सांताक्लाज का पिटारा

प्रकाश मनु

कहानी: प्रकाश मनु


“ओह!” सांताक्लाज ने अपनी लाल टोपी उतारकर फिर करीने से पहन ली। माथे का पसीना पोंछा और धीरे से मुसकरा दिया।
उसके होंठों पर एक मीठी गुनगुनाहट सी थी। बड़ी भली-भली। जैसे मन ही मन कुछ गा रहा हो।
“तो जल्दी ही आने वाला है वो दिन...! हर बार की तरह इस साल का भी मेरा सबसे व्यस्त और हलचलों भरा। पूरी दुनिया के बच्चों के लिए रंग-बिरंगे उपहारों, प्यार-दुलार और... और तमाम जादू वाली चीजों का दिन, जब कि हर बच्चे को मेरा इंतजार रहता है। पूरी रात अजब सी भागमभाग...! अजब सी उत्सुकता, रोमांच और प्यारे-प्यारे उपहारों का मेला...! ओह, कितना अनोखा है यह दिन... !” कहते-कहते सांता के चेहरे पर एक निर्मल उजास सी छा गई।
सच्ची बात तो यह है कि क्रिसमस वाले दिन यहाँ से वहाँ दौड़ते और दुनिया भर के बच्चों की इच्छा पूरी करते, सांताक्लाज एकदम थककर चूर हो जाता था। पर मन में इस बात की खुशी छलछला रही होती कि न जाने कितनों को उसने खुशियाँ बाँटीं, न जाने कितनों के आँसू पोंछे! न जाने कितने बच्चों के सपनों में खिलखिलाए उजली हँसी के फूल...!
पर...उसके लिए सांता को अभी से कितनी तैयारियाँ करनी थीं। कितनी अधिक तैयारियाँ, इसे कोई क्या जाने? अपना विशाल पिटारा उसे सुंदर-सुंदर, रंग-बिरंगे और लुभावने उपहारों से भरना था। और फिर ये सुंदर उपहार क्रिसमस की रात को ही सब बच्चों तक पहुँचाने भी थे। बस, एक ही उसूल था उसका, कि जिसकी ज्यादा जरूरत हो, उसे पहले। और फिर इस बात की चिंता तो उसे थी ही कि कहीं कोई बच्चा जिसे उसकी जरूरत है, छूट न जाए।
बरसोंबरस से चला आता था यह सिलसिला। और अब तो उसे इसी में सुख मिलता था। दुनिया के हजारोंहजार बच्चों से दोस्ती का सुख। “सांता...सांता...सांता...!” वह जिधर भी जाता, हवाओं में गूँजती बस यही पुकार सुनाई देती। नन्हे-नन्हे होंठों की भोली सी पुकार। भला उसे कौन अनसुना कर सकता है?
सो क्रिसमय के आने से पहले ही सांताक्लाज की व्यस्तता बहुत बढ़ गई थी। वह खुश था, बहुत खुश...कि अपने हजारों-हजार दोस्त बच्चों की आँखों में खुशी की चमक भरने के लिए वह कुछ तो कर पाया। पर सुबह से शाम तक यहाँ से वहाँ, वहाँ से वहाँ दौड़ते-भागते हुए उसका बरसों पुराना खूबसूरत लाल लबादा और लंबी सफेद दाढ़ी भी कुछ धूल-धूसरित और अस्त-व्यस्त हो गई थी। कभी-कभी माथे पर हलकी शिकन और उदासी भी आ जाती थी। पर फिर ध्यान आता कि कोई कुछ भी कहे, उसे तो बच्चों को ढेर सारी मुसकान और खिलखिलाहटें बाँटनी हैं। हर हाल में...! 
और यह बात मन में आते ही उसके दाढ़ीदार होंठों पर बड़ी मीठी, प्यारी मुसकान सज जाती। वह धीरे से ‘जिंगल...जिंगल...’ जैसा अपना कोई मनपसंद गीत गुनगुनाने लगता था।
इधर कोई हफ्ते भर से सांताक्लाज चुपके-चुपके बच्चों के दिल का हाल जानने के लिए पूरी दुनिया में चक्कर लगा रहा था और रात-दिन उसकी यात्राएँ जारी थीं। यहाँ से वहाँ, वहाँ से वहाँ। कुछ ही दिनों में पूरी दुनिया की थका देने वाली परिक्रमा उसे करनी थी, ताकि धरती के बच्चों के दिल का हाल जल्दी से जल्दी जान ले। और इस काम में उसे बड़े अजीब-अजीब अनुभव हो रहे थे। कभी-कभी तो ऐसे-ऐसे दृश्य देखने को मिलते, जो उसकी आँखों में खुब-से गए थे और लगता, वह उन्हें कभी भूल ही नहीं पाएगा।
कई बार सांता के चेहरे पर गहरी उदासी छा जाती। तब एक ही गीत उसके होंठों पर आता, ‘बच्चे, मन के अच्छे...सारे जग की आँख के तारे...!’ और देखते ही देखते सारा दुख, उदासी गायब हो जाती। होंठों पर मंद-मंद मुसकान नाचने लगती। फिर एकाएक उसकी आँखों में उन बच्चों के चेहरे घूम जाते जो जाने कहाँ-कहाँ उसका इंतजार कर रहे थे, और उसके पैरों में पंख लग जाते।
सचमुच, दुनिया भर में कितने ही बच्चे थे जो उसकी बाट जोह रहे थे। अनगिनत बच्चे। इनमें कुछ तो ऐसे कि उसने पक्का सोच लिया था कि चाहे कुछ हो जाए, पर उनके लिए तो वह खिलौने और दूसरे अनमोल उपहार लेकर जाएगा ही। इन्हीं में एक हैरी भी था, जिसके लिए उसने एक सुंदर सी डॉल समेत कुछ अच्छे खिलौने और एक सुंदर सी गरम शर्ट का इंतजाम अभी से कर लिया था। डॉल वही थी, जो हँसते हुए सबको हैट उठाकर ‘नमस्ते’ कहती है और जिसकी हैरी ने फरमाइश की थी। 
“ओह, हैरी यह सब पाकर कितना खुश होगा!” सोच-सोचकर सांता के मन में एक हिलोर-सी पैदा हो जाती थी।
अब तक उसने इतना तो पता लगा या था कि लालपुर मोहल्ले के हैरी के मम्मी-पापा दोनों कोई छोटी-मोटी नौकरी करते थे। वे सुबह-सुबह काम पर चले जाते और हैरी स्कूल जाता। पर स्कूल में कोई बच्चा उसे अपने साथ नहीं खिलाता था, क्योंकि उसके पास ढंग के कपड़े नहीं थे। शाम को आसपास के मोहल्ले के बच्चे भी उसे दूर-दूर ही रखते। इशारों से ही दुर-दुर करते। हैरी की आँखों में आँसू छलछला आते।
“मम्मी, सब बच्चों के पास खिलौने हैं, मेरे पास तो एक भी ढंग का खिलौना नहीं है। बस, एक एलीफेंट है, पर उसकी सूँड़ टूट गई है। कब तक उससे खेलूँ...? और बच्चों के पास कितने सुंदर-सुंदर खिलौने हैं!” उसने बड़े उदास स्वर में मम्मी को बताया।
“ओह, मेरा बेटा...!” मम्मी ने उसे छाती से लगा लिया, “तू तो मेरा लाड़ला बेटा है न, कितना समझदार। तुझे पता है न, हमारे पास ज्यादा पैसे नहीं हैं। जैसे-तैसे तुझे पढ़ा रहे हैं।...फिर अभी तो तेरे लिए गरम कपड़े बनवाने हैं।” कहते हुए हैरी की मम्मी के चेहरे पर भी गहरी उदासी आ गई। कुछ रुककर उन्होंने समझाया, “खिलौने नहीं हैं तो क्या हुआ? तू और बच्चों के साथ खेल लिया कर, हैरी!” 
“मम्मी, मुझे कोई नहीं खिलाता। सब कहते हैं, तेरे पास तो कोई ढंग का खिलौना तक नहीं है। तू हमारे खिलौने भी तोड़ देगा।” कहते-कहते हैरी सचमुच रो पड़ा।
“तो इसी बात पर रो रहा है तू, पागल कहीं का! अरे, इसमें रोने की क्या बात है? जिनके पास पैसे नहीं है, उन्हें भी तो जीने का हक है। फिर तू पढ़-लिखकर लायक बनेगा तो खूब कमाएगा और मम्मी-पापा को भी सुख से रखेगा। बोल, रखेगा ना? तब तक तो हम भी बूढ़े हो चुके होंगे, तेरे पुराने वाले एलीफेंट की तरह!...कहीं ऐसा तो नहीं कि तब तुझे हम भी बुरे लगने लगें, जैसे तुझे अपना एलीफेंट लगता है...?” मम्मी ने हँसते हुए कहा।
“नहीं-नहीं, मम्मी, ऐसा मत बोलो। मैं आप दोनों की खूब सेवा करूँगा। आप लोग इतनी मेहनत करके मुझे पढ़ा-लिखा रहे हैं, तो क्या मेरा कोई फर्ज नहीं है? मैं उसी पुराने वाले एलीफेंट से काम चला लूँगा मम्मी, और आपसे कोई शिकायत नहीं करूँगा।...प्रॉमिस, मम्मी!” हैरी कह रहा था।
“ओह, मेरा राजा बेटा...! तू कितना अच्छा है। मेरा मन तो यह है कि तुझे दुनिया की सारी अच्छी चीजें दूँ। पर हमारे पास पैसे कम हैं, इसी में घर चलाना है। इसी में तेरी फीस और किताबें...! फिर भी हम हिम्मत तो नहीं हारे ना, तो तू क्यों परेशान होता है?” हैरी की मम्मी ने उसे दिलासा दिया।
“मम्मी, क्रिसमस आने वाला है। मैंने सुना है, क्रिसमस पर सांताक्लाज सब बच्चों को सुंदर-सुंदर उपहार देता है।...क्या सच्ची है यह बात?” हैरी ने पूछा।
“मैं क्या जानूँ बेटा? सुना तो मैंने भी है कि वह रात में चुपके से आता है और तकिए के नीचे उपहार रखकर चला जाता है। पर...पता नहीं कि वह हमारे मामूली से घर में आएगा कि नहीं। और फिर यहाँ लालपुर में आएगा कैसे? यहाँ तक का तो रास्ता ही उसे नहीं पता होगा। देख नहीं रहे, कितनी तंग, अँधेरी गलियाँ हैं और रास्ता कितना ऊबड़-खाबड़। फिर उसे कैसे पता चलेगा किसमें हैरी रहता है और उसे कौन सा खिलौना चाहिए?”
“मम्मी, सांता आया तो मैं उसे बोलूँगा कि वह मेरे लिए डॉल लाए। बड़ी सुंदर वाली डॉल, जो संजू के पास है। वही वाली मम्मी, जो हैट उठाकर सबको हँसकर नमस्ते कहती है। और हाँ, वह बड़ा अच्छा डांस भी करती है...!” कहते-कहते हैरी की आँखें में खुशी झलमल करने लगी।
दीवार के पीछे कान लगाए सांता यह सुन रहा था। उसने तय कर लिया कि इस बार हैरी को उसकी पसंद की डॉल लाकर देनी ही है। उसका मन भारी था। बार-बार एक ही बात उसके मन में आ रही थी कि एक ओर इतने अमीर लोग हैं। उनके बच्चों के पास ढेर-ढेर बेशकीमती खिलौने हैं, जो यहाँ-वहाँ लापरवाही से पड़े रहते हैं। और दूसरी ओर यह बेचारा हैरी...जो एक खिलौने के लिए तरस रहा है।...जैसे भी हो, हैरी को उसकी पसंद की डॉल तो उपहार के रूप में देनी ही होगी।
यही सब सोचता हुआ सांता आगे बढ़ता जा रहा था, तभी अचानक जॉन से उसकी मुलाकात हुई। कुछ महीने पहले उसके पापा की नौकरी छूट गई थी। रेडीमेड कपड़ों की रोजी गारमेंट्स कंपनी ने घाटे की बात कहकर कई लोगों को झट से नोटिस देकर निकाल दिया था। साथ में दो-दो महीने की तनखा, बस। इनमें जॉन के पापा मैथ्यू भी थे। इसलिए कई दिनों से घर के हालात ठीक नहीं थे। 
उस दिन स्कूल से आते ही जॉन ने पापा को स्कूल की फीस की बात याद दिलाई तो न जाने कितने दुखड़े खुलते चले गए।
“पापा...पापा, मैम कह रही थीं कि जॉन, तुमने अभी तक फीस नहीं दी। अगर तीन दिन में फीस जमा नहीं हुई तो नाम कट जाएगा।” जॉन ने धीरे से स्कूल बैग मेज पर रखते हुए कहा।
तभी मम्मी को भी कुछ याद आया। बोली, “सुनिए, कुछ रोज में क्रिसमस भी आने वाला है। कम से कम जॉन के लिए तो नए कपड़े बनवाने ही होंगे। कहीं से करिए कुछ इंतजाम...!”
“तुम कपड़ों की बात कह रही हो...?” जॉन के पापा बोले, “मैं तो सोच रहा हूँ, किसी तरह इसकी फीस का इंतजाम करूँ। इस बार जमा नहीं की तो स्कूल से नाम कट जाएगा। फिर दोबारा नाम लिखवाना आसान तो नहीं।” उनकी आँखों में गहरी उदासी थी।
“हाँ, यह बात तो है। तो फिर...रहने दीजिए कपड़े। पर जॉन की फीस का तो कुछ इंतजाम करना ही होगा। कहीं से उधार ले लीजिए...?” 
“कोई नहीं देता सूजी! कोई नहीं।...बल्कि जो बड़े नजदीकी दोस्त बनते थे, नौकरी छूटते ही उन सबने भी मुँह फेर लिया।” जॉन के पापा जैसे अंदर ही अंदर रो रहे थे।
“पर फिर होगा कैसे...? कुछ तो करना होगा। हिम्मत रखो।...हिम्मत से बात बन जाती है।” जॉन की मम्मी घोर अँधेरे में भी रास्ता टटोल रही थीं।
“देखो, शायद कुछ बात बने।...मिडास एंड कंपनी के मैनेजर से बात तो की है। इस हफ्ते बुलाया है उन्होंने। पर साफ कहा है, जितनी तनखा वहाँ मिलती थी, उससे आधे पर हम रखेंगे। मैंने हाँ कह दी है, कम से कम घर तो चलेगा...!”
“पहले ही मुश्किल से घर चलता था, तो अब...!” जॉन की मम्मी के चेहरे पर खिंचाव था।
“बड़े अफसरों की इतनी तनखाहें हैं। पता नहीं, हम जैसे लोगों को निकालकर इन्हें क्या मिला? इससे कैसे कंपनी का घाटा पूरा होगा? खैर, जो होगा, देखेंगे। पर पहले जॉन की फीस का इंतजाम तो करना ही है...!” जॉन के पापा मैथ्यू पॉल किसी तरह खुद को सँभाले हुए थे।
सुनकर सांताक्लाज उदास हो गया। उसने मन ही मन तय कर लिया कि जॉन की फीस के लिए कुछ मदद तो करनी ही होगी। साथ ही उसके लिए एक बढ़िया सा केक और चॉकलेट भी वह जरूर लाएगा।
“हिम्मत रखो जॉन, और खुश हो जाओ, खुश...! ऐसे उदास मत रहो। मैं तुम्हें इतना दुखी कैसे देख सकता हूँ?” सांताक्लाज धीरे से बुदबुदाया और फिर तेजी से आगे चल पड़ा। 
*

चलते-चलते सांता एक छोटे से, सुंदर पार्क के पास पहुँचा। जहाँ गुलाब के लाल-गुलाबी फूल थे। खूब हँसी बिखेरते हुए। उनकी भीनी-भीनी खुशबू जैसे आने-जाने वालों का रास्ता रोकती थी। मगर सांता...? उसके तेजी से बढ़ते कदमों को तो किसी और चीज ने ही रोका था।
असल में वहाँ कुछ बच्चे थे, जिनकी बातें उड़ते-उड़ते सांताक्लाज के कानों में पड़ीं। और तभी उसके बढ़ते कदम किसी तेज झटके के साथ रुक गए। उसने देखा, वहाँ सब बच्चे अच्छे कपड़े पहने हुए थे, बस एक नील को छोड़कर। और सब मिलकर उसी का मजाक उड़ा रहे थे। सांता उत्सुकता से उन बच्चों की बातें सुनने लगा। जल्दी ही वह जान गया कि नील के पापा नहीं हैं। माँ बड़ी गरीबी और बेहाली में उसे पाल रही थी। पर नील को गरीबी इतनी नहीं चुभ रही थी, जितनी दोस्तों की बातें। सांता चुपके से एक पेड़ के पीछे छिपकर खड़ा हो गया और उनकी बातें सुनने लगा।
“अरे वाह पिंटू, तेरी पैंट और शर्ट तो बड़ी सुंदर है। लगता है, ब्रांडेड है।” विकी ने पिंटू की तारीफ करते हुए कहा।
इस पर पिटू बड़े रोब से बोला, “और क्या, मेरे पापा तो हमेशा सबसे बढ़िया चीज लाते हैं। सबसे कीमती। सबसे लासानी। वो कहते हैं, पहनो तो दुनिया देखे, इसी में तो मजा है।...और वैसे भी क्रिसमस आने वाला है तो हर चीज शानदार होनी चाहिए। तुझे पता है जैकी, मेरे पापा बहुत बड़ा केक लाने वाले हैं, ड्राई फ्रूट्स वाला। साथ ही बढ़िया-बढ़िया चॉकलेट्स का सुंदर सा पैक। खूब बढ़िया खिलौने भी, म्यूजिक वाले। इनमें बड़ा वाला डिंगो जोकर भी है जी, जो कंप्यूटर गेम्स खेलता है...!”
“मेरे पापा भी इतने खिलौने लाए हैं, इतने खिलौने सुंदर-सुंदर...! इनमें कान हिलाकर ही-ही हँसने वाला टेडीबियर है, उसके आगे-पीछे घूमने वाला रोबो भी। और फिर देखना, हम कैसा सुंदर क्रिसमस ट्री सजाते हैं इस बार? पापा कह रहे थे, इस बार हंड्रेड गुब्बारे और फिफ्टी चाकलेट्स टाँगेंगे क्रिसमस ट्री में। देख के तुम दंग रह जाओगे, हाँ!” विकी ने घमंड से भरकर कहा।
“और एक बेचारा नील है कि...वही पुराने कपड़े।...लगता है, इसके घर तो केक भी नहीं आया। बेचारा...!” पिटू ने मजाक उड़ाते हुए कहा।
सुनकर नील चुप रहा, कुछ बोला नहीं। विकी बोला, “क्यों नील, तुम मम्मी से कह नहीं सकते थे नए कपड़ों के लिए...?”
“तुम्हें बताया तो है विकी, कि मेरे पापा नहीं हैं। मम्मी कितनी मुश्किल से घर चला रही हैं, मुझे पता है सब कुछ। तो फिर मैं कैसे कहता...?” कहते हुए नील का गला भर्रा गया।
“अरे, मम्मी-पापा तो रोते ही रहते हैं। इनकी तो आदत होती है रोने की! तू जबरदस्ती मनवा लेता अपनी बात...” पिंटू गर्दन अकड़ाकर बोला।
“नहीं पिंटू, मेरी मम्मी कहती हैं कि क्रिसमस तो प्यार का त्योहार है। जो अच्छे बच्चे होते हैं, यीशु उन्हें बहुत प्यार करता है।” नील ने धीरे से कहा, और फिर चुपचाप घर की ओर चल दिया।
“जो अच्छे बच्चे होते हैं, यीशु उन्हें बहुत प्यार करता है।...सचमुच, कितनी बड़ी बात कह दी नील ने!” बुदबुदाते हुए सांता भी आगे चल दिया। पर नील का उदास चेहरा अब भी उसके भीतर खलबली मचाए हुए था। उसकी आँखें नम थीं।
कुछ आगे उसे एक छोटी सी बच्ची के सिसकने की आवाज सुनाई दी।
“अरे-अरे, यह क्या...?” सांता ने गरदन घुमाकर देखा तो सामने वाले घर की देहरी पर पिंकी नजर आ गई। साफ लग रहा था, आज उसकी पिटाई हुई थी। पर किसने पीटा उसे, किसने...? जल्दी ही रोने के साथ-साथ उसकी टूटी-टूटी बातों से सांता को समझ में आ गया कि पिंकी की मम्मी बात-बात पर उसे डाँटती थी और उसके भाई चिंटू की हर बात मानती थी। पिंकी दुखी थी और बुदबुदा रही थी, “पता नहीं मैंने क्या कसूर किया है कि सुबह से शाम तक बस पिटाई, पिटाई...पिटाई...! इससे तो अच्छा है कि मैं पैदा ही न हुई होती।”
“नहीं बिटिया, ऐसा नहीं कहते। मैं कुछ करूँगा, जरूर करूँगा।” कहते-कहते सांता दुखी मन से आगे चल दिया। उसके चेहरे पर एक भाव आता था, एक जाता था। धीरे से बुद-बुद करके उसने कहा, “हे भगवान, यह कैसी दुनिया हम बना रहे हैं? आखिर हर छोटे-बड़े इनसान को इज्जत से जीने का हक है या नहीं? और बच्चे...! उन्हें भला कोई कैसे मार सकता है...?”
सांता के कदम कुछ लड़खड़ाने से लगे थे। उसने धीरे से बुदबुदाते हुए कहा, “हमारी इस दुनिया में बच्चों को प्यार भी नसीब नहीं? अरे भाई, तुम उन्हें कुछ और न दो, मगर प्यार तो दो। बच्चे प्यार के भूखे हैं...!”
आगे चलने का मन न था, पर सांता एक चक्कर तो पूरा लगा ही लेना चाहता था। हर हाल में। कुछ आगे चलकर वह फिर एक पेड़ की ओट में खड़ा हो गया। उसके बिल्कुल पास से दो बच्चे गुजर रहे थे। शायद छुट्टी होने पर वे स्कूल से घर वापस आ रहे थे। उनमें से एक दुबला-पतला रमजानी अपने दोस्त राजू से कह रहा था, “मैं कितना दुखी हूँ, तुझे क्या बताऊँ, राजू। मेरे मम्मी-पापा तो हर वक्त बस लड़ते-झगड़ते रहते हैं। इसीलिए तो मम्मी ने आज लंच भी नहीं दिया। जी करता है, कभी घर से भाग जाऊँ...!”
बातें...बातें और बातें...!
किस्से...किस्से... और किस्से...!
“जिस दुनिया में इतने दुख हैं, उसमें साल में एक दिन बच्चों को उपहार बाँट देने से क्या होगा...?” दुखी सांता चलते-चलते एक गहरी उसाँस लेकर रुका, और फिर आगे चल पड़ा।
“दुनिया में इतने दुख हैं, इसीलिए तो तुम्हारी जरूरत है सांता, इसीलिए...इसीलिए...!” अंदर किसी ने पुकारा तो सांताक्लाज के लड़खड़ाते कदम सँभल गए। लगा, खुद करुणामय यीशु ही हथेली पर दीया रखे उसे आगे का रास्ता दिखा रहे हैं।
और सांता चलता गया, चलता गया।...
चलते-चलते रात हो गई। घोर अँधेरे में वह चुपचाप घर की ओर जा रहा था। तभी चलते-चलते उसके कदम गली के नुक्कड़ वाले एक ढाबे के पास जाकर ठिठक गए। रात काफी हो गई थी। पर दो बच्चों की आवाज आ रही थी। इनमें बीनू बरतन माँज था। पास ही उसका दोस्त सत्ते बैठा था।
“तुझे क्या लगता है सत्ते?...क्या सांताक्लाज मेरे पास भी आएगा। मेरे पास...?” बीनू ने बरतने माँजते हुए अविश्वास से पूछा।
“हाँ-हाँ, क्यों नहीं? मैंने तो सुना है, वह हर बच्चे के पास जाता है। बहुत अच्छा है सांताक्लाज। सीधे-सादे और भले बच्चे उसे पसंद हैं...!” सत्ते बोला।
“पर मुझे तो वह जानता ही नहीं। फिर देखो, मेरे कपड़े कितने मैले और पुराने हैं! फटे हुए भी हैं। सांताक्लाज आएगा भी तो अमीर बच्चों के पास। भला मुझे जैसे गरीब बच्चे से मिलने की उसे कहाँ फुरसत?...मेरे तो मम्मी-पापा दोनों ही नहीं हैं, दुनिया में कोई नहीं। एक पुरानी सी कोठरी है बस, रहने के लिए...वह भी ऐसी जगह कि सांता पहुँच ही नहीं सकता।” कहकर बीनू सिसकने लगा।
“तुमने क्यों कहा बीनू, कि दुनिया में तुम्हारा कोई नहीं है? क्या मैं भी तुम्हें अच्छा नहीं लगता...?” सत्ते ने दुखी होकर पूछा। वह आसपास ही रहता था। बीनू से बातें करना उसे अच्छा लगता था।
“नहीं-नहीं, तुम तो अच्छे हो। बहुत अच्छे। हमेशा मुझे हिम्मत बँधाते हो। नहीं तो पता नहीं मेरा क्या होता...?” रोकते-रोकते भी बीनू की रुलाई छूट गई। 
“रोओ मत बीनू, मुझे भरोसा है कि सांताक्लाज आएगा तुम्हारे पास...!” सत्ते बोला, “मेरी मम्मी कहती है, जो अच्छे और भले बच्चे हैं, सांताक्लाज उन्हें बहुत प्यार करता है।”
सांताक्लाज रुका। उसने हौले से अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरा, और कुछ सोचता हुआ आगे चल दिया।
*

“ओह, कितने प्यारे-प्यारे बच्चे...! और इससे भी बढ़कर तो यह कि उनका पक्का यकीन है मुझ पर, कि सांता आएगा और...और...और...! सच्ची-मुच्ची बच्चों का दोस्त होने से बड़ी खुशी इस दुनिया में कुछ और नहीं, और कैसे कहूँ कि मैंने वह हासिल की है, मैंने...!!”
सोचते हुए सांता के हृदय में एक मीठी हिलोर सी उठी और आँखों में आँसू छलछला आए। 
“अफसोस, लोगों के जीवन में सच्ची खुशी के पल कितने कम हैं। पर वे चाहें तो क्या नहीं हो सकता, क्या नहीं! आखिर बच्चे इस दुनिया में ईश्वर का रूप ही तो हैं, उसका सबसे भोला और निर्मल रूप...!!” सांताक्लाज ने सोचा और एकाएक तेजी से आगे चल पड़ा।
वह चलता गया, चलता गया, चलता गया...! उसे तरह-तरह के अनुभव हो रहे थे। इतनी बातें, इतने दृश्य...कि उसका मन उदासी से भर गया। दुनिया में कितनी अमीरी, कितना पैसा है, फिर भी लोग कितने बेहाल हैं। पता नहीं क्यों लोग अपने से बाहर निकलकर देखना और सोचना ही नहीं चाहते? इसीलिए तो दुनिया में इतने दुख हैं। कोई नहीं समझता कि सिर्फ प्यार बाँटने से ही दुनिया के दुख कम होते हैं।
सांता कुछ दुखी था, पर फिर उसके मन में वही चक्कर चल पड़ा कि किस बच्चे के लिए क्या-क्या करना है...? उसके मन में एक-एक बच्चे की तसवीर उभर आई। हैरी, जॉन, नील, पिंकी, रमजानी, बीनू, सत्ते...और न जाने कितने बच्चे। कोई किसी गली, कोई किसी मोहल्ले या कॉलोनी में। पर दिल सबके एक जैसे।...बस, अब अपने सुंदर उपहारों के साथ उन तक पहुँचना है, चाहे जैसे भी हो, पहुँचना है।
“बच्चे नहीं जानते कि क्रिसमस की मीठे सपनों वाली रात में उनके दोस्त सांता ने उनके लिए कितनी भागदौड़ की!...हालाँकि क्या इसमें खुद मुझे खुशी नहीं मिलती? सच पूछो तो खुशी एक ऐसी मिठाई है कि जितनी बाँटो, उतनी बढ़ेगी। वह बाँटने से कम नहीं होती, बल्कि बढ़ती है। यकीनन...यकीनन...!!” सांता ने मुसकराते हुए अपने आप से कहा और धीरे से ‘जिंगल..जिंगल’ गाना शुरू कर दिया।
*

क्रिसमस वाले दिन सुबह से ही सांताक्लाज की खूब व्यस्तता थी। सच पूछो तो अपरंपार।
दिन भर बच्चों के उपहार इकट्ठे करके वह अपने बड़े से पिटारे में भरता रहा। पिटारा इतना भर गया कि उसे बंद करना ही मुश्किल था। सांताक्लाज को बड़े जतन से उसे बंद करना पड़ा। जैसे ही शाम घिरी और अँधेरा हुआ, सांता ने अपनी बग्घी को सुंदर खुशबूदार गुलाबों और रंग-बिरंगी झंडियों से सजाकर उसमें उपहारों वाला बड़ा सा पिटारा रखा। फिर उसकी बग्घी झटपट सड़क पर दौड़ने के लिए उतर आई। सांता का दिल मारे आनंद के बल्लियों उछल रहा था। अब उपहार बाँटने का समय नजदीक आ गया था। पर इससे पहले वह जल्दी से जल्दी क्रिसमस के सुंदर दृश्यों और जगह-जगह सजाए गए क्रिसमस ट्री की मोहक झाँकियों को अपनी आँखों से देख लेना चाहता था!
बड़ी देर तक वह अपनी बग्घी को गलियों और सड़कों पर यहाँ-वहाँ दौड़ाता रहा। बीच-बीच में रुककर लोगों के घर सजाए गए क्रिसमस ट्री देखता और सिर हिलाकर अपनी खुशी प्रकट करना न भूलता। उस समय उसकी टोपी का फुँदना भी हिलता, जैसे वह भी क्रिसमस के आनंद में थिरक रहा हो। किसी-किसी ने तो पूरे घर को लाइटों से सजा दिया था, पर लाखों घर पूरी तरह अँधेरे में थे। 
एकाएक उसे वे बच्चे याद आए, जिनके चेहरों पर गहरी उदासी थी। जरूर उनके भीतर भी ऐसा ही अँधेरा होगा, जैसा इन घरों में पसरा हुआ है।
सांता को इंतजार था रात के अगले पहर का। आधी रात, ताकि बच्चे सो जाएँ। जब बच्चे अपने सपनों की दुनिया में खोए हों, तभी तो उन्हें सरप्राइज देने का मजा है—उसने सोचा। बस, वह चुपके से गहरी नींद में मुसकराते बच्चों के सिरहाने उपहार रखकर आ जाएगा। चुपचाप।
“तब तक क्यों न दूर-दूर की सैर की जाए?” सांता ने सोचा और उसकी बग्घी दुनिया के एक देश से दूसरे देश, एक शहर से दूसरे शहर में दौड़ने लगी। हर जगह उसे ऐसे दृश्य देखने को मिलते कि खुशी और उदासी के रंग बार-बार उसके चेहरे पर आ-जा रहे थे।
धीरे-धीरे सड़कें और गलियाँ सूनी होने लगीं। लोग छोटे-छोटे समूहों में अपने-अपने घरों की ओर जा रहे थे। कुछ देर में हर ओर सर्दी की ठंडी हवा के थपेड़ों के साथ एक शांत सन्नाटा पसर गया।
तभी अचानक सांता को याद आया, अपना उपहारों वाला पिटारा। उसे अब खोलने का समय आ गया था। सबसे पहले उसे हैरी की याद आई और उसकी बग्घी शहर के लालपुर मोहल्ले की ओर दौड़ पड़ी। एकदम ऊबड़-खाबड़ रास्ता। बड़ी मुश्किल से मिला हैरी का घर। सांता बहुत चुपके से उसकी चारपाई के पास पहुँचा, ताकि उसकी नींद न खुले। पर हैरी की नींद फिर भी खुल ही गई। 
सांता को देखकर जैसे उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि सचमुच सांता उसके पास आया है। वह खुशी के मारे रो पड़ा। सांता ने उसके सिर पर हाथ फेरा, तो वह धीरे से बुदबुदाया, “सांता...सांता माई फ्रेंड! तुम मेरा उपहार लाए हो? जरूर लाए होगे! मेरी वह प्यारी डॉल जो हैट उठाकर सबको नमस्ते...!” और सांता ने उसे बड़ा सा पैकेट पकड़ाया तो वह ‘थैंक्यू’ कहकर उसे पकड़े-पकड़े सो गया।
सांता मुसकराया। सोचने लगा, “शायद हैरी को लगा होगा कि यह भी एक सपना है...!” उसके चेहरे पर एक मीठी, शरारती मुसकराहट थिरक उठी।
फिर सांता ने अपनी बग्घी जॉन के घर की ओर मोड़ दी। जॉन का घर वाकई बड़ी तंग और अँधेरी गलियों में था। कहीं-कहीं तो इतना तंग रास्ता और सँकरे मोड़ थे कि बग्घी को वहाँ से निकालने में बड़ी आफत आई। फिर जगह-जगह गड्ढे, ऊबड़-खाबड़ रास्ता। जहाँ-तहाँ कीचड़ और कूड़े के ढेर। पर सांताक्लॉज ने जान के घर पहुँचकर ही दम लिया। गनीमत थी कि उसके घर की खिड़की खुली थी। 
“ओह, शुक्र है...प्रभु का लाख-लाख शुक्र!” बड़ी देर बाद सांता के चेहरे पर मुसकान आई। उसने बग्घी पर खड़े होकर देखा, खिड़की उसकी पहुँच में थी। बस, वहीं से उसने झटपट टॉफी और चाकलेट वाला पैकेट सरकाया। उसी पैकेट में उसने ऊपर-ऊपर जॉन की फीस के रुपए भी रख दिए थे। पूरा पैकेट धीरे से उसके सिरहाने के पास जाकर टिक गया। 
देखकर सांता खुश था। आनंदमग्न!...वह किसी छोटे बच्चे की तरह किलक पड़ा। पर फिर जल्दी ही उसने अपनी खुशी को दबा लिया और अपने अगले पड़ाव के बारे में सोचा।
अब सांता ने बग्घी को नील के घर की ओर मोड़ दिया। तेजी से दौड़ती उसकी बग्घी कुछ ही देर में नील के घर के पास आकर रुकी। नील का घर एक बहुमंजिली इमारत में ऊपर वाली बरसाती पर था।...पर वहाँ तक पहुँचा कैसे जाए? सीढ़ियों पर बड़ा सा पीतल का ताला लटक रहा था। ऊपर जाने का कोई और रास्ता भी नहीं। 
तो अब क्या हो...? सांता परेशान।
सांता ने गौर से इधर-उधर देखा, तो उसकी निगाह लोहे के एक पाइप पर गई, जो ऊपर तक चला गया था। वह जैसे खुशी के मारे चिल्ला पड़ा, “वव्वाह...! मिल गया...मिल गया रास्ता...!! अरे, यही लोहे का पुराना पाइप! शायद बारिश के पानी के निकास के लिए यह पाइप लगाया गया हो। ठीक है, पुराना है, पर अभी तो मजबूत लगता है। तो क्यों न इसी के सहारे...!”
अब देर करने की भला क्या जरूरत थी? सांता ने झट पानी के पाइप के सहारे ऊपर चढ़ने का फैसला किया और फिर तेजी से अपनी योजना को अंजाम देना शुरू किया। उसे इस तरह ऊपर चढ़ते हुए खुद हँसी आ रही थी। पर फिर अपना निश्चय याद आया कि जैसे भी हो, नील को क्रिसमस पर उपहार देना ही है। आखिर सांता पानी के पाइप के सहारे ऊपर चढ़ने में कामयाब हो ही गया। इस कोशिश में उसका लाल चोगा एक-दो जगह नुकीली कील में उलझने से फट गया। माथे पर हलकी सी खरोंच भी आई। पर नील के पास पहुँचने की खुशी इस सबसे बढ़कर थी।
अपने इस अद्भुत करतब के जरिए सांता जिस समय नील के पास पहुँचा, वह गहरी नींद में था। पर दोस्तों की हँसी-मजाक में कही गई तीखी बातों ने उसे शायद रुलाया भी था। इसीलिए उसकी सोते हुए भी उसके गाल पर आँसू की कुछ बूँदें दिखाई पड़ रही थीं। सांता ने नील को एक बड़ा सा केक उपहार में दिया। नीले रंग की एक सुंदर पैंट और नारंगी शर्ट भी। साथ ही अपने हाथ से लिखकर एक प्यारी सी चिट्ठी भी रख दी, जिस पर मोती जैसे सुंदर अक्षरों में उसने लिखा था—
‘तुम बहुत अच्छे बच्चे हो, नील। बहुत अच्छे।...मेरा दिल तुम्हारी बातें याद करके आनंद से भर जाता है। तुम जिंदगी में बहुत आगे निकलोगे और सबको खुशियाँ बाँटोगे। मुझे पता है, तुम्हारे दिल में बहुत नेकी और उजाला है। प्रभु का एक प्यारा अंश तुममें है। यही तुम्हारी सबसे बड़ी दौलत है। और इसीलिए यीशु तुम्हें प्यार करते हैं।...
तुम्हारा दोस्त, सांता’
*

नील को उपहार देने के बाद फिर शुरू हुई उसी तरह पानी के पाइप के सहारे ही उतरने की कवायद। पर सांता उतर रहा था तो एक गड़बड़ हुई। पुरानी दीवार की कुछ ईंटें खिसकीं और नीचे सड़क पर जाकर गिरीं। शोर सुनकर गली के कुत्ते जाग गए और उनकी भीषण भौं-भौं...भौं-भौं ने आफत कर दी। सांता को डर था, किसी ने उसे इस तरह पाइप से उतरते देख लिया तो क्या सोचेगा? उसने जितनी फुर्ती दिखा सकता था, दिखाई। किसी तरह उतरकर वह झटपट बग्घी में सवार हुआ और फिर बग्घी को जितना तेज दौड़ा सकता था, दौड़ा दिया।
“ओह...! आज की तो यह अद्भुत यात्रा याद रहेगी...याद रहेगी सचमुच!...और सुबह उठकर नील जब अपने सुंदर उपहारों के साथ-साथ वह चिट्ठी देखेगा तो कितना खुश होगा, कितना खुश!” सांता ने एक गहरी साँस ली और पल भर के लिए आँखें बंद कर लीं। इस समय उसका पूरा चेहरा एक अलौकिक रोशनी से दिप-दिप कर रहा था। फिर वह अगले पड़ाव की ओर चल पड़ा।
अब सांता की बग्घी अपरंपार तेजी से उस छोटी सी बच्ची पिंकी के घर की ओर बढ़ रही थी, जिसे घर में हर वक्त डाँट पड़ती थी और इसी चक्कर में वह जाने-अनजाने सब गलत कर देती थी। उसके आँसू और सिसकियाँ सांता के मन को भारी कर रहे थे। उसने सोती हुई पिंकी के पास चाकलेट, टॉफियाँ, एक सुंदर सी लाल फ्रॉक रखी। और हाँ, एक हँसी का पिटारा भी, जिसमें किस्म-किस्म के जोकर अपने मजेदार किस्से-कहानियों और चुटकुलों से हर किसी का दिल खुश कर देते थे।
“यह पिंकी के लिए अच्छा उपहार है, शायद एकदम सही...! उसे इसकी जरूरत थी।” सांता धीरे से बुदबुदाया।
सांता वहाँ से चलने को हुआ, पर नहीं, कुछ था जो उसके पैरों को अभी जकड़े हुए था। भला क्या...? तभी सांता की नजर अपने विशाल पिटारे के एक कोने में रखे गुलाब के पौधे पर गई। 
“ओह, मैं भी कितना भुलक्कड़ होता जा रहा हूँ! यह गुलाब के सुंदर फूलों वाला पौधा मैं पिंकी के लिए ही तो लाया था। पर हड़बड़ी में भूला ही जा रहा था। अच्छा रहा कि मुझे याद आ गया, वरना फिर इतनी दूर से दौड़कर आना पड़ता...!” सांता हँसा तो उसकी उज्ज्वल हँसी उसकी लंबी सफेद दाढ़ी पर शुभ्र चाँदनी की तरह फैलती चली गई।
सांता ने गुलाब का पौधा उठाया और बड़े उत्साह से पिंकी के लॉन में एक जगह गड्ढा खोदकर लगा दिया। सच ही उन गुलाबों की खुशबू बड़ी लाजवाब थी। सांता ने होंठों में ही बुदबुदाकर कहा, “बस पिंकी, अब तुम्हारी मुश्किलें खत्म। इसलिए कि यह गुलाब का पौधा असल में प्यार का पौधा भी है। इसकी खुशबू दिलों में बस जाती है और सारी बुराई खत्म कर देती है। इसके आसपास रहने वाला कोई किसी को डाँट ही नहीं सकता। तो यानी कि अब तुम्हारी मम्मी या घर के लोग तुम्हें नहीं डाँटेंगे। खुश रहो पिंकी। खुश और अलमस्त...!”
फिर सांता की बग्घी रमजानी के घर की और दौड़ पड़ी। रमजानी के सिरहाने चॉकलेट, टाफी और रंग-बिरंगे गुब्बारों का पैकेट रखने के बाद सांता ने उसके लॉन में भी वैसा ही प्यार की महक वाला सुर्ख गुलाब का एक पौधा लगाया। फिर धीरे से बुदबुदाया, “तुम्हारे मम्मी-पापा अब नहीं झगड़ेंगे रमजानी, कभी नहीं...! और हाँ, अपनी गलती के लिए वे शर्मिंदगी महसूस करेंगे। तुम्हें अब पहले की तरह परेशान नहीं होना पड़ेगा, मेरे प्यारे रमजानी!”
फिर सांता ने बग्घी को ढाबे पर बरतन मलने वाले बीनू के घर की ओर दौड़ा दिया। पर यहाँ का रास्ता तो और भी बेढब था। सांता को बड़ी मुश्किल आई। अंत में तो इतनी तंग और टेढ़ी-मेढ़ी सी गली आ गई कि उसमें बग्घी जा ही नहीं सकती थी। फिर एक मुश्किल यह कि आधी रात के समय सांता की बग्घी को देख, गली के सारे कुत्ते मिलकर जोर-जोर से भौंकने लगे थे।
सांताक्लाज को बग्घी दूर ही रोककर पैदल चलना पड़ा। रास्ता बड़ा टेढ़ा-मेढ़ा था और उसमें जगह-जगह कंकड़-पत्थरों के ढेर थे। कुत्तों की भौं-भौं के बीच सँभलकर चलते हुए सांता को एक-दो बार तो ठोकर भी लगी। एक बार एक खुले मैनहोल में पैर आ जाने से वह गिरते-गिरते बचा। बड़ी मुश्किल से वह बीनू के घर तक पहुँच पाया। उसने बीनू के सिरहाने चाकलेट, टॉफियाँ और सुंदर कपड़ों का उपहार रखा। फिर चलते-चलते बीनू के आँगन में खुद अपने हाथों से क्रिसमस ट्री लगाया और उसे खुद रंग-बिरंगी झंडियों, गुब्बारों और चमकीले सितारों से सजाया।
बाहर आकर सांता बग्घी में बैठा और फिर तेजी से दौड़ दी। पर पीछे पड़े दर्जनों कुत्तों से पीछा छुड़ाना उसे भारी लग रहा था। काफी दूर आ जाने के बाद सांता को कुछ चैन पड़ा।
“ओह, बड़ी मुश्किल से निकल पाया...!” सांता ने अपने माथे का पसीना पोंछते हुए कहा।
पर अभी तो हजारों बच्चे थे। सुबह होने में थोड़ी ही देर थी और इससे पहले सांताक्लाज को सबके पास पहुँचना था।
*

उसे याद आया, एक देश में लड़कियाँ पढ़ नहीं पा रही थीं, क्योंकि बड़े लोग नहीं चाहते थे कि लड़कियाँ पढ़ें। सांता ने बग्घी उधर ही दौड़ा दी और हर लड़की को कहानी-कविता की रंग-बिरंगी किताबों से भरा एक सुंदर बस्ता उपहार में दिया। यही नहीं, उसने एक घर के आगे बड़ी सुंदर रँगोली भी बनाई। उस रँगोली के भीतर ढेर सारी किताबें थीं, जैसे वे कह रही हों, “हमसे दोस्ती करो, हम तुम्हें आगे बढ़ने का रास्ता दिखाएँगी!”
फिर वह एक गरीब बच्चे भीमा के घर भी पहुँचा। भीमा के मम्मी-पापा दोनों नहीं थे। गाँव के बाहर अकेला एक झोंपड़ी में रहता था। थोड़ा-बहुत आसपास के घरों का काम कर देता तो लोग दो वक्त की रोटी का इंतजाम कर देते। भीमा को चित्र बनाना अच्छा लगता था और बड़ा होकर वह चित्रकार बनना चाहता था। सांता ने सोते हुए भीमा के पास कलर बॉक्स, पैन, पेंसिल और कुछ ड्राइंग शीट्स रखीं और झोंपड़ी के सामने एक सुंदर सा क्रिसमय ट्री उगा दिया...!
पर अभी तो बहुत बच्चे थे, जो उसका इंतजार कर रहे थे और नींद में भी शायद उन्हें सांता का ही सपना आ रहा था।...
सुबह होने में बस थोड़ी ही देर थी। सांता ने बग्घी को और तेजी से दौड़ाया। उसने मन में बार-बार उन नेक और भले बच्चों के चेहरे उभर रहे थे, जिन्होंने बहुत मन से उसे याद किया था और जिन्हें वाकई उसकी जरूरत थी। उसने धीरे से बुदबुदाकर कहा, “मैं आऊँगा, मैं आऊँगा...मैं जरूर आऊँगा बच्चो! यह मेरा प्रॉमिस है...!”
सुबह सांता वापस लौट रहा था, तो बग्घी में रखा ढेर सारे उपहारों वाला बड़ा सा पिटारा खाली हो चुका था। एक ही रात में उसने हजारों बच्चों को मुसकानें बाँटी थी। पर फिर भी सांता का मन कुछ भारी था।
“अभी तो बहुत मुझे बहुत कुछ करना था, बहुत…! मैं कितनी कोशिश करता हूँ, फिर भी...फिर भी जरूर कुछ न कुछ छूट जाता है, जिसका मलाल मुझे बेचैन करता है।” सांता ने अपने आप से कहा।
“मैं आखिर कितना करूँ? बच्चे मुझे सबसे ज्यादा समझते हैं, पर वे भी यह नहीं समझते कि...!” कहते-कहते सांता के चेहरे पर गहरी उदासी छा गई। 
“ओह, एक सांताक्लाज नहीं, बहुत...बहुत सांताक्लाज चाहिए, इस दुनिया को सुंदर बनाने के लिए...!” उसने सोचा।
पर तभी उसे याद आया, “इतने बच्चे, इतने नेक और अच्छे बच्चों से मैं मिलता हूँ हर रोज। अगर उनमें से कुछ बच्चे दूसरे बच्चों के लिए भी कुछ करने के लिए आगे आएँ, तो क्या नहीं हो सकता...?”
उसके मन में बार-बार एक ही बात गूँज रही थी, “अगर हर बच्चा सांता बन जाए तो यह दुनिया सुंदर बनेगी, सचमुच सुंदर। पर... पर क्या बच्चे तैयार होंगे इसके लिए?”
पर सांता कुछ और सोचता, तभी उसे अनंत दिशाओं में गूँजती हुई आवाज सुनाई दी, “हम बनेंगे, हम बनेंगे...हम बनेंगे सांता! हम सांता के कामों में मदद करेंगे।”
सांता मुसकरा दिया, उसकी उदासी छँटने लगी थी।...
उसने घूमकर अपने बड़े से पिटारे की ओर देखा। लगा कि वह कह रहा है, “इसे जल्दी से भरो सांता, ताकि फिर से बच्चों के पास जाकर मैं उनको खुशियाँ बाँटूँ। पूरे साल भर में सिर्फ एक दिन ही खुशियाँ बाँटने का क्यों होना चाहिए? हर दिन क्यों नहीं...?”
“हाँ वाकई, अब ऐसा ही होगा!” कहते-कहते सांता को लगा, दूर-दूर तक उसे नन्हे-मुन्ने सांता ही सांता नजर आ रहे हैं, जो इस दुनिया को ज्यादा सुंदर बनाने के लिए निकल पड़े हैं।

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