कहानी: क्रोंच (पद्मनाभ त्रिवेदी)

पद्मनाभ त्रिवेदी

"इंटरनेशनल कांफ्रेंस ऑन क्रिटिकल इंक्वायरी इंटू इको क्रिटिसिज्म्स” वैभव ने बिल्डिंग पर टंगे बैनर को मन में पढ़ा, पीठ पे अपना बैग संभाला और बिल्डिंग के अन्दर चला गया। उसने काला चश्मा लगा रखा था।

अंदर विवेकानंद हाल खचाखच भरा हुआ था। आगे की रो पर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर्स बैठे थे उसके पीछे की रो टीचर्स और असिस्टेंट प्रोफेसर्स के लिए थी जिस पे एक तरफ़ पुरुष बैठे थे दूसरी तरफ़ महिलाएं। वैभव को काला चश्मा पहन कर जाना थोड़ा अटपटा लग रहा था लेकिन फिर भी उसने लगा रखा था। उसने गेट से ही देखा हॉल भर चूका था। वह लोगों की नज़र में कम से कम आना चाहता था इसलिए दबे पाँव, थोड़ा झुककर गया और दूसरी रो में एक किनारे बैठ गया। बगल में बैठे दूसरे अजनबी टीचर से औपचारिक ‘हेलो' किया, और अपने लेदर बैग को गोद में लेकर डायस की तरफ़ देखने लगा। इनॉग्रेशन शुरू होने वाला था। 

फिर उसने बाईं ओर देखा कि आकांक्षा है या नहीं। आकांक्षा थी। उधर देखते ही उसने नज़र बदल ली।

वैभव आईआईटी में कुल आठ महीने पहले असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्त हुआ था और आकांक्षा दूसरे आईआईटी में कुछ दिन पहले ही। दोनों ने एक दूसरे को बधाई तक नहीं दी थी। पर एक जिज्ञासा जरूर थी। वैभव वैशाली के टच में था। उससे उसे आकांक्षा की बातें भी पता चलती थी। पर वह कभी भी आकांक्षा के बारे में वैशाली का सुझाव या  राय न तो मांगता था न मानता था। बस यूहीं पूछ लेता, और उसके बताते ही विषय बदल देता। उसी से पता चला था की आकांक्षा भी कांफ्रेंस अटेंड कर रही है। जब तक उसे ये पता चलता, उसका पेपर प्रेजेंटेशन के लिए एक्सेप्ट हो चुका था और उसने फीस भी भर दी थी। काफ़ी सोचने के बाद उसने जाना ही तय किया था।

उलझनों से भरा अतीत कितना ही सुंदर क्यूं ना रहा हो, उसका भार असह्य हो जाता है जिसका उपाय उससे दूरी बनाकर रहने में ही है। 

कुलगीत गाया जा चुका था। उसने साथ साथ ही गाया था। पर बीच बीच में उसकी नज़र अकांक्षा की तरफ चली जा रही थी। लाइट ग्रीन साड़ी में हल्की नीली बिंदी लगाकर बेहद सुंदर लग रही थी वह। 

खोई हुई  चीज़ जब सुंदर लगती है तो एक अजीब सी टीस पैदा होती है अंदर कहीं। वही अभाव का एहसास है। उसे वही टीस महसूस हुई। उसने फिर उसकी तरफ़ न देखना ठाना।

पहला कीनोट स्पीच शुरू हो चुका था। सब ध्यान से सुन रहे थे। वैभव अपने अतीत की खुदाई करने में लग चुका था।

एम ए में आने के बाद पहले दिन जब वैभव क्लास में आया था, उसकी उड़ती सी नज़र आकांक्षा पर गई जो जींस और कुर्ती पहने आगे की बेंच पर कुछ पढ़ रही थी। वह अच्छी लगी पर उसने इस बात को खुद से ही ख़ारिज कर दिया। धीरे धीरे दो सेमेस्टर्स गुजर गए दोनो में बहुत कम बात चीत हुई थी। हुई भी तो किसी न किसी काम से ही। तीसरे सेमेस्टर की शुरुआत में जब सारे बच्चे कैंपस आ गये तो वैभव ने सबसे बात करके लखनिया दरी घूमने का प्लान बनाया। उसने आकांक्षा से भी पूछा। पहले तो उसने मना कर दिया जो वैभव को बुरा लगाए पर क्लासेज खतम होते टाइम उसने पीछे से उसे बुलाकर पूछा "कितने पैसे देने होंगे?” वैभव के बताने पर उसने 400रूपए देदिये और ख़ुद को काउंट करने के लिए बोला। 

स्पीकर बड़े ही ओजपूर्ण ढंग से इकोक्रिटिसिज्म के पूर्वाग्रह पर बोल रहे थे। लोग शांत चित्त सुन रहे थे। वैभव ने चश्मे के अंदर से बाईं ओर देखा, आकांक्षा नोट्स ले रही थी। उसने भी एक दो नोट्स लिए और फिर अतीत में फिसल गया|

ट्रैवलर में अकांक्षा और वैशाली वैभव की सीट के पीछे बैठे थे। वैभव दोस्तों से बातें कर रहा था पर अकांक्षा के क्रियाकलापों का आभास लगातार कर रहा था। लखनिया दरी आ गया था। सड़क से नीचे एक रास्ता गया था जहाँ से होकर सबको झरने तक जाना था। वैभव पहाड़ियों को देखकर खुश हो रहा था, इससे भी ज्यादा खुशी उसे अकांक्षा के होने की थी।

झरने के पास पहुँच कर सबने फोटो खिंचवाई जिसमें अकांक्षा सबसे किनारे थी और दूसरे किनारे वैभव। सब लोग अपना अपना टिफिन लेकर गए थे, पर वैभव के हॉस्टल में टिफिन तो दूर दो वक्त का खाना भी नियमित रूप से मिलना बड़ी बात होती। 

अकांक्षा अपने पीजी से टिफिन लेकर आई थी। वह भांप रही थी की वैभव टिफिन नहीं लाया। उसने धीरे से उससे पूंछा "तुम्हें आलू के पराठे से एलर्जी न हो, तो मेरे साथ टिफिन शेयर कर सकते हो।" उसके बोलने में गंभीरता के साथए थोड़ा मसखरेपन का पुट था, जो वैभव ने पहली बार देखा था। "अरे न न, आलू के पराठे तो पहला प्यार हैं मेरा।" और वो हंस दिया। दोनो ने पराठे खाए कुछ कुछ बातें हुई। बगल में झरना शोर मचाते हुए गिर रहा था। सूरज पहाड़ी के पीछे जाते हीए सांय सांय की आवाज़, हल्का अंधेरा और झरने का शोर मिलकर एक हल्का डरावना सा माहौल बनाने लगे थे। फिर से फोटो खींची गई और सब पत्थरों के रास्ते वापस चल दिए। 

बाहर पहाड़ियाँ थोड़ा खुली थीं। सब अलग अलग पत्थरों पर बैठ गए। वैभव पानी के अंदर सपाट पत्थर पर बैठने चला गया। वहाँ झरने का छिछला पानी सीढ़ी नुमा पत्थरों से होकर नीचे जा रहा था और कल कल की मधुर आवाज आ रही थी। अकांक्षा ने जींस फोल्ड की और आकर वैभव के बगल में बैठ गई। और फ़िर थोड़ा हंसकर बोली, "कोई ऐतराज़?” "मुझे तो नहीं, पर इस पत्थर से पूछ लो जिसपे आप बैठे हो।" उसने कहा और हल्का मुस्कराया अकांक्षा भी मुस्करा दी। थोड़ी देर दोनो चुप रहकर बातें ढूंढते रहे। 

"तुम कविताएँ अच्छी लिखती हो।" एकाएक वैभव ने कहा।

"अच्छा! थैंक्यू!” उसने थैंक्यू को थोड़ा लम्बा खींच कर बोला और सामने देखने लगी। "तुमने फ्रेशर्स पार्टी में जो कविता पढ़ी थी, जिसकी आखिरी लाइन थी ‘सपने हमेशा उड़ान नहीं देते, कभी कभी हकीकत को खा जाते हैं।‘ मुझे बहुत अच्छी लगी थी।" वैभव ने कहा। अकांक्षा बोली "शुक्रिया शुक्रिया! अरे वह तो वैशाली है जिसने सीनियर्स को मेरा कविता लिखना बता दिया था और उन्होंने अनाउंस कर दिया।" 

"तुम इतना अच्छा लिखती हो, फेसबुक वगैरह पे पोस्ट क्यों नहीं करती?” वैभव ने उत्सुक होकर पूछा।

"मुझे ये छिछला लगता है। लोग बिना समझे लाइक करेंगे, कमेंट करेंगे। उससे भी ज्यादा मुझे ये अपने लिखे से गद्दारी लगता है। बस यही।" अकांक्षा थोड़ा विचार करके बोली।

"अच्छा क्या मैं तुमसे एक रिक्वेस्ट कर सकता हूँ?” वैभव हिचकिचाकर बोला।

"हाँ, पर मानना न मानना मेरी मर्जी।" अकांक्षा हंसी।

"एक कविता सुना दो अपनी, प्लीज, प्लीज मना मत करना।" वैभव ने आग्रह किया।

"हम्म्म… ये मेरे लिए मुश्किल होता है। पर ठीक है देखती हूँ। मैंने आज कुछ लिखा है वही सुनाती हूँ।"

वैभव ओके बोलकर इंतजार करने लगा।



"दो ऊंची लंबी पहाड़ियों के बीच
शान्त बहती पानी की धारा
कितना कुछ याद दिलाती है
शहर की ऊंची ऊंची इमारतों के बीच
सड़कों पर 
चलते फिरते लोगों की।

ये पत्थरों से बने हैं
वो कंक्रीट के बनाए गए‌ शहर।

पर हम इन्सान जल ही हैं
जो इसी झरने की तरह 
न जाने कहाँ से आकर 
अपने आने को महसूस कराते हैं 
एक शोर के साथ,
फिर कितने ही 
शम विषम रास्तों,
कूलों से होकर
अज्ञात, शान्त बहते रहते हैं
और फिर उसी शान्ति के साथ
अपने गंतव्य पे खो जाते हैं
हमेशा के लिए।

अच्छा लगता है
अपने जीवन को देखना
उस शोर और शान्ति के बीच
जो आरंभ और अंत में हैं
शाश्वत।"

और अकांक्षा ने फोन की स्क्रीन ऑफ कर ली।

"कितना अच्छा लिखती हो तुम। तुम किताब छपवाना।" वैभव ने कहा।

स्पीच खतम होने को आया था। स्पीकर निष्कर्ष पर बोल रहे थे, "हेंस, ईट इज अर्जेंट तो थिंक टुवर्ड्स डेवलपिंग इको क्रिटिसिजम्स इंस्टेड ऑफ फॉलोइंग ए मोनोलिथिक वेस्टर्न इकोक्रिटिज्म।"

आखिरी बात कहते हुए उन्होंने पोडियम पकड़ कर अपने सिर से हवा में एक गोला बना दिया। लोग बड़े प्रभावित हुए और तालियों से हाल गूंज उठा।

दोपहर के खाने का समय बोला जा चुका था। सब उठकर चलने लगे थे। अकांक्षा उठकर थोड़ा रुकी, और फिर बाहर चली गई। वैभव प्रोफेसर्स से मिलने के बहाने रुक गया। कई सारे टीचर्स उसे जानते थे क्यों उसी यूनिवर्सिटी से उसने बी ए और एम ए किया था। वैभव अकांक्षा से मिलना नहीं चाहता था। कोई डर सा था अंदर, एक कायरता उसे घेर रही थी। वह देर से बाहर गया, अकांक्षा बफे से अपना खाना लेकर खा रही थी और एक दो लोगों से बात कर रही थी। वैभव ने अपनी प्लेट लगाई और एक कोने में जाकर खाने लगा। थोड़ा रुककर अकांक्षा भी उधर आई। उसे आते देख वैभव को अपने अंदर अजीब सी असहजता रेंगती महसूस हुई। आते भी उसने पूछा

"चश्मा क्यूं लगा रखा है?”

"आँख आई है। तो सोचा लगा लूं।" ऐसे सीधे सवाल की उम्मीद नहीं थी वैभव को। उसका यूं पूछना जैसे अतीत में कुछ हुआ ही न हो, वैभव को थोड़ा चुभा।  फिर कुछ वो रुककर बोला, "कैसी हो तुम? कब आई थी बनारस?”

"ठीक हूँ। कल ही आई। पेपर प्रेजेंटेशन तो अभी है न तुम्हारा?” उसने पूछा

"हाँ। अभी लंच के बाद।" उसने खस्ते का आखिरी कौर खाते हुए कहा। वो जल्दी से खाना खतम करना चाहता था।

"मैं रहूँगी तुम्हारे प्रेजेंटेशन में। बाय द वे मेरा कल है। लंच के बाद।" अकांक्षा बोली। वैभव हाथ धुल चुका था।

"हाँ। इटिनरेरी में पढ़ा था।" वैभव बोला। वह असमंजस में था। वह बात करना चाहता भी था और नहीं भी। उसे समझ नहीं आ रहा था की बात क्या करे। 

"तुम अभी भी कविताएँ लिखती हो?” उसने साहस समेटकर पूछा।

"हाँ। मेरे दो काव्यसंग्रह आए हैं। एक ‘उस पार तुम' और दूसरा ‘राग एकाकी'।" अकांक्षा ने कहा और कुछ क्षण दुसरी तरफ़ देखने लगी। 

'उस पार तुम' काव्य संग्रह में पहली कविता यही थी। कितनी बार वह पढ़ चुका था इस कविता को। ये दो किताबें उसकी लाइब्रेरी से ज्यादा उसके बेड के सिरहाने रहती थीं। पर वो अभिनय ऐसे कर रहा था जैसे उसे उन काव्य संग्रहों के बारे में न कुछ पता हो और न ही दिलचस्पी। 



अकांक्षा के मुँह से ‘उसपार तुम' सुनकर उसे अस्सी घाट की वह शाम याद हो आई जब उसने यह कविता पहली बार सुनाई थी__

लैंप पोस्ट जल चुके थे। आरती हो चुकी थी। अस्सी घाट के नीचे जाकर दोनों गंगा किनारे तखत पर बैठे हुए थे। बातें नहीं हो रही थीं एक चुप्पी पसरी थी। अचानक आकांक्षा ने कहा__

"मैंने कुछ लिखा है। तुम सुनोगे?” उसने पहली बार अपनी तरफ़ से कुछ सुनाने को कहा था। 

वैभव ने कहा "हाँ। बिलकुल।नेकी वो भी पूछ पूछ।"

अकांक्षा ने वर्ड फाइल खोली-

"जब तुम मेरा हाथ थामे
गंगा के इस पार बैठे होते हो
और मैं चुप्पी साधे
देख रही होती हूँ
उस पार की अकेली रेत को
दूधिया चांदनी से आच्छादित,
मैं तुम्हें उस पार देखना चाहती हूँ।

मैं तुम्हारे बहुत क़रीब हूँ
इसीलिए लिए तुम्हें दूर रखना चाहती हूँ।

तुम्हारे साथ रहकर तुम हो जाना
मुझे पसंद है,
पर इसमें कुछ दफन है
शायद एक टीस या ग्लानि,
टीस मेरे ‘मैं' न रहने की।

मैं तुम्हें जीना चाहती हूँ
पर तुम्हारे साथ रहकर तुम हो जाना
एक त्रासदी है,
फिर मैं तुम्हें नहीं देख पाती
देखती हूँ,
गंगा को, वो मंथर बहती नाव को,
इन घाटों को,
सुदूर बिछी रेत को।

कितने सुंदर हो तुम मेरी कल्पना में!

मैं तुम्हें लिखना चाहती हूँ।

इस पार से कहीं ज्यादा सुंदर
कहीं ज़्यादा मेरे अपने हो,
उस पार तुम।"

अकांक्षा ने फोन की स्क्रीन ऑफ की और वैभव की तरफ़ देखा। उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। चुपचाप गंगा में एकटक देखता रहा। माहौल की शान्ति थोड़ा और गंभीर हो गई थी। चुप्पी तोड़ते हुए वो बोला-

"क्या, इस कविता का मतलब भी यही है? क्या इसका पात्र मैं ही हूँ?”

"हाँ। पता नहीं क्यों मेरे हिसाब से यही है।" उसने थोड़ा ठहरकर कहा।

"मेरा न होना, होना कैसे हो सकता है?” वैभव ने थोड़ा खींचकर पूछा ।

"हो सकता है। ये तुम्हारा न होना नहीं है बल्की तुम्हारा न मिलने वाला होना है। एक अप्राप्य तुम। जिसमें तड़प हो बिछड़न की, कल्पना की चासनी में डूबी हों सारी अच्छी यादें।" अकांक्षा ने उसका हाथ कसके पकड़कर, धीरे धीरे समझाने के लहजे में कहा।

"अक्कू! क्या तुम्हारी कविताएँ मेरा इस्तेमाल करती हैं? क्या तुम मेरा इस्तेमाल करती हो अपने लेखन के लिए?” वैभव चेहरे पर बिना किसी भाव के, अकांक्षा की आँखों में उत्तर तलाश रहा था।

"नहीं वैभव।  मैं बस अपने एक साथ होने को बचाकर रखना चाहती हूँ, उसे और सुन्दर बनाना चाहती हूँ। पर ये हकीकत की दुनियाँ में नहीं होता। इसीलिए मैं तुम्हें कल्पना में जीना चाहती हूँ, तुम्हें लिखना चाहती हूँ।" उसने वैभव की बांह पकड़ते हुए कहा।

"हम्म्म…। कल शाम नाव से आरती देखने दशाश्वमेध चलेंगे अगर तुम फ्री रहे।" वैभव ने बात बदलते हुए कहा

"हाँ, कल देखते हैं न।" अकांक्षा ने कहा और वैभव के कंधे पर सर झुका लिया।

वैभव ने बात जरूर बदल दी थी लेकिन अकांक्षा की कविता उसके दिल में घर कर गई थी जिसमें एक डर बस गया था। अकांक्षा को न पा पाने का डर। वह कभी कह नहीं पाया था, पर अकांक्षा को खोने का सोचना भी उसके लिए असह्य था। 

लंच टाईम ख़त्म हो चुका था। वॉलंटियर्स सबको अंदर जानें को बोल रहे थे। वैभव ने अकांक्षा से अचानक कहा,

"मेरा प्रेजेंटेशन अभी है तो मुझे जाना होगा।"  ये कहकर वो चलने को ही था की आकांक्षा ने कहा,

"अरे मैं भी तो वहीं चल रही। साथ चलते हैं।" 

और दोनों बड़ी सी फील्ड के बीच से होकर एनी बेसेंट हॉल की ओर चल दिए। उस फील्ड से देखने पर आर्ट्स फैकल्टी की बिल्डिंग लेटे हुए ‘M' आकार की लग रही थी। वैभव बात करने में अजीब असहजता मेहसूस कर रहा था। बहुत खोजकर वो बोला,

"अपनी आर्ट्स फैकल्टी कितना बदली बदली सी लग रही अब।"

"ह्म्म्म्म…। बिलकुल तुम्हारी तरह।" अकांक्षा ने माहौल हल्का करने की कोशिश की।

वैभव के मन में आया की कहे ‘मेरी तरह नहीं अक्कू, अपनी परिस्थितियों की तरह'  पर उसने बोलने की जगह हल्की बनावटी मुस्कान देदी और एनी बेसेंट हॉल आगया था। एंकर ने फिर से सबका स्वागत किया और पहले प्रेजेंटेशन के लिए वैभव का नाम अनाउंस किया।

वैभव ने अपने बैग से कॉम्पैक्ट लैपटॉप निकाला और लेकर पोडियम पर पहुँच गया। उसने अपना चश्मा निकालकर पॉकेट में रखा और पीपीटी खोलकर, अभिवादन करके उसने शुरु किया,

‘थिंकिंग ऑफ ऑल्टरनेटिव इको क्रिटिसिजम् इन इंडियन कॉन्टेक्स्ट' विषय पर उसने बेहतरीन पेपर प्रेजेंट किया जिसके केंद्र में जलवायु परिवर्तन और भारतीय किसानों पर उसका असर था। विषय एकदम नया था। इसपे काम भी बहुत कम हुआ था। पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा। वैभव ने लैपटॉप डिस्कनेक्ट किया, चश्मा लगाया और वापस अपनी सीट पर बैठ गया। तिरछे सामने वाली सीट पर अकांक्षा बैठी थी। उसने वैभव को बैठते देखा, फिर थोड़ा पास आकर उसने कहा,

"इट वास ए वंडरफुल प्रेजेंटेशन ।"

 वैभव ने मुस्कराकर ‘थैंक्स ए लॉट' कहा। और फिर दोनों अगले प्रेजेंटर्स को सुनने लगे।

अकांक्षा का दाहिना गाल सामने दिख रहा था। उसकी ठुड्ढी के पास का तिल वैभव को बहुत पसंद था। अभी वो हल्का हल्का दिख रहा था। उसे याद आया_

दोनों इलाहाबाद से इफ्लू पीएचडी एंट्रेंस एग्जाम देकर बस से वापस बनारस आ रहे थे। अकांक्षा वैभव के कंधे पर सर रखे सो रही थी। वैभव ने अपना दाहिना हाथ उसके सर से लपेटकर, उसके बालों में उंगलियाँ फेरने लगा। हिम्मत करके उसके तिल को छुआ। फिर उसने धीरे से कहा 

"अक्कू।"

"ह्म्म्म” वो बिना सिर उठाए अलसाई सी आवाज़ में बोली।

"मैं तुम्हारे तिल को चूमना चाहता हूँ।"उसने बोल डाला।

"नहीं।" उसने अलसा ढंग से कहा और उसका हाथ पकड़कर अपनी गर्दन से लपेट लिया और फिर दोबारा कहने की वैभव की हिम्मत नहीं हुई और रास्ता कट गया।

आखिरी प्रेजेंटेशन ख़त्म होने को था। अकांक्षा मुड़ी और पूछा,

"चाय पीने चलोगे?”

"कहाँ?” वैभव ने सचेत होकर पूछा।

"वही अपने भैयाजी के वहाँ।" उसने हल्का सा हंस के कहा।

"हाँ, चलो। उधर से ही मुझे बिड़ला हॉस्टल जाना है।" उसने अपने जाने की बात पर न जाने क्यों जोर देकर कहा।

 आर्ट्स फैकल्टी के बगल में ही भैयाजी की दुकान थी। बहुत दिनों से वही चला रहे थे उसे इसी लिए बहुत सारे बैचेस के लड़के उन्हें और वो उन्हें जानते थे। वैभव और अकांक्षा को आते देख भैयाजी ने दुआ सलाम किया और दो दूध पत्ती चाय बनाकर भिजवा दी।  

दोनों आम के नीचे बेंचनुमा पत्थर पर बैठे थे। बातें दोनों को आसानी से नहीं आ रही थीं। 

"तुम हॉस्टल में रुक रहे? किसके साथ?” अकांक्षा ने पूछा।

"हाँ। एक जूनियर है मेरा।" वैभव ने जवाब दिया फिर पूंछा,

"आंटीजी कैसी हैं?”

"ठीक हैं। एक साल और बचा है रिटायरमेंट में उनके।" अकांक्षा ने चाय के कुल्हड़ में देखते हुए कहा और फिर एकाएक पूछा

"तुमने मेरी किताबें पढ़ी हैं न?”

"नहीं । नहीं पढ़ी हैं। मुझे पता नहीं था की तुमने प्रकाशित भी करवा ली हैं।" ये झूठ उसे ऐसा झूठ लगा जो पहले से पकड़ा जा चुका था। 

वह बात बदलने के लिए कुछ ढूंढ ही रहा था कि अकांक्षा ने अपने बैग से अपनी दोनों किताबें निकाली और ‘राग एकाकी'  के शुरुआती कोरे पन्ने पर कुछ लिखने लगी। वैभव चाय पीने में व्यस्त होने का अभिनय करने लगा। अकांक्षा ने अपनी दोनों किताबें बंद बंद की और वैभव की तरफ़ बढ़ाकर कहा,

"ये लो मेरी तरफ़ से तुम्हारे लिए।" उसने हल्का सा संकोच करते हुए कहा। 

"अरे नहीं नहीं। मैं लेलूंगा न। एमेजॉन पे तो होगी ही।" उसे संकोच भी हुआ और एक डर भी। उसके पास तो दोनों किताबें थीं। लगभग सभी कविताओं के शीर्षक उसे याद थे। उसे याद था पहले संग्रह में 59 और दूसरे में 73 कविताएँ थीं। 

"पर वो मेरे हाथ से नहीं मिलेंगी न, तो प्लीज लेलो।" अकांक्षा ने प्रभावी ढंग से कहा।

 वैभव ज्यादा कुछ बोल नहीं पा रहा था। उसने दोनों किताबें ली, उन्हें देखा और अपने बैग में रख लिया और थैंक्यू कहा।

दोनों की चाय ख़त्म हो चुकी थी। अकांक्षा ने पूछा

"शाम में अगर फ्री हो तो डिनर पे चलते हैं?” काफ़ी देर से ये पूछना चहती थी वो।

"आज तो नहीं हो पाएगा। एक सर से अपॉइंटमेंट है। घर जाना है उनके।" वैभव ने बहाना बनाया।

"कल? कल तो चल सकते हो न?” अकांक्षा ने आग्रह के अंदाज़ में पूछा। 

"हाँ। कल ठीक है।" वैभव के पास ये कहने के सिवाय कोई विकल्प नहीं सूझा। "तुम्हारा प्रजेंटेशन कितने बजे है वैसे कल?” उसने जोड़ा।

"सुबह ग्यारह बजे। तुम रहोगे न? वैसे मेरा इकोलॉजिकल रिफ्यूजीज पे है।" अपना ख़ाली ग्लास पत्थर पर रखते हुए वो बोली।

"हाँ, रहूँगा। मुझे बहुत इंटरेस्ट है इस एरिया में।" वह ये भी कहना चाहता था की अमिताव घोष के उपन्यासों में तो बड़ा महत्वपूर्ण बिन्दु है ये, पर उसने कहा नहीं। 

"अच्छा, तो कल मिलते हैं फिर।" अकांक्षा माहौल को भांपते हुए बोली। 

वैभव भी वही बोलने वाला था। उसने हाँ कहा। और एक ऑटो रुकवाकर अकांक्षा को लंका गेट के लिए बिठा दिया। और ख़ुद बड़े बड़े इमली के पेड़ों के नीचे से टहलता हॉस्टल की तरफ़ चल दिया। 

उसका दिमाग उस बात पर अटका था आख़िर उसने किताब के पन्ने पर क्या लिखा है। वह तुरंत खोल कर पढ़ना चाह रहा था। पर उसका मन इस उत्सुकता को जीना चाहता था, तो उसने किताबों को अपने बैग में रखा और चुपचाप हॉस्टल चला गया। 

उसने फ़ोन देखा तो रवि का मेसेज आया हुआ था "चबिया बगलिया वाले रूमवा से लेलिहा भैया, हम घरे जात हई।"

उसे खुशी हुई। वह अकेले रहना चाहता था। रूम जाकर फ्रेशेन अप हुआ लेकिन उसने ख़ुद को वो किताब खोलने से रोका। और रूम बंद करके विश्वनाथ मंदिर चला गया। 

अकांक्षा से अलग होने के बाद, उसने यही सीखा था। खुद को रोकना। उसे कॉल करने से खुद को रोकना, उससे मिलने से खुद को रोकना, उसे देखने से, सुनने से, उस हर बात से ख़ुद को रोकना जिससे अकांक्षा को ये लग सके की वैभव अभी भी उसकी परवाह करता है। 

मंदिर के दाहिनी ओर यज्ञशाला के बगल में हरी घास थी। एक पेड़ से टेक लेकर वैभव बैठ गया। दूर से लोगों को आते जाते देख रहा था। बगल में कुछ दूर एक लड़का लड़की बैठे थे। देखने से कपल लग रहे थे। लड़का लड़की के हाथ पर बार बार एक सेमल का लाल फूल रख देता और लड़की उसको हंसते हुए या उसके ऊपर फेंक देती या इधर उधर रख देती। उसे आकांक्षा से वो खास मिलना याद आया।

दोनों गंगा के उस पार रेत में अपने अपने पांव धंसा कर बैठे थे। मई की शीतल सुबह थी, हवा ठंडी चल रही थी। एम ए का आखिरी सेमेस्टर खतम हो चुका था। अगले दिन सुबह अकांक्षा की ट्रेन थी। वो अपना हॉस्टल ख़ाली करके घर जा रही थी। 

अकांक्षा हमेशा ही जब कुछ बहुत सुन्दर देखती या मेहसूस करती, वह चुप रहती थी। वह अभी भी सुनहरी धूप में चमकते बनारस को, उसी चुप्पी के साथ देख रही थी। अचानक वो बोली_ 

"ये मीलों पसरी रेत देख रहे हो विभू! ये वो हिस्सा है जो हम जी सकते हैं।" और फिर उसने एक मुट्ठी भर रेत उठाई और हवा में मुट्ठी थोड़ी ढीली करके उसे नीचे गिरा दिया "और ये वो हिस्सा है, जो हम जीते हैं। और शायद केवल इतनी ही क्षणभांगुरता के साथ।" और वह फिर गंगा में देखने लगी। वह उदास थी। अगले दिन बनारस और यूनिवर्सिटी के साथ साथ बहुत कुछ पीछे छूट रहा था।

तभी वैभव ने एक मुट्ठी रेत उठाकर अकांक्षा के हाथ पर रख दी और कहा "अक्कू, ज़रा फिर से बताओ न कितना क्षणभंगुर और कम है अपना जीना।"

अकांक्षा ने एक बार उसके चेहरे की तरफ़ देखा और फिर हवा में रेत ढीली की। रेत गिरने के बाद उसकी मुट्ठी में कुछ फंस गया था। उसने देखा तो एक चांदी का सुन्दर छल्ला था और तब तक विभू उसके ठीक सामने अपने दोनों घुटनों पर आ गया था, और वह कहने लगा

"पाने की कोशिश किए बिना
कुछ ऐसा खो देने से
जो सब कुछ हो
कहीं बेहतर है
कोशिश करके खोना।"

और वैभव ने उसका हाथ पकड़कर, उसकी आँखों में जवाब ढूंढते हुए पूछा, "क्या मैं तुम्हारे लायक हूँ? क्या जीवन भर का साथ दोगे मेरा? मेरे बनोगे?”

अकांक्षा हतप्रभ सी थी। उसने इस सब की उम्मीद बिलकुल भी नहीं की थी। उसने हड़बड़ाकर पूछा,

"यह क्यों वैभव? सुनो, मुझे तुम्हारी फीलिंग्स की कद्र है। तुम बहुत अच्छे हो। पर मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकती।। हमारा साथ होना यहीं तक था।"

वैभव चुप हो गया। आज तक वह कभी इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाया था। उसने जानें कितने सपने देख रखे थे दोनो के साथ होने के। सब धराशाई होते देख वह बिलखकर बोला,

"अक्कू, ऐसा मत बोलो यार। प्यार करता हूँ तुमसे। तुम्हें खुश करने से मुझे खुशी मिलती है। मैं तुम्हें बहुत खुश रखूंगा। क्या तुम्हें मुझसे प्यार नहीं?”

"है। सच कहूँ तो बहुत है, बहुत ही ज्यादा। इसी लिए शादी नहीं करना चाहती तुमसे। क्योंकि शादी बंधन है। वहाँ प्रेम स्वच्छंद नहीं बल्की मजबूर होता है शादी के बंधन से। अक्सर प्यार का दम घोट देती है ये जकड़न।" उसने थोड़ा पेचीदा होते हुए कहा।

"इसका क्या मतलब हुआ अक्कू? अगर प्यार करते हो तो साथ रहो न।" वैभव ने आग्रह किया।

"क्योंकि मैं अपने प्यार को मरने देना नहीं चाहती। प्रेम की शुरुआत यकीनन प्रेम है पर अंजाम प्रेम नहीं प्रेम का भ्रम है जिसे ता उम्र हम प्रेम मानकर साथ जीते हैं, अगर साथ रहते हैं तो।" अकांक्षा ने तर्क, भावना और दृढ़ता को घोलते हुए कहा। वैभव चुप रहा। अकांक्षा फिर बोली_

"विभू, तुम बहुत अच्छे हो। तुम्हारी निशानी के तौर पर मैं ये अंगूठी रखूंगी और मैं तुम्हें इसके पैसे भी लेने नहीं बोलूंगी। पर, मुझे माफ करना, मैं ऐसी ही हूँ। मैं तुम्हारे लिए ठीक नहीं।" अकांक्षा समझाने के स्वर में आगई।

वैभव ने अपने धंसे घुटने रेत से निकाले, थोड़ा चल कर गया और गंगा में मुँह धुला फिर वापस आकर अकांक्षा के बगल में बैठ गया। और काफ़ी देर बाद बोला "अकांक्षा, मान लो ये आज की सुबह कभी हुई ही नहीं। आज का मेरा कहा सब भूल जाना प्लीज।" थोड़ी सी रेत मुट्ठी में पकड़ ली। 

"ह्म्म्म… यही बेहतर है विभू। मैं बहुत अलग हूँ। शायद वाह्यात।" और उसने वैभव के हाथ पे हाथ रख दिया।

 वैभव का मन किया वो हाथ हटा दे, पर उसने ऐसे किया नहीं। दोनों कुछ देर बिना कुछ बोले बैठे रहे। तब तक नाव आ गई थी। वैभव ने हाथ देकर अकांक्षा को उठाया और दोनों नाव में चढ़ गए।

अंधेरा बढ़ने लगा था। मंदिर में लाइट्स जल गई थीं। ऊपर लाउडस्पीकर में बेहद मधुर और मंद मंद कोई राग बजने लगा था जिसके शब्द समझ नहीं आ रहे थे। बगल का प्रेमी युगल भी जा चुका था। पीछे से मोर के बोलने की आवाज़ आई। वैभव उठा और मंदिर के पीछे से एक परिक्रमा कर के बाहर निकल आया। उसने एक कोल्ड कॉफी पी और वापस हॉस्टल की तरफ़ चल दिया। 

जब से वह बनारस आया, उसके दिमाग़ में आकांक्षा ही चल रही थी। सब कुछ ख़ाली ख़ाली सा जान पड़ रहा था।

जैसे वह चार साल पहले खिंच गया हो। उसने अपने दोस्तों को भी अपने आने के बारे में नहीं बताया था। उसे किसी से मिलने में कोई दिलचस्पी नहीं थी इस बार। 

वह चलते चलते एक पुलिया पर बैठ गया और अपना फ़ोन निकालकर व्हाट्सएप खोला। उसे आकांक्षा का फ़ोन नंबर याद था। चार साल में वो नहीं बदला था। उसने पहली बार उसका नंबर अपने फोन में सेव किया केवल ये देखने के लिए की वह व्हाट्सएप पर है या नहीं। जैसे ही उसके व्हाट्सएप पे क्लिक किया, वह ऑनलाइन दिखी। शायद उसने वैभव का नंबर पहले से सेव कर रखा था। उसके डीपी में एक सारस की फोटो लगी थी। 

उसका मन हुआ, कि उसे लिख के भेज दे "फ्री हो तो लंका पे चाय पीते हैं।" पर उसे अपॉइंटमेंट वाली बात पे झूठ बोलना पड़ता जो अब वो नहीं चाहता था। अचानक उसे याद आया की वह पिघल रहा है। चार साल से जिस कमजोरी, जिस घाव को उसने दबा रखा था, जैसे वह सब के सामने आ जानें वाली है। उसने तुरंत उसका फोन नंबर डिलीट किया। फोन किनारे रखा और माथे पर उंगलियाँ फेरते हुए एक लंबी सांस ली। उसने सोचा की उसे क्या रोक रहा है,

बनारस स्टेशन पे दोनों खड़े थे। ट्रेन आने में कुछ देर थी। अकांक्षा के चार बड़े बैग पास में रखे थे। वैभव बिलकुल भी ऐसा माहौल नहीं बनने देना चाहता था जिसमें बात करने की गुंजाइश हो। वो आहत था।

अकांक्षा बात करना चाहती थी। उसने वैभव का हाथ पकड़ा और एक टिफिन उसके हाथ में दिया। 

"ये‌ रख लो वैभव। तुम्हारे फेवरेट देशी घी के लड्डू हैं। मैं ने कल बनाए थे।" वैभव को समझ नहीं आ रहा था की वो क्या बोले। तभी आकांक्षा ने उसके हाथ से टिफिन लेकर उसके पिट्ठू बैग में डाल दिया। और कहा,

"वैभव, अब कब मिलेंगे?” वह भावुक हो रही थी। वैभव ने उसकी आँखों में देखा। उसका मन किया की अभी उसके गले से लिपटकर ज़ार ज़ार रो ले। सब कुछ कह डाले। उसे अपने सारे सपने बता दे जो उसके साथ होने के बारे में थे। पर उसने मुँह फेरते हुए कहा,

"देखते हैं…।" और चुप हो गया। फिर तुरंत कहा, "अभी आया” और जाकर उसके लिए पानी की बोतल और स्नैक्स वगैरह खरीद लाया। तब तक ट्रेन आकर खड़ी हो गई थी। दस मिनट का स्टॉपेज था। वैभव ने सामान चढ़ा कर रख दियाए और आकांक्षा को बर्थ पर बिठा दिया। ट्रेन छूटने ही वाली थी की आकांक्षा से चुप्पी बर्दाश्त नहीं हुई। वह वैभव से लिपट गई और उसके कॉलर में मुँह धंसा लिया। पहली बार उसने इस समर्पण के साथ उसे गले लगाया था। पहली बार उसने ‘लोग क्या सोचेंगे' की परवाह नहीं की थी। तभी ट्रेन ने हॉर्न दिया और रेंग पड़ी। वैभव ने जल्दी से अपनी जेब टटोली और एक छोटी सी पर्ची निकालकर हाथ में लेली तब तक अकांक्षा ने उसके माथे को चूम लिया था। 

वैभव को समझ नहीं आया। वह उतरने को हुआ, लेकिन फिर मुड़ा और इस बार अकांक्षा को जोर से हग किया और उसके हाथ में वो पर्ची पकड़ाकर निचे उतर गया। उसने उतरकर हाथ हिलाया। अकांक्षा को लगभग हमेशा के लिए दूर जाते देखना, उससे सहा नहीं जा रहा था। वह हाथ हिलाती रही पर वैभव पीछे मुड़ गया और जोर से भाग कर प्लेटफार्म के बाहर निकला, ऑटो पकड़ा और रूम चला गया। उसने टिफिन खोलकर जब लड्डू फोड़ा तो उसमें एक अंगूठी निकली। 

और आकांक्षा ने वह पर्ची पढ़ी

"अक्कू, कवि होता तो अपना साथ साथ का सारा जिया उकेर कर तुम्हें दे देता, पर मैं तो अपनी बात तक कभी तुमसे अच्छे से नहीं कह पाया। तुम्हें अंदाजा भी नहीं होगा मैं अपनी इस कमी की वजह से कितना घुट घुट कर जिया हूँ। खैर…

कल मैंने यह जान लिया। हम दो ध्रुवों की तरह अलग हैं। मैं तुम्हारे अलग होने का सम्मान करता हूँ। और वही मैं तुमसे भी चाहता हूँ। अगर तुम मुझे खुश देखना चाहती हो अक्कू, अगर तुम्हें सम्मान है मेरे भी अलग होने का, तो कभी भी मुझे कॉन्टैक्ट करने की कोशिश मत करना। मेरे और अपने अपनेपन की खातिर इतना मांगता हूँ तुमसे।

"अभी पता नहीं कौन, किसका वैभव।"

दो के बाद दो आँसू टप टप टप उस छोटे से पन्ने पर आ गिरे।

वैभव ने पर्स में से वो अंगूठी निकाली और देखा। उसे लगा वह फिर से खिंच रहा है आकांक्षा की तरफ़। उसे ढहता सा महसूस हुआ। उसका दृढ़निश्चय मोम की तरह आकांक्षा नाम की लौ से पिघलने लगा था। उसने फोन उठाया, और दिल्ली के लिए टिकट देखने लगा। उसने दो घंटे बाद का टिकट बुक कर लिया। रूम जाकर अपना सामान रखा, ताला लगाकर चाबी बगल वाले रूम में दे दी और अपने एक दोस्त को अपना सेमिनार सर्टिफिकेट लेने को बोलकर स्टेशन चला गया।

ट्रेन बनारस से निकल चुकी थी, लोग सो रहे थे। लाइट्स ऑफ थी। वैभव ने अपने फ़ोन की फ्लैश लाइट ऑन की और अपने बैग से  ‘राग एकाकी' किताब निकाल ली। 

उसने तुरंत वो पन्ना खोला जिसपे अकांक्षा ने कुछ लिखा था

‘मेरे अप्राप्य क्रोंच के लिए' 

उसने तुरंत पन्ने पलटकर पांच नंबर कविता खोली और उसकी अंतिम पंक्तियाँ पढ़ीं,


…प्रतीकों का जीवन,
हरी स्मृतियाँ,
पुराना गुलाब, 
बावरी कल्पना,
और मेरा अप्राप्य क्रोंच।

सबका मेलजोल
एक मैं,
अकेली।

उसने फिर पन्ने पलटे सैंतीस नंबर की कविता खोली। तो वहाँ एक सूखा गुलाब दबा था। पन्नो के बीच दबकर वो चपटा सा हो गया था। यह वही गुलाब है जिसे वैभव ने अपने मिलने के शुरुआती दिनों में तोड़ कर उसे दिया था। 

उसने कविता पढ़नी शुरू की,
‘क्योंकि कविता को जन्म लेना था,
तो करुण रस चाहिए था,
एक क्रोंच को मरना था,
एक क्रोंची को विरह में विलाप करना था,
एक बहेलिए को तीर मारना था
एक ऋषि को ये देखना था,
एकाएक एक कविता फूट पड़नी थी।

ये सब हुआ एक साथ
मेरे भीतर कहीं।

क्रोंची, ऋषि, बहेलिया
सब मैं ही थी,
या कहूँ अभी हूँ
और ये प्रक्रिया सतत सी है।

बहेलिया-मैं तीर चलाता है,
क्रोंची-मैं बिलखती है,
कवि-ऋषि-मैं एक कविता लिख देती है
पर हर कविता के बाद
कवि-ऋषि-मैं की सब प्रशंसाकरते हैं,
बहेलिया-मैं को कोई नहीं जानता,
और क्रोंची-मैं का विरह दुःख रह जाता है,
जो हर क्षण में यूं रिसता है
जैसे सोखते से पानी।

ये जब भी निचुड़कर पन्नों पर गिरता है,
कविता बन जाती है।

पर इस भार को अकेली ढोती है,
क्रोंची-मैं,
क्षण क्षण कटती, मौन 
सुनाती राग एकाकी।

और मैं पूछती,
मैं कौन हूँ,
हंता?
पीड़ित?
या कवि?
यह प्रश्न है पूर्ण विराम।"

 उसने लंबी सांस ली । यह कविता वह पहले भी कई बार पढ़ चुका था। लेकिन इस बार फिर उसने कई बार पढ़ी। फिर फ्लैश लाइट ऑफ करके थोड़ी देर चुप बैठा रहा। फिर उसने पर्स निकालकर वो अंगूठी अपनी रिंग वाली उंगली में पहन ली। और उस उंगली को चूम लिया। ‘राग एकाकी' को सीने से लगाकर वो बर्थ पे लेट गया। ट्रेन सरसराकर बनारस से दूर चलती चली गई और वैभव आकांक्षा से…।
***

लेखक के बारे में
लेखक, पद्मनाभ त्रिवेदी, उत्तर प्रदेश के एक सहायता प्राप्त इंटर कॉलेज में प्रवक्ता हैं और आई आई टी रुड़की से अंग्रेज़ी विषय में शोध भी कर रहे हैं। इनकी विशेष रूचि रंगमंच अभिनय और साहित्य सृजन में है। ये हिंदी एवं अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में लिखते हैं। आप इनसे Twitter और Instagram पे @tpadmanabh सर्च कर के जुड़ सकते हैं। आप इन्हें ईमेल भी tpadmanabh@gmail.com पर भेज सकते हैं।

6 comments :

  1. आपकी य़ह रचना कतई हृदय को स्पर्श कर गयी। शानदार

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  2. This story attempts to interpret the true meaning of the concept called "Love" which is so much at the center of every great literature in our known world. Congratulations, Padmanabh Sir. There is more to come !!

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  3. बहुत अच्छी मार्मिक कहानी . अन्तिम कविता कहानी का निष्कर्ष है . प्रेम को बचाए रखने की शाश्वत परम्परा ..लेकिन यह जोड़ तोड़ है दिमाग का खेल . दिल इतना गुणा भाग कहाँ कर पाता है .

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    1. आपकी सुंदर टिप्पणी के लिए धन्यवाद

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  4. वाह बहुत ही मार्मिक कहानी है । इस कहानी में वैभव शायद पद्म नाभ त्रिवेदी जी हैं। और आकांक्षा का पता नहीं कौन हैं।

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