कहानी: बोतलबन्द जिन्न

कृष्णलता सिंह
        अर्चना पाण्डे अपनी परसों  की सर्जरी  के लिये कोरोना टेस्ट  कराने जा रही थीं। आदतानुसार कार में  बैठते ही सुरसा के मुख की तरह बढ़  आये वाट्सप मैसेज़ को डिलीट  करने लगी। अचानक  तरुण के बार बार फ्लैश होने वाले मैसेज ने  उनका ध्यान खींचा। मैसेज डिलीट करना छोड़ कर उसका मैसेज देखा -"मैम ! मेरे पापा बहुत सीरियस है। मुझे तुरन्त आपसे पौने दो लाख रुपये चाहिये। पापा की बाईपास सर्जरी आज होनी है। दोपहर बारह बजे तक पैसा जमा करना है। कुल खर्चा बारह लाख होगा।  दो लाख कम पड़  रहे  हैं। प्लीज मैम! मेरे पापा को बचा लीजिये। इस मुश्किल घड़ी में सबसे पहले आपकी ही याद आई। मैं आपके घर के नीचे आधे घंटे में आ रहा हूँ। प्लीज  मना मत करना। आपसे बहुत उम्मीद है।  आप चेक मेरे नाम लिख देना, जिससे तुरन्त कैश करा सकूँ। मैम बहुत अर्जेन्ट है। तीस अप्रैल को ब्याज सहित अमाउंट आपके एकाउंट में आ जायेगा। बस आप ये समझ लो कि आपने एक महीने के लिये उसे फिक्स में डाल दिया है।"
        तरुण उसका कोई सगा या सौतेला संबन्धी नहीं  था।  बल्कि एक प्रतिष्ठित प्राइवेट बैंक में  कार्यरत था, जहाँ  अर्चना का खाता था। पाँच छह सालों  से वही उसका पर्सनल बैंककर था।  पर अब वह दूसरी ब्रांच में  चला गया था।  फिर भी बैंक के सभी छोटे बड़े काम तरुण आराम से करा देता था। सरकारी बैंकों  की तरह  यहाँ लम्बी  कतार में  खड़ा होना, एक काउन्टर  से दूसरे पर भागना, धक्का मुक्की के बीच फॉर्म  भरने आदि  से मुक्ति  थी। वह आराम से कुर्सी  पर बैठकर  कॉफी पीती और बताई जगह पर हस्ताक्षर कर देती,   बस काम हो जाता।  इन पाँच सालों में उसके साथ कुछ अपनापन सा हो गया था।  कभी-कभार  उसका त्यौहारी सीजन में शुभकामना  संदेश भी आ जाते थे।  कई पॉलिसी  उसने तरुण के कहने पर ही ली थी।  पता नहीं उसे कैसे विश्वास था कि तरुण उसका नुकसान नहीं करा सकता है।  परन्तु इतनी बड़ी  रकम की मांग  देखकर  वह कुछ क्षणो  के लिये स्तब्ध रह गयी।  परन्तु मैसेज में  बार बार प्लीज, प्लीज के साथ जुड़े  हुए  हाथों  को देखकर मन  विगलित हो गया। आँखों में  नमी आ गयी।  इंसानियत का   बोतल बन्द जिन्न उसके अन्दर से  निकल कर  सामने हाथ  जोड़कर खड़ा हो गया-'बोल मेरे आका ! इस श्रवण कुमार की कैसे मदद की जाये?' इतनी बड़ी  रकम की बात सोच कर वह पहले हिचकी -'मुझे अमर से पूछना होगा।' जिन्न ने कहा-'अगर उन्होंने  मना कर दिया तो?' 'तो फिर क्या?  मना कर दूँगी,  कोई  बहाना बना दूँगी।' जिन्न  फिर पीछे पड़  गया-'अगर पैसों  की वजह से उसके पापा का आपरेशन  रुक  गया और उन्हें  कुछ हो गया, तो क्या अपराधबोध से तुम सकून से जी पाओगी। ' जिन्न की बातों  से उसे अपने पिता की याद आ गयी, समय से मेडिकल हेल्प ना मिलने से उनकी मृत्यु  हो गयी थी।  'बात तो तुम्हारी सही है, लेकिन अगर तरुण ने आदित्य भट्ट की तरह पैसे नहीं  लौटाये?'
        जिन्न ने उन्हें  फिर उलझा दिया-'अरे!आदित्य साहब की नीयत में  खोट नहीं  था, वह तो कोरोना ने उन्हें निगल लिया।' दिमाग ने अन्तिम  कोशिश  की- 'अगर इसने पैसे नहीं लौटाया तो?' जिन्न झुंझला पड़ा-'क्यों व्यर्थ की बातों  में  समय गँवा  रही हो। बैंक का जिम्मेदार कर्मचारी है। मुश्किल में है,  एक महीने  की बात है।' जिन्न के सारे तर्कों के आगे आत्मसमर्पण करती हुई अर्चना ने तरुण को फोन किया-"बेटा! इस समय मैं हास्पीटल  के लिये निकल चुकी हूँ। मेरे पास चेक बुक नहीं है। एटीएम कार्ड है।" "ठीक है, मैं  आपको हास्पीटल  के गेट पर मिलता हूँ।" कार्ड लेते समय उसने  कहा- 'मैम! कुछ  देर बाद आपको ओटीपी आयेगी,  उसे मुझे फौरन बता देना। '
      तरुण  को एटीएम कार्ड और उसका पिन कोड बता देने के बाद उसे एहसास  हुआ  कि उसने सुरक्षा नियमों का उल्लंघन किया है। सम्भवतः अतिशय भावुकता ने उसकी समझदारी को बन्धक  बना लिया था। दूसरे दिन हास्पीटल में भर्ती  होने के बाद उसने  तरुण से उसके पापा की सर्जरी के  बारे में पूछा, तो उसने कहा-"पापा का ब्लडप्रेशर बहुत हाई हो गया था। अतः आपरेशन नहीं  हो पाया है। ऑब्जर्वेशन पर हैं,  कल ऑपरेशन हो सकता है। आपका कार्ड एक दो दिन में  आपके पास पहुँचा दूँगा। "
      उसे एटीएम की कोई  खास जरूरत  नहीं  थी, अतः वह चुप रही। लेकिन चार दिन बाद जब उसने मैसेजों पर नजर डाली, तो वह हैरान रह गयी। तरुण ने पौने दो लाख की जगह दो लाख अस्सी हजार उसके एकाउंट से निकाले थे।  मुश्किल से अब दस -बीस हजार  खाते में  शेष रह गये थे।  अर्चना  ने सोचा- 'हे प्रभु! मैंने तो सहारे के लिये हाथ दिया था।  उसने तो पूरा पहुँचा पकड़ लिया।  कम से कम ज्यादा रकम निकालने से पहले उसे पूछना चाहिये था। ' बोतलबंद जिन्न ने फिर बाहर आकर उसे समझाया-' एमर्जेन्सी में ज्यादा की जरूरत पड़ गयी होगी। पूछने का टाइम नहीं  होगा जस्ट रिलेक्स और मुझे भी रिलेक्स  करने दो।'  उसके बाद जिन्न बोतल में बन्द हो गया। 
      वह नियमित  उसके पापा  की खैरियत  जानने के लिये मैसेज करती -'पापा सीरियस हैं' का उत्तर  पाकर एटीएम कार्ड  वापस करने की बात  कहने का साहस नहीं जुटा पाती। खैर, पंद्रह  दिन बाद तरुण का मैसेज आया -' आपका कार्ड बैंक में अपने कुलीग सुनील को देकर आया हूँ। आप ड्राइवर  से मँगा लेना।'
      तीन महीने तक तरुण से रकम लौटाने  की बात नहीं की। शराफत का मुखौटा लगाये चुप रही।  सोचा तरुण स्वयं लौटा देगा। तभी श्रीनगर से पारिवारिक आत्मीय मित्र कर्नल अखिल का फोन आया-"अमर!मेरी यूनिट  अमरनाथ -यात्रा  का बन्दोबस्त देख रही है।  पुण्य कमाने का अच्छा  मौका है। फटाफट सपरिवार  हमारे पास आ जाओ।  मेरी पोस्टिंग भी गंगानगर आ गयी है। तीस जुलाई  तक मैं  यहाँ हूँ। "आनन फानन में  कार्यक्रम  बन गया। वह भी चालीस साल पहले देखे कश्मीर के गुलमर्ग,  पहलगाम आदि को फिर से देखना चाहती थी।  पुरानी यादों  को जीना चाहती थी।  मुश्किल  सामने तब आई जब पोता पोती भी साथ जाने के लिये उत्साहित दिखे। तब उसने तरुण से रकम लौटाने की बात की। तरुण ने कहा -"सुबह ग्यारह बजे तक एकाउंट में पैसे आ जायेंगे। आप चिन्ता  न करो। " दूसरे  दिन उसने शाम को ऑन लाइन श्रीनगर की फ्लाइट और अमर नाथ के लिये हेलीकाॅप्टर  से छह टिकट बुक किये। पेमेन्ट करते समय कार्ड चला ही नहीं। यानी एकाउंट में अमाउंट नहीं था। तरुण से पूछा, तो उसने कहा-"पापा की हेल्थ को लेकर कुछ इशू  हो गये थे।  भूल गया। था। मैम !कल  पक्का  डाल दूँगा।' खैर वह कल आया ही नहीं। तबयत खराब  का बहाना बना कर उसे भी यात्रा स्थगित करनी पड़ी। 
      तरुण  के इस व्यवहार  से वह बहुत आहत थी। साथ ही डर भी लगने लगा कहीं  रकम वापस न मिली तो क्या होगा ? कल परसों  करते करते सितम्बर भी निकल  गया। अक्तूबर में  इसी खाते से डेढ़ लाख की किस्त जानी थी। समझ में नहीं आ रहा है कि वह क्या करे?  फोन वह उठाता नहीं था।  शुक्र था मैसेज का जवाब  दे देता था।  उसकी कल परसों  से अज़ीज़ आकर उसने थोड़े तुर्श शब्दों  में  लिखा-' समय पर अमाउंट  बैंक में न डालकर आप  हमारा विश्वास तोड़  रहे हो, मैं  कल बैंक आ रही हूँ। ' इस मैसेज को पढ़ते ही उसका मैसेज आया- "सॉरी मैम! बहुत लेट हो गया। पर मैं  क्या करूँ? संयुक्त  परिवार  में  रहने की सजा भुगत रहा हूँ। पापा की बीमारी का फायदा उठाकर ताया जीऔर उनके  लड़कों  ने पूरा बिजनेस  अपने हाथों में ले लिया हैं। पापा के  इलाज  के लिये भी पैसे नहीं  दिये। माँगने पर घर से ही निकाल दिया। अब हम किराये के मकान में  रहते हैं। मेरी वाइफ ने भी बेबी होने के कारण नौकरी  छोड़  दी थी। अब फिर से ज्वॉइन कर ली है।  उसकी पे आते ही सबसे पहले आपका कर्ज उतारूँगा।  देरी के लिये माफ कर दीजिये। "अर्चना जी फिर गच्चा खा गयी। दिमाग से नहीं सोचा कि दो लाख अस्सी  हजार पे  से कहाँ दे पायेगा। बोतल का सोया जिन्न फिर निकल आया- "तुम्हें  इससे क्या? बेचारा मुसीबत का मारा है। कुछ वक्त उसे और दे दो।"
      एक महीना और हो गया। तरुण  की तरफ से पूरी खामोशी थी। एक दिन अचानक उसके पति अमर ने कहा- "अर्चना! अपनी डीजल की गाड़ी को दस साल से ऊपर हो गये हैं। दिल्ली में  आज  पुलिस ने पकड़  लिया था।  बड़ी  मुश्किल  से जान छूटी। मैंने तुरन्त गाड़ी बुक कर दी है। एक हफ्ते में  नयी गाड़ी आ जायेगी।  याद रखना कल थोड़ी फुर्सत निकाल कर देखेंगे  कि किस  किस एकाउंट से हम पैसा निकाल सकते हैं। फिर उसे एक एकाउंट में इकट्ठा  कर लेना होगा। जिससे कार का पेमेंट हम कर सके। जल्दी से जल्दी यह होमवर्क हमें कर लेना होगा। "अर्चना  की साँस अटक गयी। अब वह अमर से क्या कहेगी? उसने तुरन्त तरुण को फोन कियाऔर अपनी समस्या  बताई। उसने कहा- "मैम !कल दोपहर तक मेरा  पर्सनल लोन का पैसा बैंक में  आ जायेगा।  मैं  तुरन्त आपके एकाउंट में  डाल दूँगा।" लेकिन  तरुण  का कल पता नहीं  कहाँ  अटका  गया था।  शायद रास्ता भूल गया था।  वह पंद्रह दिन तक नहीं आया।। उधर गाड़ी  शो रूम में  आ चुकी थी। उसने - 'कलर पसंद  नहीं  है'- कहकर दस दिन की मोहलत ले ली। अब तरुण  का नया बहाना -"मैम !मैं अपनी लीव और ट्रैवल एलाउंस को इन कैश करने की एप्लीकेशन  डाल चुका हूँ। कल परसों में अमाउंट आपके एकाउंट में आ जायेगा। आपको शिकायत का कोई  मौका  नहीं  मिलेगा।" वह फिर चुप हो गयी। एक हफ्ता  निकल गया। वह बार बार मैसेज बॉक्स  में  जाकर बैंक का स्टेटमेन्ट देखती।  लेकिन 'ढाक के वही तीन पात' देखकर अपनी महामूर्खता पर सिर धुनती रह गयी।
      एजेन्ट का फिर फोन आया। लेकिन दूसरी बार फिर कार के रंग को रिजेक्ट करना पड़ा। अब उसका धैर्य जवाब देने लगा। उसने थोड़े कठोर शब्दों में मैसेज किया-"तरुण!अब पानी सिर से ऊपर  बहने लगा है। मैं  उसमें बुरी तरह से डूब रही हूँ। इसलिये अब कोई बहाना सुनने वाली नहीं हूँ। कल तक  रकम एकाउंट में नहीं आई, तो मैं बैंक आ रही हूँ। " उसका तुरन्त  मैसेज आया-"आपको बैंक आने की नौबत नहीं आयेगी। मेरी वाइफ लॉकर से गहने निकालने गयी है। हम उसके अगेंस्ट  लोन ले रहे हैं। "अर्चना के सामने मुथूट फाइनेंस गोल्ड लोन का विज्ञापन करते अभिताभ बच्चन का मुस्कराया चेहरा घूम गया, जो दस मिनट में  गोल्ड के अगेंस्ट  पैसा दिलाने का वायदा करते हैं। अब सदी के महानायक की  बात का तो भरोसा करना ही था।  थोड़ी तसल्ली भी हुई। मन के जिन्न ने कहा-देखा!तुम्हारे  कर्ज को उतारने के लिये  बन्दा अपनी बीबी के गहने तक गिरवीं रख रहा है।  और एक तुम!  बार बार तकाज़ा करके उसे मानसिक रूप  से प्रताड़ित और लज्जित कर रही हो।  क्या सोचता होगा तरुण अपने मन में। ' जिन्न का यह आरोप  सुनकर उसे भी जिन्न  पर गुस्सा आ गया- 'क्या जमाना आ गया है।  आप मुझ पर दोष मढ़ रहे हो। अपना ही पैसा वापस लेने के लिये रोज रोज कितने बहाने  सुनने पड़ते हैं। भिखारियों की तरह रिरियाना पड़  रहा है,  जैसे पैसा मेरा नहीं  उसका हो। यह कहाँ  की शराफत है? ' जिन्न की जगह किसी और की आवाज़  उसे सुनाई दी- "तुम यह कहावत कैसे भूल गयी- नेकी कर और कुएँ में डाल।" अर्चना  जोर से चिल्लाई- "मैं  इस नेकी को कुएँ  मैं  नहीं  डाल सकती।"
       अस्तु,  पंद्रह  दिन बीतने के बाद भी अमाउंट  बैंक में नहीं आया।  कार के तीन कलर रिजेक्ट करने से नाराज अमर ने कहा- "जब तुम्हारी पसन्द के कलर की कार आसमान से उतरे, तब ले आना। तब तक ओला और उबेर में सफर करो या घर में  बैठो।"
        पूरा महीना बीतने के बाद तरुण ने कहा-"मैम !ड्राइवर  को भेजो। चेक ले जायेगा, जहाँ  डालना हो डाल देना।" यह सुनकर, उसे इतनी खुशी हुई कि कैश होने से पहले ही उसने सारी वाट्सप चैट डिलीट कर दी।  पूरा दिन तनाव रहित बीता। रात में हँसते हुए डिनर लिया और चैन की नींद सोई।  लेकिन जब तीन दिन तक पैसा एकाउंट में नहीं आया, तो उसे चिन्ता हुई,  आखिर चेक कैश क्यों नहीं हुआ? चौथे दिन उसने तरुण से  पूछा, तो उसने कहा-"मुझे  कुछ नहीं  मालूम, आप चाहो तो दूसरा चेक ले लो।" अब अर्चना को तरुण की चालाकी समझ में आई, उसने उसका मुँह  बन्द रखने के लिये चेक दिया था और जब चेक कैश होने के लिये उसकी बैंक में आया, तो उसने उसे रोक लिया।  उसी बैंक  का कर्मचारी  होने का फायदा  उठाया।  अपनी मूर्खता की  सजा तो उसे भुगतनी थी ही।  वह समझ गयी कि तरुण उसे गोल गोल घूमा रहा  है।  फिर उसका फोन आया- "मैम !आज मैंने  दूसरा चेक आपके एकाउंट में  डाल दिया है। परसों तक पैसा आपको मिल जायेगा।"  परसों  तक के लिये फिर तरुण ने उसे खामोश कर दिया।  परसों भी निकल गया। तो अर्चना का दिमाग खटका  'जरूर वह  तरह तरह के बहाने बना कर समय को आगे बढ़ा रहा है।' सबसे ज्यादा  वह आहत हुई  कि तरुण  ने उसे गलत चेक दिया। उसे मूर्ख बनाने की कोशिश  की। इसके लिये वह उसे माफ नहीं  करेगी।  वह बैंक  मैनेजर से उसकी  शिकायत करने के लिये  जाने के लिये तैयार हो गयी। ओला कैप बुक कर रही थी, तभी मोबाइल में तरुण  का मैसेज फ्लैश हुआ, पढ़ा - सॉरी मैम!यह सारी गड़बड़ घर के हालत की वजह से हो रही है। बहुत मुसीबत में हूँ। कोरोना में  मेरे मामा मामी की मौत हो गयी थी।  तब से नानी जी हमारे साथ रहती हैं,  उनको कैंसर है। उनका इलाज  भी चल रहा है। क्या करूँ  समझ में नहीं आ रहा है? मैं आपसे आखिरी चांस माँग रहा हूँ।  शनिवार  को हमारी और मेरी वाइफ की पे आ जायेगी।। मैं  सोमवार को आपके एकाउंट में  पूरा अमाउंट  डाल दूँगा। अगर ना डालूँ तो बेशक मेरे खिलाफ कार्यवाही  कर लेना।" इस मैसेज के बाद  उसके कदम वही ठिठक गये। बोतल का जिन्न फिर मुस्कुरा पड़ा। 

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