आनन्द है' का पुरजोर समर्थन करती यह कविता सृजन, कर्म, पुरुषार्थ और निर्भय होने का संदेश देती है।
'सवाल मत करो' कविता में कवि ने लोगों की नब्ज पकड़ने की कोशिश की है, आज सब लोग सवाल कर रहे हैं जबकि उन्हें सब पता है-मुल्क और समाज में/ मौजूद/सारी उलझनों को/पब्लिक जानती है। कवि ने आगे लिखा है-सवालिया निशान/लग ही गया है/इंसान, इंसानियत/सच्चाई, प्यार.भरोसा/ विश्वास, सम्मान, प्रतिष्ठा/सब कुछ/बिकाऊ माल की तरह सज गया है बाजार में। सच स्वीकार करना मुश्किल है क्योंकि बिना पेड़ लगाये कोई हो सकता है प्रकृति मित्र, बिना पढ़े आदर्श शिक्षक, बिना कुछ किए कलाकार, साहित्यकार। इसलिए सवाल मत करो, हो सके तो जवाब दो। 'कभी-कभी'कविता में 'जीवन सफर लगता है, कभी पहेली, कभी दोनों बैठे हैं नदी के किनारे, संगीत सुन रहे हैं। कवि को अहसास है-वक्त के गुलाम हैं हम/मालिक तो नहीं। तमन्ना है- वक्त मेरे इशारे पर नाचे/और मैं अपने जीवन को/भरपूर जी लूँ/बिना कोई शिकायत/करते हुए। 'प्यार की कविता' किंचित व्यंग्य के साथ कवि के चिन्तन में उभरती है-उनकी कविता में/वही गिने-चुने शब्द/चाँद, तारे, आसमान/झरना, नदियाँ, समन्दर/गुल, बुलबुल, मेघ, मयूर/लैला मजनूँ वगैरह/उनके अपने प्राण के स्पर्श में/नये रुप, नये अर्थ लेकर/दिल को छू ही लेते हैं। कवि लोगों की पीड़ा समझता है-पर प्यार कहाँ?/इसलिए आज सब/प्यार के प्यासे हैं, और क्या?/मानो जैसे रेगिस्तान में/मरुद्यान बन गई है/ये प्यार की कविता। कवि को पता है कि इस तरह कविता लिखने में कोई समस्या ही नहीं है। महारणा जी ने प्यार की कविता का यथार्थ मनोविज्ञान चित्रित किया है जिसमें भय, संशय, अवरोध-विरोध, सहमति-असहमति सारे भाव-बिम्ब भरे पड़े हैं।

महाराणा जी सुलझे हुए व्यक्तित्व वाले हैं और संसार को अपनी कविताओं के माध्यम से, जीवन की उलझनों को समझाते हैं। 'गम का संगीत' इसी भाव की कविता है-मिट्टी के अंदर/जैसे पानी है/वैसे ही शरीर के अंदर दुख/हमेशा रहता है। आगे लिखते हैं-हम सब दर्द से/पैदा जो हुए हैं/तो ऐसा ही दर्दीला/हमारा अंत भी/होने वाला है। 'पतझड़ का आलम' में कवि, पत्तों की तरह जीवन के अंत का चित्र खींचता है, महसूस करता है, पत्नी अवश्य दुखी होगी क्योंकि खूब-खूब प्यार जो करती है और वह धीरे-धीरे सब कुछ सम्हाल लेगी। कवि निराश नहीं होता और सुखद जीवन की उम्मीद करता है। 'मैं एक इंसान हूँ' कविता में कुत्ता, बंदर या गधा से तुलना करके मनुष्य के गुणों की पहचान की गयी है। अंत में कवि की भावना देखिए-पर अफसोस है कि/मुझसे ये हो नहीं पाता/क्योंकि मैं एक इंसान हूँ/और इंसान बनकर ही/रहना चाहता हूँ/चाहे जितने भी/संकट क्यों न झेलने पड़ें। दुनिया भर में कवियों की यही भावना होती है, वह आसपास जो देखता है, जो अनुभव करता है तथा बेहतर दुनिया के लिए जो चाहता है, वह लिखे और दुनिया को सुनाए। महारणा जी की 'कविता लिखने की चाहत' कुछ ऐसी ही कविता है-एक कविता लिख दूँ/जिससे सारे गम/तनावों से उबर पाऊँ/जिन्दा लाश जो हूँ/फिर से जिंदादिल/दिलेर इंसान बन जाऊँ। कवि भयभीत है, आतंकित है, ईश्वर से प्रार्थना करता है कि वह कविता लिख सके-ऐसे ही मैं लिखता चलूँ/जीने के लिए/शांति और मुक्ति पाने के लिए। थोड़े अलग भाव-चिन्तन की कविता है 'जमाना कहता है'-तू कवि मत बन/बुरा है ये कविता/लिखने का दीवानापन। जमाना कहता है, दिल को पत्थर बना, दूसरों को ठोकर मार, किसी से प्यार मत कर, कृष्ण और राधा पागल हैं, दूसरों की तरह दौड़ता चल, पैसा कमाने वाला मशीन बन जा, अपने कलेजे को काट कर फेंक दो चौराहे पर, पैसा ही सब कुछ है, सारी चीजें बिकाऊ है-मान, मर्यादा, इज्जत, ईमान, धर्म सब कुछ। इसलिए जमाना कहता है-कवि मत बन/बस भीड़ के बीच/भाग चल, भागते चल/अर्थहीन मंजिल की ओर।

'मैं जानता हूँ' कविता में कवि को अपना सब कुछ पता है, कमजोरी, लाचारी, नाकामी और यह भी कि मरना है एक दिन। कवि यह भी जानता है-पर मरने से पहले/जरूर कुछ लिख जाऊँगा। कवि में देशप्रेम की भावना है, देश की विरोधी शक्तियों, आतंक, अन्याय को समझता है, परन्तु छद्मवेषी लोगों द्वारा जश्न मनाये जाने को लेकर चिंतित है, उसे कवियों की निर्दयता से पीड़ा हो रही है। ये सारे भाव 'यही सच है' कविता में उभर रहे हैं-हर युग में, भीड़ में/उन पर शक किया गया है/तमाम गालियाँ, पीड़ा/दी गई, कभी-कभी/उन्हें जान भी देनी पड़ी/फिर भी वही तो/जिन्दा हैं। इतिहास उन्हीं को याद करता है जो देश के लिए करते हैं। कवि में भावुकता है, संवेदना है और प्रकृति की सुकुमारता भी। उनकी कविताओं में प्रेम अपने स्वाभाविक रुप में स्पंदित होता है, सहजता के साथ ताकि मर्यादा बनी रही रहे। 'लज्जा और नारी' में कवि की भावनाएँ स्वागत योग्य हैं, परन्तु नारी विमर्श वाले लोगों को किंचित असुविधा हो सकती है। कवि विकास में बाधक नहीं है, वह मर्यादा की बात करता है, उत्तेजना और विज्ञापन में अस्मिता बचाने की बात करते हुए कहता है-बहन! आज आपकी/प्रगति को कोई नहीं/रोकेगा, रोक नहीं सकता/आप आगे बढ़ो, और बढ़ो/छू लो आसमान। कवि ने अनेक आदर्श महिलाओं का उदाहरण दिया है, वे कहते हैं- आज की परिस्थितियों में नारियों की जिम्मेदारी और बढ़ गयी है। कवि किंचित उद्वेलित और विचलित है-एक लज्जाहीन नारी/और मर्यादाहीन पुरुष/अपने आपको आदर्श/कहकर जितने भी नारे लगाए/वे कभी समाज के/आदर्श और प्रतिमान/नहीं हो सकते, यही सत्य है।

'कवि का दिल' बहुत बड़ा है-गलत व्यवस्था के विरोध में/बुलंद आवाज उठाता है/जरूरी हो तो/गालियाँ भी देता है। कवि दुखी है-कवि के दिल को/समझने की तो दूर की बात/सम्मान देने वाले/न के बराबर होते हैं। आगे लिखते हैं-अगर ऐसा हुआ तो/शब्दों के आसमानों पर/बहुत सारे फूल चमकेंगे/चारों ओर हो जायेगा/उजाला ही उजाला। कवि अपने चिन्तन के शिखर पर पहुँच कर लिखता है 'कविता लिखने की घड़ी।'अद्भुत कविता है। कवि की तुलनाएँ देखिए-कविता लिखने की घड़ी/पिया मिलन की घड़ी से/कोई कम नहीं है। आगे देखिए-दिल में गूँजती है/दूर किसी मन्दिर की घंटियाँ। कविता लिखने की घड़ी/ब्रह्म मिलन की घड़ी है----और मैं हो जाता हूँ/स्वयं पूर्ण ब्रह्म/स्वयंभू ईश्वर। समाज की संगति-विसंगति से शुरु होकर ब्रह्म और ईश्वरानुभूति की यात्रा कोई कवि ही कर सकता है, कवि विजय कुमार महारणा ही कर सकते हैं। 'कविता क्या है' और 'एक कविता लिख दूँ' दोनों कविताएँ उजाला, खुशी और उल्लास लिए हुए हैं। दोनों में कवि स्वयं को परिभाषित करता है। 'नाचने दो नट नागर को' कविता में स्वाभाविकता की भावना से भरा हुआ कवि रोकना नहीं चाहता-नाचने दो नट नागर को/उसे बजाने दो बाँसुरी/कभी बाँधने की/कोशिश मत करना/अनर्थ हो जायेगा। समाज में व्याप्त विसंगतियों की चर्चा करते हुए कवि कहता है-उनकी आजादी पर/हाथ मत डालो/मत छिनो/शरीर से आत्मा उनके/और बहने दो/झरने को/कल कल छल छल/अपनी ही धुन में। संग्रह की कविता 'सच की तस्वीर' घरेलू जीवन और आपसी सम्बन्धों की विवेचना करती है। पत्नी कहती है, इंटरनेट में लगे रहते हो, फेसबुक या ह्वाट्सअप में, यह सेहत के लिए सही नहीं है, जिम्मेदारियों से मुँह फेरते हुए लिखते हो प्यार की कविता, इस तरह जीवन की सच्चाई से भाग नहीं सकते। वह सामाजिक मीडिया की आभासी दुनिया की बहुत सी बुराईयाँ बताती है और सुझाव देती है कि अपने आसपास के लोगों के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए लिखो कविता।

'सच छुप जाता है' में व्यंग्य देखिए-सारे के सारे आदमी/अब कुत्ते और गधे बनने को/तैयार हो गये हैं। आगे लिखते हैं-सब सोच रहे हैं/आज के दौर में इंसान बनना/बड़ा जोखिम भरा काम है। यदि कोई व्यवस्था पर, बिगड़े हालात पर आवाज उठाता है, उसका काम तमाम हो जाता है। कवि अन्याय और अंधेरे की बात करते हुए प्रश्न करता है और स्वयं उम्मीद भरा उत्तर देता है-ये अंधेरा/एक दिन जरूर हट जायेगा/सत्य का सूरज/काली रात का/सीना फाड़कर/उगेगा ही उगेगा। अगली कविता 'उम्मीद है' में कवि उम्मीद की भावनाओं से भरा हुआ है-उम्मीद है/ऐसे ही फेल होते-होते/एक दिन मैं/पास हो जाऊँगा। 'दिल की आवाज' कविता में कवि देश, दुनिया और मानवता की बेहतरी के लिए चिन्तन करता है, अपनी कविता में आवाज उठाना चाहता है-ऐसा समाज बनाएँ जहाँ गरीबी, लाचारी, भुखमरी, आत्महत्या न हो, सबको काम मिले, सम्मान मिले, जाति-पांति और धर्म जैसा विभाजन न हो, चारों ओर शांति, अमन, सुख-चैन हो। कवि की पीड़ा देखिए-सब कुछ देखते हुए/कुछ कर न सकने के/गम को लेकर/चल रहे हैं हम/तमाम दुख और पीड़ा को/पीठ पर लादकर/रेगिस्तान में ऊंट/या पहाड़ी खच्चर की तरह।

महारणा जी ऐसी कविताएँ कैसे लिख लेते हैं, सीधी, सरल, सपाट, बिना किसी लाग-लपेट के। जो कहना होता है, कह देते हैं, जो सुनाना होता है, सुना देते हैं, कुछ भी छिपाते नहीं। उनकी कविताओं में दोनों भाव उभरते हैं, संसार की जटिलता भी और उम्मीदों का संसार भी। यह कहना थोड़ी जल्दबाजी होगी, कौन किस पर हावी है या कौन पक्ष कमतर या श्रेष्ठतर है। 'भीड़ से डरता हूँ' में भीड़ से डरने के पीछे का मनोविज्ञान देखिए-भीड़ में इंसान खो जाते हैं/खो जाती है इंसानियत/और आदमी बन जाते हैं जानवर। आगे लिखते हैं-पर भीड़ में अक्सर/सच्चाई छुप जाती है। कवि के मन में भीड़ का दूसरा स्वरुप भी उभरता है-पर ये भीड़/किसी-किसी के/सितारे को भी चमकाती है। कवि बनना चाहता है पूर्ण ब्रह्म, स्वयंभू ईश्वर, इसलिए वह एकान्त, शांत की तलाश करता है ताकि स्वयं को ढूँढ सके। 'सत्य की तलाश में' कवि का जीवन दर्शन, उम्मीद और विश्वास गूंथा हुआ है-सत्य के वेष में/अहंकार और मोह/जीवन को नर्क बना देते हैं। आगे देखिए-ये बात भी सच है/सत्य ही सत्य है/शिव है, सुन्दर है/एक दिन वह सामने ज़रूर आयेगा। 'चेहरा ये बदल जायेगा' कविता में कवि की उम्मीदें जगी हुई हैं-पर ये दुनिया/खूबसूरत पेड़-पौधे/झरने, नदियाँ, दरिया/ पहाड़, नीला आसमां/हरी वादियाँ, सब कुछ/ऐसे ही रहेंगे। आगे लिखते हैं-पर कविता जिंदा ही रहेगी/जब तक ये जहाँ है। कवि अपने जीवन-चक्र के माध्यम से चेहरे के बदलाव को रेखांकित करता है और चाहता है-पर हमारा जो/प्यार भरा दिल है/वह न बदले/ढल न जाये/ऐसे ही बना रहे/और हम सभी को/प्यार करते रहें। 'अब जीना मुश्किल है' शीर्षक से दो कविताएँ हैं। कवि करोना काल की परिस्थितियों का जीवन्त और यथार्थ चित्र खींचता है, प्रश्न खड़ा करता है और कहता है-आतंक जो दिल में/बैठ गया है करोना का/तो सचमुच आज/जीना है मुश्किल। आगे लिखते हैं-वह मेरे मन के अंदर/भी आ गया है। करोना के समय की जिन्दगी को देखते हुए कवि महसूस करता है कि ऐसे में अब जीना मुश्किल है। इसी की अगली कड़ी है 'मजबूरी का आलम' जिसमें कवि वैश्विक युद्ध जैसे हालात अनुभव करता है। अति व्यस्त जीवन में तनिक ठहराव अच्छा लगता है करोना के चलते, साथ रहने का, मनपसंद भोजन करने का सुख जो मिला है परन्तु नहीं, अब तो चारों ओर दिख रहा है करोना ही करोना।

कोरोना की त्रासदी की ही कविता है 'इस रात की सुबह कहाँ'। कवि ने अपनी कविता में देश-दुनिया में व्याप्त कोरोना के भय-आतंक की चर्चा की है। अगली कविता 'बदल गई है आदतें मेरी' में कवि की भावुकता देखिए-कैदी होना बुरा नहीं लगता, अकेलापन प्यारा लगता है, सुन सकता हूँ दिल की धड़कन, अहसास ही नहीं था कि चाँदनी रात कैसी होती है, हालांकि किताबों में पढ़ा-पढ़ाया है, अहसास हुआ कि चाँदनी रात इतनी प्यारी क्यों होती है आदि-आदि। आगे पढ़िए-आज मैंने सुबह का/ सूरज देखा/जैसे लाल रंग की बिन्दी/धरती की माथे पर लगी है। कवि की आदतें बदल गई हैं, अब घरेलू कामकाज से एतराज नहीं है, पत्नी की नोकझोंक, मीठी गाली और अख्खड़पन बुरा नहीं लगता, पैदल चलना, साइकिल चलाना, मास्क पहनना अच्छा लगने लगा है। 'आसमान वैसा ही है' कविता में कवि कोरोना काल के जीवन को गहराई से अनुभव करता है और पुराने वर्षों से तुलना करता है। कोरोना काल ने जिन्दगी की रफ्तार को रोक दिया है। कवि की पंक्तियाँ देखिए-आज बहुत वर्षों के बाद/कोरोना की बदौलत/मुझसे मेरा मिलन जो हुआ/छत पर आज मैं/जी भर कर/चाँदनी से नहाया/पंछी बनकर/नीले आसमान में उड़ा/पहले प्यार के नशे में/फिर से विभोर हुआ। इस तरह कवि को सब कुछ पहले जैसा ही लगता है, कहीं कुछ नहीं बदला है।'गांधी जिन्दा हैं' किंचित अलग भाव-विचार की कविता है। यह सही है, मनुष्य का शरीर मरता है, उसके विचार जिन्दा रहते हैं। गांधी अपने विचारों में जिन्दा हैं, कोई उन्हें मार नहीं सकता। कवि का यह कहना समझने योग्य है कि गांधी को उसके बाद भी लोगों ने बार-बार मारा है और गांधी बार-बार क्षमा करते हैं।

'मैं चुप रहूँगा' और 'उदास मन' दोनों कविताओं में कवि संसार की स्थिति देखकर उदास रहता है। उसे उच्चतर जीवन की तलाश है। शांत रहना, मौन रहना एक रास्ता है परन्तु सहज नहीं है। पंक्तियाँ देखिए-मैंने तय कर लिया है कि/अब मैं चुप रहूँगा/शांत रहकर भीड़ में/अपने आप को ढूँढूँगा। 'पता नहीं' किंचित धार्मिक/आध्यात्मिक चिन्तन की कविता है। कवि स्वयं को यात्री मानता है और वहाँ तक जाना चाहता है जहाँ सत्य की, ज्ञान की तलाश में नचिकेता गया था। उसे यात्रा की, सहयात्रियों की, प्रेमियों की पूरी जानकारी है और मन संकल्पित है, कहीं रुकना नहीं है, बस चलते रहना है अनवरत, अनन्त आकाश तक। 'जीवन साथी' शीर्षक के अन्तर्गत दो कविताएँ हैं। जीवन के चौबीस वर्ष बीत गये हैं साथ रहते हुए, पत्नी झगड़ती है, फटकारती है परन्तु खूब प्यार करती है, हर विपरीत स्थिति में तड़प उठती है। कवि सुखद अहसास से भरा हुआ है मानो अभी-अभी मिले हैं दोनों-आज हवा में भी/वही ताजापन/भीनी-भीनी मीठी/खुशबू है प्यार की। कवि पुकारता है-ओ मेरे जीवन साथी! मेरे मनमीत, मेरे हमदम/मेरे प्यार, तू मेरे साथ/ऐसे ही चलते रहना/सुख हो या दुख हो/धूप हो या छाँव हो/ऐसे चलते ही रहना/प्यार का गीत गाते हुए।

'सोचो मत, आगे बढ़ो' कविता उन सभी लोगों की बात करती है जिनके कंधे पर घर-परिवार का बोझ होता है, उसे नींद नहीं आती। मित्र कहता है-यह उम्र ही ऐसी है/उम्र के इस पड़ाव में/आदमी बन जाता है ऊंट/समूचे परिवार का बोझ/पीठ पर लादे हुए/जीवन के रेगिस्तान में/चलना ही हो जाता है/उसका काम। कवि कहता है, ऐसे हालात में सोचो मत, और आगे बढ़ो। 'मेरे हमदम मेरे दोस्त' कविता में दोस्ती की शुरुआत और जीवन्त सहयात्रा देखिए-जब आँखें खोली/तब तुझसे/दोस्ती हो चुकी थी/और जब मैं/पहले सूरज की/रश्मि से नहाया/नीले आसमान में/उड़ते हुए पंछियों को देख/उनके गीत सुना/रात में देखा/चाँद और तारों के मेले/तब से तेरे साथ/एक अनजाना/दोस्ती का सफर/शुरु हो चुका था। तब से तेरे साथ मिलने-विछड़ने का खेल चल रहा है। तू साथ है तो जीवन है, तू नहीं है तो अंधेरा। मेरे दोस्त! मेरा साथ मत छोड़ना। 'तेरे गुस्से में है प्यार' और 'प्रेम संगीत' कवि के समर्पित मन की कविताएँ हैं। कवि को अपनी प्रियतमा का साथ होना ही खुशियों और प्यार से भर देता है। कवि प्यार की कमी दूर करने के लिए कविता लिखता है और इस तरह अपना फर्ज निभा रहा है। 'बहुत कुछ कर सकती है कविता' इस संग्रह की अंतिम कविता है। कवि की पंक्तियाँ देखिए-मुझे ये भी यकीन है कि/आज के दौर के/तमाम संकटों और परेशानियों/को दूर कर सकती है कविता ------रेगिस्तान हो या हो पहाड़/जो भी हो, उसमें पेड़-पौधे/और फूल/खिला सकती है कविता/अगर हम कुछ पल, कुछ लम्हे/उसे समर्पण कर दें तो/बहुत कुछ कर सकती है कविता।

इस तरह देखा जाय तो महारणा जी गैर-हिन्दी-भाषी होते हुए हिन्दी में कविताएँ लिखते हैं। उनकी कविताओं में घरेलू जीवन की बातें, पति-पत्नी के बीच प्रेम, सहयोग, सहकार और एक-दूसरे के प्रति समर्पण खूब व्याप्त है। बड़ी बात है, कवि पत्नी के प्रति प्रेम को सम्मान पूर्वक स्वीकार करता है और अपनी कविता के माध्यम से संदेश देता है कि दोनों मिलकर समर्पण भाव से रहें तो जीवन सुखी-शांत रहेगा। उनकी कविताओं में समाज का संघर्ष दिखता है और समस्याओं से निकलने का मार्ग भी। कवि सरल, सहज भाषा-शैली का उपयोग करता हैा उनकी सीधी-सादी कविताएँ हैं परन्तु प्रभाव पैदा करने वाली हैं। हो सकता है, बड़े-बड़े आलोचक, समीक्षक सहमत/असहमत हो सकते हैं, प्रश्न खड़ा कर सकते हैं, मुझे महारणा जी में संभावनाएँ दिख रही हैं। संभवतया हिन्दी भाषा में उनका यह पहला कविता संग्रह है। निश्चित ही उनके नये-नये संग्रह आयेंगे।
***
विजय कुमार तिवारी (कवि,लेखक,कहानीकार,उपन्यासकार,समीक्षक)
टाटा अरियाना हाऊसिंग,टावर-4 फ्लैट-1002, पोस्ट-महालक्ष्मी विहार-751029, भुवनेश्वर, उडीसा, भारत
चलभाष: 91 0293 9190

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