अहिंसा और गांधी के बलिदान के 75 वर्ष

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

लेखक भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं एवं सेतु संपादन मंडल के सम्मानित सदस्य हैं। आप अहिंसा आयोग के समर्थक एवं अहिंसक सभ्यता के पैरोकार भी हैं।

अहिंसा हमारे भारतीय मानस की सबसे महत्त्वपूर्ण जीवनचर्या है। इससे हम सम्पूर्ण पृथ्वी के कल्याण, जीवन-जगत से जुड़े सभी कल्याण, नभ-मंडल का कल्याण और अखंड सृष्टि के कल्याण की कामना करते हैं। हम चाहते हैं कि हमारे जीवन का आभूषण बनकर अहिंसा का सत्व सत्यरूप से परिलक्षित हो जिससे सभी उसे अपनाएँ और अपने समय और आने वाले समय का मार्गदर्शन भी होता रहे। जीवन में अहिंसा की उपस्थिति इस प्रकार हुई है कि हम उसे अपने से अलग करके नहीं रख सकते लेकिन इस बात का मलाल हमेशा मनुष्य करता रहा है कि उसके भीतर के इस गुण का विलोप कैसे हो जाता है और वह हिंसक कैसे बन जाता है? गांधी ने हिंसा का एक जगह समर्थन किया है और वह ऐसी स्थिति की हिंसा है जब हमारा मुक्ति पाने में ही भलाई हो। वह ऐसा करने के लिए हाँ, इस दशा में बोले जब उन्हें लगा कि अमुक जानवर तड़प रहा है और उसे बचाया नहीं जा सकता तो उसे मिस्टर जाना ही उचित है। गांधी ने ऐसे जानवरों की मुक्ति के लिए हाँ कर दिया था क्योंकि वे अबोल थे। यद्यपि यह हिंसा का ही एक प्रकार से परोक्ष समर्थन हुआ लेकिन वे इस स्थिति में स्वयं को विवश महसूस करते हैं। इसके अतिरिक्त गांधी जी ने सदैव अहिंसा को अपने जीवन का सबसे बड़ा आभूषण माना और उसे अपनाने के लिए सभी से अपील की।

ऐसी मान्यता है कि गांधी जी यदि चाहते तो भगत सिंह को फाँसी नहीं होती। जनता को अपेक्षा थी कि गांधी भगत सिंह को बचा लेंगे। हमारी श्रुतियों में ऐसी कथाएँ मिलती हैं कि एक बहेलिया किसी जानवर का पीछा करते हुये आ रहा था। वह अपने लिए भोजन की व्यवस्था कर रहा था। जानवर ने देखा कि किसी ब्राह्मण ऋषि का आश्रम है। वह इस भाव से उस आश्रम की ओर गया कि वहाँ वह छुप सकेगा और उसका जीवन बच जाएगा। ऋषि ने उसे आते हुये देखा। वह ऋषि के पास गया तो बोला-त्राहिमाम, त्राहिमाम। मेरी रक्षा करें! नहीं तो मुझे बहेलिया मार देगा। ऋषि को दया आई और उसे इशारा किया कि तुम जाकर किसी कोने में छुप सकते हो। इस अंतराल के साथ बहेलिया भी ऋषि के पास आया और पूछा- क्या आपने किसी जानवर को देखा है? उसे मैं अपना शिकार बनाने के लिए पीछा किया और मुझे इस बात का ससाय है कि वह इसी आश्रम में आया और यहीं कहीं छिप गया है। कृपया यदि आप जानते हों तो मुझे बताएं। ऋषि ने इस बात से सीधे इनकार किया कि उन्होंने कहीं इस प्रकार के जानवर को देखा है। इससे जानवर की जान बच गई क्योंकि बहेलिया को भरोसा था कि ऋषि कभी उससे झूठ नहीं बोल सकते। वह वहाँ से चला गया।

ऋषि द्वारा झूठ बोलकर किसी की जान की रक्षा की गई तो इसे समकालीनों ने झूठ नहीं माना बल्कि इसे धर्म से परिभाषित किया कि आपतकाल में झूठ बोलकर किसी के जीबन की यदि रक्षा की जाती है तो उसको धर्म करहते हैं। गांधी ने भगत सिंह को नहीं बचाया। अब यह तो लोग तय करें कि गांधी ने धर्म की रक्षा की या अपने अनुसार धर्म की रक्षा की। भगत सिंह को फाँसी हुई और गांधी पर प्रत्येक धड़े से सवाल किया जाता है और किया जाता रहेगा।

गांधी को 1948 में 30 जनवरी को एक उद्विग्न मन ने मार दिया। तीन गोलियाँ मारकर उनकी हत्या कर दी। सबसे बड़ी बात नाथुराम गोडसे, आपटे और उसके साथ जुड़े लोगों को कोई इस बात का मलाल नहीं रहा कि उन्होंने एक अहिंसक व्यक्ति की हत्या कर दी। उन्होंने हमेशा कहा कि वे अपने निर्णय और अपने कृत्य पर हमेशा एक सा मत रखते हैं और वे सही हैं। आज़ादी के अमृत पर्व के बाद जब गांधी के शहादत वर्ष की गणना की जाए तो यह गांधी के शहादत की 75वीं पूण्यतिथि है। एक अहिंसा के पुजारी की शहादत के 75 वर्ष बीत गए हैं और अब भी हिंसा और अहिंसा के प्रश्न कम हुये या ज्यादा बढ़ गए, इसका आंकलन आवश्यक हो गया है क्योंकि समय के सापेक्ष जब किसी भी परिस्थिति का मूल्यांकन नहीं होता है तो भटकाव ही शेष होता है, उसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं। सबसे अहम बात यह है कि गांधी के जीवन बलिदान से यदि भारत को कुछ भी नहीं मिला तो गांधी को गांधी के समस्त संघर्ष शून्य ही समझे जाएंगे। भारत के लिए ही गांधी की भूमिका गौड़ मान ली जाएगी। यदि ऐसा नहीं है तो गांधी के बलिदान के 75 वर्ष बीत जाने पर उनके जीवन-उत्सर्ग से सीख लेने की जरूरत है।

गांधी जी ने सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, प्रेम, करुणा, दया, सर्वधर्म-संभाव, अस्पृश्यता-उन्मूलन, अभय और सत्याग्रह का आह्वान किया था। गांधी ने ट्रस्टीशिप के लिए हाथ बढ़ाने की बात की थी। गांधी ने अपने रचनात्मक कार्यक्रम के माध्यम से आत्म-निर्भर समाज की संकल्पना की थी। स्वछता उनके लिए बहुत बड़ी अहमियत रखती थी। वह चाहते थे कि लोग स्वावलंबी हों तथा ग्राम-स्वराज में विश्वास करें। वह विकेन्द्रीकरण के माध्यम से सत्ता का हस्तांतरण चाहते थे। उन्होंने यह बताया कि सत्यनिष्ठ होकर सत्याग्रह करना निष्क्रिय प्रतिरोध का समर्थन है। गांधी जी ने स्वदेशी, चरखा, सूत और तेकुआ को आज़ादी के दौरान सबके जीवन का हिस्सा बनाया। वह द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान का समय हो या दक्षिण अफ्रीका में संघर्ष का समय हो या परचुरे कुटिया में किसी व्यक्ति-विशेष के स्वस्थ्य संघर्ष हो, इन सबमें वह सेवा-सुश्रुषा को महत्व देते हैं। गांधी ने न झुकना सीखा न ही टंकार हिंसक होने की बात स्वीकारी। विभिन्न आंदोलनों को जब भी कोई अवलोकन करेगा तो गांधी जी ने संवाद के लिए स्पेश छोड़ा। इन सबके साथ गांधी ने अहिंसा को अपने जीवन का सबसे बड़ा आभूषण माना। 75 वर्ष बाद कौन है गांधी का शत-प्रतिशत अनुयाई और उनके जैसा देश व्यापी अपनी बात को मनवा लेने वाला? शायद कोई इसका उत्तर नहीं है लेकिन यह एक बड़ा सच है कि गांधी अपने संकल्प और श्रेष्ठ जीवन से पूरी दुनिया को संदेश देने में आज भी सक्षम हैं कि ‘अहिंसा ही समस्त लोगों के लिए वरदान है’। इससे विमुख होकर किसी सभ्य समाज की संरचना करना असंभव है।

भारत के लिए गांधी की अहिंसा सबसे बड़ी ताकत के रूप में उभरती लेकिन अहिंसा का उत्कृष्ट छवि को उतारना भारतीयों के लिए शायद उतनी आसान बात भी नहीं थी, जितना कहने-सुनने में लगती है। शायद आज सम्पूर्ण विश्लेषण के पश्चात यह मान लेना ही उचित है कि पूर्ण अहिंसा पाना कभी भी संभव नहीं होगा। अधिकतम अहिंसा की कामना की जा सकती है। अहिंसक समाज की व्याप्ति और उसे शांति के परिप्रेक्ष्य में समझने की कोशिश ही अहिंसा होगी। यह जरूर संभव है कि सभी अपने जीवन में अहिंसक विचार को स्थान दें, इसके लिए मानस तैयार हो। गांधी जी ने स्वयं के जीवन में अहिंसा को लागू किया। वह कहते थे तो लोग उन पर अमल करते थे। आज पूरी पृथ्वी पर हर आठवाँ व्यक्ति भी अहिंसक हो जाने का संकल्प ले ले तो संभव है कि वह अधिकतम लोगों को प्रभावित कर सके। गांधी की आज यही मांग होती आज के मनुष्य सभ्यता से शायद कि अधिकतम लोग अहिंसक हो जाएँ। एक अरब लोग अहिंसक हो जाएँ। एक अरब लोग सत्य बोलें। एक अरब लोग अपरिग्रह पर विचार करें। एक अरब लोग अस्तेय को समझकर उसके साथ अपना तादात्म्य बनाएँ। इस प्रकार प्रत्येक एक अरब से कुछ लोग पूर्ण अहिंसा का पालन करें। इस प्रकार गांधी पूरी पृथ्वी पर स्वर्ग सी अनुभूति कर सकते थे। पता नहीं गांधी ग्लोबल और ग्लोकल स्लोगन के युग में ऐसा कर पाते या नहीं लेकिन मेरी सोच यह अवश्य है कि यदि एक व्यक्ति केवल एक ही अच्छा आचरण अपना ले। सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, अस्तेय, ब्रह्मचर्य या प्रेम इनमें से किसी एक गुण को भी अपने जीवन में उतार ले तो यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि यह धरती सबसे खुशहाल धरती हो जाये। यह दावा इसलिए मेरी दृष्टि से सही लगता है क्योंकि इन गुणों में से कोई एक भी अपना ले तो वे सभी तो एक-दूसरे से जुड़े हैं। वे जीवन का सबसे उत्कृष्ट जीवन को अंगीकार करने वाला मनुष्य बनते हुये दिखेगा। एक गुण से सभी को प्रपट करने की कोशिश वह करने लगेगा लेकिन दुखद यह है कि मनुष्य अपने अंतस में अच्छे गुणों का प्रवेश करने ही नहीं देना चाहता और इसका परिणाम है कि पृथ्वी हिंसा से जड़ीभूत होकर विभिन्न कलह से जूझ रही है। गांधी की शहादत के 75 वर्ष होने पर अहिंसा को सभ्यता के सोपान के साथ यदि देखना है तो भारत की सनातन सभ्यता का यह शाश्वत संदेश जाना आवश्यक है कि भारत का हर व्यक्ति गांधी द्वारा अपनाए गए गुणों में से कोई एक गुण अपने जीवन में ज़रूर शामिल करेगा।

अहिंसा किसी गांधी की बपौती नहीं है। अहिंसा तो प्रत्येक मनुष्य के जीवन का सौंदर्य है। इसलिए हमें मनुष्य मात्र होने के नाते अहिंसा, सत्य, प्रेम को अपने जीवन में शामिल करना चाहिए। जीवन में उदार होना चाहिए। करुणा को जीवन में घुलने देना चाहिए। यह तो हमें गरिमामय बनाते हैं। यदि इस प्रकार हम प्रकृति और संसार की सम्पूर्ण उपस्थित का अपने जीवन से जोड़ लेने के आग्रही हो जाएँ तो निश्चित ही हमारी सभ्यता अप्रतिम होगी।

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