धर्मवीर भारती: कविताओं की वह गजब की संजीदगी

प्रकाश मनु

- प्रकाश मनु

(25 दिसंबर को भारती जी के जन्मदिवस पर विशेष)

मेरी पीढ़ी के लेखकों का कैशोर्यकाल जिन कवियों को बड़ी स्पृहा के साथ पढ़ते, सराहते और उनकी कविता की पंक्तियों को गुनगुनाते हुए, एक अजब से विद्रोह और नोस्टैल्जिया के साथ इस दुनिया के साथ झगड़ते और एक अलग सी दुनिया बसाने के सपनों के साथ बीता है, उनमें धर्मवीर भारती अव्वल हैं। बाद में वहीं अज्ञेय, सर्वेश्वर, रघुवीर सहाय और विजयनारायणदेव साही आए, मुक्तिबोध, धूमिल, नागार्जुन, त्रिलोचन, शमशेर और केदार आए, पर शुरुआत हममें से ज्यादातर ने भारती जी से ही की।

वे इतने सहज लगते थे कि पढ़ते हुए उनकी कविताएँ दिल में उतर जाती थीं और काव्य-भाषा के अनजाने से खुमार के साथ-साथ उनके बिंबों का जादू दिल में नक्श हो जाता था। खासकर भारती जी की ‘कनुप्रिया’ तो सुकुमार कल्पनाओं के जिस अगम्य मायालोक में ले जाती थी और वहाँ जिस अद्भुत रस को अपने बहुतेरे कवि मित्रों के साथ-साथ खुद मैंने बड़ी शिद्दत से महसूस किया, उसे मैं आज तक कोई नाम नहीं दे सका। शायद कभी दे भी नहीं सकूँगा। यह एक ऐसी अद्भुत प्रगीतात्मक कृति है, जिसे धर्मवीर भारती ही लिख सकते थे। बल्कि कहना होगा, सिर्फ और सिर्फ भारती ही लिख सकते थे।

धर्मवीर भारती (25 दिसंबर, 1926 - 4 सितंबर, 1997)
अरसे बाद भारती जी की कविताओं को फिर से पढ़ते हुए आज भी मन दौड़-दौड़कर पुराने दिनों की ओर जाता है। और मन पर पड़े उनके प्रभाव को याद करते हुए हर बार एक ही बिंब आँखों के आगे तिरता है—वह भी उन्हीं की एक विस्मयकारी पंक्ति के साथ—“बाँसुरी रक्खी हुई ज्यों भागवत के पृष्ठ पर...!” इसमें बाँसुरी का संगीत, उसकी मन को लहर-लहर कर जाती आकुल पुकार और एक किस्म की रूमानियत के साथ-साथ भागवत की आध्यात्मिक पवित्रता—ये दोनों भाव एक साथ आते हैं, बल्कि कहना चाहिए कि एकमेक होकर आते हैं।
जहाँ तक याद पड़ता है, अज्ञेय के ‘दूसरा सप्तक’ से भारती जी को पहलेपहल जाना था, जहाँ उनकी कविताओं की भाषा की रवानगी और गहरी रूमानियत कभी मुग्ध तो कभी चकित करती थी। पर साफ कहूँ तो उनके आकर्षण के साथ-साथ कुछ-कुछ अधूरेपन की-सी प्रतीति होती थी, जैसे कवि शरीरी स्वादों में कैद होकर रह गया है और चाहकर भी उनसे बाहर नहीं निकल पा रहा। पर फिर हाथ लगी ‘कनुप्रिया’ और सब कुछ बदल गया। ‘कनुप्रिया’ को पढ़ा तो लगा कि मेरे भीतर-बाहर बहुत कुछ बदल-सा गया और भारती जी भी मेरे लिए पहले सरीखे नहीं रह गए। वे कुछ से कुछ और हो गए हैं। अभी तक जाने हुए भारती जी से बहुत बड़े। ‘कनुप्रिया’ पढ़ते हुए अठारह-उन्नीस बरस की उस तरुणाई में मैं कैसे बौरा गया था, इसकी अब भी याद है। सोते-जागते उठते बैठते कनुप्रिया की संवेदना और उसके मुग्ध कर देने वाले अछूते बिंब साथ चलते थे, मन को कोमल, बहुत-बहुत कोमल, मृदुल और उदार बनाते हुए। ‘कनुप्रिया’ कविता पुस्तक नहीं, एक देहधारी अस्तित्व बनकर मेरे सामने थी और घड़ी-घड़ी मेरे तसव्वुरात में दस्तक दे रही थी। मुझे महसूस हुआ कि कविता के अभी तक के बने-बनाए फ्रेम तड़के हैं और बहुत-कुछ जो उनके आरपार था, चुपके से झाँकने लगा है। लगा कि कविता की भाषा हवा जैसी हलकी और उत्फुल्ल भी हो सकती है। संजीदगी और पवित्रता की सुवास से मढ़ी हुई। और पहली बार यह रहस्य भी जाना कि अच्छी कविता बिल्कुल अनजाने में सदेह होकर आपके भीतर का एक हिस्सा हो जाती है।

यों ‘दूसरा सप्तक’ में शामिल भारती जी की कविताओं में भी एक दुर्वह आकर्षण था, और उनमें रूमानियत का नशा-सा था, पर जब ‘कनुप्रिया’ पढ़ी तो मैं एकदम उनका होकर रह गया था और बहुत दिनों तक किसी और कवि को पढ़ने की तबीयत ही नहीं हुई। आप किसी अच्छे कवि की कोई विमुग्ध कर देने वाली कविता पढ़ते हैं, तो मन कृतज्ञता के बोझ से कुछ दब सा जाता है। ‘कनुप्रिया’ पढ़कर एक पाठक के रूप में मैंने भारती जी के प्रति बड़ी कृतज्ञता महसूस की थी, कि उन्होंने एक इतनी बड़ी कृति दी—इसकी अब भी अच्छी तरह याद है।

और फिर ‘धर्मयुग’ तो था ही, जो हमें पूरी तरह भारती जी से एकरूप ही लगता था। और उफ, कैसी बेसब्र प्रतीक्षा हम उसकी करते थे। वह था भी कुछ ऐसा ही। सिर्फ एक पत्रिका नहीं, बल्कि हर अंक एक संपूर्ण कृति सरीखा, जिसमें कविता, कहानियों, लेखों, फीचर आदि-आदि में भारती जी कहीं न होते हुए भी हमें सबसे ज्यादा वही नजर आते थे। हर अंक किसी कसे हुए सितार जैसा, जिसमें एक भी तार ढीला नहीं। फिर चाहे गीत-कविताओं की बेहद कलात्मक प्रस्तुति हो, या फिर पाठकों के दिलों को छूती कहानियाँ, धारावाहिक उपन्यास, लेख और फीचर। कोई पत्रिका कैसे किसी लेखक की मुकम्मल रचना हो सकती है, इसकी ‘धर्मयुग’ जैसी मिसालें हमारे यहाँ कम हैं। खासकर जिन दिनों बांग्ला देश के लिए लड़ाई जोरों पर थी, ‘धर्मयुग’ के अंक इतना कुछ लेकर आते थे कि उसके हर अंक का शब्द-शब्द हम पीते थे। लगता था, ‘धर्मयुग’ अब एक पत्रिका नहीं रही, न्याय के लिए लड़ते हुए देश का राष्ट्रदूत हो गया है। और ऐसा, एक नहीं, बहुत बार देखा, जब ‘धर्मयुग’ ने पूरी जनता की लड़ाई, तेवर और भावनात्मक आँधी को आवाज दी और उसे दिशा-दिशा में गुँजाया। लगभग उन्हीं दिनों भारती जी की बातचीत के लहजे में खुली अभिव्यक्ति और जादुई लय वाली कविताओं की ओर ध्यान गया तो लगा, हाँ सचमुच, इतना बड़ा रचनाकार ही पाठकों को ‘धर्मयुग’ सरीखी बड़ी रचना-कृति दे सकता है!

फिर तो ‘सात गीत वर्ष’, ‘ठंडा लोहा’, ‘गुनाहों का देवता’—एक-एक कर उनकी सारी रचनाएँ पढ़ीं। तब साहित्य की बहुत ज्यादा समझ तो नहीं थी, पर मन की किसी स्वाभाविक अंतःप्रेरणा से इतना जरूर समझ में आ जाता था कि ‘गुनाहों का देवता’ पढ़ने में कैसा ही बाँध लेने वाला उपन्यास हो, पर वह ‘कनुप्रिया’ सरीखी बड़ी रचना नहीं है, जिसमें कविता प्रेम, अध्यात्म—सभी एकमेक हो जाते हैं और यह सब किसी शास्त्रीय संगीत के आलाप की तरह मन में तरंगित हो उठता है। और गीत और कविताओं में ‘फिरोजी होंठों’ से ज्यादा ‘नया रस’ और ‘प्रमथ्यु-गाथा’ मन को छूती थी।

मुझे याद है, ‘कनुप्रिया’ जब पहली दफा पढ़ी थी तो बड़ा अचरज हुआ था कि अरे, इन खुली और मुक्त छंद-लय में बहती हुई कविताओं को गीत कहा गया है। क्यों भला? यह कोई छंदबद्ध रचना तो नहीं। पर फिर भीतर मन से ही जवाब आया— ‘नहीं मित्र, जरा गौर से देखो, ये कुछ और ही तरह के गीत हैं। गीत भी जिस अनुभूति-रस और तरल संवेदन के लिए तरसते हैं, उस अनुभूति और संवेदन से छल-छल करते, बहुत-बहुत आर्द्र और कोमल गीत।’ मन हैरान था कि वही शब्द हैं जिन्हें हम रोज बरतते हैं, पर एक सिलसिले में आकर ये एक-दूसरे से ऐसे अदृश्य तार से बँध गए हैं कि लगता है, अरे, ये तो ऐसे ही—बस ऐसे ही पास आने के लिए बने थे। आप इनकी तरतीब थोड़ी बदल दीजिए और आप देखेंगे कि इनका सारा जादू नष्ट हो गया है। इस पुष्पित डाल के सारे फूल बेनूर होकर जमीन पर आ गिरेंगे। 

‘कनुप्रिया’ को इस बार फिर पढ़ा तो लगा कि यह कविता नहीं, महाराग की अभिव्यक्ति है। वह महाराग जिससे यह सारी सृष्टि संचालित होती है और जिसके लिए आचार्य द्विवेदी के उपन्यास ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ की भट्टिनी कहती है कि बाण, यह सृष्टि आनंद से जन्म लेती है और अंत में आनंद में ही इसका पर्यवसान होता है। इसके अलावा भला इसका और क्या निमित्त हो सकता है! कनुप्रिया महज कोई स्त्री नहीं है और कृष्ण केवल पुरुष नहीं। ये दोनों तो उस महाराग के नाभिकेंद्र में केलिरत दो अलौकिक लहरें हैं। ‘कनुप्रिया’ का पहला गीत ही पार्थिव से अपार्थिव की ओर उड़ चलने के लिए पंख दे देता है। यहाँ राधा के अशोक-वृक्ष से कहे गए शब्द हैं, जो मानो अशोक से नहीं, खुद से ही कहे जा रहे हों। और यहाँ अशोक-वृक्ष से जुड़ी एक कौतुक भरी कल्पना सामने आती है कि किसी सुंदर युवती के चरणों के आघात से यह वृक्ष एकाएक पुष्पित हो उठता है—“ओ पथ के किनारे खड़े/ छायादार पावन अशोक-वृक्ष/ तुम यह क्यों कहते हो कि/ तुम मेरे चरणों के स्पर्श की प्रतीक्षा में/ जन्मों से पुष्पहीन खड़े थे!” और आगे कनुप्रिया जो कहती है वह एक स्त्री के रागात्मक मन की समूची कहानी है— 

तुमको क्या मालूम कि
मैं कितनी बार केवल तुम्हारे लिए—
धूल में मिली हूँ
धरती में गहरे उतर
जड़ों के सहारे
तुम्हारे कठोर तने के रेशों में
कलियाँ बन, कोंपल बन, सौरभ बन, लाली बन—
चुपके से सो गई हूँ
कि कब मधुमास आए और तुम कब मेरे
प्रस्फुटन में छा जाओ।

यानी असल में तो यह कनुप्रिया—एक प्रेम-मग्न स्त्री ही है जो किसी अशोक-वृक्ष में ‘कलियाँ बन, कोंपल बन, सौरभ बन, लाली बन’ मधुमास की तरह छा जाती है—और हम कहते हैं कि पेड़ फूलों से लद गया है!
‘कनुप्रिया’ के दूसरे गीत में उसका एक ऐसा अद्भुत आत्म-साक्षात्कार है, जिसमें कृष्ण बाहर नहीं, उसे अपने आप में समा गए लगते हैं—

यह जो अकस्मात्
आज मेरे जिस्म के सितार के
एक-एक तार में तुम झंकार उठे हो—
सच बतलाना मेरे स्वर्णिम संगीत
तुम कब से मुझमें छिपे सो रहे थे।

यहाँ शृंगार कुछ-कुछ अध्यात्म के नजदीक पहुँच जाता है, जहाँ गहरी आकुलता के क्षणों में सारे आवरण हट जाने पर ही आप आत्म से मिल पाते हैं— “पर हाय मुझे क्या मालूम था,/ कि इस वेला जब अपने को,/ अपने से छिपाने के लिए मेरे पास,/ कोई आवरण नहीं रहा,/ तुम मेरे जिस्म के एक-एक तार से झंकार उठोगे...” 

हालाँकि कनुप्रिया को कृष्ण इतनी आसानी से नहीं मिलते। कृष्ण आत्मस्थ और ध्यानमग्न हैं। पूरी तरह खुद में खोए हुए। कनुप्रिया कब पास से गुजरी, कब उसने प्रणाम करके आदर से सिर झुकाया, उन्हें कुछ पता ही नहीं—

घाट से लौटते हुए
तीसरे पहर की अलसाई वेला में
मैंने अकसर तुम्हें कदंब के नीचे
चुपचाप ध्यानमग्न खड़े पाया
मैंने कोई अज्ञात वनदेवता समझ
कितनी बार तुम्हें प्रणाम कर सिर झुकाया
पर तुम खड़े रहे अडिग, निर्लिप्त, वीतराग, निश्चल! 
तुमने कभी उसे स्वीकारा ही नहीं।

बहुत बाद में कनुप्रिय इस सचाई को समझ पाती है कि कृष्ण तो असल में उसी के ध्यान में लीन थे और उन्हें कनुप्रिया के प्रणाम के लिए बद्ध हाथों के जादू ने बाँध लिया है। और सचमुच, यह ऐसा भावनात्मक स्थल है, जब पाठक को लगने लगता है कि भारती जी का जो कनु है और जो कनुप्रिया है—मैं उसे जानता हूँ। बल्कि वे दोनों ही मन की रागात्मक तरंगों की तरह हमारे भीतर बस गए हैं, हमेशा-हमेशा के लिए!

‘कनुप्रिया’ प्रेम-तन्मयता का काव्य है, जिसमें मन और देह के बीच के फासले भी मिटने लगते हैं। प्रेमल क्षणों में अपने आप को घंटों निहारना दरअसल खुद को नहीं, उसे निहारना है, जिसका प्रेम हमारे भीतर-बाहर व्याप्त है और जिसने हमारे जीवन को अर्थ दिया है। कनुप्रिया कृष्ण के आगे एक सवाल रखती है—“यह जो दोपहर के सन्नाटे में/ यमुना के इस निर्जन घाट पर अपने सारे वस्त्र/ किनारे रख/ मैं घंटों जल में निहारती हूँ/ क्या तुम समझते हो कि मैं इस भाँति खुद को देखती हूँ?” और फिर इस सवाल का जवाब भी वही देती है—

नहीं मेरे साँवरे
यमुना के नीले जल में 
मेरा यह वेतसलता सा काँपता तन-बिंब, और उसके चारों 
ओर साँवली गहराई का अथाह प्रसार, जानते हो कैसा लगता है—
मानो यह यमुना की साँवली गहराई नहीं है
यह तुम हो जो सारे आवरण दूर कर
मुझे चारों ओर से कण-कण रोम-रोम 
अपने श्यामल आलिंगन में पोर-पोर
कसे हुए हो।

और ‘कनुप्रिया’ में स्त्री का एक आत्मविश्वासी रूप वह भी है, जिसमें समय को उसने अलकपाश में बाँध लिया है और अब इस निखिल सृष्टि के विस्तार में केवल उसी का होना है—“आओ मेरे अधैर्य/ दिशाएँ घुल गई हैं/ जगत लीन हो चुका है/ समय मेरे अलकपाश में बँध चुका है/ और इस निखिल सृष्टि के/ अपार विस्तार में/ तुम्हारे साथ मैं हूँ—केवल मैं/ तुम्हारी अंतरंग केलिसखी!”

लेकिन अफसोस! इतिहास की यह कैसी अजब विडंबना है कि जो प्रेम, ऊर्जा और शक्ति की अक्षय स्रोत है, वही प्रेम-संगिनी आगे चलकर सबसे निरर्थक हो जाती है। जाने वाला उस पर पग रखकर चला जाता है, युग का नया इतिहास रचने—और जिसने अपनी हृत्तंत्री के तार-तार से उसे बल दिया, धरती और इतिहास को उथल-पुथल करने की महाशक्ति दी, वही नेपथ्य में रह जाती है, अकेलेपन की पीड़ा, उदासी और अंतहीन टूटन के साथ। हाँ, पर विदग्ध राधा का एक सवाल ऐसा है, जो इतिहास के उदात्त कथानकों और महा चरित्रों के आभामंडल के आगे जरूर एक अनुत्तरित सवाल की तरह खड़ा रहेगा—

सुनो कनु, सुनो
क्या मैं सिफ एक सेतु थी तुम्हारे लिए
लीलाभूमि और युद्धक्षेत्र के
अलंघ्य अंतराल में?

बहुत सीधे-सादे अल्फाज में पूछा गया एक महाप्रश्न! और यह सवाल इतना बड़ा है कि लगता है, एक स्त्री ने केवल कृष्ण ही नहीं, राजनीति के बड़े-बड़े महारथियों, धुरंधर विद्वानों और सारी पुरुष-सत्ता को कठघरे में खड़ा कर दिया है। इस सवाल की गूँज-अनुगूँज ऐसी है कि वह कल भी सुनाई देती है, आज भी सुनाई देती है और आगे आने वाले समयों को भी अपनी संवेदना के ताप से प्रश्नांकित करती रहेगी। यही वह बिंदु है, जहाँ भारती जी की काव्य-नायिका प्रेम, अध्यात्म और यथार्थ तीनों का एक अद्भुत संधिस्थल बन जाती है।

सच तो यह है कि ‘कनुप्रिया’ में ऐसे बहुत क्षण हैं, जहाँ कविता मानो एक महाकाश हो जाती है। यही दूर तक व्यप्ति भारती जी को अपने समय के दूसरे कवियों से अलग, अद्वितीय और कहीं ज्यादा स्वीकार्य बनाती है।


[2]

भारती जी के एक और बहुचर्चित संग्रह ‘सात गीत वर्ष’ में भी ऐसा बहुत कुछ है, जिसमें उनकी सदेह उपस्थिति महसूस होती है। उनके जाने के बाद भी। ‘सात गीत वर्ष’ के गीतों में खासी विविधता है, पर पाठकों के दिल के तारों को छेड़ते हुए, एक हलचल पैदा करने की उनकी कूवत तो एक जैसी है। और वही इस संकलन को एक पुख्ता आधार देती है। साथ ही एक अलहदा मिजाज भी, जिससे यह महज कविता संकलन न होकर एक संपूर्ण कृति का अहसास कराता है।

‘सात गीत वर्ष’ के गीतों में एक गहरी प्रश्नाकुलता के साथ-साथ कहीं-कहीं बाहर से भीतर की यात्रा दिखाई देती है और वही सबसे ज्यादा मुग्ध करती है। देह की मांसलता की जगह प्रेम यहाँ एक अचरज की तरह है, जिसे शायद ठीक-ठीक कभी नहीं समझा जा सकता—

प्रभु,
इस रस को
इस नए रस को क्या कहते हैं
जिसमें शृंगार की आसक्ति नहीं
जिसमें निर्वेद की विरक्ति नहीं
जिसमें बाँहों के
फूलों जैसे बंधन के
आकुल परिरंभण की गाढ़ी तन्मयता के क्षण में भी
ध्यन कहीं और चला जाता है
तन पिघले फूलों की
आग पिया करता है
पर मन में प्रश्नचिह्न उभर आते हैं
यह सब क्या है/ क्यों है

साथ ही यहाँ ऐसे बिंब नजर आने लगते हैं, जो नई कविता में बहुत चर्चित और बार-बार उद्धृत हुए। उनमें नयापन भी था और एक अदा भी। ‘शाम : एक थकी लड़की’ ऐसी ही कविता है, जिसकी शुरुआती पंक्तियाँ ही बाँध लेती हैं—
नींद भरी तरलायित बड़री कटावदार आँखें मूँद
शाम
एक सफर में थकी हुई लड़की सी
आई और मेरे पास बैठ गई।

इसी तरह ‘सात गीत वर्ष’ की ‘प्रमथ्यु-गाथा’ एक बहुत बड़े फलक की और भीतर तक मथने वाली कविता है। यहाँ चरित्रों के अतल तक जाने और उसे आज के जमाने से जोड़कर अलग अर्थवत्ता देने की भारती जी की दृष्टि उन आलोचकों को जवाब देने के लिए पर्याप्त है, जो भारती जी को सिर्फ प्रेम और रोमान में बंदी कवि समझते हैं। यह केवल प्रमथ्यु ही नहीं, स्वयं भारती जी भी कह रहे हैं—

ये जो जन हैं, साधारण जन हैं
उनमें से एक-एक के अंदर
मूर्च्छित प्रमथ्यु कहीं बंदी है
अवसर जिसे मिला नहीं साहस कर पाने का

यानी हर शख्स में एक प्रमथ्यु है जो बदलाव लाना चाहता है और उसके लिए जूझना चाहता है। सच पूछिए तो भारती जी की यह आशावादिता ऐसी है, जिसे दिल में सँजोकर ही कोई कवि लेखनी हाथ में लेता है, कोई चित्रकार तूलिका उठाता है और कोई वीर योद्धा तलवार। सब आखिर इसी उम्मीद को लेकर चल रहे हैं कि आखिर कभी तो जड़ता की परतें हिलेंगी और हर शख्स के दिल में प्रमथ्यु जागेगा जो एक नया बदलाव लेकर आएगा—

कोई तो ऐसा दिन होगा
जब मेरे ये पीड़ा-सिक्त स्वर
उसके मन को बेध मूर्च्छित प्रमथ्यु को जगाएँगे
उस दिन
हाँ, उस दिन
अकेला मैं रहूँगा नहीं
सबके हृदयों में मैं जागूँगा
मैं—प्रमथ्यु

भारती जी के ‘ठंडा लोहा’ संकलन का मिजाज भी इससे काफी मिलता-जुलता सा है। खास बात यह है कि इसमें ‘दूसरा सप्तक’ में शामिल बहुत-सी कविताएँ आ गई हैं। इन कविताओं में “ये शरद के चाँद से उजले धुले से पाँव, मेरी गोद में” तथा “इन फिरोजी होंठों पर बर्बाद मेरी जिंदगी” सरीखी काव्य-पंक्तियाँ उसी देह गंध और रोमानियत से सराबोर नजर आती हैं, जो भारती जी की शुरुआती कविताओं का एक खास आकर्षण भी है। पर संकलन की शीर्षक कविता ‘ठंडा लोहा’ एकदम ढंग की और सही अर्थ में एक शक्तिशाली कविता है। एक ऐसी कविता, जो उस रोमान से बहुत परे जाकर जिंदगी की जड़ता के खिलाफ तनकर खड़ी होती है और एक बड़ी पुकार लिए हुए है।

कहना न होगा कि ‘ठंडा लोहा’ उस बड़े दृष्टिफलक को सामने रखती है, जो भारती जी के काव्य को विस्तार ही नहीं देता, बल्कि उसे जमीनी यथार्थ से भी जोड़ता है। वे यहाँ भी अपनी आत्मा की संगिनि को पुकारते हैं, पर अब पुकार ही नहीं, उसकी भाषा भी बदल गई है। यह सचमुच बदलते समयों से मुठभेड़ करके, कहीं भीतर ही भीतर टूट रहे कवि की आवाज है— 

ओ मेरी आत्मा की संगिनि
अगर जिंदगी की कारा में
कभी छटपटाकर मुझको आवाज लगाओ
और न कोई उत्तर पाओ
यही समझना कोई इसको निगल चुका है
इस बस्ती में कोई दीप जलाने वाला नहीं बचा है
सूरज और सितारे ठंडे
राहें सूनी विवश हवाएँ
शीश झुकाए खड़ी मौन हैं
बचा कौन है
ठंडा लोहा! ठंडा लोहा! ठंडा लोहा!

हालाँकि इस संकलन में प्रेम के ऐसे क्षण भी हैं, जो अध्यात्म की सी उदात्तता लिए हुए हैं। ऐसा ही एक बड़ा अद्भुत भावनात्मक मुक्तक—याद पड़ता है—जब पहलेपहल पढ़ा, तभी से मेरे भीतर मानो नक्श हो गया है— 

तप्त माथे पर नजर में बादलों को साधकर
रख दिए तुमने सरल संगीत से निर्मित अधर,
आरती के दीपकों की झिलमिलाती छाँह में
बाँसुरी रक्खी हुई ज्यों भागवत के पृष्ठ पर।

कहना न होगा कि यह प्रेम का देह से परे जाकर सृष्टि के कण-कण में गूँजता संगीत बन जाना है। तप्त माथे पर आकर टिक गए सरल होंठ ऐसे लगते हैं—बाँसुरी रक्खी हुई ज्यों भागवत के पृष्ठ पर! समूची नई कविता में ऐसा बिंब और ऐसी प्रेम-तन्मयता शायद ही कहीं और मिले। और सचमुच भारती जी की कविता की अंतर्धारा भी यही है—“बाँसुरी रक्खी हुई ज्यों भागवत के पृष्ठ पर...!” यह महाराग ही उन्हें जीवन देता है और बार-बार कुछ और रचने के लिए प्रेरित करता है। यहाँ तक कि उनका विद्रोह भी यहीं से शक्ति, ऊर्जा और लड़ने की ताकत लेता है। 

इसीलिए तो हर क्षण सृजन में लीन, थके हुए कलाकार को उम्मीद बँधाने के लिए वे बड़ी आत्मीयता से कंधे थपथपाते हुए, जैसे उसके मन की सारी थकान उतार देना चाहते हैं। अभी तो धरा अधबनी है और चाँदनी के सपने दूर हैं। अभी तो धरती पर स्वर्ग उतारने के लिए बहुत कुछ किया जाना है। तो कोई सृजनशील आदमी थककर कैसे बैठ सकता है? भारती जी के शब्द यहाँ गहरी संवेदना में डूबे हुए हैं, इसीलिए दिल में गहरी हलचल भी पैदा करते हैं—

सृजन की थकन भूल जा देवता,
अभी तो पड़ी है धरा अधबनी।
अभी तो पलक में नहीं खिल सकी
नवल कल्पना की मृदुल चाँदनी,
अभी अधखिली ज्योत्सना की कली
नहीं जिंदगी की सुरभि से सनी।
अभी तो पड़ी है धरा अधबनी,
अधूरी धरा पर नहीं है कहीं
अभी स्वर्ग की नींव का भी पता!
सृजन की थकन भूल जा देवता।

इसी से कुछ-कुछ मिलती-जुलती कविता ‘फूल, मोमबत्तियाँ, सपने’ शहर के उस मध्यवित्त युवक को संबोधित करके लिखी गई है, जिसे लगता है कि दफ्तरी रूटीन में उसके सपने कैद होकर टूट और बिखर रहे हैं। सब कुछ तबाह हुआ जा रहा है। पर भारती जी की कविता यहाँ दर्द के गहरे उतरने पर मिलने वाली एक ज्योति की ओर इशारा करती है, “जिसके मंजुल प्रकाश में सब के अर्थ नए खुलने लगते।” जरा इन पंक्तियों में छिपी सहानुभूति की आर्द्रता देखें— 

यह फूल मोमबत्तियाँ और टूटे सपने
ये पागल क्षण
यह कामकाज, दफ्तर फाइल उचटा सा जी
भत्ता वेतन
ये सब सच हैं, इनमें से रत्ती भर न किसी से कोई कम...
ओ मेजों की कोरों पर माथा रखकर रोने वाले,
यह दर्द तुम्हारा नहीं सिर्फ, यह सबका है
सबने पाया है प्यार, सभी ने खोया है
सबका जीवन है भार और सब जीते हैं
बेचैन न हो
यह दर्द अभी कुछ गहरे और उतरता है
फिर एक ज्योति मिल जाती है
जिसके मंजुल प्रकाश में सब के अर्थ नए खुलने लगते...

यह एक ऐसी कविता है, जिसमें यथार्थ से भिड़ने की कूवत तो है ही, पर साथ ही जिंदगी की एक नई शुरुआत के लिए वह पहला कदम बन जाती है, और एक नई इमारत के लिए नींव का पत्थर भी। बेशक भारती जी की कविताओं और काव्य-चेतना में आ रहे बदलाव की भी यह गवाह है, और इशारों में ही बता देती है कि एक युग जा रहा है और एक नया युग जन्म लेने को आतुर है। 

भारती जी की कविता का यह एक बड़ा और महत्त्वपूर्ण मोड़ है, जिसे गौर से देखने, समझने की जरूरत है।


[3]

सन् 1993 में ‘धर्मयुग’ से मुक्त होने के बाद भारती जी का नया संकलन ‘सपना अभी भी’ सामने आया। कोई चौंतीस बरस बाद। इसी पर उन्हें 1994 में व्यास सम्मान से विभूषित किया गया। संकलन की भूमिका बहुत संक्षिप्त पर मानीखेज है। इसमें भारती जी के दिल की बड़ी कचोट, पीड़ा, उदासी तथा बदले हुए समय और हालात में खुद पर हलका सा अविश्वास भी सामने आता है। वे बहुत सीधे, सहज लहजे में लिखते हैं—

“एक लंबे बहुत लंबे अरसे के बाद मेरा कविता-संकलन आपके हाथों में है। वैसे भी कविताएँ लिखने के बीच-बीच में पहले भी बहुत अंतराल छूटते थे, लेकिन इस अवधि में तो एक कविता और दूसरी कविता के बीच में कभी-कभी तो वर्षों का अंतराल रहा है। इस संकलन में सन् ’59 से लेकर सन ’93 तक की कविताएँ हैं—चौंतीस लंबे वर्ष यानी दो बनवासों की अवधि से भी ज्यादा। इन दो बनवासों की समवेत अवधि के बाद भी घर लौट पाया हूँ या नहीं—पता नहीं।” 

जरा गौर कीजिए, यह घर लौटना क्या है? भारती जी जब ‘धर्मयुग’ में थे, तो कहा जाता था कि उन्होंने अपनी संपूर्ण सृजनात्मकता ‘धर्मयुग’ पर निसार कर दी है और इसीलिए उनका अपना लेखन कुछ थम सा गया है। तो क्या यह घर लौटना एक हलके से पछतावे के साथ फिर से कविता की राह पर आ जाना था, जो शुरू से उनमें बह रही थी और हर दुख और मुश्किल में उनकी ताकत बनकर साथ खड़ी हो जाती थी? ‘धर्मयुग’ से मुक्त होकर भारती जी फिर से उसी कविता के साथ हो लेते हैं। उनके मन में भले ही संदेह की हलकी झाँईं हो, पर न कविता ने उन्हें छोड़ा और न कविता से वे कभी दूर हो सके। कविता एक अंतःसलिला की तरह उनके भीतर हमेशा बहती रही और उनके जीने की शक्ति बन गई।

‘सपना अभी भी’ में कुछ कविताएँ भारती जी की पुरानी रंगत यानी ‘हलके जरतारी’ मिजाज की हैं। पर इसी संकलन में ऐसी बहुत कविताएँ हैं, जो न सिर्फ समय के साथ-साथ उनके बदलते हुए मिजाज की गवाह हैं, बल्कि उनमें एक लंबी यात्रा के अनुभूतिपरक पड़ाव भी देखे जा सकते हैं। जाहिर है, संकलन की ज्यादातर कविताएँ मुंबई में जाने के बाद लिखी गई हैं। इनमें ‘दीदी के धूल भरे पाँव’ कविता मन को सहज ही पकड़ लेती है। कविता अच्छी तो है ही, पर वह इसलिए भी ध्यान खींचती है कि वह मंबई में जाने के बाद लिखी गई पहली कविता है और इसमें हाथ उठाकर पुकारता अपना गाँव, दीदी के धूल भरे पाँव और अगहन की कोहरीली भोर समेत ऐसा बहुत कुछ पीछे छूट जाने की कसक है, जिससे जीवन को अर्थ मिलता है। और उसकी जगह यह जो महानगर की चाकचिक्य है, बहुत झूठी और निरर्थक लगती है—

एक लाख मोती, दो लाख जवाहर
वाला, यह झिलमिल करता महानगर
होते ही शाम कहाँ जाने बुझ जाता है—उग आता है मन में
जाने कब का छूटा एक पुराना गँवई का कच्चा घर
जब जीवन में केवल इतना ही सच था :
कोकाबेली की लड़, इमली की छाँव!

इसी तरह ‘एक कविता इलाहाबाद पर’ में भी भारती जी अजित कुमार को भेजे गए खत में पुराने इलाहाबाद के दिनों की जिंदादिली और मस्ती को पूरी शिद्दत से याद करते हैं—

वही जाड़े की धूप जरतार
जोगिया नैस्टर्शियम अलसाई जमुना
काँपता कोहरा, सड़कें छायादार
अपने पुराने शहर में
सब कुछ वही है प्रिय अजित कुमार,
मगर कुछ है जो अब वहाँ नहीं रहा
चला गया हमारे तुम्हारे गिरधर सर्वेश्वर रमानाथ के साथ
कभी-कभी वापस न लौटने के लिए

मोहन राकेश पर लिखी गई ‘खाली हाथ तुम्हारे लिए’ भी एक उदास कविता है, जो धीरे से दिल में उतर जाती है। मीर की किसी दर्द भरी गजल की तरह, एक गहरी कसक लिए। यहाँ भी पुराने इलाहाबाद की यादें साथ नहीं छोड़तीं और वे बड़ी बेसब्री से दिलो-दिमाग में मँडराती रहती हैं—

काश, मैं तुम्हें दे सकता आज
इलाहाबाद की वह सर्द सुबह
जब काँपती धूप हमारे साये कितनी दूर तक फेंकती थी
काश, मैं ला सकता तुम्हारे लिए
अपनी उसी टूटी साइकिल पर लादकर
वह छत की दोपहर
बेमतलब घूमना, ठहाके, वे निश्छल
धड़कनें विश्वास भरे दिल की

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की ‘सोनार तरी’ पढ़कर लिखी गई कविता में भी खयालों से जमीनी सच्चाइयों की ओर आने की आहट है। आँखों के आगे से स्वप्निल झाँइयाँ उतरने लगी हैं और यह हकीकत सामने है कि—

नहीं-नहीं, कभी नहीं थी कोई नौका सोने की!
सिर्फ दूर तक थी बालू, सिर्फ दूर तक अँधियारा
नहीं दिखा कोई भी पाल, नहीं उठी कोई पतवार
नहीं तट लगी कोई नाव, हमने हर शाम पुकारा

और फिर कवि रवींद्र की जगह अपनी पीढ़ी के दर्द और हकीकत की बात करने लगता है तो स्वर में कुछ और बेबाकी और साफगोई आ जाती है—

हमने भी अनमने उदास धूल में लिखे अपने नाम
हमने भी भेजे संदेश उड़ते बादल वाली शाम
जाग-जाग वातायन से देखी आगंतुक की राह
हाय, क्या गजब थी वह प्यास, हाय, हुआ पर क्या अंजाम
लगते ही जरा कहीं आँच
निकला हर मणि-दाना काँच
शेष रहे लुटे-थके हम
हमको लेने कब आया/ कोई भी चंदन का रथ?

‘अंतरात्मा : एक खाली शाम की बातचीत’ में आत्मा की चर्चा चलने पर भारती जी थोड़े नैराश्यपूर्ण लहजे में अपने भीतर गहरे झाँककर उसकी खोज करते हैं, तो सड़कों पर ‘टुटही साइकिल’ दौड़ाता एक लड़का नजर आता है, जिसकी शक्ल उनसे बहुत मिलती है। फिर अगले ही क्षण उसके चेहरे पर इलाहाबाद के पीछे छूट गए गर्दिश के दिनों की धूल भी नजर आ जाती है— 

एक टुटही साइकिल पर
हवाओं को चीरता
फूलों और कोहरे की परतों में से
हैंडिल सँभालकर गुजरता हुआ
एक लड़का याद आता है...

आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के सबसे काले अध्यायों में से है। अफसोस, बहुत से जाने-माने लेखक-साहित्यकार अपने अचूक अवसरवादी रवैए के कारण इस तानाशाही दमन के पक्ष में खड़े हो गए थे। पर भारती जी उस समय ‘मुनादी’ लिख रहे थे—जनता की आवाज को बुलंद करते हुए सड़कों पर निकल आए एक बहत्तर बरस के बूढ़े आदमी का अभिनंदन करते हुए। और साथ ही तानाशाही के चेहरे को अपने तीखे व्यंग्यात्मक शब्दों की मार से किरच-किरच करते हुए— 

खलक खुदा का मुलुक बाश्शा का
हुकुम शहर कोतवाल का...
हर खासोआम को आगाह किया जाता है
कि खबरदार रहें
और अपने-अपने किवाड़ों को अंदर से 
कुंडी चढ़ाकर बंद कर लें
गिरा लें खिड़कियों के परदे
और बच्चों को बाहर सड़क पर न भेजें
क्योंकि
एक बहत्तर बरस का बूढ़ा आदमी अपनी काँपती कमजोर आवाज में
सड़कों पर सच बोलता हुआ निकल पड़ा है।

‘पर्व’ कविता में भी विनोबा द्वारा आपातकाल को ‘अनुशासन-पर्व’ कहे जाने पर उनका खून जैसे उबल पड़ा है। ‘अनुशासन-पर्व’ देखते ही देखते सरकारी जुमला बन गया। आपातकाल के जुल्मों और हर तरह के अत्याचार के खूनी छींटों को ढाँपने के लिए उसे सर्वोदयी चादर की तरह इस्तेमाल किया गया। लिहाजा तमाम विदूषक और सरकारी खर्चों पर लारियों में ढो-ढोकर लाए गए लोग हैं जो आपातकाल को अनुशासन-पर्व कहकर नाच रहे हैं, गा रहे हैं और खुश हो रहे हैं। वे सबके सब अनुशासन-पर्व के नशे में धुत्त हैं। विडंबना यह कि बहुत से अच्छे और सम्मानित लेखक भी देखते-देखते सरकारी लेखक हो गए हैं और उधर भारती जी की कविता सवालों पर सवाल उठा रही है— 

जो पुरखों के अपराजेय ईमान की तरह पाया है
जिससे उगते सूरज के जयगान की तरह गाया है
हर हारती सचाई को बचाने के लिए जो ढाल की तरह उठी है
बड़े से बड़े झूठ के खिलाफ जो महाकाल की तरह उठी है
वह क्या ज्वार के रेत के पगचिह्न की तरह बह जाएगी
क्या सिर्फ झूठ, सिर्फ झूठ, सिर्फ झूठ की आवाज बाकी रह जाएगी

गुस्से और तीखे व्यंग्य से लबालब इस लंबी कविता का अंत इन पंक्तियों से होता है—

तो,
परवरदिगार
यह तुम्हारी बुजदिली का त्योहार
मुबारक हो तुम्हें, मुझे अपने एकांत में लौट जाने दो
और जो झुके नहीं टूट गए, उनकी
पराजय का विजय-गान गुनगुनाने दो।

कवि के रूप में भारती जी की कविता की सबसे बड़ी ताकत यह है कि उस जमाने में जब कविता सिर्फ कवियों के बीच पढ़ी जा रही थी और आम आदमी से लगभग कट चुकी थी, उन्होंने फिर से कविता को सहज स्वीकार की भाषा दी। ठूँठ किस्म की बौद्धिकता परोसने तथा किस्म-किस्म के ऊटपटाँग प्रयोग करने के बजाय उनकी कविता प्रेम, सौंदर्य, राग-विराग और मानवीय संवेदना की गहनतम अनुभूतियों से जुड़ती है। इसीलिए जो नई कविता से बिदकने वाले साहित्यमना लोग थे, उन्होंने भी भारती जी को बहुत रुचि से पढ़ा और सराहा। बल्कि जो पाठक छायावाद, उत्तर-छायावाद, प्रगतिवाद और गीत-कविता के घोर हिमायती थे, उनमें से भी हम बहुतों का भारती जी की ओर झुकाव देखने लगते हैं।

सच तो यह है कि दिनकर, बच्चन, नागार्जुन, सर्वेश्वर और भवानी भाई के साथ-साथ धर्मवीर भारती भी उन बड़ी रेंज वाले कवियों में से हैं, जिन्होंने कविता की सीमित हदबंदियों और फेंसेज को तोड़कर उसे आम जनता के बीच ले जाने का बड़ा काम किया। नहीं तो हिंदी में ऐसे कवियों की कमी नहीं थी—आज भी नहीं है जिन्हें सिर्फ उनके मित्र-कवि ही पढ़ते और सराहते हैं और अपनी इस महानता से वे कुछ-कुछ आक्रांत भी रहते हैं, कि देखिए जी, हमने क्या लिख दिया जिसे समझने के लिए बहुत बड़ा दिमाग चाहिए!

यों भारती जी ने हिंदी कविता में लोगों की आस्था को बचाया, यह खुद में एक बड़ी बात है। इस लिहाज से उनकी कविता की एक और चमत्कारिक शक्ति है, उनकी लय और अभिव्यक्ति का खुलापन। एक ऐसा जादू जो पाठकों को बाँध लेता है और हमेशा के लिए भारती जी की कविता उनके दिल में घर बना लेती है। नई कविता और समकालीन कविता के नाम पर निरा बे-ताल गद्य परोसने की सुविधा कवियों को मिल गई है और बहुतेरे कवि उसी में अपने कवि-कर्म की इतिश्री समझ लेते हैं। पर भारती जी स्वच्छंद तबीयत के कवि हैं और दिल से दिल की राह कैसे बनती है, यह उनसे बेहतर कोई नहीं जानता। लिहाजा वे यह अच्छी तरह समझते हैं कि बँधे-बँधाए छंद-विधान से हम भले ही मुक्त हो जाएँ, पर कविता ज्यादा से ज्यादा पाठकों तक पहुँचे, इसके लिए उसमें लयात्मकता का जादू तो होना ही चाहिए। एक भिन्न और लचीले किस्म की छांदिकता के बगैर आज भी कविता की गुजर नहीं। 
इधर तो कविता को बिल्कुल गद्य के पैराग्राफ की तरह लिखकर खुद ही पढ़ने और पढ़कर खुश हो लेने वाले कवियों की लगभग बाढ़ आ गई है। ऐसे में भारती जी की कविता को पढ़ना एक राहत भरे सुकून की तरह है, जिसमें कविता सीधे दिल को छूती है और मन की उन परतों तक चली जाती है, जिनके अँधेरे, वीरान कोनों और उदासियों से बात करने वाला कोई नहीं है। भारती जी की कविता हमारे नजदीक आती है तो पूरी तरह हमें अपना बना लेती है। उनमें और हममें कोई दूरी नहीं रह जाती। बहुत आमफहम शब्दों से बुनी गई उनकी कविता में बड़ी सहजता है, पर भूलना नहीं चाहिए कि कविता की यह सादगी भरी बुनावट किसी कवि में छंद, लय और भाषा की उस्तादी के बगैर नहीं आ सकती। और भारती जी में वह है। इसीलिए जितनी बार उन्हें पढ़ें, हर बार वह कविता नए-नए ढंग से हमें छूती और खुद हमारे भीतर के बहुत से अनजाने अर्थों को प्रकाशित करती चलती है। 
एक बात और। भारती जी ने कविताओं के अलावा ‘गुनाहों का देवता’ जैसा अत्यंत लोकप्रिय उपन्यास, ‘गुलकी बन्नो’ सरीखी गहरी संवेदना से छलछलाती कहानियाँ, ‘अंधा युग’ सरीखा युद्ध और जीवन के बड़े प्रश्नों से टकराता नाटक और ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’ सरीखी अपने ढंग की निराली कथाकृति हमें दी। वे बड़े संपादक भी हैं। पर इसमें दो राय नहीं कि मूलतः तो वे कवि ही हैं। सबसे पहले वे कवि हैं, फिर कुछ और। उनके कहानीकार, उपन्यासकार, नाटककार और यहाँ तक कि संपादक में भी उनके कवि की ही व्याप्ति है। बल्कि सच तो यह है कि भारती जी के ये सारे ही रूप, जिनसे उन्हें अपार ख्याति मिली, उनके कवि के ही भिन्न-भिन्न रूप हैं, जिनके बिना न वे बड़े संपादक हो सकते थे, न कथाकार, नाटककार और संपादक।

भारती जी के कवि ने ही उन्हें इतनी व्यापक दृष्टि, संवेदना और उदारता दी कि ‘धर्मयुग’ की लोकप्रियता को बरकरार रखते हुए उन्होंने उसे नव्यतर लेखन के साथ-साथ हिंदी के दिग्गज साहित्यकारों की एक से एक उत्कृष्ट साहित्यिक कृतियों से सजाया। विचारधारा आदि के सारे पूर्वग्रहों को एक ओर रख, उन्होंने जहाँ से जो बेहतर मिल सकता था, उसे बड़ी विनय और शिष्टता के साथ लिया और पत्रिका में बहुत सम्मान के साथ छापा।

हर कोई जानता है कि भारती जी इलाहाबाद में ‘परिमल’ गुट के लेखकों में थे, और परिमल वाले लेखक प्रगतिवादियों के दूसरे ध्रुव पर थे। पर कोई आश्चर्य नहीं कि रामविलास शर्मा सरीखे ख्यात प्रगतिवादी साहित्यकार के भाषा-समस्या पर लिखे गए अधिकतर लेख उन्होंने 'धर्मयुग’ में छापे। रामविलास जी ने एक बार भारती जी की चर्चा चलने पर मुझे बताया था कि “वे अपनी मृत्यु से कुछ ही समय पहले मेरे घर आए। 'व्यास सम्मान’ ग्रहण करने के बाद वे यहाँ मुझसे मिलने आए थे और जहाँ आप बैठे हैं, वहीं बैठे थे। उन्होंने यह बात कही थी कि मुझसे जो लोग मिलने आते हैं, उनमें अस्सी प्रतिशत लोग ऐसे होते हैं, जिन्होंने भाषा-संबंधी आपके विचारों को पढ़ा है और उन्हें पसंद करते हैं—या जो मार्क्सवाद के बारे में आपकी व्याख्याओं से सहमत हैं।” इसी तरह लखनऊ में हुए एक लेखक-सम्मेलन में भारती जी ने सुझाव दिया कि हिंदी-उर्दू का एक सम्मिलित इतिहास लिखा जाना चाहिए, और यह काम रामविलास शर्मा ही कर सकते हैं।

मैं इसे एक संपादक की ‘मुक्तावस्था’ कहता हूँ कि जहाँ से जो भी अच्छा मिलता है, उसे वह झोली में भर लाता है तथा साहित्य और कला के एक से एक बेशकीमती नगीनों से अपनी पत्रिका को सजाकर पाठकों के आगे पेश करता है। भारती जी की झोली बड़ी—बहुत बड़ी थी, इसलिए वे अंत तक एक से एक सुंदर रचनाओं से ‘धर्मयुग’ को सँवारते रहे। 

‘धर्मयुग’ में भारती जी का युग ‘भारती-युग’ कहा जा सकता है और बेशक हिंदी पत्रकारिता का वह स्वर्ण युग था। पर जाने क्यों मुझे लगता है, भारती जी इतने बड़े कवि न होते, तो उनकी झोली इतनी बड़ी और इतने बेशकीमती रत्नों से भरी न होती, जिसके कारण आज भी हम उन्हें संपादन-कला का आचार्य कहते हैं और शायद आज से सौ बरस बाद भी कहेंगे!

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