रत्नेश्वर कुमार सिंह का उपन्यास ‘32000 साल पहले’

समीक्षक: दीप्ति गुप्ता


32,000 साल पहले (पेपर बैक)
लेखक: रत्नेश्वर
प्रकाशक: प्रभात प्रकाशन
प्रकाशन वर्ष: 2022
पृष्ठ संख्या: 192
मूल्य: ₹ 300/-

रत्नेश्वर जी का यह उपन्यास हमें 32000 साल पहले' की एक ऐसी बर्फीली दुनिया में ले जाता है, जिससे हम आज-तक बिल्कुल अंजान रहे। उस दुनिया से होते हुए हम उससे थोड़ी बेहतर और विकसित ओखा समाज और संस्कृति की दुनिया में पहुँचते हैं। उसके सम्पर्क में आकर, इस बात का सहज ही खुलासा होता है कि यह उपन्यास अलग हटकर है, जो दो महत्वपूर्ण तथ्यों पर केंद्रित है - पहला तो यह कि हमारे पूर्वजों का इतिहास, उनकी सभ्यता-संस्कृति, बत्तीस हज़ार साल पुरानी है, और दूसरा तथ्य यह कि पूर्वजों की सभ्यता-संकृति ‘नेहा संस्कृति' थी, जिसे तत्कालीन एक नदी ‘अमृता' के नाम पर ‘अमृता-संस्कृति' भी कहा गया, जिसका मूल-मन्त्र था - ‘हमें जीना है' और ‘प्रेम के साथ जीना है' -  इन दो अहम बिन्दुओं को यह उपन्यास अपने में सघनता से संजोए हुए है। ये दो तथ्य पाठक की आगे पढ़ने की जिज्ञासा अनवरत जगाए रखते हैं और अन्त तक उसे अपने से बाँधे रखते है। 

लेखक ने अपने इस उपन्यास को गुजरात की मिट्टी, उसकी ऊर्जा और आबोहवा को समर्पित किया है, क्योंकि वहाँ बत्तीस हज़ार साल पहले की दुनिया की ‘आदि नगरीय सभ्यता' होने के संकेत मिले हैं। अबतक इतिहासज्ञों के अनुसार, जो मानव सभ्यता पाँच हज़ार वर्ष पुरानी मानी जाती रही, उसके बारे में पुरातत्त्ववेत्ताओं के नवीनतम अध्ययन द्वारा नए महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं, जिनके आधार हमारी भारतीय सभ्यता 32000 वर्ष पुरानी सिद्ध होती है। रत्नेश्वर जी के सात वर्षों के गहन शोधपरक अध्ययन, विविध श्रव्य-दृश्य स्रोतों एवं विद्वानों से हुए वार्तालाप व अन्य अनेक माध्यमों से मिली ऐतिहासिक जानकारी के अनुसार, वे इस अहम ऐतिहासिक तथ्य को सामने लाए हैं जिसे उन्होंने अपने ‘महायुग त्रयी‘ के इस प्रथम खण्ड -‘32000 साल पहले' उपन्यास में संजोया है।

दीप्ति गुप्ता
 पहला अध्याय “यह कैसी ध्वनि है? इस वाक्य से शुरू होता है। फिर 12.6 से भी अधिक तीव्रता के भूकम्प और समझ न आने वाली आवाज़ें निकालते हुए, भूकम्प से बचने के लिए अजब सी मानव प्रजाति का इधर-उधर दौडने का उल्लेख हैं। कुछ देर बाद कम्प्यूटर पर उन विशालकाय मानवाकर प्राणियों की चीख-पुकार को सुनते हुए, वैज्ञानिक गणी और मिथ समझ पाते हैं कि ध्वनियाँ ही उनके संज्ञानात्मक शब्द थे। प्राकृतिक ध्वनियों से ही ये उनकी पहचान करते थे और उसका नामकरण करते थे। इसलिए वे भूकम्प की ध्वनि के आधार पर ‘उम्मअ' बोल रहे थे। आगे लेखक ने इस सृष्टि में विद्यमान विभिन्न प्रकार की ध्वनियों, उनकी अलग-अलग फ्रिक्वेंसियों और उनसे इंडस अल्ट्रा- कम्प्यूटर पर बनने वाले चित्रों के वैज्ञानिक अध्ययन के हवाले से आदिकाल की अनेक बातें प्रस्तुत की है। अनेक सा‌क्ष्यों, अवशेषों, विषय से सम्बन्धित पुस्तकों, सालभर‌ तक जंगल का भ्रमण, सागर, पर्वत, नदी, पशु-पक्षियों के संसर्ग में रहकर अपेक्षित अध्ययन, एकात्मबोध, स्थितप्रज्ञ अवस्था में होना, युवाल नो आ हरारी की पुस्तकों का अध्ययन, वेदों और पुराणों का अध्ययन, Philips Coppens की पुस्तक The Lost Civilization of Enigma और Kathleen McGowan की पुस्तक The Source of miracles का अनुशीलन, गूगल‌ पर मिली सामग्री का अध्ययन तथा यूटयूब आदि की मदद से विविध सामग्री तक पहुँचना, इस तरह ढेर जानकारी हासिल करके,उसकी गहन‌ परतों में जाकर, तब यह उपन्यास अस्तित्व में आया। लेखक के परिश्रम एवं लगन को सलाम...!


‘आर्कियोलॉजी साउंड रिसर्च सेंटर' के हॉल में वैज्ञानिक गणी, मिथ और चिन्तक, पृथ्वी और हवाओं की कम्पन ध्वनि, मानव व पक्षियों की ध्वनियों को कम्यूटर पर डिकोड कर रहे थे, तो कहीं ध्वनियों के आधार पर चित्र बनाए जा रहे थे। फ़िल्टर मशीन द्वारा हज़ारों साल पहले की ध्वनियों को अलग-अलग कालों में बाँटकर छाना जा रहा था तथा इंडस कम्यूटरों पर ध्वनियों की विविध फ्रीक्वेंसियों को सेव किया जा रहा था। कुछ अलग तरह की यानी उच्च कोटि की आवाजों को सुनकर गणी और मिथ अनिश्चय की स्थिति में थे कि वे पशु की ध्वनि हैं या मनुष्य की और उन्हें होमो सेपियंस की भाषा समझ रहे थे, क्योंकि बत्तीस हजार साल पहले होमो सेपियंस ही थे, जो इतनी प्रगति कर चुके थे कि उनकी भाषा विकसित मानव-जाति की भाषा लगती थी। आज तक हम भारतीय सभ्यता को साक्ष्यों के आधार पर पाँच से छह हजार वर्ष पुराना मानते आए हैं। वैज्ञानिकों में उनकी खोजों के अनुसार, कुछ मतभेद हुआ भी तो, सभ्यता को अधिकतम नौ हजार वर्ष पुराना माना गया। लेकिन जब ‘हिमयुग' के उपरान्त अन्न उत्पादन की बात सामने आती है, तो प्रमाणों ने मानव सभ्यता को पैंतीस और फिर कुछ अपेक्षित जाँच-पडताल करके, पीछे जाकर, अंतिम रूप से बत्तीस हजार साल पुरानी सिद्ध करने में कोई कोर-कसर नहीं छोडी। इस पर मिथ का यह कथन द्रष्टव्य है:

“ओह क्या बात है, गणी! यह तो अद्भुत ध्वनि है। गीत की आज से बत्तीस हजार साल पहले हो गई थी। क्या खूब! परंतु आज के जर्मनी स्थित एक गुफा में चिड़ियों की हड्ड‍ियों से निर्मित बाँसुरी मिली है। सी-14 आइसोटोप पर कार्बन डेटिंग से यह पता चला है कि यह हड्ड‍ियों से निर्मित बाँसुरी बयालीस हजार साल पुरानी है।” मिथ ने अपने रिसर्च को यहाँ जोड़ते हुए एक नई जानकारी दी थी। मिथ इन ध्वनियों से अचंभित थी।‘' (पृष्ठ 134)

मिथ की बात के समर्थन में उसके साथी गणी का यह सूचनापरक कथन 
उस प्राचीन युग में संगीत और उसके छोटे-छोटे वाद्य से जुडी जानकारी देता 
है: 
‘हाँ, सही कह रही हो, मिथ। गीत से भी मजेदार बात यह है किउन्होंने चिड़ियों की हड्ड‍ियों से बाँसुरी बना ली थी और उसे इतना अच्छा बजाने का अभिनव प्रयोग भी कर लिया था। इन लोगों ने बाँसुरी बजाना किसी से सीखा नहीं था। बाँसुरी की धुन को इन्होंने विकसित किया था। एक वाद्ययंत्र का आविष्कार किया था।” यह जानकर गणी बेहद उत्साहित था।' (पृष्ठ 134)


मिथ जो ध्वनियों को डिकोड करने में माहिर थी, उसने अंतिम रूप से कम्प्यूटर 
की मदद से अनेक तरह की भाषा को डिकोड करने में कामयाबी पाई थी। उस बीते युग के मनुष्यों, पशु-पक्षियों की भाषा और उनके शब्दों को वर्त्तमान समय में अर्थ और भाव के साथ समझना कोई सरल कार्य नहीं था। 
अल्ट्रा कम्प्यूटर पर दिन-रात खोज में लगे मिथ और गणी को लगता है कि स्क्रीन पर बनने वाले चित्रों में नज़र आने वाले प्राणी कहीं होमो इरेक्टस तो नहीं हैं या फिर डेनीसोवंस या फिर वे निअंडरथल भी हो सकते हैं। क्योंकि जैसा कि लेखक ने विविध स्रोतों के अध्ययन से पाया कि वैज्ञानिक तथ्यों के अनुसार लगभग पचास हजार साल पहले मनुष्य की कई प्रजातियाँ विकास की ओर अग्रसर थीं और सब एक ही स्तर पर थीं। उस काल में भी होमो सेपियंस, होमो इरेक्टस और निअंडरथल में परस्पर मित्रता और शत्रुता थी और उनके आपस में युद्ध होते थे।

गणी अवशेषों का अध्ययन, तो मिथ ध्वनियों और उनकी फ्रीक्वेंसियों का अध्ययन करने में लगी हुई थी। मिथ के अनुसार फ्रीक्वेंसी बदलने पर अनेक वर्षों के अंतराल की ध्वनियाँ मिलती थी,उनका यह मालूम नहीं चलता था कि वे किसकी थीं, साथ ही, उनमें से कुछ ध्वनियाँ पैंतीस हजार साल पहले की, तो कुछ चालीस-बयालीस हज़ार साल पहले की थीं। मिथ को लगता है कि इस बात का पता अब मात्र खनन एवं खनन में मिले अवशेषों की पड़ताल करने से ही चलेगा। अवशेषों पर गौर करने वाले गणी को लगता है कि वैज्ञानिकों द्वारा खनन तथा अन्य स्थानों के शोध से निकाले निष्कर्ष, सही दिशा में जा रहे हैं। 2001 ईसवी में अमेरिकन वैज्ञानिकों ने जो समुद्र की गहरी सतह में जाकर जो खोज की थी, उसके अनुसार वहाँ की सतह पर मानव निर्मित संरचना मिली है और साथ ही वहाँ कुछ लकड़ियों, और विशेष प्रकार की धातुओं के टुकड़े पाए गए - वे कार्बन डेटिंग से लगभग बत्तीस हजार साल पुराने साबित हुए हैं। जिसका तात्पर्य है कि यहाँ बत्तीस हजार साल पुराना नगर रहा होगा, जो लगभग नौ हजार साल पहले नष्ट हुआ। लेकिन एक नगर जो निश्चित रूप से नौ हजार साल पहले नष्ट हुआ, यह वही बत्तीस हजार साल पुराना वाला नगर है या यह उसके नष्ट होने के बाद का नगर है, अकबर, मिथ, गणी, अदा सब मिलकर इसके प्रमाण खोजते नज़र आते हैं। समुद्र के भीतर का वह नगर आज की द्वारिका नगरी से दो सौ मील दूर है। क्या यह श्री कृष्ण वाली द्वारिका नगरी है,- प्रमाणों के आधार पर श्रीकृष्ण की द्वारिका नगरी तो पाँच हज़ार वर्ष पहले नष्ट हुई थी। इसका मतलब हुआ कि श्रीकृष्ण की द्वारिका, पुराने नगर के अवशेषों पर बसी थी। उपन्यास में इस सन्दर्भ में सबसे अधिक गौरतलब जानकारी यह है कि जिस द्वारिका को ओखा मंडल, गोमती द्वार, आनर्तक, चक्रतीर्थ, अंतरद्वीप, वारी दुर्ग आदि अनेक नामों से भी जाना जाता है, वे सारे नाम के ओखा कबीले में बत्तीस हजार साल पहले मौजूद थे। सागर-रिसर्च पर जमीनी काम करने की विशिष्ट और मानदी की ही मुख्य भूमिका थी। मानदी ओखा पोर्ट सेंटर पर वैज्ञानिकों की टीम- लीडर थी। समुद्र तल में जीव-जंतुओं के बीच रहना और समुद्र तल पर साउंडकैचर मशीन से वहाँ की हजारों साल पुरानी आवाजों का संग्रह करना जैसा बहुत ही महत्त्वपूर्ण कार्य किया था। शोधकर्ता ओखा पोर्ट के ऑफिस सेंटर पर लौटकर समुद्र तल से लाए गए अवशेषों की लिस्ट बनाते थे और वाटर प्रूफ ध्वनि मशीन से चिप निकालकर उसे कंप्यूटर पर अपलोड करते थे। फिर भी उन शोधकर्ताओं को यह जानकारी हाथ नहीं लगी थी कि उस काल की विभिन्न प्रजातियों को होमोसेपियंस ने खत्म कर दिया था या वे परस्पर मिलते चले गए थे। गणी के यह कहने पाए, मिथ उससे सहमत होते हुए चिन्तक से सवाल करती है कि क्या उसे लगता है कि पृथ्वी पर अठारह लाख सालों तक राज करने वाले ‘होमो इरेक्टस', ‘होमोसेपियंस' द्वारा पूरी तरह खत्म कर दिए गए होंगे? यदि ऐसा था, तो किस कारण से ‘होमोसेपियंस' के सामने वे कमज़ोर सिद्ध हुए? 

उन शोध कर्ताओं को यह भी लगता है कि कि प्रलयंकारी भूकंप की वज़ह से पैंतीस हज़ार साल से पहले की बहुत कम ध्वनियाँ शेष बची थीं, अधिकांशत: नष्ट हो गई थीं या फिर इतनी क्षीण हो गई थीं जिन्हें उनकी साउंडकैचर मशीन नहीं पकड़ पा रही थी। इसलिए वे अंतिम निष्कर्ष के निकट नहीं पहुँच पा रहे थे। अतैव गणी ध्वनि की बजाय अवशेषों और शोधों पर ध्यान देने का सुझाव देता है, जिससे पता चले कि‘परा' एवं ‘ओखा ‘ और उसके आसपास एक विकसित भाषा-संस्कृति के साथ रहनेवाले कौन थे?अवशेषों और ध्वनियों के आधार पर तो वे होमो सेपियंस ही लगते थे, किन्तु इस बारे में पुख्ता प्रमाण खोजने ज़रूरी थे।वे तरह-तरह की ध्वनियाँ निकालने में भी माहिर थे। जैसे हमले के समय हुती द्वारा तरह-तरह की पशु-ध्वनियाँ निकाल कर पराओं को भ्रमित करना। पृष्ठ 32) 
 शोध के आधार पर, लगभग डेढ़ लाख साल पहले होमो सेपियंस ने होमो 
इरेक्टस के साथ युद्ध किया था,परंतु उस पहले युद्ध में वे हार गए थे।लेकिन 
दूसरी बार, लगभग नब्बे हजार साल पहले, होमो सेपियंस ने होमो इरेक्टस पर 
पहली जीत हासिल की थी। उपन्यास में इस बात का भी उल्लेख है कि 
होमो सेपियंस की महिलाओं के गले के कोड में एक अजब क्रान्तिकारी 
परिवर्तन आया था, जो उनके मध्य बेहतर संप्रेषण करने का आधार बना।

लेखक के अनुसार अठारह लाख साल पहले दुनिया के महान यात्री कहे जाने वाले होमो इरेक्टस अफ़्रीका से पूरी दुनिया में फैले थे। वे दस-बारह लोगों की टुकड़ियों में यात्रा करते थे और चीन, ईरान, भारत आदि अनेक देशों में बसते हुए टुकड़ों में बँटते गए। गणी और मिथ, को लगता है कि होमो इरेक्टस के जीवन के द्वारा, वे होमो सेपियंस के जीवन की विकास-गति को समझ सकेंगे तथा यह पता चल सकेगा कि ‘होमो सेपियंस' उन्ही की (होमो इरेक्टस ) विकसित प्रजाति है या उनसे बिल्कुल अलग है? भारत में वे ईरान होते हुए आए थे और सबसे पहले पर्वतीय क्षेत्रों में पहुँचे थे और उन पर उस भूभाग का असर पड़ा था।

ऊँचा कद, लम्बे हाथ और लम्बे बाल उन्हें सुदर्शन और आकर्षक बनाते 
थे। उस समय की उनकी विकसित सशक्त व बलिष्ठ शारीरिक बनावट 
उन्हें, सभी प्राणियों से पृथक करती थी। उसकी वज़ह से वे अपने 
शिकार से कहीं अधिक , तीव्र गति से बहुत दूर तक और देर तक दौड़ 
सकते थे। वैसे, शोध के अनुसार पहली बार हर काम, जैसे आग के बदले 
चमड़े के बने सामन का पहला व्यापार, लेन-देन, ज्ञान और परम्परा का 
आदान-प्रदान भी होमो इरेक्टस ने ही किया था। (पृष्ठ 107)

अपनी सोच-समझ और मन में आई बात को तरह-तरह की ध्वनियों, चेहरे की भाव-भंगिमाओं और शरीर के अंगों के संचालन द्वारा यानी देह-भाषा से दूसरे तक सम्प्रेषित करना, इस तरह का आदान-प्रदान उनके बीच होने लगा था। इसके अलावा, उस युग में भी, इस सृष्टि की निर्मल-निश्छल और पुरुष की अपेक्षा पारदर्शी स्त्रियाँ अतीत और भविष्य की बात बताने का प्रयास करती थीं। जैसे, वैज्ञानिकों के अनुसार, पशु से मनुष्य बनने की प्रक्रिया में लाखों साल पहले एक अनुभवी बुज़ुर्ग स्त्री ने पहले की अनेक घटनाओं को याद करते हुए,अपनी स्मरण शक्ति और संप्रेषण-कुशलता के बल पर‘पहली कहानी' सुनाई थी। (पृष्ठ 108)

 इन सब महत्वपूर्ण सूचनाओं और शोध के साथ-साथ यह उपन्यास बत्तीस हज़ार साल पहले के समाज और उसकी संस्कृति पर विशद प्रकाश डालता है। उस आदिम युग के मनुष्यों,उनके रहन-सहन, खान-पान, वेश-भूषा, जंगली पशुओं के नख व अस्थियों आदि से बने उनके आभूषण, जड़ी-बूटियों आधारित प्राकृतिक चिकित्सा, अस्त्र-शस्त्र, पशु-पक्षियों की बोली और संकेतों को समझने की क्षमता, प्राकृतिक संसाधनों से अपने रहने के स्थान को सुरक्षित बनाना, झोंपडियाँ निर्मित करना- इन सबका अनेक अध्यायों में रोचक उल्लेख मिलता है। ओखा युग में मातृसत्तात्मक प्रथा थी, वंश स्त्री के नाम से ही चलता था! वह ही घर और कबीले की मुखिया होती थी! स्त्रियों की इच्छा से उनका घर बसाने पुरुष उसके घर जाकर रहते थे। ( पृष्ठ 146) जैसे, ओखा कबीले का नाम भी ‘ओखा' के नाम से जाना जाता था न कि उसके पुरुष साथी ईश के नाम से। एक स्थान पर महागुरू सुधि की बेटी संकरी का कथन - 
 “पर, महागुरु, मैं तो एक ‘यह' हूँ और वंश तो एक स्त्री का ही चलता है। इस तरह हमारे बच्चे भी ‘यह' हुए। स्त्री चाहे जिससे गर्भधारण करे, वह बच्चा अपनी माँ की संतान ही कहलाएगा न!” (159)
कोई अगर यह समझें कि उस प्राचीन युग में जब न‌ शिक्षा थी, न कोई ख़ास कलाऍं विकसित थीं, तो मनुष्य एकदम अनगढ़, अनपढ़, पशुवत मूढ़ और जड़ होगा, न ही वह कोमल‌ भावों, मृदुल और नरम अनुभूतियों से परिचित होगा। जंगलों में जन्में, पले, बढ़े, उस युग के लोग निपट रूखे, कठोर और पथरीले मनोमस्तिष्क के होते होंगे। प्रेम, करुणा, सुख-दुख, क्रोध, ईर्ष्या, दया, सहानुभूति, वात्सल्य आदि मानवोचित भाव और संवेदनाऍं बत्तीस हज़ार पहले के मनुष्यों में शून्य होंगी। लेकिन ऐसा नहीं था। ये सारे भाव उस आदि युग के मनुष्यों में भरपूर विद्यमान थे।
सभ्यता और संस्कृति के विकास में इन भावों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। हमें इन्हें नहीं भूलना है और उपन्यास में जगह-जगह इनकी अभिव्यक्ति और उपस्थिति को पकड़ना है।
महा और बोध की माँ ओखा, जब परा कबीले के लड़ाकुओं द्वारा गम्भीर रूप से घायल होकर, उपचार के बाद भी ठीक नहीं होती, उसे एहसास हो जाता है कि उसका अन्तिम पल पास है, तब ओखा का भावुक होकर रोते हुए, अपनी बेटी ' महा' और बेटे 'बोध' को दुलारना, प्यार करना। 
उनसे अन्तिम विदा लेते हुए, ओखा का ऑंसू बहाते हुए उन्हें समझाना, दोनों युवा बच्चों का माँ ओखा के गले लगकर बिलखना, यह सब, उनकी भावनात्मकता और करुणा, वेदना और पीड़ा की अनुभूति का परिचायक है। ओखा के शरीर त्यागने से पहले उसके आसपास उपस्थित महागुरु सुधि, वैद्य धनवन और युग सभी भाव विह्वल हो उठते है। इसी तरह कबीले की बेटी ‘पुलक' पराओं के साथ हुए युद्ध में मृत्यु को प्राप्त होती है तो, उसकी माँ ‘असा' सुख-चैन भूलकर, अपनी बेटी पुलक की समाधि को बाँहों में भरे, विलाप करती सुबह से शाम तक बैठी रहती है। महा उसे समझाना चाहती है तो, वह सूनी आँखों से महा को देखती हुई गिडगिडाने 
लगती है कि ‘“नहीं-नहीं, मेरी बेटी को मुझसे न छीनो।' (पृष्ठ 78) 

कबीले की अन्य बहुत बुज़ुर्ग स्त्री भी युद्ध में मारे गए लोगों का दुःख 
मनाती अमृता नदी के किनारे समाधियों के अवसाद में भरी बैठी रहती 
है। जब महा उसे शाम के धुंधलके में पहचानती है, तो कहती है:

 “दामा आप?” महा ने ज्यों ही ओखा की ओर कदम बढ़ाए थे कि नदी 
किनारे ही विशाल वृक्ष के नीचे एक पत्थर पर बैठीं दामा, उन सभी 
समाधियों की ओर चुपचाप गहरी आँखों से निहारती हुई दिख गई थीं। 
महा के टोकने पर भी वे चुप रही थीं।

“दामा आद्य? आप यहाँ क्यों आ गई हैं? आपको अपने झोप में ही रहना चाहिए!” 
कहते हुए महा उनके बिल्कुल करीब आ गई थी और उन्हें ध्यान से 
देखते हुए, उन्हें पुकारा था।

अंतरद्वीप का युग जब अपनी माँ इति को ओखा माँ के निधन की सूचना 
देता है, तब इति ओखा से हुई अनबन को याद कर एकाएक अनमनी और 
उदास हो जाती है। माँ को उदास और खामोश देख युग तब तक भोग नही 
लेता, जब तक वह माँ की उदासी का कारण नहीं जान लेता। इतना ही नहीं 
युग और महा के मन में एक-दूसरे के लिए अनकहे प्रेम का भाव और उपन्यास 
में यह वर्णन:

‘हम सब मिलकर पराओं को अजीव ही नहीं करेंगे, बल्कि उनका समूल अंत कर देंगे।” .
कहते हुए युग महा के करीब पहुँच गया था। बिल्कुल करीब। प्रारंभिक हिचक के बाद उसके सिर पर हाथ रखते हुए उसने बालसखा भाव में उसे सहलाया था। उसने युग को दोनों हाथों से अपनी बाँहों में भरकर उसके कंधे-सीने पर सिर रख दिया था और वह फूट-फूटकर रोने लगी थी। माँ के बिछुड़ने की वेदना जैसे उसकी आँखों से फूटकर एक वेग के साथ आँसू के रूप में बह निकली थी। उसकी आँखों को जैसे ऐसे ही किसी स्नेह-प्रेम का इंतजार था। XXXXXXX वह बाँध अब टूटकर बिखर गया था और नीर का सैलाब उमड़ पड़ा था। (पृष्ठ 67)

उपन्यास में अध्याय बीस तो मानव मन में स्थायी रूप से विद्यमान 
नौ भावों में सर्वोपरि ‘प्रेम-भाव' पर ही केंद्रित है और उसे नाम दिया है -
‘संसार का पहला प्रेम'। पूर्णिमा की रात को नदी के जल से अपने दल 
के साथ मछलियाँ पकड़ते ‘युग' का, बालसखी ‘महा' का भी, अपने दल 
के साथ उस ही नदी के पास मछलियाँ पकड़ने के लिए पहुँचने पर, युग 
और महा में पहले बहस होती है और फिर एक दूसरे पर वार करते हुए 
झगड़ा शुरू हो जाता है। दोनों कुशल योद्धा एक दूसरे पर उछल कर प्रहार 
करते हैं, तो एक वार में महा, युग की बाँहों में कैद हो जाती है! उसे 
युग की आँखों में कुछ अलग सा रंग दिखाई पड़ता है और पल भर में ही, 
दोनों एक-दूसरे को गुस्से से नहीं, वरन, स्नेह की नजरों से देख रहे थे। 
युग की लगातार मुसकराहटों के बाद महा ने भी मुसकरा कर उसे देखा था! 
एकाएक युग के चेहरे पर मुस्कराहट तैर जाती है। महा भी लजाते हुए 
मुस्कुरा उठती है! (पृष्ठ 180) 

एक और स्थान पर भी युग और महा के बिच मौन प्रेम के संकेत मिलते है__

‘महागुरु सुधि की वाणी सुनकर महा थोड़ा सचेत हुई थी और उसने अपनी 
जकड़ से युग को स्वतंत्र कर दिया था। अपनी आँखें पोंछते हुए, उसने 
पहले बोध को देखा था और उसकी आँखों से भी आँसू पोंछते हुए युग को 
 एक प्रेम भरी नजर से देखा था।' 

 ‘युग और महा के मध्य उपजा संसार का यह पहला प्रेम था।‘

महागुरू सुधि का वर्षों के अंतराल के बाद,अपनी बेटी संकरी से भावुक मिलन और दोनों का आँसू बहाते व एक दूजे से विह्वल होते हुए पुरानी बातें याद करना, अपनी बेटी में उसके बचपन को ढूँढना, इस बात का प्रमाण है कि बत्तीस हज़ार पहले के अनगढ़, अंजान किसी भी तरह आतंरिक और बाह्य विकास से रहित मानवजाति में भावनाएं और संवेदनाएं सघनता और प्रगाढता से अंतर्मन में प्रच्छ्न्नावस्था में विद्यमान रहती थीं और जन्म-मृत्यु, मिलन -विछोह सुख-दुःख आदि विविध हालत और अवसरों पर वे भावनाएँ उद्भूत हो जाती थी तथा उन्हें आंदोलित करती थी! (पृष्ठ 152) ये सारे उल्लेख उन आदि मानवों के भावनात्मक कोमल पक्ष को प्रतिबिम्बित करते हैं। 
 ‘सामाजिक और सांस्कृतिक परम्परा' के तहत, मृत्यु होने पर भूतल करना, फूल चढ़ाना, मौन प्रार्थना करना, प्राण त्यागते हुए ओखा का आदित्य होना, 
कोई अतिथि आए, तो उसके स्वागत में, आदर-सत्कार सहित उसे आसन देना, फलों का भोग लगाना, एक-दूसरे के सुझावों का सम्मान करना, रोगग्रस्त अथवा घायल होने पर, गति से मदद करना, चिकित्सा हेतु वैद्य धनवन के औषधालय पहुँचाना, बच्चों और किशोरों को गुरुकुल में प्रशिक्षित करना, उन्हें स्वाध्याय के लिए प्रेरित करना, ये सब 32000 वर्ष पहले की सामाजिक व्यवस्थाएँ थी, वे ही कालान्तर में विकसित होकर, समयानुकूल परिवर्तन के साथ वृहत्तर होती गई।

आदि-मानव के, ऊपर उल्लिखित प्रकृतिप्रदत्त ये ही वे मूल्यवान संस्कार थे, जो उस आदिम युग में "नेह संस्कृति" को जन्म देने की, उसे विकसित करने की नींव बने। क्योंकि प्रेम सब भावों में ऐसा उदात्त और सशक्त भाव है,जो सृष्टि के हर प्राणी - मनुष्य से लेकर पशु-पक्षी तक - सबको अभिभूत करता है, सुख-सुकून देता है, सकारात्मक वातावरण रचकर, विकास और तरह-तरह की रचनात्मकता की ओर प्रेरित करता है। जीवन और समाज में सर्वोत्कृष्ट प्रगति एवं उन्नति सदैव, प्रेम और सद्भाव के बने रहने पर हुई और घृणा व दुर्भाव से भरे होने पर हमेशा हिंसा, अशांति और अवनति को जन्म दिया।
 
अनुमानत: और साथ ही कुछ साक्ष्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि उस काल‌ में मनुष्यों की अपनी समझ-बूझ और ज़रूरतों के अनुसार बने, सामान्य, छोटे-छोटे रीति-रिवाजों ने एक सामाजिक व्यवस्था को जन्म देकर आगे बढ़ाया होगा।
 
लेखक ‘नेह संस्कृति' जो अमृता नदी के नाम पर,‘अमृता संस्कृति' के रूप में 
भी जानी गई, महागुरु सुधि के मुख से उसका परिचय देते हुए, बताता है 
कि माँ ओखा इस संसार की पहली सुसंस्कृत और सबसे वीर स्त्री थी, 
जिसने संस्कृति और सभ्यता आरम्भ की थी। संसार ने इससे पहले भूमि पर 
किसी भी संस्कृति या सभ्यता को नहीं देखा था और संसार का पहला बारह सौ 
लोगों का नगर-आकार उसकी ही देन था। ओखा ने नेह व्यवहार करना, अपनी 
रक्षा के लिए युद्ध करना और दूसरे समुदायों को भी स्नेह और संस्कारों के साथ 
जीना सिखाया था। ओखा ने सिखाया था कि हरेक ‘यह' का पहला धर्म है
स्वयं को नेह के साथ जीवित रखना। इसी मंत्र के साथ वह सबको जीवन में आगे
बढ़ने का सन्देश देती थी। बेटी महा से ओखा के ये शब्द:

‘कुछ लोग इसे ‘अमृता संस्कृति' से भी पहचाना करेंगे, पर अब यह भूमिका 
महा को निभानी है। अब इस ओखा समूह को वह आगे बढ़ाएगी। ऐ महा
मुझे अपनी शब्द-ध्वनि दो कि तुम परा का समूल अंत करोगी और भूमि 
पर नेह संस्कृतिको बढ़ाओगी। साथ ही, मेरे पुत्र बोध की देखभाल करोगी' (पृष्ठ 41)

महागुरु सुधि ओखा को आश्वस्त करते हुए कहती है कि हम आगे बढ़ेंगे और 
परा ही नहीं, उन सभी प्रजातियों का अंत कर देंगे, जो नेह संस्कृति को स्वीकार नहीं 
करना चाहते (पृष्ठ 41)

आगे एक प्रसंग में इस रीति का परिचय मिलता है कि शत्रु कबीले से किसी 
भी तरह का सम्बन्ध बनाने पर, उस व्यक्ति को अपने कबीले से सदा के 
लिए निकाल दिया जाता था! जैसे महागुरू सुधि की बेटी संकरी के ओखा 
कबीले के विरुद्ध जाकर, परा से विवाह करने पर, संकरी को निष्कासित कर 
दिया गया था। सत्रह साल की उम्र में ही वह माँ से दूर हो गई थी। (पृष्ठ 153-158)
महागुरू सुधि जब सत्तावन वर्ष बाद अपनी बेटी संकरी के उसके पास आने और निवेदन करने पर, उसके जनपद में गुरुकुल स्थापित करने के लिए राजी हो 
 
जाती है तो उससे कहती है कि संकरी को ‘नेह -संस्कृति' को आगे बढ़ाना होगा, क्योंकि नेह संस्कृति से ही अन्य कबीलों से भी बेहतर संबंध बनाए जा सकते हैं। संकरी भी उमग कर सहमत होते हुए कहती है कि वह महागुरु की बेटी होने की वज़ह से सदा से ‘नेह संस्कृति' ‘पर ही विश्वास करती आई है और उने अपने बच्चों को भी ‘नेह संस्कृति' में ढाला है। (पृष्ठ 173)

उस युग में मृत्यु-संस्कार में – ‘आदित्य' होने की भी जानकारी मिलती है। 
जिसका मतलब था योग-समाधि लेना! जब आकाशीय बिजली का आत्मा रूपी 
अगन से मिलन होता था, तब विशिष्ट किरणें प्रवाहित होती थी, उस क्षण पूरा 
शरीर जलकर ऊर्जा में परिवर्तित हो जाता था। माँ ओखा की मृत्यु के 
समय उसके आदित्य होने की जानकारी, विस्तार से मिलती है। मृत्यु से 
पहले घावों की वजह से दर्द से कहाराती ओखा अपनी बेटी को कलाप और 
सिंहाल सौपती है और छोटे भाई बोध का ख्याल रखने,, वीर योद्धा बनने, 
ओखा कबीले की पराओं से रक्षा करने और अमृता व नेह संस्कृति को आगे 
बढाने की हिदायतें देती है। फिर वहाँ खडे सभी आत्मीय जनों से बाहर जाने 
का और उसे अकेला छोडने का निवेदन करती है। वह आदित्य होना चाहती 
थी। सब बाहर चले जाते हैं और झोपा के द्वार पर बड़ा सा पत्थर रख देते हैं। 
सूर्योदय पर सब अंदर जाते हैं, तो ओखा को अदृश्य देख अवाक् रह जाते हैं। 
महा माँ के सिंहाल को छूकर देखती है तो उसे ज़ोर का झटका लगता है। 
तब महागुरु सुधि महा को समझाती हैं कि उस जगह पर आग जलाकर उसमें 
हवन करते हुए,‘आदि ‘से प्रार्थना करनी होगी किवे तुम्हारा साथ दें और ऐसी शक्ति दें 
कि तुम उसे कलाप को धारण कर सको, क्योंकि ‘आदि' ही मनुष्यों के जन्म
मरण के कारक हैं। ऊर्जा-शक्ति के सारे स्रोत वे ही हैं। महा महागुरु सुधि के 





निर्देशानुसार, हवन और प्रार्थना करने के बाद चारपाई की परिक्रमा करती 
है और प्रार्थना के पश्चात् सिंहाल को प्रणाम कर उठाती है, तो इस बार सिंहाल 
बहुत आसानी से उसके हाथ में आ जाता है।

तदनन्तर, महागुरु कहती हैं कि ओखा से जुड़ी अंतिम समय की चारपाई और 
हवन सामग्री को ही अगन को समर्पित किया जाना चाहिए। तब महा उनसे 
पूछती है कि अब तक तो अपनी परम्पराओं के अनुसार अमा आदि सभी
मृत लोगों को मिट्टी में ही दफन किया गया। महागुरु शान्त भाव से उत्तर 
देती हैं कि संसार के कोई भी मानक या नियम शाश्वत नहीं होते हैं, वे काल, 
समय और परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहते हैं। प्रकृति भी ऐसा ही करती 
है, पंचतत्त्व भी ऐसा करते हैं। हमारी देह में भी सृष्टि के इस नियमानुकूल 
इस स्वतः परिवर्तन होते रहते हैं, वैसे भूतल करने की परम्परा के स्थान पर 
अब मृत व्यक्ति को अग्नि को समर्पित करने का नया विधान आज से शुरू 
होगा।वैसे भी ओखा की देह विशिष्ट प्राकृतिक अगन में समाहित हुई है, जो एक 
विशेष परिवर्तन है। इसलिए उसके अंतिम क्षण से जुड़ी वस्तु को भी अगन को ही 
समर्पित किया जाना चाहिए। दूसरे लोकों में भी ऐसा होता है। इस तरह, संसार 
में मृत शरीर को अग्नि को समर्पित कर, पंचतत्त्वों में समाहित करने की नई 
परम्परा का शुभारम्भ हुआ।

इसके बाद ‘आदित्य! आदित्य!' के उद्घोष के साथ वैद्य धनवन की कुटिया से 
ओखा-स्मरण की शैया को अमृता नदी के किनारे ले जाया जाता है, वहाँ विशेष 
रूप से बने गड्ढे के पास उसे रखा जाता है। तदनंतर महा ओखा की शैया को 
अगन समर्पित करती है और आग बुझने पर, भाई के साथ मिट्टी के बर्तन में राख भर कर माँ अमृता नदी में विसर्जित करती है तथा शेष भस्म को चिह्नित गढ्ढे में डालकर, उस पर रंगीन पत्थरों से समाधि बना दी जाती है। ओखा की मृत्यु से जुड़ी‌ यह सारी प्रक्रिया, उस युग के मृत्यु संस्कार की प्रविधि का विस्तार से परिचय देती है।

इस उपन्यास में यह संस्कृति भी देखने में आती है उस आदिम समाज 
में वरिष्ठ और वृद्ध लोगों की तनिक भी अवहेलना न करके उनका हर तरह 
से ख्याल रखा जाता था और बहुत सम्मान किया जाता था! युवा जन 
उनकी मदद के लिए तैयार रहते थे! जैसे, पन्द्रहवें अध्याय में यह 
वर्णन इस खूबसूत संस्कार का प्रमाण है:

‘नहीं दामा, आप हमारी आदरणीय हैं। आपसे तो मैं हमेशा मिलती रही हूँ। 
आपने मुझे कई बार अनेक किस्से सुनाए हैं।‘ महा ने दमा से कहा!' (पृष्ठ 80)

अध्याय पन्द्रह में ही हुती ‘दामा' को पकड़े हुए आती दिखी थी। वह धीमे 
कदमों से दामा को लेकर महागुरु के पास आई थी।

“प्रणाम दामा। प्रणाम दामा।” अनेक स्वर एक साथ उभरे थे। आइए, दामा, आप 
यहाँ बैठिए।” कहते हुए महागुरु सुधि ने दामा को पकड़कर बैठाया था। 
 (पृष्ठ 129)

एक अन्य अध्याय में महा द्वारा महागुरु सुधि का आदरपूर्वक गुणगान भी 
इसी रीति का प्रतिबिम्ब है। महा से सुधि कहती हैं- “यह तुम्हारी श्रेष्ठता है
महा कि तुम्हें अपनी गुरु के प्रति ऐसा आदर है।' (पृष्ठ 60)

 प्रकृति जीवन देती है, तो उसकी हिफ़ाज़त के संसाधन भी देती है। 
उन संसाधनों का प्रयोग करने की यथासम्भव सोच-समझ भी देती है,
जिसके प्रचुर प्रमाण इस उपन्यास में दर्ज़ हैं। स्वभाल बनाना और उन नुकीले काँटेनुमा साधन को रहने के स्थान के चारों ओर लगाना। पत्थर, 
लकड़ी, चमड़े, हड्डियों के भाले, तीर, कमान अस्त्र-शस्त्र बनाना। उपन्यास में 
विविध वर्णनों और कथनों से स्पष्ट है कि उस काल में जनपदों के लोग, 
भोजन व चिकित्सा के समान, सुरक्षा के लिए भी प्राकृतिक संसाधनों पर 
निर्भर होते थे। कलाप यानी धनुष-बाण,त्रिशूल, और युग का विशेष त्रिशूल 
‘सारंग' आदि अस्त्र-शस्त्रों का स्वयं ही अपनी सूझ-बूझ से निर्माण करते थे। किन्नर बेसाल्ट और चकमक पत्थर से औजार तैयार करते थे।

“हाँ, बड़ा सुंदर त्रिशूल बना है। धार भी अच्छी है। जरा मेरे बाण देखो तो (28)

उस युग में किन्नर अग्रिम सैनिक होते थे और समुदायों की चौकीदारी करना उनकी ही जिम्मेदारी थी। पत्थर जुटाने, अस्त्र-शस्त्र बनाने का काम किन्नर ही करते थे क्योंकि वे औजार बनाने में सिद्धस्त होते थे। परा-हमले के समय वे उनसे अद्भुत ताकत और ऊर्जा से लड़ते नज़र आते हैं। परा कबीले के खूंखार शत्रुओं से रक्षा हेतु युग और महागुरु सुधि के मध्य यह वार्तालाप सुरक्षा के उपायों पर प्रकाश डालता है__
“महागुरु, जिन काँटों का प्रयोग हम अपने घरों की सुरक्षा के लिए करते हैं और काँटों का एक घेरा बना देते हैं, वैसे ही कुछ विशेष काँटों का घेरा यदि अपने-अपने कबीले के बाहरी स्थान पर कर दें, तो क्या उससे सुरक्षा हो सकती है?” (पृष्ठ 68)
बाँस और पेड़ की शाखाओं से मोटे काँटे तैयार करना, उन बड़े-बड़े काँटों को पूरे जंगल के मार्ग में बिछा देने की तरकीब निकलना, उन्हें बट के बरोह व टहनियों और पतले वृक्ष की शाखों के छिलकों से बाँधकर इस तरह फँसा देना कि जब शत्रु उनके निकट जाएगा, तो उनके सटते ही वे बंधन खुल जाएँगे तथा फँसाव खुलते ही शाखाओं और बाँस से बने मोटे कीले उनकी देह के आर-पार हो जाएँगे। वे काँटे उन्हें न केवल घायल कर देंगे, बल्कि उनकी जान भी ले लेंगे। मतलब कि अपनी रक्षा को लेकर, इतनी चतुराई उस आदिमानव समाज में थी।

इतना ही नहीं, शत्रु से बचाव के लिए एकजुट होने की भावना भी उस काल मे पनप चुकी थी! महागुरु सुधि के कथन में इस सोच और भावना की झलक 
मिलती है:
‘मैं सभी ‘यह' पदों के प्रमुखों से बात करूँगी। यह तो सबके हित में है, परंतु इसके लिए मुझे सभी कबीले जैसे— गोमती, चक्र और अनार्तक में जाना होगा!' (पृष्ठ 70)

आज के युग में भी हम जो,विभिन्न तीज-त्यौहारों करवा-चतुर्थी,शरद पूर्णिमा, छट-पूजन, अहोई अष्टमी, बड अमावस आदि पर नदी, पेड़-पौधों, चाँद, सूरज और तारों को पूजते हैं आराध्य मानते है, उनके लिए आदर व सम्मान का होना, देव एवं माँ कहना, यह 32,000 पहले के समाज और संस्कृति में देखने को मिलता है! महागुरु सुधि का या कथन भी इसी बात की पुष्टि करता है_‘आदि' (सूर्य) ही हमारे जन्म-मरण के कारक हैं। ऊर्जा-शक्ति के सारे स्रोत वही हैं।” (पृष्ठ 54) 
ओखा के ये शब्द" 'यह नेह हमें माँ अमृता से मिला है। अमृता सिर्फ एक नदी नहीं, हमारी माँ है। उसी का पानी पीकर; उसी की मछलियाँ खाकर; उसी के मैदानों में खेलकर हम बड़े हुए और यह संस्कृति बनी।‘ (पृष्ठ 41)
 गुरु बुध के इस कथन कि ‘अपने घायलों के लिए सूर्यदेव से प्रार्थना करेंगे.. में भी ये ही संस्कार दीखते हैं। उस समाज में दूसरों के उत्तम कार्य के लिए कृतज्ञता का भाव होता था। (पृष्ठ 63)

पशु-पक्षियों, वाहनों, अस्त्र-शस्त्रों के प्रति आदर भाव, दशहरा पर उनका पूजन, गोवर्धन पूजा भी तत्कालीन समाज में होती थी। महागुरु सुधि का युग से यह कथन द्रष्टव्य है:
 ‘'तुम्हारा गज मेरा भी प्रिय है, युग। इसका बच्चा हमारी सवारी है और अभी इसने पंख फड़फड़ा कर, सचेत रहने का जो संकेत किया, उसके लिए यह आदर का पात्र है।” (पृष्ठ 71) 
 . 
इसी तरह महा का अपने साथी वाहन गरुड़ से यह कहना “आओ गरुड़, हमें वहाँ माँ अमृता के किनारे अपने साथियों की समाधि को प्रणाम करने और उस पर पुष्प अर्पित करने जाना है। हम यहीं पास से कुछ फूल ले लेते हैं” और यह यह कहते हुए वन की ओर जाकर, पुन:फूलो और पौधों से यह विनम्र कथन:

“ऐ फूल के पौधे, मैं महा तुम्हें प्रणाम करती हूँ। मेरे कुछ प्रिय साथी अजीव हो गए हैं। मैं उन पर पुष्प अर्पित कर, उन्हें प्रणाम करना चाहती हूँ, इसलिए ऐ सुगंध देने वाले पौधे, तुम मुझे अपनी डालियों से कुछ पुष्प लेने की अनुमति दो...” (पृष्ठ 77)

यह उन आदि मानवों का, हमारे पूर्वजों का प्रकृति के जड़-चेतन पदार्थों के लिए उनके प्रेम, सम्मान और कृतज्ञ भाव का द्योतक है। 


मानव सभ्यता के विकास के बाद, अठ्ठारहवीं और उन्नीसवीं सदी में 
भी जो गुरुकुल शिक्षा प्रथा विद्यमान रही, वह भी ओखा समाज की ही देन 
थी। बत्तीस हज़ार वर्ष पहले महागुरु सुधि ने गुरुकुल की स्थापना की 
थी, वो संसार का पहला ज्ञानपीठ था। उस काल के गुरुकुल कहे जाने वाले 
विद्यापीठों में स्व-अन्वेष का बड़ा महत्त्व था, जिसकी आदत बालकाल 
में ही डाल दी जाती थी। हवा में छलाँग लगाकर कलाबाजियाँ सीखना, 
जंगलों में जाकर पशु-पक्षियों की आवाजों, वनस्पतियों की गंध आदि को समझना 
और मानव-हित में कुछ नवीन खोज के प्रयास करना, समाज की 
एक अपेक्षित और गतिविधि थी। 
 
उपन्यास में जड़ी-बूटियों से प्राकृतिक चिकित्सा के औषधालय का उल्लेख भी लेखक ने किया है। वहाँ वैद्य धनवन के उपचार से सब लोग स्वास्थ्य लाभ करते थे। आज भी जड़ी-बूटियों की महत्ता और इलाज पर अटूट विश्वास उस ही काल की देन प्रतीत होता है। अध्याय नौ में, महा गुरुकुल से बाहर निकल कर, औषधालय की ओर जाती है तो देखती है कि प्रशिक्षु वैद्य घायलों के उपचार में लगे हुए थे। युद्ध में घायल ओखा के लिए पत्तों के साथ कुछ जड़ी-बूटियों को मिलाकर वैद्य धनवन द्वारा लेप तैयार करना और उसे ओखा के जख्मों पर लगाकर पत्तों से बाँध देना, जड़ी-बूटियों के इलाज पर अगाध विश्वास का ही प्रमाण है। अमृता नदी के जल में कई जड़ी-बूटियों को मिलाकर घोल बनाना और उसे पत्ते के दोने से बूंद-बूंद कर उसके ओठों पर डालते जाना, ये सारे उल्लेख उस काल की प्राकृतिक चिकित्सा के प्रचलन को द्योतित करते हैं। गति के चीटियों के काट लेने से लहूलुहान हो जाने पर, तब उसका साथी ‘अथ' उसके घावों पर पत्तों का रस लगाता है। (189) 

इस बात का भी उल्लेख है कि जाड़ों की अपेक्षा, जड़ी-बूटी, औषध पत्ते और फल-फूल बसंत ऋतु में भरपूर मिलते थे। (पृष्ठ 37) दवाओं के साथ वैद्य धनवन का ओखा के लिए प्रार्थना करने का निवेदन करना, उन लोगों का प्रार्थना की शक्ति, पर विश्वास का, स्नेह-भाव का सुख-दुःख मे एकजुट होने का परिचायक है। जब महा, वैद्य धनवन की कुटी में जाती है और उन्हें प्रणाम करके कहती है कि आपके स्नेह ने इन सभी घायलों को नया जीवन दे दिया है। उसके पश्चात वह अंग-भंग वाले घायलों के लिए घनवन से कटे अंगों को निर्मित करने के विषय पर सोच-विचार करती है कि क्या उनके अंगों को पुनः पूर्ण नहीं किया जा सकता? क्या कोई ऐसा उपाय नहीं, जो घायल होने से बेकार हो गए अंग उपचार से पुनः निर्मित हो जाए या उन्हें वैद्य आप निर्मित कर दें? धनवन आशान्वित होकर कहते है – ‘बात यह थी कि ऐसे सपने देखे जाने लगे थे। तुम्हारा यह विचार मेरा भी स्वप्न है। मैं अवश्य यह प्रयास करूँगा कि हमारा कटा हुआ अंग पुनः शरीर से जुड़ जाए। 
 (पृष्ठ 76)

 'मेमथ' जैसा बड़ा शिकार हाथ लगने पर, ओखा कबीले में सबके लिए, एक उत्सव का अवसर उपस्थित हो जाता है और उस रात मेमथ का मांस पकाया जाता है। मेमथ के शिकार के बाद जब महाभोग का आयोजन होता है, तो महा सबसे आँखें बंद करके, शिकार के समय मृत हुए साथी ‘सक्त' का स्मरण करने के लिए कहती है। उस दिन सभी ओखी मिलकर झांस-झड़ी, समंदर का जल और मक्खन, मिलाकर मांस पकाते हैं, दूध से कई तरह की खाद्य सामग्री बनाते हैं। पत्तों और मंजर का विशेष काढ़ा बनाते हैं। वृक्षों से प्राप्त मीठे फल पत्तों पर सजाते हैं और फिर सब मिलकर उस स्वादिष्ट भोग को ग्रहण करते हैं। साथ-साथ भोग, मृत साथी का मिलकर ध्यान करना, उसकी शान्ति के लिए प्रार्थना करना, इस तरह की मिलजुल कर रहने से एक-दूसरे से नेह-सम्बन्ध स्थापित कर पाते हैं। इसी को ‘नेह-संस्कृति' कहते हैं और ये ही माँ ओखा द्वारा स्थापित ‘नेह- संस्कृति' है। उस अवसर पर महा संगीत की एक नई रीति आरम्भ करती है और वो थी, गीत-संगीत की। कुछ गाना, गुनगुनाना! उसके लिए ओखा जनपद की बेटी यानी जिसने गायन कला को सीखा था, वह महा के निवेदन पर गीत गाती है और अन्य सब उसके साथ सुर में सुर मिलाते हैं। तब गीत और अथ की बेटी सुरी गीत गाती है और चक्र कबीले की बेटियों कांता और संगी मिल कर चिड़ियों की हड्डियों से बने वाद्ययंत्र ‘फुऊ ‘(बाँसुरी) से  मधुर धुन बजाती हैं। (पृष्ठ 130-131) 

भोजन करते समय पूरब की ओर मुँह करके बैठना भी उस काल में लोगों का संस्कार बन चुका था।

अंतिम अध्याय ‘हमें जीना है' में - ‘गति' का “हमें जीना है! हमें जीना है...” यह बुदबुदाना और लेखक का यह संकेत - ‘इस भय में भी उनके भीतर आगे बढ़ने की हिम्मत और जीने की हठ के साथ सुबह की सुनहली उम्मीद जिंदा थी।'

अंतिम अध्याय के अलावा, अध्याय चार ‘आदित्य' में, ओखा की अपने जनपदवासियों के लिए यह सीख कि हरेक ‘यह' का पहला धर्म है स्वयं को नेह के साथ जीवित रखना।

इस अभिव्यक्ति ने मुझे मानव-जीवन पर गहराई से सोचने के लिए विवश किया। मैंने जीवन अनुभवों से और अपने आसपास के लोगों का कठिन, तो किन्हीं का सुविधामय जीवन देखकर, यह जाना कि जिन लोगों का जीवन कठिन और अनेक अभावों से भरा होता है, वे परिश्रमशील और संघर्षशील होते है और अपने संघर्षों तथा मेहनत के बलबूते पर सुख-सुविधाएं अर्जित करके भरपूर खुशियों व सुकून से भरे होते हैं। अपने सुख के लिए वे दूसरों का मुँह नहीं तकते बल्कि, कर्मठता से स्वयं उसे प्राप्त करते है, इसलिए आशा से भरे हुए, जीने की इच्छा रखते हैं। आदिमानव समाज के लोगों में ‘जीने की बलवती ललक' का ये ही कारण था, जो उपन्यास में, मुझे पात्रों के पारस्परिक कथोपकथनों में नज़र आया। पँक्तियों के अंदर छुपी परतों से यह भाव मुझ तक पहुँचा। प्राचीन हो या अर्वाचीन, सभी कालों में देखा गया है कि संघर्षशील व्यक्तियों का समाज शारीरिक और मानसिक रूप से आत्मविश्वास, ऊर्जा और उत्साह से भरा होता है क्योंकि वह समाज जीवन के छोटे-बड़े कार्यों को सम्पन्न करने के लिए स्वाश्रित होता है न कि दूसरे समूह या वर्ग पर। वैसे भी, जो लोग अपनी समस्याओं और ज़रूरतों का निदान खुद निकालते हैं, वे भरपूर खुशी और संतोष के साथ जीवन जीते हैं और भविष्य में उत्तरोत्तर बेहतर जीवन जीने की इच्छा रखते है। आदिमानव समाज का यह मनोविज्ञान, इस उपन्यास में बखूबी उभर कर आया है। भूकंप के दौरान ‘ हमें जीवित रहना है।' (पृष्ठ 17)

 इस प्रकार यह उपन्यास अमृता नदी के निकट कबीलों में बसे हमारे  पूर्वजों के तत्कालीन समाज, उसकी खूबसूरत सभ्यता-संस्कृति का रोचक विवरण प्रस्तुत कर, हमें अपनी आदि संस्कृति के विविध पहलुओं के  बारे में गहन दृष्टि देता है और गम्भीरता से सोचने के लिए प्रेरित करता  है। आशा करती हूँ कि रत्नेश्वर जी की कलम मानव-जीवन और समाज  से जुड़े ऐसे ज़रूरी पहलुओं पर भविष्य में भी सक्रिय रहेगी!
***

लेखक परिचय: रत्नेश्वर के बारे में 
ग्लोबल वार्मिंग पर केन्द्रित बेस्ट सेलर उपन्यास ‘रेखना मेरी जान' के लेखक रत्नेश्वर महज पाँचवीं कक्षा से ही अपने स्कूल सर गणेश दत्त पाटलिपुत्र, पटना में स्टोरी मास्टर के नाम से पुकारे जाने लगे थे। 20 अक्टूबर 1967 ई. को अपने ननिहाल महरथ (वारिसलीगंज, नवादा) में जन्मे रत्नेश्वर ने बचपन से ही संघर्षपूर्ण जीवन जिया। चार साल की अवस्था में ही उनके पिता का देहांत हो गया। अपने पैतृक गाँव बड़हिया में एक किसान के रूप में अपना जीवन शुरू करनेवाले रत्नेश्वर को बचपन में ही पञ्चतत्त्वों के साथ पेड़, पानी और जिन्दगी के गहरे रिश्ते की समझ हो गई थी. शाकाहारी भोजन करनेवाले अल्पाहारी रत्नेश्वर प्रतिदिन सुबह जीतम (एक तरह का ध्यान) द्वारा स्वयं-साक्षात्कार करते हैं।

रत्नेश्वर कुमार सिंह को पत्रकारिता साहित्य के लिए प्रकाशन विभाग, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 1998 का ‘भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार' प्रदान किया गया. इन्होंने 1988 ई. में ‘नवभारत' नागपुर से पत्रकारिता की शुरुआत की. ‘स्टार वन' पर ‘मानो या न मानो' का स्क्रिप्ट-लेखन किया, साथ ही ‘मौर्य टी.वी.' के उप-सम्पादक भी रहे। इन्होंने अब तक 11 पुस्तकें लिखी हैं।
ईमेल: ratneshwar1967@yahoo.co.in
ट्विटर: follow me @ratneshwarS 
फ़ेसबुक: ratneshwarsingh@facebook.com


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