2023 - वर्ष नया है, हर्ष नया है

दीवार न हो, हर द्वार खुले हम ऐसे पथ के गामी हों,
कहें नहीं खल सहें नहीं, सत्याग्रही व निरभिमानी हों
कालचक्र रुकता नहीं, समय कभी चुकता नहीं। वर्ष बदलते हैं। हर नूतन वर्ष एक नयी आशा का संचार करता है और साथ ही पिछले वर्ष के पुनरावलोकन का अवसर भी देता है। केवल तारीख नहीं बदलती, यह भविष्य बदलने का संकल्प लेने का अवसर भी होता है। मान्यता यह है कि जिस संकल्प का पालन 21 दिन तक कर लिया जाये वह सरलता से हमारी आदत में सम्मिलित हो सकता है। हमारे संकल्प शुभ हों, समाज के लिये उपयोगी हों, यही मेरी कामना है।

नववर्ष के आगमन के साथ ही विश्व हिंदी दिवस के वार्षिक आयोजन भी होने लगते है, इसलिये देवनागरी वर्णमाला के हिंदी उपसमुच्चय के प्रति अपनी एक चिंता प्रबुद्ध पाठकों के साथ साझा करना चाहता हूँ। यह चिंता है वर्तमान मानकीकरण के प्रति - चिंता वर्णमाला को सीमित करके कमज़ोर करने के बारे में है। आजकल नुक़्ते पढ़ाये नहीं जाते, जैसे भारत के हिंदीभाषी, व अहिंदीभाषी क्षेत्रों में प्रयुक्त होने वाले सामान्य वर्ण को हिंदी वर्णमाला से बाहर रखा गया है। अभी कुछ समूहों से जानकारी मिली कि शिक्षण पुस्तकों से वर्णमाला ही हटायी जा रही है। लोकमान्य टिळक का नाम हो या बहादुरशाह ज़फ़र का, या शिर्वळ और खण्डाळा जैसे स्थानों का, हिंदी में भाषायी व लिपिकीय सामर्थ्य होते हुए भी हमारे राष्ट्रनायकों व स्थानों के नाम ग़लत लिखना और फिर ग़लत बोलना जितना दुर्भाग्यपूर्ण है, ग़लत रूढ़ियों की रक्षा के लिये खड़ा हुआ जनमत उससे कहीं अधिक दुर्भाग्यपूर्ण है। 

जिन लोगों के पास हिंदी के मानकीकरण का दायित्व और अधिकार है, उनसे भाषा के विषद ज्ञान, विस्तार, वैविध्य, समन्वयीकरण, और सशक्तीकरण की अपेक्षा होनी चाहिये न कि संकीर्णता की। हिंदी से का निर्वासन हिंदी को भारत की अन्य भाषाओं, व क्षेत्रों से ही नहीं, बल्कि दिल्ली, हरियाणा, व राजस्थान जैसे हिंदीभाषी क्षेत्रों से भी च्युत करता है। कुछ मित्र इसका कारण हिंदी में का उच्चारण अज्ञात होना बताते हैं। उनकी बात पर विश्वास करने लगे तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा यदि हिंदी-मानकीकरण के मठाधीश पहले , फिर , फिर , और तत्पश्चात पर भी गाज गिरा दें क्योंकि की विशुद्ध भारतीय ध्वनि अंग्रेज़ीकरण का साथ नहीं निभा सकती और आजकल को कहना देशीकरण और फ़ैशन दोनों में है। , और  तो पहले से ही अस्पृश्य हैं।

भाषाएँ बदलती हैं लेकिन मानकीकरण करने वाली आधिकारिक संस्थाओं में बैठे बाहुबलियों द्वारा भाषा या ध्वनि के अपने अज्ञान को हिंदीभाषियों पर थोपना किसी भी रूप में सही नहीं कहा जा सकता। इस प्रकार की हरकतों से भारत की राजभाषा न केवल अन्य भारतीय भाषाओं से कट रही है, बल्कि कमज़ोर भी होती जा रही है। नुक़्ते पढ़ाये जाने चाहिये, को मानक वर्णमाला में लिया जाना चाहिये, एक स्वर क्यों है और र/रि/रु से किस प्रकार भिन्न है यह शिक्षकों को स्पष्ट किया जाना चाहिये, , , और के अंतर भी स्पष्ट किये जाने चाहिये, के उच्चारण पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। ये ध्वनियाँ संस्कृत में थीं, पर हिंदी में लुप्त हो गयीं जैसे बहाने भाषाविदों को शोभा नहीं देते हैं। विस्तृत नागरी वर्णमाला हिंदी की शक्ति है, उसका ज्ञान हर हिंदीभाषी को होना चाहिये।
 
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इसके साथ ही मैं सेतु में प्रकाशित उन सभी लेखकों, सहयोगियों का आभार व्यक्त करना चाहता हूँ जिनके गंभीर लेखन और भाषा, समाज व मानवता के प्रति समर्पण के कारण सेतु जैसी पत्रिकाओं का परिचालन सम्भव है। आप से ही हम हैं, आपको सादर नमन!

सेतु के नियमित लेखक और वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. दिनेश पाठक शशि को  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी भोपाल द्वारा वर्ष 2020 के अखिल भारतीय गजानन माधव मुक्ति बोध पुरस्कार (धनराशि - एक लाख रुपये) से सम्मानित किया गया है। उन्हें हार्दिक बधाई!

करोना की नयी लहरें आने की खबरें हैं। यद्यपि संसार की बहुसंख्य जनसंख्या के टीकाकृत हो चुकने के बाद खतरा शायद पहले जितना बड़ा न हो फिर भी सावधान रहिये, स्वस्थ रहिये।

सेतु का यह अंक आपको समर्पित है, आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है। यदि सामग्री आपको पसंद आये तो अपने परिजनों व मित्रों के साथ साझा कीजिये, धन्यवाद!

नववर्ष की मंगलकामनाओं सहित,
आपका शुभाकांक्षी,
सेतु, पिट्सबर्ग
31 दिसम्बर 2022 ✍️

सेतु के सभी लेखकों, व पाठकों को नववर्ष 2023 की मंगलकामनाएँ


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