समीक्षा: कविता में जीते हुए (राकेश प्रेम)

समीक्षा: मधु संधु

पूर्व प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर, पंजाब

पुस्तक: कविता में जीते हुए
कहानीकार: राकेश प्रेम
प्रकाशक: कलमकार, नई दिल्ली
मूल्य: ₹ 250.00
वर्ष: 2023
---

राकेश प्रेम के दो काव्य संग्रहों से गुज़र चुकी हूँ- 'जड़ पकड़ते हुये’ तथा 'सूरजमुखी सा खिलता है जो’। फिलहाल बात मुझे उनके सद्य: प्रकाशित काव्य संग्रह – 'कविता में जीते हुए’ की करनी है। इसमें कुल 58 कविताएँ हैं। हर कवि की अपनी अलग शैली, अंदाज़, स्टाइल होता है। राकेश प्रेम की यही विशेषता उन्हें अपने समकालीनों से अलग करती है। 'कविता में जीते हुए’ राकेश प्रेम जी का छठा काव्य संग्रह है। जितेंद्र श्री वास्तव के शब्दों में, “वरिष्ठ कवि राकेश प्रेम की कविताएँ समकालीन कविता के प्रचलित मुहावरों से अलग है, इसीलिए अपने पाठकों से अतिरिक्त सहृदयता और ठहराव की उम्मीद रखती हैं।” (पृष्ठ 7)
प्रकृति से सानिध्य इन रचनाओं का प्राण तत्व है। कवि बार- बार प्रकृति की ओर मुड़ता है और पाता है कि प्रकृति का नैसर्गिक रूप गतिशील, कर्मण्य, सौद्देश्य जीवन का समर्थन कर रहा है। अंधड़, वर्षा, आग उगलती हवाएँ भी एक बीज को ध्वस्त नहीं कर सकती। वह फूटता है और धरती में जड़ होते हुए भी रंग- बिरंगे आकाश की ओर बढ़ते हुए अपने सौंदर्य, ओज और सुगंध से जीवन के महाकाव्य का सृजन करता है। विपरीत हवाओं से लड़कर कल्प वृक्ष बनना- यही जीवन है- 'चलना है उसे हवा की गति के विरुद्ध और देना है अर्थ अपने जीवन को-------- बीज अब कल्पवृक्ष हो गया है किसी सपने के सच होने जैसा।' (पृष्ठ 16)

मधु संधु
   प्रकृति के बिंब प्रतीक, प्रकृति से साम्य भी यहाँ मिलता है क्योंकि  मनुष्य भी प्रकृति का ही अंग है।
           माँ का त्याग, निस्वार्थ ममत्व, वात्सल्य, स्नेह सुधा सर्वोपरि है। वह सबसे बड़ी धर्म शिक्षक है, ज्ञान पुंज है-
जिसके आशीष से
प्रफुल्लित होती है
हमारी जीवन बगिया
माँ ही है
उसकी सुघड़ माली। (पृष्ठ 32)
कवि अपने पाठक को जीवन गत समस्याओं के प्रति सचेतन करता है, लेकिन आशावाद, जय, आस्था, सद्कर्म  तथा सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय  मूलमंत्र की तरह सर्वत्र बिखरा है- 'जय होगी, मानव की, मानवता की, फिर उगेगा सूर्य, संभावना का।' (पृष्ठ 112) 
 समय बहुत बलवान है-
'रथ का टूटा पहिया
कब बन जाएगा ब्रह्मास्त्र
और देगा चुनौती
अक्षौहिणी सेनाओं को
यह तो समय ही जानता है।' (पृष्ठ 106) 
चरेवेति, चरेवेति, गति ही जीवन है, प्रगति है। राकेश प्रेम कहते हैं- “ कविता भावुक लोगों की रचना है और ऐसे लोग अब अप्रासंगिक हो गए हैं। किन्तु कविता का संबंध मनुष्य के आत्मचेतस के साथ है। --- वह ऐसी जीवन शक्ति है जो कि मानवीय विवेक के साथ जुड़ी है और जिसका अस्तित्व मानवीय अस्तित्व के साथ जुड़ा हुआ है।“ (पृष्ठ 9)
परिवेश, समाज उत्तरदायित्व की बात कर कवि उसे जीवन से जोड़ता है। सृष्टि में प्रकृति हो या मनुष्य- सभी परस्पर अनुस्यूत हैं। अहंकार अनादृत है, अवांछित है।  सभी एक दूसरे से जीवन रस लेते हैं। 
शेषनाग, क्षीरसागर, एकलव्य, कामधेनु के पौराणिक बिम्ब, महाभारत, रामायण की कथाएँ भी यहाँ हैं। पौराणिक कथाओं के वे काले पन्ने कवि को व्यग्र करते हैं, जहां निहत्था अभिमन्यु महारथियों के कोप का भाजन बनता है। द्रौपदी को शतरंज के मोहरे की तरह दांव पर लगा दिया जाता है। शकुनि की चालें अन्याय का पोषण करती हैं। स्त्री का मायावी मृग के लिए कौतूहल अनहोनी का कारण बनाता है। आज भी कुछ नहीं बदला। युग- युगांतर से यही व्यवस्था चल रही है। 
कवि पौराणिक एकलव्य की आधुनिक होरी से तुलना करता है। क्योंकि दोनों को ही नरभक्षी व्यवस्था के जबड़ों का शिकार होना पड़ा। 
'बस बदलना है पात्र को ही
भोगने की नियति,
उसे ही होना है होम
और सहर्ष हो जाना है कैद
नरभक्षी व्यवस्था के जबड़े में ।' (पृष्ठ 45)
चर्म और धर्म से नहीं कर्म से मनुष्य की पहचान होती है। 
भारतीय संस्कृति के कुछ पक्ष भी यहाँ आए है। 'पितृपक्ष’  कविता में श्राद्ध और पितरों की बात है। 'संकल्प’ में सह अस्तित्व का संदेश है। 
प्रगति और गति के नाम पर भूमंडलीकरण/ विश्वग्राम की चर्चाओं से भी कवि       अनभिज्ञ नही है। लेकिन कवि के लिए सभ्यता, संस्कृति, स्थानीयता का महत्व सर्वोपरि है।
कवि का दार्शनिक रूप पंच तत्वों की बात करता है। आग, हवा, पानी, मिट्टी, आकाश में छिपी अबूझ पहेलियों पर चिंतन करता है। तर्पण, नश्वरता, पुनर्जन्म और निर्वेद की बात करता है। समय के साथ सम्बन्धों के निस्तेज होने का आर्ष सत्य निरावृत करता है।   
अपनी रचना प्रक्रिया की बात करते राकेश प्रेम कहते  है- 'कविता न शब्द है, न अर्थ है, वाक्य है न वाक्यांश कविता, भाषा भी नहीं है, न है भाव का समुच्चय, कविता संवेग है, ताप है.... रेगिस्तान में उड़ते चले आते बवंडर, और शिलालेख से, बहते लावे की तपिश है कविता।' (पृष्ठ 25)
काव्य राकेश प्रेम के लिए एक संवाद है। मानो एक सर्जक अपने भीतर के मनीषी से बतिया रहा हो। यह एक संवेदनशील और संयत व्यक्ति का काव्य संसार है, जो न प्रलोभनों, सुविधाओं के आगे आंदोलित होता है और न सपनों के लिए बिकता है। अपनी लक्ष्मण रेखा वह पहचानता है। एक कुंभकार की तरह कवि भावों को गूँथकर, चाक पर चढ़ाकर आकृति दे रहा है। लोहार की तरह आग को पीकर सृजन कर रहा है। चित्रकार की तरह रंग भर रहा है-
'अनुभव साँच को जीता हूँ
विष पीता हूँ
शब्द की पगडंडी पर चलता
अर्थ की बाँह पकड़
स्वयं को ढालता हूँ
कविता में।' (पृष्ठ 100)  

समास शैली में, अर्थगर्भिता में, व्यंजना में कवि का विश्वास है। जैसे एक जुलाहा सूत  सहेज कर आँचल बना देता है, वैसे ही कवि भी चुपचाप शब्दों में प्राण डाल काव्य सृजन करता है।   कथ्य, भाव और भाषा की दृष्टि से यह एक परिपक्व रचना है। हर शीर्षक कविता के मूल कथ्य/ भाव का पर्याय है। मर्म को गहराई से उकेरती यह कविताएँ पाठकों को बांध लेने की शक्ति रखती हैं ।
***

madhu_sd19@yahoo.co.in 

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।