पाँच कविताएँ: प्रकाश मनु

प्रकाश मनु
(1) खुशी द्वार पर दस्तक दे रही है

हर खुशी के लिए अपना द्वार बंद करके
क्यों बैठी हो मेरी बच्ची?

खुशी द्वार पर दस्तक दे रही है
एक बार, दो बार, तीन बार...
कब तक वह दस्तक देती रहेगी मेरी बच्ची?

एक बार आ के लौट जाए जो खुशी
वह दुबारा नहीं आती

बादलों के घर से निकलकर आई
एक नई-नई सी उजली भोर के लिए 
अपना द्वार बंद करके क्यों बैठी हो 
मेरी बच्ची...?

बाहर फूल खिले हैं रंग-रंग के और खुशबुओं 
और हरियाली का समंदर है
हँसता झम्मर-झम्म
हिलोरें लेता...

कोई कब तक उनसे अछूता रह सकता है,
द्वार खोलो!

द्वार खोलो मेरी लाडली बच्ची,
द्वार खोलो
उससे भेंटो जो नवागत द्वार पर आया है

खोलो द्वार उसके लिए
जो भी है नया-नया
दिल की उमंगों भरा उम्मीदों भरा
दीया टिमटिमाता तुम्हारी राह में

सपनों की धरती से आकाश तक फैली जो
हरी-हरी बेल है
सफेद मोतियों से भरी
उसके लिए द्वार खोलो मेरी प्यारी बच्ची

दुनिया बहुत बड़ी है और विशाल
और बेशुमार संभावनाओं से भरी
कोई कब तक खुद को एक छोटे से पिंजरे में समेटे
शांत रह सकता है...?

दुनिया तुमसे भेंटने आई है
उसे देखो, पहचानो
उसके ताजगी भरे चेहरे खिले-खिले प्रशस्त माथे
और आँखों की उजास को देखो तो जरा उठकर

खुशियाँ बाहर दस्तक दे रही हैं
और बड़ी मीठी सी रिम-झिम है
हलकी-हलकी फुहारें देह-मन को भिगो रही हैं
कोमल थापें देकर
प्रकृति माँ ने अपना सबसे खूबसूरत दिन 
आज भेंट किया है दुनिया को

आत्मा अनहद नाद के झूले पर थिरक रही है

खुशियाँ दस्तक दे रही हैं कब से
दरवाजा खोलो मेरी बिटिया,
दरवाजा खोलो...! 
***


(2) नन्ही किश्तियों का कोरस

हजारोंहजार पन्नों के बीच घिरा
एक बूढ़ा शख्स
उन हजारोंहजार पन्नों की कुछ सीधी, कुछ टेढ़ी सतरों
और आड़े-तिरछे अक्षरों के बीच
टटोल रहा था कुछ भोले मासूम चेहरे
कुछ बेचैनियाँ, कुछ सवालों के जवाब
जो कभी मिलते कभी खो जाते थे।

चेहरे कुछ बहुत मासूम
बार-बार उन शब्दों के बीच से उठकर खड़े हो जाते थे...
कि सर जी, मैं हूँ यहाँ, आपने देखा नहीं मुझे।
कि अंकल, मैंने लिखे हैं चार पाइंट बहुत कमाल के
बहुत माथापच्ची के बाद।

कक्षा छह में पढ़ने वाली एक नन्ही अबोध बच्ची कह रही थी,
देखिए अंकल, मेरी राइटिंग जरा खराब है
पर आप पूरा मेरा लेख पढ़ना जरूर ध्यान से
मैंने पूछा नहीं किसी से...
सब कुछ लिखा है अपने आप से सोच-सोचकर।

सतरें थीं, हजारोंहजार सतरें
और तमाम चेहरे चंचल उत्साह, जोश और कुतूहल से भरे, 
और एक बूढ़ा आदमी जो शायद एक बूढ़ा मछुआरा 
कि बूढ़ा मल्लाह था
और बच्चे जिसे अच्छे लगते थे,
उनके बीच बच्चा बनकर खुश था।

और आज जबकि दिए जाने हैं इनाम बाँटे जाएँगे मैडल
फूलों और रोशनियों से लकदक मंच पर
वे चेहरे हैं उसके सामने
उतने ही जोश और चंचल उत्साह से भरे ताजादम चेहरे
खिले गुलाबों से
वह उन्हें देखता हूँ और सोचता है
फिर देखता और फिर-फिर सोचता है 
कि किस चेहरे से किस आड़ी-तिरछी लकीरों वाली कॉपी
का रिश्ता है

भला वह छोटी-सी चंचल बच्ची कौन-सी थी
जिसने अपनी कापी में विचारों के साथ
बना दिए थे अपनी इच्छाओं के सुंदर, सतरंगे डिजाइन
खूबसूरत तितलियों की शक्ल में
और कौन-सा था वह अलबेला कलाकार जिसने कॉपी में 
अलहदा-अलहदा रंगों में विचार दर्ज करते हुए
धरती पर पूरा इंद्रधनुष उतार दिया था...?

यों हजारोंहजार पन्नों के साथ लिखने और बात कहने की 
हजारों रँगारंग अदाओं को 
दो बाँहों में सहेजता यह बूढ़ा शख्स मुग्ध और चकित-सा
देख रहा है अपने सामने
नन्हे-नन्हे हाथों से तिराई जातीं हजारों नन्ही किश्तियाँ।

इनमें हर किश्ती एक उम्मीद है
क्योंकि उस पर हाथ में एक नन्हा-सा चप्पू 
और नन्ही कलम लिए एक नन्हा बच्चा बैठा है

हर किश्ती एक परचम उठाए
कि सुनिए, पानी की एक-एक बूँद कीमती है
हमें उसे आने वाली पीढ़ियों के लिए बचाना है
कि इस मुल्क में भूजल की बर्बादी न हो
वरना बजने लगेंगी खतरे की घंटियाँ...
फिर हमारी प्यारी धरती का क्या होगा, 
क्या होगा दुनिया का—
बोल रहे थे नन्हे पहरेदार वतन के।

और खुश है वह बूढ़ा मल्लाह
कि नन्ही-नन्ही किश्तियाँ चल पड़ी हैं
उस सदाबहार टापू की खोज में
जहाँ से नई खुशियाँ लौटेंगी हिंदुस्तान में
और बनेगी हरी-भरी उम्मीदों की दुनिया

वह बूढ़ा मल्लाह यह देखता है
अपनी लगातार धुँधलाती 
घुच्ची आँखों से...
और नन्हे हाथों में परचम उठाए
नन्ही-नन्ही किश्तियाँ खेते नन्हे मल्लाहों को सलाम करता है।
***


(3) धन्यवाद प्यारे मित्र
(कवि मित्र सुभाष राय के लिए)

धन्यवाद प्यारे मित्र,
बहुत-बहुत धन्यवाद!

तुमने बनाया है ऐसा घर
जिसके खुले हैं दरवाजे खुली खिड़कियाँ
वह चौतरफा खुला घर है
खिला-खिला सूरजमुखी के फूलों सा

तुमने बनाया है ऐसा घर
हवाओं से बतियाता हुआ
जिसमें किताबों के लिए बहुत जगह है
बहुत बड़ा आँगन है साहित्य और खुली चर्चाओं के लिए
जिसका फर्श धरती पर है लेकिन छत आसमानों को छूती हुई

उसमें नदी किनारे दरख्तों पर
चहक-चह नाचती हैं चिड़ियाँ
उसमें पहाड़ों के सिर झुकते हैं उन धुनी
खुरदरे इनसानों के लिए
जिनके दिलों में जज्बा है सच्चा
जूझने और जीने का
हाथों में कुछ रचने का हुनर

धन्यवाद प्यारे भाई,
बहुत-बहुत धन्यवाद,
मुझे अपने घर का पता देने के लिए
जिसमें साहित्य की बेदखली के मौजूदा वक्त में भी
उगते हैं खूबसूरत कहानियों के दरख्त
उन पर चढ़ती हैं कविताओं की हठी लतरें और गिलहरियाँ

पौधे हँसते हैं नन्हे चाँद की सी दँतुलियों से
नन्हे प्रसन्न शिशुओं की मानिंद...
और हवाएँ उनके गालों को चूमकर खिलखिलाती हैं
प्यार से बौराई माँओं की तरह
जिनके स्तनों से झरता है दूध
इस वत्सला धरती को और भी हरा-भारा, प्यारा और 
ममतालु बनाने के लिए 

एक घर जैसा घर है वह
करुणा की नदी किनारे खड़ा कच्ची ईँटों और गारे से बना
जिसमें सच्चाई की सूधेपन की कीमत ज्यादा है
उन बड़ी-बड़ी कुरसियों ऊँचे अभिमानी सिंहासनों से भी
जिन पर बैठे हैं कुछ ठूँठ
और उनकी गरदनें मारे अकड़ के काठ हो गई हैं

धन्यवाद मेरे प्यारे मित्र
धन्यवाद मेरे हरदिल अजीज भाई,
सहोदर मेरे
धन्यवाद चिर साथी मेरी आत्मा के,
कि तुमने बनाया है ऐसा घर
जिसकी दीवारें भी शिरकत करती हैं
साहित्य-कला की युगों से चलती आई सनातन बहसों में

जब चार यार मिलकर जोशोखरोश से करते हैं चर्चा
अपने समय की हकीकत और त्रासदियों की
और जब पूरे जोम पर होती है मित्र संगोष्ठी
तो अलमारी में रखी किताबों और फूलदान से भी आती हैं आवाजें
कि ठीक कहा, हाँ ठीक कहा,
तुमने बिल्कुल ठीक कहा मेरे भाई!

और एक नवजन्मा बच्चा भी असहमति में उठा सकता है हाथ
कि नहीं, मुझे ठीक नहीं लगती आपकी बात श्रीमान,
आप इस पर फिर से विचार कीजिए

यहाँ तक कि कमरे की दीवारें भी उठाकर हाथ कहती हैं
बड़े हौसले से
आप लोगों ने सुनी नहीं हमारी बात मित्रो,
सुनिए, जरा हमारी बात भी तो सुनिए पहले आप!

धन्यवाद प्यारे मित्र
बहुत-बहुत धन्यवाद,
तुमने बनाया है ऐसा घर
जिसमें अभिमानी कुरसियाँ काँपती हैं धरती के हिये 
से आती आवाजों
और इनसान की जुंबिश से

धन्यवाद प्यारे भाई, धन्यवाद
तुमने बनाया है ऐसा घर
जिसमें सच को सच, झूठ को झूठ कहने की आजादी है
आजादी है जिसमें सफेद को सफेद काले को काला 
और हत्यारे को हत्यारा कहने की 

धन्यवाद प्यारे मित्र
बहुत-बहुत धन्यवाद,
तुमने बनाया है आजाद खयालों का घर
जिसमें विशालकाय हाथी को ही नहीं
एक नन्ही मासूम चींटी को भी सिर उठाकर जीने का
हक है

तुमने घर नहीं
आजादी का शिवाला बनाया है मित्र,
बनाया है आजादी का स्मारक
जिसमें खुली हवाओं की आवाजाही है
और किसी को घुटकर नहीं जीना पड़ता अँधेरी गुफा में

धन्यवाद प्यारे मित्र,
कि तुमने घर बनाया है
जो खुली हवाओं का घर है
हाँ, जो घर है विचारों की आजादी और सर्जना की 
हरी कोमल दूब का
जिस पर मुक्त उड़ानें भरते हैं विहग
और चिड़ियों की तरह चहचहाता है जीवन

इसीलिए इस घर में हर थके-हारे के
लौट आते हैं प्राण,
और वहाँ कोई किसी से अपने होने का सर्टीफिकेट 
या प्रमाण नहीं माँगता

धन्यवाद प्यारे मित्र, बहुत-बहुत धन्यवाद
कि तुमने पता दिया अपने घर का,
जो तुम्हारा भी घर है और मेरा भी
और हम-तुम सरीखे हजारों हजार का
जो इनसान हैं और बस इनसानों की तरह जीना चाहते हैं! 
***


(4) एक पेड़ गिरा

एक पेड़ गिरा जमीन पर
एकाएक भारी धक्के के साथ
गिरा टूटकर
काँपी धरती, काँपा अंबर
 
हिला बहुत कुछ हिला कि जब पेड़ गिरा
जी धक से हुआ
माँगी सबने दोनों हाथ जोड़कर दुआ
कि आजू-बाजू सब खैरियत हो कि पेड़ जो गिरा है

गिरा पेड़ तो हिला घर आँगन 
छत, दीवारें...
साथ ही बिखर गया काल के सीने में दर्ज
स्मृतियों का ताना-बाना

गिरा पेड़ तो छप्प छपाछप
झील का पानी उछला एक पल को हवा में 
फिर खामोश...
चुप्पियों में कुछ बुद-बुद करता काँपा हवा का कलेजा

चिड़ियाँ मिलकर कोरस में सुबह का स्वागत-गान 
गाते-गाते चौंकीं
अचानक उदासियों में छिपकर बदहवास 
उन्होंने शोकगीत गाया

ऊधमी बंदर जो दिन भर उछलते थे पेड़ की शाखाओँ पर
आज देख रहे उदास
कि आह, टूक-टूक हुआ कलेजा कि पेड़ गिरा

पथिक जो बैठे थे कल यहीं ठंडी छायाओं के सुख में 
आज गुजरते पास से एकाएक ठिठककर
देखते टुकुर-टुकुर कि आह, हुआ क्या 
प्यारे भाई,
कि यह पेड़ जो गिरा तो हुआ जैसे हादसा!

पेड़ गिरा औचक
आज सबेरे
तो मन में उमड़ा बरसों पुरानी स्मृतियों का सैलाब
आँखें गीली, रुँध गया गला...

ओह, पेड़ जब खड़ा था अपनी गर्वीली स्मिति में
तो क्या, कैसा था गबरू खूब
करता चिड़ियों से ठिठोली लहकती जवानी में
हवा में उड़ते शानदार कहकहे...
और अब गिरा गिरा गिरा
पेड़ गिरा
और यों पूरी हुई उसकी कहानी

गिरा पेड़ गिरकर मिट्टी में अब मिट्टी होने को है
ताकि पूरी हो युग-युग से चली आती अनवरत वृक्ष-कथा 
जो हर बार खुद को दोहराती है
जब-जब गिरता है कोई पेड़
और आँखें डब-डब... डब-जब... डब-डब!

ओह, गिरा... फिर गिरा कोई पेड़
फिर पूरी हुई एक और कहानी
फिर से लिखे जाने के लिए
टटोलती हवाओं को किसी नवजात शिशु-की-सी
नन्ही-नन्ही ललछौंही उँगलियों से

एक नन्हे पौधे के भीतर यों फिर लिखी जाएगी शायद
सृष्टि की अशेष कथा
और एक नन्हे सपने में फिर एक विराट पेड़ 
जन्म लेगा
***


(5) अभी थोड़ा जीना चाहता हूँ

जिंदगी की किताब के पन्ने 
अब थोड़े, बहुत थोड़े ही बचे हैं
आँधियों में फड़फड़ाते अक्षर...
काली विडंबनाओं से 
विकटाकार!

नेपथ्य में कोई हँसा है बहुत जोर से
परदे हिलते हैं
अजब सा डरावना
अट्टहास...!

मुझे दिखाई पड़ रहा है अंत
पर मैं अभी जीना चाहता हूँ
थोड़ा और जीना चाहता हूँ मेरे प्रभु!
***

प्रकाश मनु
545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008
चलभाष: + 91 981 060 2327 
ईमेल: prakashmanu333@gmail.com

6 comments :

  1. नन्ही कश्तियों का कोरश...... अच्छी कविता है प्रकाश मनु जी अभिनंदन

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  2. भावपूर्ण कविताएं

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  3. सहजता से रचित जीवन जीना सिखाती कविताएँ हैं सब... पहली कविता में वो हम सबको हर पल में जीने का संदेश दे रहे हैं तो अगली कविता बच्चों के कोमल मन को प्रोत्साहन देती हुई हर बच्चा अलग है ये बात प्यार से समझाती बहुत सुंदर कविता है , एक और कविता ये बता रही है कि घर का वातावरण कैसा हो और इस कविता के माध्यम से अपने जीवन साथी को आभार भी प्रकट कर दिया उन्होंने , पेड़ के माध्यम से सपनों का टूटना धराशायी होना मगर उम्मीद बचाये रखना ..... अंतिम कविता तक पहुँच कर ये एहसास होता है कि ये सारी कविताएँ कहीं ना कहीं लेखक के जीवन को प्रतिबिंबित करती है

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  4. सहजता से रचित जीवन जीना सिखाती कविताएँ हैं सब... पहली कविता में वो हम सबको हर पल में जीने का संदेश दे रहे हैं तो अगली कविता बच्चों के कोमल मन को प्रोत्साहन देती हुई हर बच्चा अलग है ये बात प्यार से समझाती बहुत सुंदर कविता है , एक और कविता ये बता रही है कि घर का वातावरण कैसा हो और इस कविता के माध्यम से अपने जीवन साथी को आभार भी प्रकट कर दिया उन्होंने , पेड़ के माध्यम से सपनों का टूटना धराशायी होना मगर उम्मीद बचाये रखना ..... अंतिम कविता तक पहुँच कर ये एहसास होता है कि ये सारी कविताएँ कहीं ना कहीं लेखक के जीवन को प्रतिबिंबित करती है

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  5. अलग ढ़ंग से लिखी ये कविताएं बहुत ही प्यारी हैं।

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  6. ‘सेतु’ में प्रकाशित आप की पाँच कविताएंँ पढ़ी। सर्वप्रथम ‘सेतु' की संपादकीय टीम को बहुत-बहुत बधाई, कि उन्होंने ऐसी सुंदर कविताओं को अपने पाठकों तक पहुँचाया।
    पहली कविता “ खुशी द्वार पर दस्तक दे रही है” जीवन संगीत और चेतना सजीव बिम्ब हैं। वाह! इतनी सुंदर भावपूर्ण और सजग अभिव्यक्ति को पढ़कर आनंद आ गया। यह मन को चेतन करने वाले कविता है। किसी भी कारणवश मन के अंधकार को निकाल कर बाहर प्रकृति के उज्जवल रूप से एकाकार करने वाली कविता है। तन-मन में उत्साह, उमंग और खुशी भरने वाली कविता है। यह मानव मन के सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पक्ष पर विचार करने के लिए उकसाती है। भाव और भाषा का ऐसा अनूठा जादू कम...बहुत कम कविताओं में मिलता है।
    दूसरी, “नन्हीं किश्तियों का कोरस" कविता में बाहर प्रकृति का जो सौंदर्य है, उसकी विराटता, विस्तार, सौंदर्य, स्वरूप और अनूठा प्रभाव मन की सारी निर्बलता-निराशा को बाहर निकाल फेंकता है। कवि जी कहना चाहते हैं कि मानव और उसका मन इस प्रकृति का हिस्सा हैं। कितनी उज्जवलता और अनंत संभावनाएँ प्रकृति में है, उतनी ही मन में भी समाई हैं। वास्तव में प्रकृति अपने ही स्वरूप को खोजकर, बाहर विस्तार देने के लिए बच्ची से मिलने आई है। जब बाहर और भीतर एक हो जाएगा, तब आत्मा अनहद नाद के झूले पर थिरकेगी।
    दूसरी कविता में नन्हें-नन्हें पवित्र मन-हृदय वाली बच्चों की अनंत संभावनाओं, आकांक्षाओं और अन्य से भिन्न एवं बेहतर करने की ललक दिखाई देती है। यहाँ बच्चों की रचनात्मकता, कलात्मकता और संवेदनाओं का अनूठा रागात्मक विस्तार है। बाल मन की उज्जवलता, उसकी स्पष्टता खुद को अभिव्यक्त करने का विनम्र आग्रह काबिले तारीफ है। भावों की सहजता आप देखिए तो, “देखिए अंकल, मेरी राइटिंग जरा खराब है..।"
    वास्तव में लेखक अपनी निर्मल छवि, अपना भोला बचपन और सुनहले सपने बच्चों में तलाशता है। अमूर्त भाव का मूर्त रूप मन को बाँध लेता है। प्रकृति में जल बचा रहे दूषित और बर्बाद न हो आदि चीजों को लेकर बच्चों की भविष्य के प्रति संवेदना, सजगता और भावों की उदारता बहुत सुंदर है। ऐसी जागरूक और शिव संकल्प वाले बच्चे सचमुच में वतन के पहरेदार हैं और भविष्य की उम्मीद भी।
    “धन्यवाद प्यारे मित्र" कैसा अजब-अनोखा घर है, लेखक के मित्र का। जिसमें आर-पार सब कुछ दिखाई देता है और वह सब कुछ देखता भी है। यह हर तरफ से खुला है, जैसे किसी ज्ञानी का मन और हृदय होता है।
    खुला घर और खुली खिड़कियाँ वास्तव में लेखक के मित्र का मन और हृदय ही हैं। जो असहमति यों के लिए भी खुले हैं। उसकी अनुभूति जमीन से जुड़ी है और अभिव्यक्ति आसमान को छूती है। इसमें भाव-विचारों की विविधता और श्रेष्ठता है। इसमें प्रकृति है, बचपन है और माँ जैसा वात्सल्य भी है।
    लेखक के मित्र का घर या मन दया, करुणा, सच्चाई, सादगी और सरलता से भरा है। साहित्य और कला में नवीनता लाने के लिए वास्तव में ऐसे घर को ‘शिवाला' कहना एकदम सटीक है। क्योंकि यहाँ का सृजन और चिंतन समानता, स्वतंत्रता, एकता और बंधुत्व जैसे लोकतांत्रिक मूल्यों पर की नींव पर खड़ा है। यह मानव कल्याण का ही नहीं, मनुष्य निर्माण का घर है।
    “एक पेड़ का गिरना” कविता बहुत ही गहन संवेदना से लिखी गई है। केवल एक पेड़ का गिरना या काटना नहीं है। एक जीवंत जीवन का अंत है। यह पेड़ जैसे कोई अपना अति प्रिय अपना हो और मैं बीच में छोड़कर ही चला गया हो। बल्कि इस पेड़ के साथ जुड़ी मधुर स्मृतियों का, कोमल भावनाओं का, अल्हड़ मस्तियों का, स्नेह भरे कह कहों का, राही की आशाओं का और भावी सपनों का खत्म होना भी है। जैसे पेड़, पेड़ न होकर संवेदनशील हितचिंतक और हमारा अपना कोई बड़ा बुजुर्ग हो। यह सुख-दुख और अनुभवों से भरी एक वृक्ष की व्यथा कथा है।
    वृक्ष का गिरना क्यों... कैसे... किसलिए जैसे कई गंभीर प्रश्न भी खड़े करता है। फिर भी एक स्नेहभरी उम्मीद अभी शेष है।

    अंतिम कविता “अभी थोड़ा जीना चाहता हूँ" मेरे जैसे कमजोर हृदय के पाठक को खूब उद्वेलित करती है। वास्तव में जिसने भी भरपूर सुख-दुख, संघर्ष, पीड़ा को आनंद के साथ झेला और जिया है, वही ऐसा कह या लिख सकता है। यह कविता बहुत सहजता से बुजुर्ग अवस्था के अनुभव की ओर संकेत करती है। वहीं कुछ और करने, जीने या फिर अधूरे कामों को निपटाने उम्मीद और विनय भरा स्वर भी स्पष्ट होता है। कविता जीवन के अंतिम और अटल सत्य की ओर भी इशारा करती है।
    यह सभी कविताएँ आत्मकथात्मक कविताएँ। लेकिन लेखक इन सभी में किसी न किसी रूप में उपस्थित है। मनु जी ने इन कविताओं में स्वयं को बहुत मथा है। भाषा की शुद्धता इन कविताओं की बड़ी उपलब्धि है। एक-एक दृश्य, एक-एक के बिंब और संवेदना जैसे अपने जीवन से उठाकर यहाँ एक पौधे की तरह बड़े कोमल हाथों से बड़े स्नेह स्पर्श से यहाँ रोपी गई है।
    एक बार पुनः सेतु की संपादकीय टीम और आदरणीय प्रकाश मनु जी दोनों को बहुत-बहुत शुभकामनाएँ।

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