भारत की संस्कृति और गौरवशाली इतिहास के साथ प्रेम की पराकाष्ठा को दर्शाता उपन्यास: कलाकार का प्रेम

समीक्ष्य पुस्तक: कलाकार का प्रेम

लेखिका: श्रीमती उषा सक्सेना 
पृष्ठ: 120
मूल्य: ₹ 260.00 
प्रकाशन वर्ष: 2022
प्रकाशक: मोबाइल एप्स हिन्दी पुस्तक बैंक, जबलपुर


साहित्य जगत में उपन्यास विधा पर अपनी कुशल लेखनी चलाने वाली श्रीमती उषा सक्सेना जी का यह प्रथम उपन्यास है। यह उपन्यास प्रेम के साथ-साथ खजुराहों की मूर्तियों और वहाँ की संस्कृति को दर्शाता है।

 यूँ तो खजुराहो का इतिहास 1, 000 वर्ष पुराना है। यह कला और सौन्दर्य का संगम आज भी दर्शनीय होने के साथ-साथ अप्रतिम रूप से भारतीय इतिहास की अनुपम धरोहर भी है। इस स्थान पर शान्ति, सुकून देता पर्यावरण आज भी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है।

 कथानक के प्रारम्भ में उषा जी की लेखनी ने खजुराहो की मूर्तियों के वैभव के इतिहास को दर्शाने में बखूबी भूमिका निभाई है। प्रस्तर शिल्पी का राजकुमारी के प्रति प्रेम के रूप मे हम राजकुमारी की सुन्दरता एवं कलात्मकता के दर्शन हमें प्राप्त होते है।

उषा शर्मा
उस‌का रूपविन्यास और अभिनय क्षमता न केवल विश्वजीत को प्रभावित करती है बल्कि विश्वमोहिनी की कलाओं का चित्रण भी पाठक को अपनी ओर आकर्षित करने में पूर्णरूपेण सक्षम है। उपन्यास के नायक विश्वजीत के समान विश्वमोहिनी ने भी प्रेम सौन्दर्य की पराकाष्ठा तक पहुचने के लिए काँटो से चुभन को स्वयं पर झेलकर पाठकों को स्पष्ट करने प्रयास किया है कि प्रेम मात्र फूलों की नरम सेज नहीं बल्कि काँटो का ताज है।

 "पैरों में नुकीले पत्थरों की चुभन झेलकर महसूस करती अंत में मिट्टी के अंदर छिपे राह में पड़े बबूल के काँटो में से एक काँटे पर उसका पैर पड़ ही गया और वह पैर को झुककर ऊपर एक हाथ से पकड़कर चीख उठी -- उई माँ" तभी त्रिभंगी मुद्रा में खड़ी होकर दूसरे हाथ से काँटा निकालने लगी।

उसके चेहरे की पीड़ा और शूल की चुभन के साथ ही उसके निकालने की प्रक्रिया इन सब मुद्राओं का अलग-थलग शिलाओं पर अंकन करते शिल्पी व्यस्त थे---।" क्रमांक 44

 यह दृश्यांकन उपन्यासकार की विवरणशीलता और उसकी यथार्थ अनुभूति को अभिव्यक्त कर सकने में पूर्णतया सक्षम हो सका है।

 वास्तविकता तो यह है कि उपन्यास साहित्य जगत की सर्वश्रेष्ठ विधा है। इस विधा में लेखक पात्रों को कभी भी अपने अनुसार किसी भी रुप में ढाल सकता है। प्रेमचंद जी भी उपन्यास को मानव जीवन का चित्र मात्र मानते थे।

 उपन्यास केवल प्रेम की गाथा नहीं कहता बल्कि भारतीय संस्कृति से संबद्ध विविध कलात्मक पहलुओं और राजधर्मिता की भी बात करता है।

 रचनाकार की ये पंक्तियाँ इस बात को पूर्णतया स्पष्ट करती हैं--"राजशिल्पी विश्वकर्मा के मन मे ये विचार आया क्यों न युद्ध कला का भी कालिंजर विजय के प्रतीक के रूप में चित्रांकन करते हुए इसे भी अपनी प्रस्तर शिल्प कला में मूर्ति के रूप में उॅकेरकर टंकण करें।इससे हमारे राजा की शूरवीरता का भी पता चलेगा और एक कला के रूप में इसका प्रदर्शन भी होगा, सदा के लिये अमर हो जायेगा।आने वाली पीढ़ी को भी इसका ज्ञान होगा कि हमारे पूर्वज किस प्रकार से युद्ध करते हुए विजय प्राप्त करते थे--- हम रहे या नहीं हमारी युद्ध कला एक कला के रूप में सदा के लिए प्रतिबिम्बित होकर अमर हो जायेगी।" क्रमांक 45

 इस तरह उपन्यास की अभिरचना जीवन के सौन्दर्य बोध के साथ ही आसक्ति से विरक्ति, भोग से योग की बात करते हुए खजुराहो की मूर्तियों का कलात्मक चित्रण प्रस्तुत करती है। ये कलाकृतियाँ केवल जीवन का भोग ही नहीं बतातीं बल्कि उस मार्ग से होते हुए योग तक पहुँचना है। एक निश्चित अवस्था में हम प्राचीन काल से चले आ रहे आश्रम धर्म के अनुसार पुरुषार्थों पर चलते हुये विरक्ति या समाधि को प्राप्त करें। इसी बात को स्पष्ट करते हुए उषाजी कहती हैं कि --" योग का शाब्दिक अर्थ ही है जुड़ना या जोड़ना अर्थात मन का आत्मा से संयोग। 

 योग विषय ही अनंत और असीम है। मुक्ति पथ पर वास्तविकता में हम उपन्यास की सफलता इस बात पर निर्भर है कि इसके प्रत्येक दृश्य सरलता साथ प्रस्तुत हों और सामान्य रहें उपन्यास के प्रत्येक पात्र व कहानी को इस तरह दर्शाया जाए कि पाठक को पढ़ते समय ऐसा लगे मानों वह उनके आस-पास की उनकी खुद की कहानी महसूस हो। 

 उपन्यास का अंत अनेक कौतूहलों का, जिज्ञासाओं का समाधान करता है। कापालिक का प्रायश्चित, राजशिल्पी का राजकुमारी का हाथ माँगना, राजनर्तकी का योगिनी बनना इत्यादि कथा की संपूर्णता को अभिव्यक्त कर पाने में सफल हो सके हैं।

 उपन्यास की भाषा-शैली बहुत ही सरल और भाषायी विन्यास और उपन्यास की शैलीगत विशेषताएँ भी बहुत उन्नत हैं भाषा की सरलता के कारण पाठक उपन्यास को जब एक बार पढ़ना प्रारम्भ करता है तो पढ़ता ही जाएगा और यह पाठक के मन पर एक अमित छाप छोड़ेगा ऐसा हमारा विश्वास है। 
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उषा शर्मा
शिक्षा: एम॰ ए॰ (हिन्दी, संस्कृत, समाजशास्त्र) बी॰ एड॰ 
संप्रति: अध्यापन (आर्मी पब्लिक स्कूल, मथुरा)
प्रसारण: गत 10 वर्ष से आकाशवाणी मथुरा से नियमित काव्य व कहानी पाठ  साथ ही मंचों पर नियमित काव्य पाठ
उल्लेखनीय: लगभग दो दर्जन साहित्यिक संस्थाओ द्वारा सम्मानित। उपन्यास (?) सबसे छोटे टाइटल के रूप में ग्लोबल ऑफ इंडिया बुक रिकॉर्ड मे शामिल। अर्पण संस्था की सचिव के रूप में पिछले 10 वर्ष से गरीब बेसहारा लोगों की अप्रत्यक्ष रूप से मदद, गरीब बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा व्यवस्था, तथा महिलाओं को रोजगार में सहायता करना
पता: ई-45 महाविद्या कॉलोनी, मथुरा-281001
चलभाष: 9997683004
ईमेल: priyaushasharma@gmail.com 

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