अहिंसा का अर्थशास्त्र

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

लेखक भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं एवं सेतु संपादन मंडल के सम्मानित सदस्य हैं। आप अहिंसा आयोग के समर्थक एवं अहिंसक सभ्यता के पैरोकार भी हैं।

इस संसार की सबसे अमूल्य निधि है प्रकृति। हमने ईश्वर से मनुष्य तन पाया है लेकिन प्रकृति हमारी जीवन यात्रा की सहचरी है। हमारे जीवन के लिए प्रकृति से वे समस्त उपभोग की चीजें मिलीं, जिससे हम जीवन-यापन कर सकें। अच्छा होता कि हम प्रकृति पर आश्रित जीवन जीते, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। आज स्थिति यह है कि हम अपने जीवन को प्रकृति से भी षड्यन्त्र करके उत्कृष्ट होने के लिए दिमाग लगा रखे हैं। मनुष्य का जीवन जीने के लिए मूलभूत जरूरतें हमें मिल गईं किन्तु उसके अतिरिक्त हमने उपभोग की वे सामग्रियाँ, व्यवस्थाएँ कृत्रिम ढंग से इकट्ठा करना शुरू किया। आज ऐसा लगता है कि इन सुविधाओं और अनावश्यक वस्तुओं ने हमारी वास्तविक ज़िंदगी से हमें अलग कर दिया है। इसका परिणाम यह हुआ है कि हम लालच, चोरी, हिंसा और क्रूरता के वशीभूत हो गए हैं।

अहिंसा के अर्थशास्त्र की अवधारणा को समझना आज इसलिए आवश्यक है क्योंकि हिंसा का उत्पादन हम मनुष्यों को प्रकृति और अन्य मनुष्यों से अलग कर रखा है। इसे भले ही हम हल्के में लें, लेकिन इसका घनत्व यदि इसी प्रकार बढ़ेगा तो हम न स्वयं को बचा सकेंगे और न ही प्रकृति की खूबसूरती बचेगी। इसमें से किसी का ह्रास होता है तो भी हम स्वयं और अपनी आने वाली पीढ़ी को एक अंधकार भरा भविष्य प्रदान करेंगे, इसके अलावा और कुछ भी नहीं।

आज सवाल यह है कि हम अहिंसा के अर्थशास्त्र को कैसे समझें और अपने जीवन में उसे शामिल करें, क्योंकि सहज लोग तो इसे जीते हैं, लेकिन कृत्रिम लोगों की वजह से आज सम्पूर्ण सभ्यता इस विषय को लेकर चिंतित है। कृत्रिम सोच और अधिक संभ्रांत समाज यह चाहता है कि उसे उपभोग की सारी वस्तुएँ मिल जाएँ। उसे खाने के लिए स्वादिष्ट व्यंजन चाहिए। जीने के आलीशान घर और लग्जरी गाड़ियाँ चाहिए। अपने सुख का चरम चाहिए और अपने स्वजनों के भविष्य सुरक्षित और ग्लैमर से भरा हुआ चाहिए। इसके लिए उसे कोई भी यत्न करना पड़े, वह करता है। वह चोरी करता है। भ्रष्टाचार करता है। छीनता है। कब्जा करता है। सीधे और सादगी वाले जीवन से तो ये चीजें उसे मिलने से रहीं। इसलिए अपनी सुख और समृद्धि के लिए हिंसा करता है। यह इस धरती के उस मनुष्य का चरित्र है, जो हिंसक सभ्यता को आनंद से जीता है। यह उस मनुष्य का ही एक चेहरा है, जिसे दूसरों के साथ हिंसा करके उसके माथे पर शिकन नहीं पड़ती।

हिंसा का अर्थशास्त्र अपरिग्रह और अस्तेय से दूरी बनाकर इसके विरुद्ध जीवन-पद्धति से जीवन जीता है। वह अपनी समस्त ऊर्जा की खपत केवल संग्रह और आधिपत्य में करता है। हिंसक सभ्यता के बरक्स प्रेम के नियम पर आधारित जीवन के लिए टॉलस्टॉय ने आग्रह किया था जिसका उद्देश्य था अहिंसा के अर्थशास्त्र का विस्तार हो। जिस अन टू दिस लास्ट में रस्किन ने अंतिम व्यक्ति की गरिमा को मुख्यधारा की गरिमा से तुलना की और बताया कि सभी के कार्य समान सम्मान के पात्र हैं, वही अहिंसा का अर्थशास्त्र समझने का ठीक-ठीक उदाहरण है। गांधी ने स्वयं अपने एकादश व्रत में जिन मूल्यों की बात की है उसमें अहिंसा के अर्थशास्त्र की स्थापना थी। उन्होंने ट्रस्टीशिप अपनाने पर इसीलिए बाल दिया ताकि लोग अपने जीवन में कमाए धन और संपत्ति से दूसरों का सहयोग कर सकें और लोगों में दयालुता की भावना का संचार हो। कमाकर संग्रह करने वाले भी ट्रस्टीशिप के माध्यम से लोगों का उपकार कर सकें, यह है अहिंसा का अर्थशास्त्र। 

दान भारत में एक सबसे अच्छा गुण माना जाता है। हमारे धर्मशास्त्रों में दान को इसलिए ज्यादा महत्व दिया गया क्योंकि उसके माध्यम से लोग दूसरों के जीवन की मूलभूत जरूरतों को पूर्ण कर सकें। इस्लाम धर्म में अपनी कमाई का कुछ हिस्सा जकात के रूप में निकालने की बातें की गई हैं। इसका सीधा संबंध उन गरीबों के जीवन-जगत से जुड़ा हुआ है जो अपने जीवन को अभाव में जी रहे हैं और अपनी जरूरतें पूरी करने में अक्षम हैं। सिख धर्म में सेवा-सुश्रुषा और परोपकार के लिए गुरुद्वारों के माध्यम से लंगर की व्यवस्था की जाती है ताकि गरीब दुखियारे आकर अपनी क्षुधा मिटा सकें। हिन्दू धर्म में राजा हरिश्चंद्र और महादानी कर्ण के दान की कथा लोग गौर से पढ़ते हैं लेकिन हिन्दू समाज का हर घर अपनी सनातन परंपरा का निर्वहन करते हुए अपने खेत खलिहान से ही अनाज निकालकर गरीबों को देता है। पूजा या यज्ञ के माध्यम से अंतरिक्ष और पृथ्वी सबके लिए दान करता रहा है। इससे हमारी प्रकृति और वातावरण को भी हम दान कर रहे होते हैं। गरीबों और वंचितों के लिए भी हिन्दू सनातन सभ्यता में ऐसी जीवन-पद्धति अपनाने पर बल दिया गया है जिससे सभी सुखी रहें और उनका जीवन प्रसन्नता से परिपूर्ण और शांति को प्राप्त करे। दुनिया के सभी धर्मों में इस प्रकार एक ऐसी व्यवस्था की आकांक्षा है जो हमारा और हमारे साथ जीने वाले सभी जीवों का संरक्षण करे। विडंबना यह है कि हम धार्मिक होने का दंभ भरते हैं। हम धार्मिक होने का दावा भी करते हैं लेकिन सच में अपने मनुष्य धर्म का पालन नहीं करते और हिंसा के अर्थशास्त्र से अपने जीवन को अक्षय जीवन बनाने का यत्न करते हैं जबकि यह एक भ्रम है। यदि अहिंसा के अर्थशास्त्र पर आधारित जीवन जीते तो निश्चित ही हमारा समाज सह-अस्तित्व में विश्वास करता और सबके जीवन में किस वजह से उन्हें मुश्किलें हैं, उनकी मदद के लिए दौड़ पड़ता। यदि सभी अनुराग करें एक-दूसरे से यह छीना-झपटी समाप्त हो जाए। भी समाप्त हो जाए। विवाद समाप्त हो जाए। घृणा समाप्त हो जाए। वैमनस्य खत्म हो जाए। यह हिंसा का अर्थशास्त्र है जिसने हम मनुष्य के बीच बड़ी-से बड़ी खाई बना रखा है और वह सदियों से पटने का नाम ही नहीं ले रही है।

हिंसा का अर्थशास्त्र हमारी बुरी कामनाओं एवं अतिरेक की महत्वाकांक्षाओं का भी परिणाम है, यह कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। आज बाज़ार ने जितनी भौतिकवादी वस्तुओं का उत्पादन किया है उसके मनोविज्ञान को जब हम पढ़ेंगे तो पता चलेगा कि पूरा का पूरा बाज़ार मनुष्य-द्रोही है और लालच और संग्रह की बुनियाद पर टिका है। लाभ आधारित व्यापार करके जीवन में अधिक धन संग्रह के लिए नानाप्रकार के यत्न किए जा रहे हैं। देखा जाए तो यह अहिंसा के अर्थशास्त्र के खिलाफ हिंसा का अर्थशास्त्र तैयार करने वाला उपक्रम है जिसमें छोटे व्यापार से लेकर बड़े व्यापार सबमें हिंसा केंद्र में है। इस पूरी व्यवस्था में जकड़े लोग केवल स्व-हित के लिए कार्य कर रहे हैं। मुनाफ़े के लिए कार्य कर रहे हैं। माना कि बाज़ार भी हमारे लिए जरूरी निकाय है। इससे हम अपनी सभ्यता में आमूलचूल परिवर्तन और जरूरी चीजों को खरीदकर अपने जीवन में रोमांचकारी परिवर्तन करते हैं लेकिन इसके पीछे फायदे का जो उत्सव है वह तो अहिंसक अर्थव्यवस्था की दुश्मन है। इसके खतरे यह होते हैं कि व्यापार से जुड़े लोग ज्यादा धन इकट्ठा कर लेते हैं और गरीब शोषित होकर भ्रम में जीवन जीते हैं। इसके सबसे बड़े उदाहरण तो विज्ञापनों में मिलते हैं। विज्ञापनों में जिस प्रकार की आकर्षक चीजें दिखती हैं उपभोक्ता उसी को देखकर आकर्षित होता है और बाज़ार के साथ विक्रेता लाभ कमाकर लाल हो जाता है। ये विज्ञापन हिंसा करते हैं और इससे अहिंसा का अर्थशास्त्र हमसे और हमारे समाज से कोसों दूर चले जाते हैं।

छोटे व्यापार और बड़े व्यापार के लाभकेंद्रित हिंसक आर्थिकी हमारे जीवन को लील रही है और हम यह नहीं समझ पा रहे हैं कि हम क्या करें या क्या न करें। यह द्विधा हमारी मनुष्य संस्कृति के सौंदर्यबोध को विकृत करती जा रही है जिसकी जननी हिंसा की संस्कृति है और उसमें भी हिंसा के अर्थशास्त्र की भूमिका सबसे ज्यादा है। युद्ध आधारित हथियार खरीदने के पीछे खर्चे जा रहे धन हिंसा के अर्थशास्त्र की सबसे विकृत स्वरूप का उदाहरण है। देस, जब देश बनता है तो इस बनने के पीछे की ताकत का हम और आप अंदाजा नहीं लगा पाते। उसी अनुपात में हमें यह भी नहीं पता चलता है की आधुनिकता, सूचना और प्रौद्योगिकी के विस्तार की आड़ में फलफूल रही हिंसा के अर्थशास्त्र को भी हम रेखांकित करने में कहीं न कहीं विफल हुय हैं और उसका परिणाम है कि अब राज्य के द्वारा बड़ी खरीद फरोख्त में हिंसा के अर्थशास्त्र पर सवाल भी नहीं कर सकते जिसका परिणाम है की युद्ध आधारित बाज़ार अपने उत्सव में प्रत्येक वर्ष अपने मुनाफे का जश्न मनाती है और इससे हिंसा ही बढ़ती है। भी ही बढ़ती है। बाज़ार ने कब हमारे खिलाफ एक हिंसक समाज की अवरसंरचना खड़ी कर दी उसका हमें एहसास तक नहीं है।

देशज-संस्कृति का विलोप होने से हमारा स्वदेशी व्यापार ध्वस्त हुआ। इसमें कम से कम अपने आसपास की वस्तुओं का उत्पादन और विपणन होता था। लोग अपने खरीद से संतुष्ट रहते थे। मामूली लाभ लेकर भी स्वदेशी-व्यापारी प्रसन्न रहता था। भूमंडलीकृत बाज़ार में स्वदेशी वस्तुएँ भी उन्हीं की अमानत बन गईं। तुलसी नीम को पेटेंट, रैपर में बांधने के प्रयास किये गये। प्रोडक्ट बिकता है, उसकी ब्रांडिंग होने लगी। मल्टीनेशनल कम्पनियों का गणित काम कर गया और अब देशज उत्पाद ही देशज लोगों को नापसंद हैं रैपर में पैक्ड सामग्री सबके स्वाद का हिस्सा होती जा रही हूँ। भारत में चरक, सुश्रुत, पतंजलि जैसे ऋषि हुए हैं जिन्होंने आयुर्वेद और योग से विभिन्न बीमारियों का हल निकाला था। हमारे हिमालय की औषधियाँ हमारे लिए अमृत थीं लेकिन हमारे औषधियों को अब भूमंडलीकृत व्यवस्था में विभिन्न औषधि निर्मता कंपनियाँ अपने अनुसार उत्पाद तैयार कर हमसे वसूली कर रही हैं। हिंसा का अर्थशास्त्र हमारे हिमालय पर भारी पड़ गया है और अब हम खुद न जाने कटनी प्रकार की औषधियाँ बिना जाने समझे उपयोग कर रहे हैं। 

सवाल यह है कि अहिंसा का अर्थशास्त्र मनुष्य सभ्यता के जीवन का हिस्सा कब बनेगा और कैसे बनेगा? सवाल यह है कि क्या हमारे ऊपर हिंसा का अर्थशास्त्र हावी रहेगा? यदि हावी रहेगा तो हमारे मन काभी भी हिंसा से मुक्त नहीं होंगे और हम अहिंसा के अर्थशास्त्र का वरण नहीं कर सकेंगे। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि पूरी दुनिया यह विचार करे की हमारे जीवन में अहिंसा का अर्थशास्त्र कितना जरूरी है और यह कैसे हमारे जीवन पद्धति में शामिल हो सकता है। राज्य यह विचार करें कि बाजार और मुनाफे से हमारे ठाट-बाट बचे रहेंगे। भौतिक सुख साधन मिलेंगे लेकिन किस गर्त में हम मनुष्य सभ्यता को ले जा रहे हैं। यह एक विचार का विषय है। यह संवाद का विषय है। इसका हाल हमें निकालना है। इसको हमें दुरुस्त करना है। यह किसी एक व्यक्ति, समूह और राज्य की जिम्मेदारी नहीं है अपितु इसे पूरी सभ्यता में जीवन जी रहे लोगों के सामूहिक पहल से दुरुस्त किया जा सकेगा लेकिन यह एक गंभीर और संवेदनशील समाज का काम है। यदि अहिंसा के अर्थशास्त्र की पौध हम उग पाए तो मैं यह विश्वास करता हूँ कि हमारा गतिशील समाज ज्यादा दीर्घायु हो सकेगा। सुनिश्चित हमें करना है कि हम चाहते क्या हैं? 

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