कहानी: विश्वास की ताकत

विजय कुमार संदेश

प्राध्यापक, पी.जी. हिन्दी विभाग, मार्खम कॉलेज, हजारीबाग, झारखंड,भारत
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नव्या! मेरे माँ-बाबूजी का ख्याल रखना। अनीला ने कहा और अपना घर यानी ससुराल जाने के लिए पीछे मुड़ी ही थी कि नव्या ने टोकते हुए कहा- दीदी, जरा रुकना। अनीला ठिठक कर रुक गयी और भेदी नजरों से नव्या को देखा। नव्या ने अनीला के भावों को क्षणभर में ही ताड़ लिया। इसी से स्थिति को भांपकर चुप हो गयी और बात बदलते हुए कहा- दीदी, खाना खाकर जाइयेगा। नव्या इस घर की बहू थी और अनीला बेटी। मायके में अनीला की तूती बोलती थी। क्या मजाल कि उसके विरोध में कोई कुछ कह दे। अनीला बचपन से ही जिद्दी स्वभाव की रही है। पिता पारसमणि अक्सर कहते थे- मेरी बेटियों में यही एकमात्र है जिसे हर बात में रिजर्वेशन चाहिए। पढ़ाई में भी अनीला शहर के लब्धख्यात अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ती थी जबकि उसके भाई-बहन हिन्दी माध्यम के सरकारी विद्यालयों में पढ़ते थे।
नव्या का इस तरह टोकना अनीला को जरा भी अच्छा नहीं लगा। उसे लगा जैसे उसकी जमींदारी में सेंध लग गयी है मानों, किसी ने उसके वर्चस्व पर हथौड़े से चोट कर दिया हो और गाँठें ढीली पड़ गयी हो। लगभग दो वर्ष हुए होंगे जब नव्या इस घर में बहू बनकर आयी थी और इन दो वर्षों में ही उसने अनीला के इस जुमले को कि ‘मेरे माँ-बाबूजी का ख्याल रखना’- कम से कम वह पचासों बार सुन चुकी होगी। हर शनिवार-रविवार को अनीला मायके आ जाती थी और जाते-जाते इसी जुमले को दुहरा जाती थी। शुरु-शुरु में नव्या को लगता था अनीला दीदी यों ही कहकर चली जाती हैं। किंतु, बार-बार एक ही जुमले को सुनकर उसके कान पक गए थे। अब उसे यह जुमला नागवार लगने लगा था। परिवार के प्रति उसका क्या दायित्व है, वह भली-भांति जानती है तथा अपने तईं यह कोशिश करती है कि सत्तर पार कर चुकीं सासू माँ और बहत्तर छू चुके पितातुल्य ससुर जी जिन्हें वह ‘पापाजी’ कहती है, को उसकी वजह से कोई परेशानी न हो। नव्या को यह संस्कार बचपन से ही उसे माँ-पिताजी से मिला था। 
नव्या अपने जन्म के साथ ही कई खुशियाँ लेकर आयी थी। उसके पिता दशस्यंदन गुरुजी अक्सर कहा करते थे कि नव्या हमारे जीने की मंजिल बनकर आई है। इसने जन्म के साथ ही मेरे भाग्य के दरवाजे खोल दिये हैं। दशस्यंदन गुरुजी को बीस वर्ष पूर्व के वे संघर्ष भरे दिन याद हैं, जब स्नातक और स्नातकोत्तर में अच्छे अंक आने और मौलिक प्रतिभा होने के बावजूद व्यवस्थागत दोषों के कारण सरकारी नौकरी में सफलता नहीं मिली थी, तो उन्होंने गाँव में ही निजी स्कूल खोल लिया था और व्यस्त हो गए। फिर, पलटकर सरकारी नौकरी की ओर नहीं देखा। विद्यालय की स्थापना के बाद वे पूरे इलाके में ‘गुरु जी’ के नाम से ख्यात हो गए। दशस्यंदन जी का परिवार निम्नमध्यवर्गीय था। कृषि आय का एकमात्र स्रोत था। दशस्यंदन गुरुजी प्रातः नौ बजे तक कृषि-कार्य में पिताजी का सहयोग करते और दस बजते-बजते स्कूल पहुँच जाते। दो-तीन वर्षों तक अपने सहयोगी और मित्र नवीन के साथ मिलकर उन्होंने कड़ी मेहनत की। नवीन ने भी कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया। शहर से दूर गाँव-देहात का यह स्कूल था। विद्यार्थियों से शुल्क के नाम पर उतना ही लिया जाता था जितना अभिभावक अदा कर सकते थे। दो-तीन वर्षों के अंतराल में लगभग सौ-डेढ़ सौ विद्यार्थी हो गए, जिसमें छात्र-छात्राएँ दोनों ही थे। छात्राओं के लिए यह विद्यालय वरदान की तरह था। छात्र तो शहर जाकर पढ़ भी लेते थे। छात्राओं को गरीबी और दूरी के कारण यह सुविधा नहीं मिल पाती थी। इस विद्यालय के खुल जाने से पास-पड़ोस के गाँवों से छात्राएँ आने लगीं। दशस्यंदन गुरुजी ने विद्यालय की स्थापना के साथ ही सरकारी मान्यता के लिए आवेदन मानव संसाधन मंत्रालय में कर दिया था। यह संयोग ही कहा जायेगा कि जिस दिन नव्या का जन्म हुआ उसी दिन विद्यालय को ‘स्थापना की अनुमति’ मिली और स्थापना अनुमति का पत्र मंत्रालय से प्राप्त हुआ। दशस्यंदन गुरुजी ने अपनी नवजात बेटी को भाग्य-लक्ष्मी के रूप में देखा। चूंकि, दशस्यंदन जी के जीवन में एक नव्य-रश्मि के रूप में वह अवतरित हुई थी। इसलिए जन्म के साथ ही वह नव्या हो गयी।
नव्या के अवतरण ने दशस्यंदन गुरुजी के साथ-साथ विद्यालय के भाग्य का द्वार भी खोल दिया था। स्थापना की अनुमति के पूर्व विद्यालय में मात्र डेढ़ सौ विद्यार्थी थे। देखते ही देखते उनकी संख्या पांच सौ के करीब पहुँच गयी, मानो कोई दैवीय चमत्कार हो गया हो। इस कारण नव्या विद्यालय-परिवार के लिए भी भाग्य-लक्ष्मी हो गयी थी। पढ़ाई में अव्वल, खेल में अव्वल और गीत-संगीत में विशेष रुचि ने नव्या को क्षेत्र में विशेष लोकप्रिय बना रखा था। यहाँ तक कि कुकिंग में भी उसका कोई जोड़ नहीं था। विद्यालय द्वारा आहूत वनभोज हो या कोई अकादमिक कार्यक्रम उसमें उसकी विशेष भूमिका रहती थी। नव्या को ये गुण उसे अपनी माँ से मिले थे। माँ उसे पढ़ाई के साथ-साथ संस्कारों की सीख भी देती रहती थीं। बेटी पराया धन होती है माँ ने कभी नहीं कहा, पर पराये घर जायेगी इस सत्य से परिचित तो थीं ही। इसलिए सदैव उसे व्यवहार कुशल और आचरण में शुचिता की सीख देती रहती थीं। नव्या उसी विद्यालय में पढ़ती थी, जिसे उसके जन्म के समय ही स्थापना अनुमति मिली थी। दिवस जात नहिं लागिहिं बारा यानी समय बीतते देर नहीं लगती। देखते ही देखते नव्या कक्षा दस में पहुँच गयी।
प्रतिवर्ष दशस्यंदन गुरुजी विद्यालय के छात्र-छात्राओं को किसी टूरिस्ट प्लेस में शैक्षणिक भ्रमण के लिए ले जाते थे। इस बार विद्यार्थियों और शिक्षकों का एक समूह भूटान जा रहा था। नव्या भी उस समूह में शामिल थी। इस समूह का नेतृत्व विद्यालय के प्रधानाचार्य दशस्यंदन गुरुजी कर रहे थे। बस से बारह घंटे का सफर था। शाम 08.30 बजे सफर शुरु हुआ। विद्यार्थियों में लंबे सफर के कारण ऊब पैदा ना हो और उन्हें भूटान के बारे में सम्यक जानकारी भी हो, इसलिए लगभग आधे घंटे का व्याख्यान दशस्यंदन गुरुजी ने दिया और बताया कि भूटान भारत का पड़ोसी मित्र देश है। क्षेत्रफल में यह हमारे केरल राज्य के बराबर है। केरल का भू-क्षेत्रफल 38,863 वर्ग किलोमीटर है तो भूटान का 38,394 वर्ग किलोमीटर है। भूटान एक पहाड़ी और लैंड-लॉक देश है। भारतीय नागरिकों को भूटान में प्रवेश के लिए किसी पासपोर्ट या वीजा की आवश्यकता नहीं होती। केवल भारतीय नागरिकता का पहचान-पत्र आवश्यक है। भूटान का राष्ट्रीय धर्म बौद्ध-धर्म है। इसलिए सांस्कृतिक दृष्टि से यह भारत के करीब है। भूटान के लोग पर्यावरण के प्रति अति जागरूक हैं। यहाँ के कानून के अनुसार भूटान की धरती के साठ प्रतिशत हिस्से में वन का होना अनिवार्य है। वर्तमान में यहाँ सत्तर प्रतिशत वन मौजूद है। भूटान के घने जंगल, पर्वत, झरने, नदियाँ, पेड़-पौधों से हरी-भरी पहाड़ियाँ, बर्फ से आच्छादित पर्वत चोटियाँ और सुरम्य दृश्य-छवि यहाँ की प्रकृति की विशेषता है। गर्मियों में ठंढा मौसम और आर्द्र हवाएँ यहाँ के मौसम के मिजाज का प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। जिधर भी आप सबकी दृष्टि जायेगी उधर ही पर्वतमालाओं की लंबी-लंबी शृंखला दिखाई पड़ेगी। विश्व हैप्पीनेस इंडेक्स जिसे विश्व खुशहाली भी कहा जाता है, भूटान ने ही उसकी शुरुआत की थी और उसके प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 1973 में प्रस्तावित व स्वीकृत किया था। भौगोलिक दृष्टि से ऊँचे पहाड़, पहाड़ों से नीचे आती हुई नदियाँ, झरने और हरियाली भूटान की विशेषताओं में शामिल है। यहाँ जितना कार्बन सालभर में उत्सर्जित होता है, उतना यहाँ के जंगल सोख लेते हैं। भूटान ने पर्यावरण को बचाकर रखा है। इसलिए यह दुनिया का सबसे शांत और खुशहाल देश है। प्रदूषण-मुक्त धरती का यह अन्यतम उदाहरण है। भूटान के लोग प्रकृति को ईश्वर-तुल्य मानते हैं। आक्सीजन बैंक की दृष्टि से भी यह अव्वल है। भूटान की खासियतों में यह भी है कि यहाँ एक भी वृद्धाश्रम नहीं है। पूर्वजों की पूजा यहाँ होती है और माता-पिता भगवान के प्रतिरूप होते हैं। भूटानी यह मानते हैं कि माता-पिता को वृद्धाश्रम में छोड़ना कलंक की बात है। इस संबंध में भूटानी लोग एकदम स्पष्ट हैं। आप सभी अपने इस शैक्षिक भ्रमण में इस तथ्य का अनुभव करेंगे। प्राचार्य के संबोधन को नव्या ने बड़े ध्यान से सुना। पत्थर पर खींची गयी अमिट लकीर की तरह संबोधन के एक-एक शब्द उसके मस्तिष्क में स्थायी लकीर की तरह खिंच गए। दशस्यंदन गुरुजी का संबोधन खत्म होते-होते रात के दस बज चुके थे। उन्होंने विद्यार्थियों को अपनी-अपनी सीट पर ही आराम करने का निर्देश दिया। सुबह-सुबह विद्यार्थियों की जब नींद खुली तो वे भूटान के प्रवेश द्वार जयगाँव में थे। जयगाँव से उन्होंने भूटान के फुंत्शोलिंग में प्रवेश किया। भूटान प्रवेश की सारी औपचारिकताएँ यहीं पूरी हुई और सुबह के दस बजते-बजते वे राजधानी थिम्पू के लिए निकल पड़े, जहाँ दो दिवसीय भ्रमण का कार्यक्रम था। दो दिन की यात्रा सह भ्रमण के बाद सभी अपने विद्यालय वापस आये। अपनी स्मृतियों को संजोने के लिए नव्या ने एक लंबा लेख लिखा जिसे बाद में एक लब्धख्यात पत्रिका ने यात्रा-वृत्त के रूप में प्रकाशित किया। नव्या का जिस दिन विवाह हुआ, उस समय स्नातक की परीक्षा दी थी और विवाह के साथ जब उसने अपने ससुराल में पहला कदम रखा ही था तो उसे सूचना मिली कि वह स्नातक की परीक्षा में न केवल सफल हुई है बल्कि पूरे विश्वविद्यालय में सर्वोच्च स्थान भी प्राप्त किया है।
नव्या को आगे की पढ़ाई के लिए उसके ससुर पारसमणि जी ने प्रोत्साहित किया तो उनकी प्रेरणा से उसने आगे की पढ़ाई शुरु की। पारसमणि जी शिक्षक थे और शिक्षाविद होने के कारण वे शिक्षा के महत्व को न केवल जानते थे बल्कि उसके कई लाभों से स्वयं लाभान्वित भी थे। अक्सर वह अपने छात्रों से कहते थे कि दुनिया में धन-संपत्ति की चोरी हो सकती है, लूटकर दूसरा उसे अपने कब्जे में कर सकता है। पर, एकमात्र शिक्षा ही है जिसकी चोरी नहीं हो सकती और न ही इसका बँटवारा हो सकता है। यह एक ऐसा धन है जो बाँटने पर भी कम नहीं होता। यह मानव-जाति के उज्ज्वल भविष्य के लिए आवश्यक है। सच्ची शिक्षा से मनुष्य के भीतर आत्मविश्वास जागृत होता रहता है। 
पारसमणि जी की प्रेरणा और स्वयं के विचारों-संस्कारों से नव्या के जीवन में अद्भुत संतुलन आ गया था। घर-परिवार और पढ़ाई के बीच का उसका संतुलन देखते ही बनता था। उसे मालूम था कि संतुलित जीवन ही आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करता है तथा बड़े सपने देखने व उसे पूरा करने के लिए प्रेरित करता है। जीवन केवल सुख-सुविधाओं के लिए नहीं मिला है प्रत्युत् दूरगामी और ऊँचे लक्ष्य की प्राप्ति के लिए भी बना है। जो जीवन हमें प्रकृति से विरासत के रूप में प्राप्त है उसकी सार्थकता राष्ट्र-समाज के लिए उत्सर्ग में है। नव्या ने निजी जीवन और अपने दायित्वों के बीच संतुलन बनाने का अद्भुत गुर सीख रखा था। नव्या को यह संस्कार बचपन से ही मिला था कि बड़ों का सम्मान प्रथम कर्तव्य है और जब वह युवावस्था में आयी तब वह संस्कार दूध-पानी की तरह उसके व्यक्तित्व में घुल चुका था। नव्या के ससुर पारसमणि जी ने अपने चालीस वर्षों की सेवा के उपरांत कुछ वर्ष पहले ही अवकाश लिया था और एकमात्र बेटे का ब्याह कर अपने अंतिम दायित्व को भी पूरा कर लिया था। बेटियों का विवाह वे अपने सेवाकाल में ही कर चुके थे। अपने जीवन से पूरी तरह संतुष्ट वे शालीन जिंदगी जी रहे थे। सुबह-सुबह पांच बजे उठकर दो-तीन किलोमीटर सैर के लिए निकलते। मित्रों से गप्प-शप्प करते हुए आठ बजे के करीब वापस आते। तबतक नाश्ता तैयार रहता। नाश्ते के उपरांत चाय-कॉफी पीकर अखबार और मैगजीन पढ़ते। कुछ मिलने वाले आते तो बातचीत करते। इस तरह सामाजिक जीवन की गतिविधियों को जीते हुए दिन बीत जाता था। अवकाश के बाद सामाजिक जीवन की गतिविधियों ने उन्हें जीवंत बना रखा था। नव्या को तो वे अपने जीवन का अनमोल वरदान मानते थे।
नव्या के ठीक विपरीत था अनीला का स्वभाव। वह अहंकार में डूबी हुई पूरी तरह असंयत और अमानवीय थी। उसकी कथनी और करनी में आकाश-पाताल का अंतर था, गोया कथनी मीठी खांड-सी, करनी विष की लोय। इसी के साथ ही गिरगिट की तरह रंग बदलने में भी वह निष्णात थी। समय और अवसर के अनुरूप व्यवहार बदल लेना उसकी दिनचर्या में आवश्यक अंग की तरह शामिल था। सिद्धांतहीन जीवन, लाभ-हानि और अवसर-सुअवसर की परख उसे खूब आता था। यह उसका सौभाग्य था कि वह जीत बाबू की पुत्रवधू थी। हर अमंगल में मंगल ढूंढ़नेवाले जीत बाबू सकारात्मक सोच के धनी और अवकाशप्राप्त प्रोफेसर थे। सादा जीवन, उच्च विचार के तो वे जीवंत प्रतिमान थे। चालीस किलोमीटर के दायरे में उनकी छवि ‘मोटिवेशनल गुरुवर’ की थी। क्या बच्चे, क्या बूढ़े यहाँ तक कि उनसे उम्र में बड़े गाँव-ज्वार के लोग भी उन्हें ‘मोटिवेशनल गुरुवर’ ही कहते थे। इलाके में यही उनकी पहचान थी। क्लास रूम हो या कोई सभा-बैठक उनका मोटिवेशनल सह चमत्कारिक भाषण लोगों को प्रेरित कर जाता था। ऐसे कई अवसर आये जब जीत बाबू ने अपने प्रेरक उद्बोधन से भटके हुए लोगों को सही मार्ग दिखाया था। किंतु, अनीला पर उनके जादुई व्यक्तित्व का कोई प्रभाव अबतक नहीं पड़ा था। उन्होंने हार नहीं मानी थी और प्रयास जारी था।
अनीला की शादी के समय ही उन्हें कई लोगों ने बताया था कि वह जिद्दी है, अहंकारी है और अपने आगे किसी की नहीं सुनती। ‘अधजल गगरी छलकत जाय’ का प्रतिरूप थी वह। अपने गलत तर्कों को भी वह सही साबित करने की पूरी कोशिश करती थी। लोगों ने मना भी किया था। पर, जीत बाबू की सकारात्मक सोच ने लोगों को समझाया कि समय बड़े से बड़े अभिमानियों को भी सीधा-सरल बना देता है। यह जानते हुए भी कि होनेवाली पुत्रवधू जिद्दी है, अहंकारी है, इसके बावजूद अपने बेटे का विवाह अनीला से कर दिया था। दो-चार महीनों तक तो अनीला शांत रही, फिर उत्पात मचाना शुरु किया। उसके अनावश्यक तांडव से परेशान बेटे और पत्नी ने जीत बाबू को ताना, उलाहना देना शुरु किया। पर, जीत बाबू शांत रहे। वे जानते थे कि हर आदमी में कोई न कोई गुण अवश्य होता है। उनकी मान्यता थी कि बुरा से बुरा आदमी भी एकदम बुरा नहीं होता। कुछ न कुछ उसमें अच्छाई जरूर रहती है। अपने इन विचारों पर वे दृढ़ थे। रोज-रोज की चिक-चिक और खिच-खिच के बीच दस वर्ष बीत गए। किंतु, अनीला के स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं आया। घर-परिवार के साथ-साथ पड़ोसियों से भी अनीला का व्यवहार अत्यंत रूखा था। इसलिए पड़ोसियों ने भी उससे बोलना बंद कर दिया था। अनीला इस स्वभाव को अपने वर्चस्व का पैमाना समझती थी। उसको जानने वाले यह समझ गए थे कि अब उसमें बदलाव की कोई गुंजाइश नहीं है, उससे दूरी बनाने और किनाराकशी में ही भलाई है।
अनीला की सासू माँ अपने समय में विज्ञान की पोस्ट ग्रेजुएट थीं। घर-परिवार और अपने बच्चों के भविष्य को देखते हुए उन्होंने सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया था तथा अपने निजी कोचिंग से ही सैकड़ों छात्रों को इंजीनियरिंग-मेडिकल जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलवायी थी। जीत बाबू अपने अवकाश के बाद भी किताबी दुनिया से जुड़े थे और मस्त थे। वे अपने छात्रों से बातचीत में अक्सर कहा करते थे कि दुनिया में असंभव नाम का शब्द केवल शब्दकोशों में है। कोई भी काम चाहे वह कितना भी दुष्कर क्यों न हो, उसकी परिणति उसके संभव होने में ही है। अपने छात्रों की हौसला आफजाई करते हुए कहते थे कि यदि कोई असंभव को संभव कर सकता है तो तुम सब क्यों नहीं कर सकते ? असंभव शब्द को अपने मस्तिष्क के शब्दकोश से बाहर कर दो। देखोगे, सफलता तुम्हारे कदम चूमेगी। शिक्षा प्रेमी जीत बाबू के पूर्व छात्र कहीं न कहीं उन्हें मिल जाते। एक बार विवेक नामक छात्र उन्हें दिल्ली के एयरपोर्ट पर मिला। उसने पाँव छूकर प्रणाम किया और कहा कि वह उनका छात्र रहा है। अभी अमेरिका की एक कंपनी में प्रबंधक है। उसने आभार प्रकट करते हुए कहा कि सर! आप का वह ब्रह्मवाक्य ‘दुनिया में कुछ भी असंभव नहीं है’ ने मेरे ऊपर जादू-सा काम किया और आज मैं जो कुछ हूँ, उसमें उस ब्रह्मवाक्य की बड़ी भूमिका है। विवेक जैसे सैकड़ों छात्र हैं जो प्रोफेसर जीत को अपना आदर्श मानते हैं और उनकी प्रेरणा से भारत ही नहीं विश्व के कई देशों में अपनी-अपनी प्रतिभा से देश का नाम रोशन कर रहे हैं। जीत बाबू अभी सत्तर वसंत पार कर चुके हैं और उनकी सहधर्मिणी पैंसठवां वसंत छूने वाली हैं। संयमित तनावरहित जीवन और योग-प्राणायाम के प्रभाव से दोनों आज भी तंदुरुस्त हैं। सत्तर पार के होकर भी साठ के लगते हैं। लगता है जैसे दोनों ने उम्र चुरा ली है।
हरबार की तरह अनीला आज फिर मायके आयी और वापस जाते हुए उसने फिर वही पुराना जुमला दुहरा दिया, नव्या! मेरे माँ-बाबूजी का ख्याल रखना। हर बार यही जुमला सुनते-सुनते नव्या का धैर्य जवाब दे गया तथा चुपचाप सहन करनेवाली नव्या ने पलटकर पहली बार जवाब दिया- दीदी, एक बात कहूँ। पलटकर अनीला ने तीखी नजरों से देखा। सहसा उसे विश्वास नहीं हुआ कि कोई उसे प्रत्युत्तर भी दे सकता है। नव्या ने बहुत ही मीठे स्वर में कहा- आप हर बार एक ही जुमला क्यों दुहराती हैं ? इसके क्या मानी हैं ? क्या, आप चाहती हैं कि मैं भी आपके जैसा बनूँ ? मेरी आँखें मुंदी नहीं हैं। इन दो-एक वर्षों में मैंने देखा है और मुझे मालूम है कि आप अपने ससुराल में परिवारजनों के साथ क्या व्यवहार करती हैं? आप अपने बुजुर्ग सास-ससुर को सुबह की बनी बासी रोटी-सब्जी रात को और रात में जो रोटी-सब्जी बच जाती है, वह सुबह नाश्ते में देती हैं ? सीधे-सरल सास-ससुर आपसे या किसी से कुछ नहीं कहते, यह उनका बड़प्पन है। आपका अहंकार इतना बड़ा है कि आप को खुद-सा व्यवहार कुशल दूसरा दिखाई नहीं देता। नव्या और भी बहुत कुछ कहना चाहती थी, पर कुछ सोचकर चुप हो गयी। जैसे चोर की दाढ़ी में तिनका होता है और दोषी व्यक्ति स्वयं अपने दोषों से डरता रहता है। लगभग वही स्थिति अनीला की भी थी। उसे अंदेशा था कि कहीं मेरी ही तरह नव्या भी मेरे माँ-बाबूजी से व्यवहार नहीं करे। पर, नव्या के संस्कार उससे इतर थे। नव्या के सास-ससुर दोनों की बातचीत ओट में सुन रहे थे और खुश थे कि अनीला को जवाब देनेवाला आज कोई मिला है। अपनी बेटी के अहंकार और संस्कार से वे क्षुब्ध थे। 
अनीला को नव्या के ये वचन काँटे की तरह चुभने लगे थे। यहाँ रहना दुश्वार लगने लगा था, सो बिना किसी प्रतिकार के वह पीछे मुड़ी। स्कूटी स्टार्ट की और चल पड़ी। नव्या के कहे गए शब्द इस समय अनीला के कानों में ड्रम की आवाज की तरह गूँज रहे थे। स्कूटी चलाते हुए भूल गयी कि वह स्कूटी चला रही है। चौराहे पर बायीं ओर मुड़ते हुए अचानक उसका स्कूटी फिसल गया। वह गिर पड़ी और अचेत हो गयी। उसके मोबाइल से ही पड़ोस के लोगों ने जीत बाबू को सूचना दी। संयोग से जीत बाबू उसी रास्ते पर थे, जहाँ अनीला की दुर्घटना हुई थी। वे उसे अस्पताल ले आये। 
चार दिनों तक अचेतावस्था में वह बुदबुदाती रही और जब सचेत हुई तब पहली नजर में सामने जीत बाबू और अपनी सासू माँ को पाया। पीछे पारसमणि जी,  दशस्यंदन गुरुजी और परिवार के सभी सदस्य थे। अनीला के केवल पाँव ही नहीं टूटे थे बल्कि अन्य गहरी चोटें भी थीं। शरीर का पोर-पोर दर्द कर रहा था। नर्स ने उसे बताया कि आपके अस्पताल में आने के बाद से ही ये दोनों बुजुर्ग चार दिनों से सोये नहीं हैं। अस्पताल के बेंच पर बैठे-बैठे कभी-कभी ऊँघ लेते हैं। अनीला को अतीत में उनसे किये गये अपने व्यवहार पर आत्मग्लानि होने लगी थी। झटके में उसका हृदय-परिवर्तन हो गया था। चार दिन की अचेतन अवस्था में उसके पूर्व के अभिमान-कुसंस्कार धुल चुके थे। उसकी आँखों में आँसू तो थे ही, क्षमा मांगने के भाव भी थे। जीत बाबू जानते थे अहंकार का अंत एक न एक दिन होना ही था। यह उनके विश्वास की ताकत थी, जो अनीला को ढाढ़स दिये हुए था। अमंगल के पीछे का मंगल अब दिखाई देने लगा था।

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