व्यंग्य: सरकार बनेगी तो कचरा हटेगा

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

पिछले दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय के एक नामी-गिरामी गणित के प्रोफेसर साहब से मिलना हुआ। बात करने में ही उनकी अपार विद्वता झाँकती थी। इसलिए मैंने सहज ही छठी कक्षा के गणित का एक सवाल पूछ लिया। सर, दिल्ली में रोज ग्यारह हजार टन कचरा पैदा होता है और पाँच हजार टन कचरा रोज साफ करके निस्तारित कर दिया जाता है। अब आप बताइए दिल्ली कितने दिनों में कचरा मुक्त हो जाएगी? वे बगलें झाँकने लगे। वे माथापच्ची करते-करते पसीने-पसीने हो गए और हार कर बोले – ‘यह कैसा सवाल हुआ! इसकी तो इबारत ही गलत है। कोई माई का लाल इस सवाल को हल नहीं कर सकता।’

मैंने कहा - सर, आपको ढंग से गणित करना नहीं आता तो नौकरी छोड़ दीजिए, पर सरकार की काबिलियत पर शक तो मत कीजिए। आप तो गाजीपुर, ओखला और भस्वला के छोटे बच्चों जैसी नादान बात कर रहे हैं। जब सरकार कह रही है कि अगले चुनाव के पहले सब कचरा साफ हो जाएगा तो हो ही जाएगा। यदि आप गलत हुए तो जेल में होंगे और यदि सरकार गलत हुई तो किसी के बाप में हिम्मत नहीं है जो कह सके कि सरकार गलत है। प्रोफेसर साहब वहाँ से चुपचाप खिसक लिये। बुद्धिजीवी ऐसा ही करते हैं, कठिन प्रश्नों पर कन्नी काट जाते हैं। वे चाहते तो कह सकते थे कि इस स्थिति में दिल्ली कभी कचरा मुक्त नहीं होगी। उनमें दम-गुर्दा होता तो वे चेतावनी भी दे सकते थे कि दिल्ली कभी भी कचरे का एवरेस्ट बन जाएगी या दिल्ली कभी अपने कचरे की आग में जल कर भस्म हो जाएगी। वे वहाँ से भाग लिए तो उनकी बुद्धि और पद दोनों सुरक्षित हैं।

कुछ दिनों पहले यही प्रश्न मैंने दिल्ली के एक मीठे राजनेता से पूछा था। मीठे राजनेता ऐसे जैसेकि राजधानी की चाशनी में आकंठ डूबे। आप उन्हें टीवी और अखबारों में रोज देख सकते हैं, पर दफ्तर में नहीं। ज्यादा ही हुआ तो जब वे वोट माँगने आयें तब उनके गदराये-गदराये स्वरूप को छू अपनी मीठी ऊँगली चाट सकते हैं, पर उनसे कोई काम नहीं करवा सकते। मेरे प्रश्न पर वे बड़े चिंतक की तरह ज्ञान देने लगे। बोले – ‘सबका विकास करना है तो कचरा बढ़ेगा ही। अमेरिकनों को देखो, सबसे ज्यादा कचरा वे लोग पैदा करते हैं इसलिए वे विकास के मामले में टॉप पर हैं। उन्हें कोई चीज पुरानी लगने लगे या खराब हो जाए तो वे उसे ठीक-ठाक कराकर उपयोग करने की बजाय ‘गारबेज’ कर देते हैं, फेंक देते हैं और ठाठ से नई चीज ले लेते हैं। हम भी डिक्टो ऐसा देश बनाना चाहते हैं, अपने लोगों के पास नई से नई चीजें होना चाहिए।’

मैंने कहा आप सही कह रहे हैं, पर उनका कचरा प्रबंधन जोरदार है। वे कचरा उपजाते हैं और उसे उसी श्रद्धा के साथ इकठ्ठा करके घर के बाहर निर्धारित कचरा पेटियों में डाल देते हैं। स्थानीय प्रशासन की कचरा-गाड़ियाँ नियत समय पर आती हैं, बिना इधर-उधर बिखेरे कचरे को गाड़ी में डालती है। वहीं पर  कचरा प्रोसेस होना शुरू हो जाता है और निर्धारित लैंडफिल के गड्डों में चला जाता है। पूरा देश चकाचक साफ दिखता है। हमारे यहाँ तो कचरे को लेकर राष्ट्रीय स्तर की गंदी राजनीति शुरू हो जाती है।

‘वही तो’, चहकते हुए राजनेता बोले। अब आप मुददे पर आए। आपको मालूम होना चाहिए कि सारे देश का कचरा चुन-चुनकर दिल्ली में आता है और यहाँ की लैंडफिल में पसर जाता है। जनता दिल्ली में हमारी सरकार बना दे तो हम भी दिल्ली को कचरे की राजधानी बना दें। इसके लिए दिल्ली में जरूरी कचरा तो हो। अभी केवल तीन लैंडफिल हैं, हमारी सरकार बनने दें हम दिल्ली के चारों ओर लैंडफिल ही लैंडफिल बनवा देंगे। विदेशों से बड़ी संख्या में आधुनिक ट्रोमेलो मशीनें खरीदेंगे, फिर देखिये कचरा कितनी तेजी से निपटता है।  हमारी मशीनें दिन-रात काम करेंगी, कचरे से सस्ती खाद बनायेगी, लैंडफिल में भर्ती डाल कर नई जमीन बनाएगी और लघुउद्योगों को बचा-खुचा कच्चा माल देगी। विकास और विकास, और चहुँ ओर विकास। 

मैंने कहा सरजी, आपकी सरकार जब बनेगी तब बनेगी, पर ये जरूरी काम आज क्यों नहीं हो सकते! अभी हालत यह है कि हवा जरा-सी सरसराती है तो बदबू फैलने लगती है। बदबू ऐसी कि साँस लेना कठिन होता है, बच्चे आनुवंशिक रोगों के साथ पैदा होते हैं। कचरे के पहाड़ों पर गर्मियों में ऐसी आग लगती है कि बस्तियाँ जहरीली गैस से भर जाती है। अभी भी कोई तो सरकार है, वह यह ठीक क्यों नहीं कर सकती?

राजनेता को गुस्सा आने लगा। वे बोले हम भारतीय कचरा पैदा करने में भी अमेरिकियों से बहुत पीछे हैं। हमारे यहाँ प्रति व्यक्ति वार्षिक कचरा उत्पादन...। वे लच्छेदार तकनीकी भाषा में मनगढ़ंत आँकड़े बनाने में माहिर थे। बस्ती के एक बुजुर्ग से नहीं रहा गया। वह अपनी मरियल आवाज में बोला – “सरकार, हम आखिरी साँस तक चीजों का उपयोग करते हैं। बटन टूट जाए तो नया टाँक लेते हैं, छेद हो जाए तो रफू करके काम चला लेते हैं। पुराने कपड़े देकर नए बर्तन खरीद लेते हैं। काँच की बोतलें, टिन के डिब्बे, प्लास्टिक, चमड़ा, रद्दी अखबार और किताबें सब इकट्ठे करते हैं और बेच देते हैं। बासी खा लेते हैं और एक बल्ब की रौशनी में घर जगमगा लेते हैं। हमारे यहाँ कचरा कहाँ साहब! उधर कॉलोनियों में देखिए, उनके घर के अंदर थोड़ा-सा भी कचरा हो तो वे घर के बाहर सड़क पर फेंक देते हैं। उनका कचरा सड़क के आसपास खुले में, घर के पिछवाड़े में या सरकारी जमीन पर फैलता रहता है। फिर वहाँ सफाई होती है और ट्रक भर-भर कर सड़ा-गला कचरा हमारी बस्तियों के पास डाल दिया जाता है। हमारी तकलीफ किसी को नहीं दिखती माई-बाप।”

उस बूढ़े की आवाज़ वहीं दब कर रह गई। नेताजी वोट माँगने की मुराद लेकर आए थे, हाथ जोड़ कर चले गए। बस्ती के घर-घर में नई साड़ी, चप्पल और शराब के अद्दे का भोग चढ़ाने प्रचार टीमें लगी हुई थीं, उधर टीले के पार ट्रक कचरा ‘डम्प’ कर रहे थे।

ईमेल: dharmtoronto@gmail.com फ़ोन: + 416 225 2415
सम्पर्क: 22 Farrell Avenue, Toronto, M2R 1C8, Canada

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।