कहानी: जो हुक्म मेरे आका

गरिमा संजय दुबे
गरिमा संजय दुबे


कीबोर्ड पर तेजी से चलती उंगलियाँ अपने प्रोग्राम को पूरा कर रही थीं, वेरियेबल, ऑपरेटर सिंबल, कुछ अक्षरों के, संकेतों के मिश्रण से जाने कैसा जादू होता है जो पूरा प्रोग्राम तैयार हो जाता है। तकनीक की जादूई दुनिया जिसे समझ आती है, उसे ही समझ आती है। स्क्रीन पर आँखें गढ़ाए किसी प्रोग्राम में लगे आरोग्य को कॉफी की तलब महसूस हुई, उसने तुरंत अपने अलादीन के चिराग को आदेश दिया, “हे एलेक्सा वन कप कॉफी प्लीज़”। 
“जो हुक्म मेरे आका” की आवाज़ के साथ ही कॉफी मशीन ने अपना काम शुरू कर दिया।
“कॉफी इज़ रेडी” के संदेश के साथ रोबोट ने कॉफी लाकर आरोग्य के टेबल पर रख दी। 
 “तकनीक भी क्या कमाल चीज है, लोग यूँही रोते रहते हैं, इंसानों से तो मशीनें अच्छी”। आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से सजे अपने घर में बैठे आरोग्य ने सोचा, एक बड़ी कंपनी में डिपार्टमेंट का मुख्य है वह, जूनून है तकनीक उसका, सपना है कि इंसान की जगह ले ले तकनीक, किसी इंसान को इंसान की जरूरत ही नहीं होगी फिर। 
“अच्छा है, मशीनें भ्रष्ट नहीं होतीं, झूठ, बेईमानी छल, कपट, हिंसा कुछ नहीं होगी”, उसका मानना था कि इंसान की जगह मशीन में तय प्रोग्राम डाल दुनिया को बेहतर बनाया जा सकता है।
“लेकिन यह भी तो सच है कि प्रोग्राम इंसान बनाता है, तो जहाँ अच्छी होंगी वहाँ बुरे दिमाग बुरे प्रोग्राम बनायेंगे, फर्क बस इतना है कि पहले इंसान लड़ते थे, अब मशीन लड़ेंगी, तकनीक लड़ेगी”। उसका दोस्त अक्षय कहता।
तो वह जवाब देता “हाँ तो ठीक है न तकनीक से तकनीक लड़े, मनुष्य तो बचे रहेंगे”।
“लेकिन जिस हिसाब से तू इंसान को रिप्लेस कर रहा है, इंसान बचेंगे क्या” अक्षय ने कहा 
“हाँ इंसानों की जरूरत ही क्या, मशीन ही दुनिया चला लेगी, इंसान आराम करे, ऑर्डर दे यूनीवर्स के रहस्य ढूंढें, और रिसर्च करे” आरोग्य ने कॉफी का घूंट भरते हुए कहा।
“लेकिन इंसान ही नहीं हो तो फिर दुनिया की जरूरत ही क्या होगी” बोल” अक्षय ने कहा।
“वो इंसान जो मशीन से दुनिया चला सकें, चुनिंदा लोगों के लिए दुनिया, राज करेंगे” आरोग्य ने जवाब दिया।
“राज करने के लिए दुनिया तो होनी चाहिए, क्या मशीनों पर राज करेंगे”, माय डीयर फ्रेंड दुनिया दुनिया के इंसान, दुनिया की खूबसूरती, ज़मीन, हवा, पानी समंदर और हर कीमती चीज पर इंसान राज करना चाहता है, और तुम्हें पता है जितना सुकून उसे इंसानों को तकलीफ देकर उनकी चीखे सुन कर, उनका लहू देख कर मिलता है ना उतना और किसी चीज में नहीं, तुम्हें क्या लगता है इंसान किसी निर्जीव धरती पर राज करना चाहता है, नहीं वह इंसानों पर, ज़िंदा जानवरों पर, सांस लेती धरती पर राज करना चाहता है, मशीनों पर राज करने का नशा इंसानों पर राज करने से बड़ा नहीं है, एक दूसरे पर अपने प्रभुत्व को दिखाने, ताकत आजमाने के लिए इंसान चाहिए, जिसकी कमी मशीन पूरी नहीं कर सकती, मशीन चलाने के लिए भी इंसान चाहिए, और किसी दिन किसी वायरस से तकनीक इंसान पर हावी हो जाए तो” अक्षय ने कहा।
“अरे यार ऐसा कभी नहीं होगा, मशीन वही करेंगी जो हम कहेंगे, अब बनाओं न प्रोग्राम, दया करुणा, प्रेम, सत्य, अहिंसा, संस्कार के और कर लो इंस्टॉल मशीन में, वैसा रोबोट मिलेगा” आरोग्य ने कहा।
“हाँ तो मशीनों का निर्माण हम करेंगे, और हम अलग अलग इंसान हैं, सबको ए आई तकनीक सिखा दोगे तो, चोर चोरी का प्रोग्राम बनाएगा, आतंकवादी आतंक का, बलात्कारी बलात्कार का, जो जैसा है वैसा ही काम करेगा, और वैसी ही मशीन बनाएगा, तो समस्या खत्म कहाँ हुई, बढ़ गई, इंसान में तो फिर भी सुधार की गुंजाईश होती है, मशीन को कैसे बदलोगे। इसलिए हर ज्ञान हर किसी के लिए नहीं होता, तकनीक मनुष्य के लिए है या मनुष्य तकनीक के लिए, थोड़ा सोच ले भाई” अक्षय उसके तकनीक के लिए जूनून से परेशान था।

“अरे यार तुम दिमाग मत खाओ, बस आगे का समय तकनीक का है, हमें हाथ भी नही हिलाना पड़ेगा सब काम हो जाएगा”, आरोग्य ने कहा।
“अच्छा कैसे”, अक्षय ने पूछा।
“बस कमांड दो और काम खत्म” 
“जैसे एलेक्सा स्विच ऑफ द लाईट” 
और लाईट बंद 
“एलेक्सा खाना” 
“एलेक्सा विल ऑर्डर द फूड” आरोग्य कहता चला गया।
“अरे, क्या यह इंसान की तरह खाना बना पाएगा या केपसूल खाओगे, पानी पूरी के केपसूल, पाव भाजी के, माँ के हाथ के बेसन के लड्डू का स्वाद भी देगी यह मशीन” अक्षय ने फिर पूछा 
“क्यों नहीं, बनाओ प्रोग्राम, फ़ीड करो, द रोबोट विल मैक इवन रोटी फॉर यू डार्लिंग” 
“घर के समान की लिस्ट डाल दो, आईटी विल ऑर्डर, सारे काम के प्रोग्राम बनाकर डाल दो, हो रहा है यार, हो रहा है, सब कर तो रहे हैं, फोन से, ऑनलाइन सब, अभी हम कर रहे हैं बाद में, हमको इतना काम भी नहीं करना पड़ेगा, टेक्निक अपने आप करेगी, हमारे मन में आया और विश पूरी, जस्ट लाईक अलादीन का जिन्न, जो हुकूम मेरे आका”, बोल कर”, हा हा हा वह जोर से हँसा।
“ओके बाबा डू योर वर्क” कहकर अक्षय ने फोन काट दिया।
आरोग्य, बचपन से अलादीन का जादूई चिराग उसकी पसंद की किताब रही, सोचता था ऐसा कुछ हाथ लग जाए तो कमाल हो जाए, रही सही कसर डोरेमोन कार्टून ने पूरी कर दी।
इंसान यही तो चाहता है, कोई हो जो उसकी हर इच्छा पूरी कर दे, सपने उसकी इच्छाओं की परछाई ही तो होते हैं, वो उन्हें सपने में पूरा होते देखना चाहता है, तरह तरह की कल्पनाएं करता है, अपने लिए स्वर्ग रचता है कल्पना में, जो किसी दिन वह पूरी होने लगे तो। बचपन की कल्पनाशीलता ने उसके तकनीक दिमाग को और विस्तृत किया।
जैसे जैसे कंप्यूटर की और बढ़ता गया वैसे वैसे तकनीक की चमत्कारी दुनिया उसे अलादीन का चिराग ही लगने लगी, पढ़ाई पूरी करके एक कंपनी में अच्छे पैकेज पर आ गया विदेश, खाली समय में अपने घर को ए आई होम में बदलने की कोशिश करता, सब अपने आप होने लगे, छोटे छोटे प्रोग्राम, छोटे छोटे काम के लिए रोबोट बनाना और कमांड देकर काम करवाना उसका सपना था, कमांड भी न देनी पड़े, बस मन में आए और इच्छा पूरी, उसने अपने रोबोट में यस या नो नहीं, जो हुकूम मेरे आका का टोन सेट किया था, तकनीक उसके हाथ में जादुई चिराग और जिन्न जैसी हो गई थी। उसकी इंटेलीजेन्स की कंपनी भी कायल थी और उसके प्रयोगों के लिए पैसा भी देती थी। घर एक छोटी मोटी कार्यशाला में तब्दील हो गया था। सेंसेर, रोबोट यह तो अब पुरानी बात लगने लगी थी, मन की भी सुनने लगी थी तकनीक, वह चाहता था कि किसी भी काम के लिए इंसान के शरीर, मन को कष्ट न हो, बस सोचे और पूरी हो जाए।
उसके इस जूनून से उसके जानने वाले भी परेशान रहते थे।
 उसके जीवन में आया प्रेम कब इस तकनीकी जूनून का शिकार हो गया पता ही नहीं चला, पाखी, हाँ पाखी उसकी प्रोजेक्ट पार्टनर तकनीक में वह भी कम नहीं थी, लेकिन जीवन में किस भाव का कितना महत्व है, वह जानती थी। प्रेम भी आरोग्य लिए रोबोटिक हो गया था, प्रेम उत्तेजना भी उसमें समय देखकर उभरती और किसी बटन की मानिंद खतम हो जाती, पाखी के साथ होकर भी वह वह नहीं होता, उसकी कल्पनाएं, रोमांच सब मशीनी होते, उसे पाखी भी एक मशीन नजर आने लगी, स्विच ऑफ, स्विच ऑन। लेकिन पाखी तो मशीन नहीं थी न, वो तो जीत जागता इंसान थी, जिसे इंसानी प्रेम और भावनाएं चाहिए थी, एक दिन रोते रोते कह गई, “इन्ही मशीनों से तकनीक से अपने लिए प्रेम बना लेना तुम”, 
“हाँ हाँ बना लूँगा, कम से कम कोई डिमांड तो नहीं होगी, मेरी हर जरूरत पूरी कर देगी, प्रेम भी बना लूँगा प्रोग्राम प्रेम का भी, जाओ” वह चीखा।
विदेश में रहने वाले अक्सर अपने परिचित हिन्दुस्तानी लोगों का समूह बना लेते हैं, समूह में एक बुजुर्ग डॉक्टर भी थे, जो जाने माने मनोवैज्ञानिक भी, अंकल सेठ, अक्सर कहते थे, “अति सर्वत्र वर्जयते, आ बैठते थे कभी कभी आरोग्य के जादूई घर में, आम इंसान के लिए तकनीक तो जादू ही होती है, वो कहते कभी कभी “तकनीक प्रकृति का ही एक अलग डायमेन्शन मतलब आयाम है”,
आरोग्य उनकी बात पर ध्यान नहीं देता यह वो जानते थे, लेकिन फिर भी कोशिश करते कि यह लड़का कभी तो निकले इस जाल से।
कभी कहते “देखो रंग पहले से थे, इंद्रधनुष पहले से था, उन्हें देखकर ही विज्ञान ने, तकनीक ने नए रंग, नकली रंग ईजाद किए, पानी पहले से था जिसका परीक्षण कर कुछ खोज की तकनीक ने, ग्रह पहले से थे तकनीक ने उन्हें खोजा भर है बनाया नहीं, प्राकृतिक उपग्रह ही तो तकनीकी सेटेलाईट की प्रेरणा बने, आरोग्य प्रकृति ही इनपुट इनपुट देती है, जिसके इस्तेमाल से आधुनिक तकनीक बनती है, नेचर इस द ट्रू इन्स्परैशन बिहाइन्ड एव्रीथिंग, नेचर इज़ गॉड यू नो, कहीं बाहर चले जाया करो, यह स्क्रीन पर ही हर रंग, प्राकृतिक दृश्य और झरनों की तस्वीर क्या असली सुख देगी”।
वह कहता, “मेटावर्स इस अनदर यूनीवर्स अंकलजी, बस उसमें ही जीना है, सब है उसमें, वह प्लाज्मा टेक्नॉलजी, वर्चुअल थ्री डी, और मेटावर्स से हमें मनचाही जगह होने का आभास दिला देता है”।
वे निराश होकर कहते “आभास ही है ना, मेटावर्स माया है, माया, बचो”।
“अंकल जी आप कहते हो ना जगत भी माया है, लेकिन रहते हो न इसमें, फिर मेरी माया को गलत क्यों कहते हो” वह खीजता। 
वे निराश हो जाते और चले जाते।
वह झल्लाता, अक्षय से कहता, “देट ओल्ड फ़ेलो हैज़ नथिंग टू डू विद टेक्नॉलजी” “ही इज सफरिंग फ्रॉम पेनथेइज़्म, टू सी गॉड एवरीवेअर”। 
पता है क्या कहते हैं, मोबाईल फोन इस नथिंग बट द ट्रांसफॉर्माशन ऑफ अन ओल्ड सिद्धि, जहाँ ऋषि किसी की तरंगों की वाइब्रैशन से उस इंसान का पता लगा कर बात कर लेते थे, तकनीक ने वही तो किया है, हर इंसान के हाथ एक चिप देकर उसकी वेवलेन्थ, वाइब्रैशन को एक तरह से पहचान लिया है, हा हा हा, योर मोबाईल इज़ नथिंग बट अ कोड ऑफ योर वैव्लेंथ, वैसे ही हर चीज की वाइब्रैशन होती है, उसे पहचानने की विधा जान लो और पहुँच जाओ या पहचान लो, हा हा हा”।
अक्षय ने गौर से उसे देखते हुए कहा, “तो क्या गलत कह रहें हैं वो, सही तो कह रहे हैं, सब खेल ही तो है तरंगों और फोटन्स का, फिज़िक्स यू नो, इन डीप कोर ईज़ स्पिरिचुअल, टॉक्स अबाउट एलिमेंट्स, ये फाइव जी, सिक्स जी क्या हैं, तरंगें हैं न, रडार कैसे काम करता है, हर चीज की उपस्थिति का पता कैसे चलता है, सही कह रहे हैं वो”।
एक क्षण के लिए आरोग्य स्तब्ध रह गया, “हाँ सही कह रहे थे, पर उसका वैज्ञानिक मन यह मानने को तैयार नहीं था कि तकनीक भी दरअसल प्रकृति का ही आधुनिक विस्तार है, वह नेचर को तकनीक, विज्ञान से अलग मानता है”।
खैर, उसकी ज़िंदगी की बोर्ड पर चलती हुई उँगलियाँ और उसके अनोखे प्रोग्राम के बीच ही सांस ले रही थी।
 
उसकी गाड़ी में ड्राइवर नहीं है, वह अपने लैपटॉप में सिर घुसाए गाड़ी में बैठ जाता है, जिसका दरवाजा उसके आते ही खुल जाता है, घर से ऑफिस के रास्ते की सेटिंग की हुई है जो उसके बैठते ही, चालू हो जाती है, न उसे दायें बाएं देखना होता, न आगे पीछे गाड़ी उसे उसके ऑफिस पहुंचा देती है। पहुँचने पर “हम पहुँच गए” का संदेश मिल जाता और वह उसी तरह अपने लैपटॉप को लेकर अपनी डेस्क पर जाकर बैठ जाता, डेस्क तक का रास्ता उसकी स्मार्ट वॉच उसे बताती जाती। दिनभर अपना काम कर फिर से घर, और खाने की इच्छा होने पर भोजन अपने आप ऑर्डर होता पेमेंट कट जाता और वह, एलेक्सा के कहने पर “मालिक अब सोने का समय हो गया” तो सो जाता।
उसने एलेक्सा में हर घंटे दो घंटे के बाद कुछ निर्देश डाल दिए हैं, जैसे सुबह उठिए, ब्रश कीजिए फ्रेश हो जाईए, या नहा लीजिए, भोजन का समय है।
मौसम बहुत सुहाना है, क्या कॉफी पीजिएगा, बाहर हल्की बारिश या बर्फ गिरने पर उसके रोबोट उससे पूछते, मौसम में बदलाव, हवाएं तेज चलेंगी, बर्फबारी होगी या हरियाली छाने लगी है इन सबका पता, दिनरात का पता उसे अपने रोबोट से चलता। घर से फोन आने पर एलेक्सा उसे बताती माँ का फोन है, बहन का फोन है, उसने अपना वर्चुअल इमेज भी बना लिया था, उसकी अनुपस्थिति में वही माँ, बहन, पिता, दोस्तों से बात कर लेता था। उसमें सब मेमोरी बचपन की घटनाए, यादें डाल दी थी उसने, बिल्कुल उसकी तरह कोई पहचान नहीं सकता।
बस वह लगा हुआ था कि दुनिया पर तकनीक राज करे और तकनीक पर वो और उसके जैसे लोग। 
उसका हंसने का मन करता तो एलेक्सा उसे चुटकुला सुनाती, गाने सुनने का मन करता तो घर के थियेटर में उसके मन पसंद गाने बजने लगते, वह और उसकी तकनीक की दुनिया, हर दिन नए प्रोजेक्ट, नई तकनीक और उसका जूनून। वह मशीनों से घिर गया था। 
माता पिता भाई बहन एक बार आकर मिल गए, तब तक वह अपने ए आई घर को पूरा कर चुका था, महीने भर रहने के बाद, मशीन से चलते घर, मशीन से चलती कार से उनकी आँखें चौंधियाँ गई थी, कई इनाम कई पुरस्कार भी मिल चुके थे। जिसे वे भारत में बैठे रिश्तेदारों के बीच बता बता कर खुश होते रहते। 
इन दिनों माँ बार बार फोन करती, शादी के लिए, उसने बोला “मेरी शादी तो तकनीक से हो गई, जब तक एक पूरा इंसान, इंसान के मन, बुद्धि वाला रोबोट नहीं बना लूँगा शादी नहीं करूंगा”।
उसका जूनून अब पागलपन की शक्ल लेने लगा था।
कुछ दिनों से उसे महसूस हो रहा था कि वह भूलने लगा है चीजें, एलेक्सा को दी जाने वाली कमांड में गलतियाँ होने लगी है नतीजा गलत परिणाम, वह भूलने लगा था पानी और चाय के बीच का अंतर। रंगों को वह स्क्रीन पर ही पहचान पा रहा था, असल रंग को पहचानने मे उसे गूगल लेंस की मदद लेनी पड़ती थी। 
सुबह शाम के बीच का अंतर उसे मशीन बताती थी। उगते सूरज और ढलते सूरज में फरक वह नहीं कर पाता, दिशाओं को भूलने लगा था, जिसे उसने काम का स्ट्रेस मान ध्यान नहीं दिया।
 एक दिन ऑफिस से घर आते हुए बैटरी कम होने पर उसकी कार का परफ़ॉर्मेंस बिगड़ने लगा उसने सोचा कि वह खुद कार चला लेगा, लेकिन यह क्या ? कार उससे चल नहीं रही थी, वह कार चलाना भूल गया था, बरसों से मशीन ही तो चला रही थी कार।
उसने अपने घर की दिशा याद करने की कोशिश की, लेकिन उसका दिमाग दायाँ बायां भूल गया था, क्योंकि वो तो मशीनें बताती थीं उसे, यह काम तो वह कबका छोड़ चुका था, दिमाग को कोई कष्ट न हो, सब निर्देश मिलते रहे और वह करता जाए, वह रोबोट हो गया था, उसके दिमाग ने खुद निर्देश देना छोड़ दिया था, जो तकनीक उसके निर्देश पर चलती थी, वह कबसे उस तकनीक के निर्देशों पर चलने लगा, पता ही नहीं चला।
वह पसीने पसीने हो गया, पासवर्ड याद नहीं आ रहे थे, बैटरी के बैकअप कमांड के, अब घर जाए कैसे, किसी को फोन लगाने के लिए एलेक्सा को बोला तो वह भी जवाब नहीं दे रही थी, उसका फोन किस पासवर्ड से खुलेगा यह भी उसे याद नहीं क्योंकि वह काम भी एलेक्सा करती थी, घबराहट के मारे उसका बी पी बढ़ गया था, चक्कर आने लगे थे, वह वहीं सड़क पर सर पकड़ कर बैठने वाला था कि कार के औटोमेटेड सिस्टम ने सिस्टम दुरुस्त कर गाड़ी चालू कर दी, वह तुरंत उसमें सवार हुआ और जैसे तैसे घर पहुँच गया।
शुक्र था कि घर का सिस्टम ठीक था, ए आई ने तुरंत गड़बड़ी पकड़ी और सिस्टम दुरुस्त किया, उसे भी अपनी प्रिय मशीनों के बीच पहुँच अच्छा लगा, एलेक्सा ने डॉक्टर से उसकी पूरी हेल्थ हिस्ट्री स्कैन करके भेज दी थी, शरीर की हरकतों को नोट कर डॉक्टर ने प्रिस्क्रीप्शन मेल किया, रोबोट ने मेडिकल स्टोर से दवाएं ऑर्डर कर दी। वह दवाई ले कर सो गया। सुबह उठा तो तरोताजा महसूस कर रहा था। इतने में अक्षय का फोन आया, अब वह खुद फोन नहीं उठाता, मशीन उसे जोड़ देती, पहचान भी मशीन बताती अक्षय दोस्त, अनीता माँ, अजय शर्मा पापा, अनुराग भाई, और ऐसे ही सारे रिश्तेदारों और दोस्तों के नाम ए आई की पहचान के हिसाब से डाल दिए हैं, उसे जहमत नहीं उठानी पड़ती किसी को पहचानने की।
अक्षय का फोन लिया, “क्या हुआ, एरर मैसेज था मेरे इनबॉक्स में”, अक्षय ने चिंता से कहा।
आज न जाने क्यों अक्षय की आवाज उसे अजनबी सी मालूम हो रही थी, ऐसा लगा जैसे वह उसकी आवाज पहली बार सुन रहा है, फिर भी उसने बोल दिया “मशीन है, जब इंसान का शरीर चलते चलते थक जाता है तो गलतियाँ करता है, मशीन में भी एरर आना स्वाभाविक है” मैं फिर फोन लगाता हूँ”, कहकर उसने फोन काट दिया।
“ऐसा कैसे हो सकता है, मेरी प्रोग्रामिंग में गड़बड़ कैसे हो सकती है” वह झल्लाया। अपने प्रिय खिलौने, वेरियबल्स, आइडेंटिफ़ायर्स, सिंटेक्स, स्पेशल केरेक्टर, की वर्डस जिन्हें वो पाँच तत्व कहता है, कहता है जैसे सृष्टि की रचना पाँच तत्वों से हुई है न वैसे ही तकनीक की दुनिया इन पाँच तत्वों के कॉमबीनेशन पर ही बनी है, जो चाहे बना लो, करवा लो, दुनिया तुम्हारे इशारों पर नाचेगी। उसका दोस्त अक्षय हमेशा कहता “साले पाँच तत्वों पर नियंत्रण करके पूरे यूनीवर्स को अपनी मुट्ठी में करने का सपना राक्षस देखते थे, तू राक्षस होता जा रहा है, तकनीक का राक्षस”।
वह नाटकीयता से राक्षस जैसा अट्टहास करके कहता, “हा हा हा हाँ राक्षस, तकनीक का राक्षस, यूनीवर्स के पेरेलल, मेटावर्स हा हा हा, पूरी दुनिया मुट्ठी में एक कमरे में, उंगलियों पर, मायावी शक्तियां, जादुई तकनीक हा हा हा”।
अक्षय चिंता करता लेकिन कुछ कर नहीं पाता।
आज उन्हीं पाँच तत्वों के मेल में कोई विकृति आ गई थी, जो बैकअप के बावजूद उसकी कार बंद पड़ गई थी, घर से भी उसने बैकअप के सिग्नल डाल दिए थे, लेकिन उन्होंने काम क्यों नहीं किया। पूरे सिस्टम को रिव्यू करना पड़ेगा, कहीं कोई वायरस तो नहीं, कोई हैकिंग तो नहीं हुई है उसके मॉडल के साथ, कोई और नियंत्रित कर रहा है जैसे उसके सिस्टम को, ऑफिस से लाने के लिए एलेक्सा को आपातकालीन कमांड दी, एलेक्सा ने आज सुना ही नहीं, उसने खुद सिस्टम को खोलना चाहा लेकिन पासवॉर्ड याद ही नहीं आ रहा था, वह तो एलेक्सा औटोमेटेड मोड में करती थी उसने जाने दो बरस से खुद खोला ही नहीं। सर में तेज दर्द था सोचा कुछ पी लिया जाए, ऐसी स्थिति में क्या पिया जाता है, उसे वह भी याद नहीं, इतना तो वह समझ गया था की उसका सिस्टम, ए आई होम और सारी मशीन में कोई एरर है, उठा और अपने घर में घूमने लगा, आज कितने दिन बाद मशीन बंद थी, उसके घर में कहाँ क्या रखा था, वह भूल चुका था, किचन पानी कहाँ था, उसे याद नहीं ऐसे ही भटकते हुए वह किचन में पहुंचा और क्यों गया था यह भूल गया, घबरा कर वापस आया, फोन उठाया लेकिन दूसरी मशीनों से जुड़े फोन में नंबर ढूँढने में उसे परेशानी आई, पसीने पसीने हो उसने फिर से मशीनों को ठीक करने की कोशिश की, एक वायरस ने उसके पूरे सिस्टम को ध्वस्त कैसे कर दिया था, एंटी वायरस कहीं खतम हुआ और इस बीच किसी बग ने कुछ गड़बड़ की थी शायद। सिस्टम खोल कर उसने पूरी प्रोग्रामिंग को ठीक करने का फैसला किया, तकनीक की भाषा अब उसकी भाषा बन गई थी वह जावा, पायथन में बात करता, सपने में भी प्रोग्रामिंग और एक्सक्यूशन दिखता, वह अपने पूरे परिवेश से कट गया था, झरने फूल, हरियाली, नमीं उसे महसूस नहीं होती, सुगंध पहचानना वह भूल चुका था।
वह जैसे हर चीज़ अब स्क्रीन पर ही देख समझ पाता, सुबह की धूप, सांझ का सौंधापन रात के तारे सब उसकी स्क्रीन पर दमकते और उनकी सुंदर छवियों को वह वहीं निहार लेता, मेटावर्स वर्चुअल दुनिया के इस सच ने उससे असल सच को कोसो दूर कर दिया था।
 पिछले दस साल से उसने अपने प्रोजेक्ट के अलावा कुछ सोचा ही नहीं, किया ही नहीं। तकनीक की जो दुनिया उसके सामने हाथ बांधे जो हुकूम मेरे आका कहती खड़ी रहती थी, आज उसका जैसे किसी ने अपहरण कर लिया था। उसका इंटीग्रेटेड सिस्टम ध्वस्त हो रहा था, अपने सामने बनाई दुनिया को यूँ बिखरते देख वह पगला गया था, “यह नहीं हो सकता मेरे बनाए प्रोग्राम में कभी गड़बड़ हो ही नहीं सकती, ऐसा कैसे हो गया” वह धड़ाधड़ धड़ाधड़ अपनी तकनीक चेक करता रहा, करता रहा, न खाने की सुध न सोने की, उसके तकनीकी के पाँचतत्वों के मिश्रण के साथ ही उसके शरीर के पाँच तत्व का मिश्रण भी बुरी तरह गड़बड़ा गया था। भूलना, ध्यान कम होना, नींद कम होना तो काफी समय से हो रहा था, लेकिन सामान्य मान वह चलता रहा, पासवर्ड याद नहीं आ रहे थे, की वर्ड भूल गया था, वेरिएबल्स के सीक्वन्स उसे उलझा रहे थे, ठीक करने की घबराहट बैचैनी ने उससे और गलतियाँ करवाई। दो तीन दिन सतत काम करते रहने के बाद उसे ऐसा लगने लगा जैसे वह किसी अंधे कूए में गिरता चल जा रहा है, अंधेरे में सब चीजें विलीन होती जा रही थीं, जैसे ब्लैकहोल सब कुछ निगल लेता है ऐसे ही उसके दिमाग में कोई ब्लैकहोल निर्मित हो गया है जो उसकी याद, उसकी भाषा, उसकी सीख, उसका सबकुछ जो जीवन में था निगलता जा रहा है, तस्वीरें धीरे-धीरे धूमिल होती जा रहीं थीं, जैसे कोई मिटा रहा हो, उसका दिमाग खाली बरतन जैसा हो गया था, बचपन की यादें, दोस्त, यार, प्यार सब जैसे पीछे छूटते जा रहे थे, आखिर वह बेहोश हो गया, तकनीक उसकी कोई मदद नहीं कर पा रही थीं, वह पड़ा हुआ था अपनी मशीनों के बीच।

इधर तीन दिन से कोई खबर नहीं थी आरोग्य की, फोन कोई जवाब नहीं दे रहे थे, अक्षय ने उसके घर की तरफ कार मोड़ दी, बाहर से ही कुछ अनहोनी का अंदेशा जाने क्यों हुआ, घंटी की जरूरत कभी नहीं होती थी, सेंसर से दरवाजे खुल जाते थे आज नहीं खुले, उसकी समझ में आ गया और उसने घर के चारों तरफ दौड़ कर किसी खुली खिड़की या दरवाजे को ढूँढने की कोशिश की, हार कर एक बड़ा पत्थर लेकर शीशे के दरवाजे पर दे मारा। पुलिस हेल्पलाइन पर फोन भी लगाया और घर के अंदर दाखिल हुआ, दो मिनट में पुलिस आई और एम्बुलेंस भी, उसे लेकर अस्पताल पहुँच गया। आरोग्य के घर भी फोन लगा दिया। डॉक्टरों ने तुरंत केस की जांच शुरू की, “न्यूरोलोजी का केस है, हमें दिमाग की जांच करनी होगी, लगता है मामला गंभीर है”, डॉक्टर्स ने पूरे छह घंटे जांच में लगाए।
 वह अस्पताल की लॉबी में बैठे बैठे उसे देख रहा था। दो दिन तक दवाइयों पर रहा वो, ज़िंदा था, भारत से आने में तीन दिन तो लगेंगे उसके घरवालों को, अक्षय ने सोचा।
पाँच सीनियर डॉक्टरों की टीम लगी थी उसके केस में, जब डॉक्टर्स ने उसे बुलाया और पूरी बात बताई तो वह सन्न रह गया, उसने कहा “डॉक्टर ऐसा कैसे हो सकता है, कोई फिर से अबोध नवजात शिशु जैसा कैसे हो सकता है”।
डॉक्टर ने कहा, “अक्षय तुमने जो पूरी बात आरोग्य के जूनून के बारे में बताई थी, उस जूनून ने ही इसे इस हालत में पहुँचा दिया है। उन्होंने दिमाग का एक्स रे बताया, जहां जहाँ परेशानियाँ थी, उस जगह पर लाल निशान थे, पूरे दिमाग, रीढ़ की हड्डी और पूरे शरीर की मैपिंग भी दिखाई, सभी जगह पर बड़े बड़े लाल निशान थे, डॉक्टर ने समझाया अत्यधिक तनाव की वजह से आरोग्य के न्यूरॉनस में गंभीर क्षति पहुँची है, जैसे सर्किट के तार उलझ जाते हैं, वैसे ही ये उलझ गए हैं, इसके दिमाग के तन्तु, ऊतक ब्लैक होल की तरह काम करने लगे हैं, दिमाग का वो हिस्सा जिसमें हमारी यादें, सेरीब्रम, जिसमें सीख, पढ़ाई लिखाई, भाषा स्टोर होती है वह खतम हो चुका है, तुम्हारी भाषा में कहूँ तो दिमाग रूपी कंप्यूटर की यह फाइल करप्ट हो गई जिसमें सारी जानकारियाँ थीं, यादाश्त खोने से लेकर चीजों को पहचानने तक अब दिमाग में कुछ नहीं हो रहा, इसकी हालत अभी अभी पैदा हुए बच्चे जैसी हो गई है, जिसे इस दुनिया की कोई खबर नहीं, अब उसे हर चीज फिर से, ए बी सी से शुरू करनी पड़ेगी। और यह होगा तब जब वह कोमा से बाहर आएगा”।
लेकिन ऐसा होने का कारण अक्षय ने पूछा, “आर्टिफ़िशीयल इंटेलिजेंस ने उसकी नेचरल इंटेलिजेंस को खतम कर दिया है, माय डीयर फ्रेंड तकनीक जब तक इंसान की गुलाम रहती है तब तक ठीक, जिस दिन इंसान उसका गुलाम हो गया, ऐसे ही ब्लैक होल बनते रहेंगे” उन्होंने अनमने ढंग से चिंता करते हुए कहा ।
“बहुत सामान्य सी बात है केलकुलेटर आने के बाद हम मन से करने वाले छोटे मोटे हिसाब भूल गए, फोन आने के बाद जो सैकड़ों नंबर याद रखते थे वह भूल गए, गूगल मैप के साथ रास्ते भूलने लगे, ठीक वैसे ही हर बात में तकनीक का साथ हमारी सामान्य बुद्धि को खा जाएगा, हम हर बात तकनीक से पूछकर उससे जानकर करेंगें, तो हमारी बुद्धि प्रज्ञा पर जंग लगनी तय है, तकनीक हमारे लिए है या हम तकनीक के लिए, ठीक है जीवन आसान किया है, लेकिन जीवन पूरी तरह उसपर निर्भर होगा तो ऐसे केस आते रहेंगे, दिस इज़ टेक्निकल पेंडेमिक डीयर, एण्ड नो वैक्सीनेशन कैन क्युर ईट, बट यस सेंसिबल यूज़, अलर्ट माइंड एण्ड टाइम लिमिट विल सेव द लाइव्स।

अक्षय एक ठंडी सांस भर कर वहीं बैठ गया, उसे इसी बात का डर था, “अब क्या होगा, क्या यह इतना उन्नत दिमाग, बिल्कुल अबोध बच्चे जैसा हो जाएगा, वह आरोग्य जिसे किसी रंग सुगंध को देख सूंघ कर कोई उत्सुकता नहीं होती थी, अब हर चीज को आश्चर्य से देखेगा जैसा एक शिशु देखता है, हर चीज को उसे फिर से समझना होगा, भाषा फिर से सीखनी होगी, क्या उसके भीतर एक शिशुवत जिज्ञासा जागेगी, हर चीज की जानकारी होने के भरम ने इंसान से उसकी स्वाभाविक जिज्ञासा छीन ली है, जब जो जानना चाहो उँगलियाँ घुमाओ हाजिर, तकनीक ने धीरे धीरे समय के साथ खुलने वाले रहस्यों, समय से होने वाले अनुभवों के बीच का समय खतम कर दिया है, और उस खतम हो चुके समय ने मनुष्य के जीवन से धैर्य, शांति, प्रतीक्षा उत्सुकता सब खतम कर दी है। सच कहते हैं वो बूढ़े अंकल अति हर चीज की बुरी होती है”।
उसने आरोग्य के सिर पर हाथ फेरा और पूछा “क्या कोई संभावना नहीं”।
“संभावना क्यों नहीं, मेडिकल साइंस कभी उम्मीद नहीं छोड़ता, हाँ मुश्किल है कितना व्यक्त लगेगा बताना मुश्किल है”, डॉक्टर ने कहा।
“आरोग्य, आरोग्य” की आवाज सुन वे चौके, भारत से आरोग्य के माता पिता और भाई या गए थे, अक्षय ने पाखी को भी फोन कर दिया था, रुदन सिसकियों के बीच सब बात बताई अक्षय ने। 
शाम को मिलने का कह कर डॉक्टर वहाँ से चले गए, दिन भारी था, बाहर बर्फ की चादर ने सब ढँक लिया था, कोहरा घना था, पाखी ने कहा, “स्नो कवर्ड ऑल सीन्स एज़ टेक्नॉलजी कवर्ड आरोग्यास मेमोरी”, नई अक्षय।
अक्षय ने धीरे से उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “इफ विन्टर कम्स, कैन स्प्रिंग बी फार बिहाइन्ड?
डॉक्टर ने अंदर घुसते हुए कहा, “एक्सेक्टली, होप इस द बेस्ट रेमिडी”,
पाखी ने पूछा, “डॉक्टर, क्या, कितनी उम्मीद है”।
“पोसीबीलीटीस आर इन्फनाईट, सो एज़ द टाइम {संभावनाएं अनंत है, और समय भी}।
कितना समय लग सकता है, बताना कठिन है, दवाएं अपना काम करेंगी, नेचर अपना, बहुत संभव है कि किसी दिन किसी पुरानी याद, कोई पुरानी सुगंध, कोई पुराना स्वर, दृश्य देखकर कोई इग्निशन हो जाए न्यूरॉनस में और वह छोटा सा स्पार्क दिमाग की मशीन को फिर से चालू कर दे, लेकिन यह कब होगा यह बताना मुश्किल है, इसलिए इसे ले जाईए घर, धीरे धीरे कोशिश कीजिए, पुराने समय की यादों को, चीजों को याद दिलाने की, लेकिन बिना तनाव दिए, नियमित जांच के लिए आते रहना होगा”।

आरोग्य को घर ले आया गया, लेकिन यह क्या घर का नक्शा बदल दिया गया था, खिड़कियां खोल दी गईं थीं, भारी परदे हट दिए थे, जरूरत की मशीनों के अलावा, सारी मशीन बंद कर दी गईं थीं, घर में आरोग्य की पसंद के असली रंग जो तकनीक के जूनून के पहले उसके जीवन में सच में थे, घर की दीवारों पर थे, तस्वीरें नई थीं, पेड़ पौधों की एक पूरी बगिया माँ ने लगा ली थी, उसके विदेशी घर में उसके बचपन का, भारत का घर सांस लेने लगा था, अब हर रोज उसकी पसंद के पकवान की खुशबू घर में तैरती, माँ उसकी आँखों के सामने उन सब बातों को धीरे-धीरे दोहराती जो कभी उसकी ज़िंदगी का हिस्सा थीं, पिता उसके दोस्तों की तस्वीर और उसके घटनाक्रम की बात करते, पाखी और अक्षय रोज उससे मिलने आते, पड़ोस वाले अंकल जी उसे व्हील चेयर पर बैठा कर सैर करवाते और हर चीज उसे इस तरह दिखाते जैसे कोई दादा अपने नन्हे पोते को पहले पहल दुनिया से परिचित करवाता है, देखो वह बर्ड है, देखो डॉगी, यह हरे रंग का पत्ता, लाल फूल, यह एप्पल है, कहते जाते, वह सूनी आँखों से सब देखता रहता, कहीं कोई हलचल नहीं। माँ पिता और सभी उसकी आँखों में परिचय की एक झलक के लिए दिनरात लगे रहते, कोशिश करते कोई खुशबू, कोई रंग, कोई दृश्य, कोई याद, कोई गीत, कोई लोरी, उसके सोये हुए, खोए हुए सिरे तक जा पहुँचे और और वहाँ से धीरे धीरे वह अपनी स्मृति के गलियारे में फिर से चहलकदमी कर सके। ईश्वर से मन्नतें मांगते-मांगते, कोशिश करते करते पूरे दो साल बीत गए, आरोग्य ज़िंदा था, लेकिन चैतन्य नहीं। 

उस सुबह जब माँ उठी तो खिड़की से झाँककर देखा, पिछले कई दिनों से हो रही बर्फबारी के बाद आज तेज धूप निकली थी, अदरक की चाय बना, दोनों पति पत्नी आरोग्य के सिरहाने ही बैठे थे, आरोग्य के पिता ने देखा इन दो वर्षों में ही उनकी पत्नी मानों बीस बरस ज्यादा बुढ़ा गई है, दुख उम्र की रेखाओं को गहरा कर देता है, खुद अपने आप में वे कमजोर महसूस करने लगे थे।

बाहर धूप खिली थी उनकी फ्रेंच विंडो से बाहर का नजारा दिखाई दे रहा था, प्रकाश के परावर्तन से दूर इंद्रधनुष दिखने लगा था, वे भी निर्लिप्त से उस इंद्रधनुष को देखने लगे कि तभी अचानक आरोग्य की दिमागी तरंगों को महसूस करने के लिए लगी मशीन में से बीप की ध्वनि सुन वे चौंके, आज पूरे दो बरस बाद उनको यह आवाज सुनाई दी, देखा तो आरोग्य की सुनी आँखों में चमक थी, उसने खिड़की के बाहर के इंद्रधनुष को देख प्रतिक्रिया दी थी, पिता ने दौड़कर डॉक्टर को फोन लगाया डॉक्टर तुरंत पहुँचे, सारी जांच करने के बाद डॉक्टर ने एक धीमी मुस्कुराहट के साथ कहा, “शायद ईश्वर को हम पर दया या गई है, आरोग्य के न्यूरॉनस में हलचल हुई है, कुछ कोशिश करने पर शायद हम पुरानी स्थिति में आ सके, कुछ कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन उम्मीद रखिए”।
पाखी ने आरोग्य का हाथ अपने हाथ में ले लिया, माँ ने उसका सिर चूम लिया और पिता ने झट से सारे दरवाजे खिड़की खोल दिए, पड़ोसी अंकल व्हील चेयर ले कर खड़े थे, “चलो, चलो आरोग्य आज इंद्रधनुष देखेंगे है ना”, 
 “उसके रंग भी, बेजानीहपीनाला, जानते हो अंग्रेजी में vibgyor कहते हैं, सबसे नीचे वाला लाल उसके बाद… अंकल की आवाज धीरे धीरे धीमी होती जा रही थी, और उसे लेकर जाते देखते हुए माता पिता, पाखी, अक्षय की आँखों में आशा का नया रंग दमक रहा है।
***

परिचय:
सहायक प्राध्यापक, अंग्रेजी साहित्य,
अंग्रेजी भाषा में पाठन, पठन किन्तु मातृभाषा हिन्दी में लेखन को प्राथमिकता।
बचपन से पठन पाठन, लेखन में रूचि, गत 8 वर्षों से लेखन में सक्रीय, कई कहानियाँ, व्यंग्य, कविताएँ व लघुकथा, समसामयिक लेख, ललित निबंध, समीक्षा नईदुनिया (नायिका, तरंग,अधबीच मेरा प्रदेश ),जागरण, पत्रिका, हरिभूमि, दैनिक भास्कर, फेमिना, अहा ज़िन्दगी, वागर्थ, किस्सा, सरस्वती, साक्षात्कार, विभोम स्वर, शब्द प्रवाह, वीणा, समावर्तन, शिवना साहित्यिकी, स्वदेश, प्रजातन्त्र, अमर उजाला, नवनीत, प्रभात खबर, प्रतिलिपि, वाङ्गमय, क्षितिज, विश्व लघुकथा कोश, गद्य कोश मातृभारती, पुरवाई, इंद्रदर्शन, में प्रकाशित। सुबह सवेरे भोपाल में 2 वर्ष तक नियमित स्तम्भ लेखन, वाङ्गमय पत्रिका में किन्नर जीवन पर कहानी प्रकाशित जिसका अंग्रजी व उर्दू में अनुवाद कार्य प्रगति पर, वेबदुनिया न्यूज़ पोर्टल पर नियमित लेखन, कुशल मंच संचालक, वक्ता। 
शोध ग्रंथ “द नॉवल एज़ हिस्ट्री: पोस्ट 1980 नॉवल्स ऑफ नयनतारा सहगल” पर शोध उपाधि।
“एरिस्टॉटल: द क्रिटिक” विषय पर स्नातकोत्तर वर्ष लघु शोध ग्रंथ
एक कहानी संग्रह ‘दो ध्रुवों के बीच की आस’ 2019 में प्रकाशित।

आकाशवाणी से कहानियों का प्रसारण, कई राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय गोष्ठियों में शोध पत्र का वाचन।
विभिन्न विषयों पर वक्तव्य हेतु वक्ता के तौर पर आमंत्रित।
इंदौर में निवास।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।