चरम सफलता में निहित है, एकाकीपन का अभिशाप

दयानिधि सा

सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग प्रमुख, महात्मागांधी स्नातक महाविद्यालय, भूक्ता-768045,
जिला–बरगढ़, (ओड़ीशा)
चलभाष: +91 917 828 1452 ईमेल: sa.dayanidhi2011@gmail.com

काशीनाथ सिंह का 'उपसंहार' 
चरम सफलता व्यक्ति के लिए एकाकीपन का अभिशाप बन जाती है। जब व्यक्ति सफलता के चरम उत्कर्ष पर पहुँच जाता है, तब उसके आस-पास, आगे-पीछे कोई मौजूद नहीं रहता। वह इतना अकेला रह जाता है कि अपना सुख-दुख बाँट नहीं पाता। वह आम लोगों से और खाश लोगों से भी इतना कट जाता है कि अकेलेपन का अभिशप्त जीवन जीना पड़ता है । चाहे इनसान हो या भगवान कोई भी इस अभिशाप से मुक्त नहीं हो पाता। 'उपसंहार' नामक उपन्यास में इस जीवन सत्य को विशिष्ट कथाकार काशीनाथ सिंह ने एक मिथक के माध्यम से शब्दांकित किया है। आधुनिक हिंदी कथा साहित्य के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाले कथाशिल्पी काशीनाथ सिंह ने उत्तर महाभारत के कथा प्रसंग को आज के युगीन सन्दर्भों से जोड़कर महाभारत के महायुद्ध के महाविनाश को हमारे सामने प्रस्तुत किया है। उन्होंने सिद्ध करके दिखाया है कि युद्ध किसी भी समस्या का समुचित समाधान नहीं हो सकता, युद्ध केवल विनाश का कारण बनकर मानवता का हनन कर सकता है। महाभारत के युद्ध ने यही करके दिखा दिया । 
    अठारह दिन के महाविनाशकारी महाभारत युद्ध की विभीषिका का मर्मस्पर्शी चित्रण 'उपसंहार' उपन्यास में हुआ है। द्वारकाधीश श्रीकृष्ण महाभारत के युद्ध की परिसमाप्ति के पश्चात द्वारका लौटते हैं । उस भीषण महायुद्ध के परिणाम से उनका हृदय उद्वेलित हो उठा है। क्योंकि महाभारत युद्ध के कर्ताधर्ता श्रीकृष्ण ही थे। उन्होंने ही धर्म की स्थापना के लिए महाभारत युद्ध का संचालन-सम्पादन किया था। उस युद्ध में कौरवों और पाण्डवों की तरफ से पूरे आर्यावर्त के राजा-महाराजाओं ने शामिल होकर, युद्ध को अन्तिम अंजाम दिया था। हजारों की संख्या में सैनिकों ने, राजा-महाराजाओं ने अपनी जान गंवाई थी। पूरा कुरुक्षेत्र रक्त रंजित हो गया था, योद्धाओं के रक्त से। जाने कितनी माताओं की गोद सुनी हो गई थी, कितनी पत्नियों का सुहाग उजड़ गया था, कितने बच्चे अनाथ हो गए थे। दुर्योधन के अभिमान ने सब कुछ तहस-नहस कर दिया था, कौरवों-पाण्डवों का सब कुछ छीन लिया था।
    महाभारत युद्ध की परिसमाप्ति के पश्चात श्रीकृष्ण द्वारका लौटकर देखते हैं कि सब कुछ शान्त, नीरव, निस्तब्ध है । सभी तरफ निस्तब्धता छाई हुई है। महाभारत की विभीषिका से धरती, आसमान, सागर सभी प्राकृतिक वैभव क्षतिग्रस्त हो गए हैं। श्रीकृष्ण अठारह दिनों तक दिन-रात युद्ध कौशल में व्यस्त थे, सभी कार्य खुद संपादित कर रहे थे। युद्ध की परिणति के बाद द्वारका लौटकर कृष्ण देखते हैं, “उस पार धुंध में डूबी हुई द्वारका, इस पार हरे भरे जंगलों का अनन्त विस्तार, बीच में पश्चिमी सागर की उछलती-कुदती खाड़ी, जंगलों का विस्तार जहाँ खत्म होता है, वहीं से शुरू होता है रेत का मैदान। वह मैदान जंगल से उतरता है और थोड़ा चलकर समुद्र में गुम हो जाता है। समुद्र रात भर उछल-कूद मचाने के बाद इस वक्त शान्त पड़ा है, जैसे सुस्ता रहा हो ।”01 
       सागर की तरह श्री कृष्ण का विशाल शरीर, अब सुस्ताना चाहता है, वे शांति से जीवन बिताना चाहते हैं। लेकिन उनके जीवन पथ पर कंटीला पथरीला जंगल है, नदी जैसी ऊबड़-खाबड रेत है। नदी का पानी गतिशील होकर सागर में समाहित हो जाता है और समाहित होकर अपनी सार्थकता सिध्द करता है। श्री कृष्ण भी जल-समाधि लेकर शांति  की नींद सो जाना चाहते हैं, पर परिस्थिति उन्हें ऐसा करने से रोकती है। क्योंकि श्रीकृष्ण भगवान होकर भी परिस्थिति के दास हैं। नियति के नियमों से बन्धे हुए हैं। प्रकृति के नियम कृष्ण पर भी लागू होते हैं, जो दूसरों पर लागू होते आ रहे हैं। युद्ध की परिसमाप्ति के पश्चात द्वारका में प्रवेश करते हुए श्रीकृष्ण कुछ अलग ही अनुभव-संसार में विचरण करने लगते हैं।
     उपन्यास में देखते हैं कि महाभारत विजय के बाद द्वारकाधीश द्वारका प्रत्यावर्तन करते हैं । उनके साथ बलराम की नारायणी सेना भी लोटती है, जिससे स्वयं देवराज इन्द्र तक भय खाते हैं। द्वारका लौटकर श्रीकृष्ण महाभारत युद्ध का मंथन करते हैं। युद्ध में लडाकू घोड़ों की देखभाल के लिए दारुक वहाँ मौजूद थे। उन्होंने देखा था कि युद्ध के दौरान श्रीकृष्ण दिन रात कितनी मेहनत करते थे। कृष्ण कितनी वेदना भरी जिंदगी व्यतीत करते थे। युद्ध में वीरगति प्राप्त करने वाले योद्धाओं, सगे संबंधियों के लिए दुख प्रकट नहीं कर पाते थे। अपना दुख, दर्द, वेदना, सन्ताप अपने वक्षस्थल में धारण कर लेते थे। दारुक जब भगवान कृष्ण के त्यागमय जीवन के बारे में अपने विचार प्रकट करते हैं तो कृष्ण दिल को पत्थर करके कहते हैं, “भगवान बनने के लिए पत्थर होना जरूरी है क्या?” (2)
    महाभारत के युद्ध को धर्म का युद्ध माना जाता है। धर्म की स्थापना के लिए, अधर्म के नाश के लिए महाभारत का युद्ध अवश्यंभावी हो गया था। स्वयं श्रीकृष्ण ने धर्म की संस्थापना के लिए इतना बड़ा विनाशकारी महायुद्ध का संचालन किया। अधर्म का नाश तो हुआ, धर्म की स्थापना तो हुई लेकिन इसके पीछे मानव जाति के लिए कई कंलकित अध्याय जोड़ दिए। मानवता के विनाश का इतना बडा महायुद्ध धरती पर घटित नही हुआ था। यद्यपि यह युद्ध, धर्म और अधर्म के बीच हुआ था, धर्म की विजय हुई थी, अधर्म का नाश हुआ था। परन्तु अधर्म का नाश करने वाले श्रीकृष्ण के ऊपर अनेक लांछन लगे, उन्हें अभिशाप तक मिल गया। स्वयं उनके दाऊ भैया बलराम ने उन पर कई आरोप प्रत्यारोप लगा दिए। द्वारका नगरी में सागर किनारे बैठे हुए बलराम अत्तेजित होकर श्रीकृष्ण से कटाक्ष भरे शब्दों में कहते हैं -”तुमने युद्ध की शास्त्रीय और पुरानी शैली को नकारा साबित कर दिया, अपनी छल और कूट बुद्धि से। इनका प्रयोग तुम असुरों-राक्षसों के संहार के लिए करते हो। लेकिन युध्द में छल से जिसका वध किया, वे असुर या राक्षस नहीं थे। भीष्म, द्रोण, कर्ण ये अनमोल रत्न थे आर्यावर्त के, जो किसी किसी युग में कभी कभार ही जन्म लेते हैं। इन्हें अकेले नहीं मार सकता था क्या अर्जुन? फिर वह किस बात के लिए तीनों लोकों में सबसे बड़ा धनुर्धर कहलाता फिर रहा था?”3
     अठारह दिन के महाभारत युद्ध  में श्रीकृष्ण के साथ रणभूमि में रहने वाले दारूक के मन में कृष्ण के प्रति गहरी संवेदना जाग्रत होती है। दारुक हमेशा कृष्ण को करीब से देखता था, उनके अन्दर की वेदना को भली भाँति महसूस करता था। वह देखता था कि कृष्ण किस तरह से हर व्यक्ति, हर योद्धा के दुःख-दर्द को अपने आप में समाहित करते आ रहे थे। कर्म योगी बनकर केवल अपने कर्तव्य का सफल सम्पादन कर रहे थे। श्रीकृष्ण स्वयं भगवान हैं, सर्वज्ञाता हैं, सर्वशक्तिमान हैं, पूरी सृष्टि के संचालक हैं। फिर भी धरती पर वसुदेव-देवकी के पुत्र के रूप में प्रादुर्भूत होकर सामान्य व्यक्ति के रूप में जीवन जी रहे थे। कहीं भी अपने ईश्वरत्व को लेकर उनके मन में अहंकर व अहम भाव नहीं था। महाभारत युद्ध को रोकने के लिए वे पाण्डवों की तरफ से शान्ति दूत बनकर गए थे। शांति का संदेश पूरे भारत वर्ष को ही नहीं पूरे विश्व को दे रहे थे। परन्तु दुर्योधन ने उनका तिरस्कार किया, अपमानित किया, लांछित किया। फिर भी श्री कृष्ण ने दुर्योधन की शुभकामना में ईश्वर से विनती की कि उन्हें सद्‌बुद्धि प्रदान करें।
     श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध को टालने के  पूरे प्रयास किए । लेकिन जब युद्ध निश्चित हो गया, तब उन्होंने न्याय का, धर्म का साथ दिया। दारुक ने श्रीकृष्ण को कुरुक्षेत्र में कर्मयोगी पुरुष के रुप में कर्मरत होते देखा। दारुक वासुदेव श्रीकृष्ण से उनके कर्तव्यबोध की प्रशंसा करते हुए कहता है-”दादा, में महाभारत के अठारह दिनों तक दिन रात शिविर में था आपके साथ। मैं आपके घोड़ों की ही देखभाल नहीं कर रहा था, लोगों की बातें भी सुनता था कि आप सर्वज हैं, वर्तमान भविष्य सब जानते हैं, अवतार हैं, ईश्वर हैं, सब कुछ हैं। आप युद्ध भूमि से लौटकर आते थे, न चेहरे पर कोई तनाव होता था, न देह में थकान। घंटे दो घंटे बाद ही निकल जाते थे, फिर रात भर ढूंढ-ढूंढ कर अपनी सेना के वीरो की चीताएँ सजाते थे। फिर सुबह होते होते कुरुक्षेत्र में । कितना जोश कितना उत्साह था आपके अन्दर । काम, काम, काम ।”04 श्रीकृष्ण ने निष्काम कर्मयोग का ज्ञान पार्थ को कुरुक्षेत्र में सुनाया था, उसका पालन उन्होंने महाभारत युद्ध में किया, परन्तु उसकी बहुत बड़ी कीमत उनको चुकानी पड़ी।
      महाभारत युद्ध ने लोगों के मन में अविश्वास बोध इतना भर दिया था कि कोई व्यक्ति किसी पर विश्वास ही नहीं कर पा रहा था। द्वारका में विद्वेष की भावना पनप रही थी। यादव वंशीय लोग एक दूसरे पर लांछन लगाते हुए वैमनस्य भाव को बढ़ावा देने लगे थे ।अपने कुल के लोगों को आपस में कलह करते हुए देखकर कृष्ण का मन क्षोभ से भरा जा रहा था। धीरे धीरे सभी यादव वीर, पुरुष आपसी संघर्ष में विनाश होते जा रहे थे। माता कैकेयी के अभिशाप को याद करके श्रीकृष्ण अधीर होते जा रहे थे। यद्यपि कौरवों के विनाश में श्रीकृष्ण का कोई हाथ नहीं था, वह तो दुर्योधन के अभिमान की चपेट में आकर सब कुछ खत्म हो गया था। श्रीकृष्ण निराश होकर सागर तट पर चिन्तामग्न अवस्था में बेठे हुए थे। तभी एक अनुगुंज उनके कानों तक पहुँचती है, “वासुदेव सुख के दिन बीत चुके। अब तो भयानक संकट का समय आ रहा है। आने वाला हर नया दिन बीते हुए दिन से त्रासद होगा। धरती ने अपना यौवन खो दिया है।”05
   द्वारका में यादव वंश की विनाश लीला प्रारम्भ हो जाती है। विनाश की प्रलय छाया पूरी द्वारका नगरी में मण्डराने लगती है। पूरी नगरी में अकाल जैसी विभीषिका उत्पन्न होने लगती है। लोगों में हाहाकार मचने लगता है। लोग एक- दूसरे को नफरत की नजर से देखने लगते हैं। सभी तरफ लूट पाट, चोरी-चपारी, मार-काट होने लगता है। श्रीकृष्ण के पूर्वज और वंशज आपस में लड़कर मौत की नींद सोने लगते हैं। सत्यकि, कृतवर्मा, साम्ब, बभ्रु, अनिरुद्ध आदि यदुवंश के लोग आपसी संघर्ष के शिकार होकर विनाश की गर्त में समाहित हो जाते हैं। सात्यकि मदिरा पान करके नशे में धूर्त होकर कृतवर्मा से उपहास भरे स्वर में कहता है, “हार्दिक्य, तू नीच है। याद है, तूने पाण्डव पुत्रों  और दूसरे योद्धाओं की हत्या कब की थी? आधी रात को । जब युद्ध खत्म हो गया था और वे अपने शिविर में मुर्दों की तरह अचेत सोए हुए थे। क्या यही क्षत्रिय धर्म है? इससे बढ़कर नीचता और क्या होगी? जो अन्याय तुमने किया है, उसके लिए यदुबंशी तुझे कभी क्षमा नहीं करेंगे ।”06 द्वारका के क्षत्रिय इसी तरह एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाकर आपस में लड़ मरते हैं। यदुवंश का नाश हो जाता है, माता गांधारी का अभिशाप फलीभूत हो जाता है।
    उपन्यास के अंतिम भाग में दर्शित है कि यदुवंश के नाश हो जाने के भीषण दुख-सन्ताप को बलराम सहन नहीं कर पाते। वह इस मार्मिक वेदना से मुक्ति पाने के लिए सागर गर्भ में प्रवेश करके जल समाधि ले लेते हैं। श्री कृष्ण उन्हें रोकने की पूरी कोशिश करते हैं, पर रोक नहीं पाते। नियति के अनुसार उन्हें भी इस दुनिया से विहा लेनी थी, इसीलिए सांसारिक जीवन से मोह त्यागकर बलराम परम धाम की यात्रा तय करने के लिए द्वारका नगरी त्यागकर सलिल समाधी वरण कर लेते हैं। श्रीकृष्ण भी इस भीषण संकट की घड़ी में संयम धारण नहीं कर पाते और निर्जन वन में एकान्त में चले जाते हैं। खाण्डव वन में वे एक पेड़ के नीचे शिला पर लेट कर आराम कर रहे होते हैं, तभी जरा नाम का शबर उनके कोमल पैरों को हिरन का कान समझकर तीर चला देता है। जरा के शर से वे बुरी तरह से घायल हो जाते हैं। श्रीकृष्ण जरा को अपना भाई मानते हैं, क्योंकि उन दोनों के बीच भाई का रिश्ता है। वे अपने भाई जरा से कहते हैं -'जब मैं ही नहीं समझ सका जीवन  और जगत के रहस्य को तो दूसरा कोई क्या समझेगा ।”07जीवन के अन्तिम समय में भगवान श्री कृष्ण खुद अपने मुख से इस सच्चाई को व्यक्त करते हैं कि जीवन और जगत के गूढ़ रहस्य को समझ पाना उनके वश की भी बात नहीं है। वे भी नियति के सामने घूटने टेक देते हैं, महाकाल मृत्यु के सामने नतमस्तक होते हैं। सर्व शक्तिमान, सर्वज्ञ  भगवान के रूप में पूरी सृष्टि का संचालन करनेवाले श्रीकृष्ण आज नियति के सामने हार मान गए हैं।
    जरा के तीर से गंभीर रूप से घायल श्रीकृष्ण महाकाल के अधीन हो चुके हैं। समय चक्र में पड़ कर श्रीकृष्ण शक्तिहीन, तेजहीन हो गए हैं। मौत के सामने नतमस्तक होकर, माया-मोह के सारे बंधन तोड़ने लगते हैं। मृत्यु को समीप देखकर वे अपनी जीवन लीला समाप्त होने का आभास करने लगते हैं। जरा अपने भाई कृष्ण को कहना चाहता है, पर पता नहीं वे सुन पाए  या नहीं। उन्होंने अपनी आंखें बंद कर दीं और सिर जरा की गोद में रख दिया। जरा ने आहिस्ता से कृष्ण के सिर को उठाया ओर नीचे जमीन पर रख दिया। चाँदनी छिटकी हुई थी और पीपल के पत्तों से छनकर उनके चेहरे पर आ रही थी। जरा ने उनकी भुजाएँ ठीक कीं, पाँव सीधे  किए और देर तक उस शांत, प्रसन्न और पूर्णकाम मुख मंडल को निहारा। उन्होंने कृष्ण के बारे में बचपन से जो सुना था, बिल्कुल वैसा ही था ।
       “श्रीकृष्ण ने अन्तिम बार आँखें खोलकर उसे देखा। वे भावुक और द्रवित हो उठे। उनकी आँखों की कोर में आंसू लुढ़क आए। उनके होठ काँप रहे थे, वे कुछ कहना चाहते थे, लेकिन आवाज बाहर नहीं आ पा रही थी। जरा ने झूकमर अपना कान उनके होठों के पास रखा। वे कह रहे थे - 'जरा मेरे भई, द्वारका जाकर वसुदेव महाराज से कह दो, अब मेरी प्रतीक्षा न करें ।”08 इतना कहकर द्वारकाधीश श्रीकृष्ण अपनी जीवन-लीला समाप्त कर देते हैं। श्री कृष्ण की मृत्यु के साथ ही एक युग की परिसमाप्ति हो जाती है । जरा अपने भाई की मृत्यु के शोक संताप से निकलकर अंतिम संस्कार के लिए लकड़ी इकठ्ठा करता है और शव को मुखाग्नि देकर गति मुक्ति का पथ उन्मुक्त करना चाहता है। तभी एक स्वर गूंज उठता है , “शव को बचाए रखो, सुबह तक के लिए । 09 
     वस्तुतः 'उपसंहार' काशीनाथ सिंह द्वारा रचित आध्यात्मिक चेतना संपन्न औपन्यासिक कृति है। इसमें लेखक ने एक नए प्रतिमान को स्थापित करते हुए मिथक प्रयोग द्वारा प्रत्येक युग के चरम सत्य को प्रतिस्थापित किया है। यह उपन्यास सिद्ध करता है कि चरम सफलता व्यक्ति को एकाकीपन का अभिशप्त जीवन जीने को मजबूर कर देती है। श्रीकृष्ण की महाभारत की चरम सफलता एकाकी जीवन का ऐसा अभिशाप बनकर सामने आती है कि उन्हें उनका संपूर्ण जीवन निस्सार लगने लगता है। डॉ. शशिभूषण द्विवेदी के शब्दों में कहें तो, “यहाँ श्रीकृष्ण जीवन-मृत्यु, सत्ता और काल के विराट प्रश्नों से जूझते हैं और उन्हें खुद गीता के अपने प्रवचन खोखले लगने लगते हैं ।”

संदर्भ ग्रंथ सूची -
01. उपसंहार, काशीनाथ सिंह, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 1999, पृष्ठ- 09
02. उपसंहार, पृष्ठ- 17
03. उपसंहार, पृष्ठ- 64
04. उपसंहार, पृष्ठ - 117
05. उपसंहार, पृष्ठ- 119
06. उपसंहार, पृष्ठ - 120
07. उपसंहार, पृष्ठ- 126
08. उपसंहार, पृष्ठ- 127
09. उपसंहार, पृष्ठ - 127

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