रांगेय राघव: सामान्यजन का अनूठा रचनाकार

सन्दीप तोमर

सन्दीप तोमर



रांगेय राघव हिंदी साहित्य के विलक्षण कथाकार, लेखक, कवि माने जाते हैं। वह मूल रूप से तमिल भाषी थे, लेकिन उन्होंने हिंदी में बहुत लिखा। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के आगरा जिले में 17 जनवरी, 1923 को हुआ था। ऐसा माना जाता है कि रांगेय राघव के पूर्वज लगभग 300 साल पहले आकर जयपुर और भरतपुर के गांवों में रहने लगे थे। उनकी शिक्षा-दीक्षा आगरा में हुई।

उन्होंने 1944 'सेंट जॉन्स कॉलेज' से स्नातकोत्तर और 1949 में 'आगरा विश्वविद्यालय' से गुरु गोरखनाथ पर शोध करके पीएचडी की डिग्री हासिल की थी। केवल 39 साल की उम्र में रांगेय राघव का निधन कैंसर के कारण 12 सितंबर 1962 में हो गया। भले ही वे बहुत कम उम्र देख पाए लेकिन इतना अधिक लिखा कि कालजयी हो गए। राहुल सांकृत्ययायन के बाद सबसे ज्यादा लिखने वाले साहित्यकार कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। उन्होंने संस्कृत रचनाओं का हिन्दी में अनुवाद किया, साथ ही जर्मन और फ्रांसीसी के अनेक साहित्यकारों की रचनाओं का भी हिंदी में अनुवाद किया। उनके द्वारा शेक्सपीयर की रचनाओं का हिंदी अनुवाद मूल रचना सरीखा होने के कारण उन्हें 'हिंदी के शेक्सपीयर' की संज्ञा दी गई। शेक्सपियर के दस नाटकों का उन्होंने हिंदी में अनुवाद किया था। भारतीय भाषाओं में अनूदित कृतियाँ - जैसा तुम चाहो, हैमलेट, वेनिस का सौदागर, ऑथेलो, निष्फल प्रेम, परिवर्तन, तिल का ताड़, तूफान, मैकबेथ, जूलियस सीजर, बारहवीं रात उन्हीं की देन हैं। इन कृतियों को पढ़कर अंदाजा लगाना मुश्किल है कि ये वास्तव में किसी अन्य भाषा कि अनूदित कृतियाँ हैं, अनुवाद का यह कौशल उन्हें एक विशिष्ट दर्जा प्रदान करता है।

रांगेय राघव
वह अंग्रेजी, हिंदी, ब्रज और संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। साथ ही दक्षिण भारतीय भाषाओं, तमिल और तेलुगू का भी उन्हें अच्छा-खासा ज्ञान था। इतनी अधिक भाषाओँ के जानकर साहित्यकार विरले ही मिलते हैं। साहित्य के अतिरिक्त चित्रकला, संगीत और पुरातत्त्व में विशेष रुचि रखते थे। वे साहित्य की प्रायः सभी विधाओं में सिद्धहस्त रहे। उन्होंने मात्र 39 वर्ष की आयु में कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, रिपोतार्ज के अतिरिक्त आलोचना, सभ्यता और संस्कृति पर शोध व व्याख्या के क्षेत्रों को 150 से भी अधिक पुस्तकों से भारतीय साहित्य को समृद्ध किया। वे अपनी अद्भुत प्रतिभा, असाधारण ज्ञान और लेखन-क्षमता के लिए सर्वमान्य अद्वितीय लेखकमाने जाते रहे। उन्होंने कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, रिपोर्ताज सहित आलोचना, संस्कृति और सभ्यता जैसे विषयों पर डेढ़ सौ से अधिक पुस्तकें लिखी हैं।

उनके बारे में एक कहावत प्रचलित थी, “जितने समय में कोई एक किताब पढ़ता है, उतने में वह एक किताब लिख देते हैं।” रांगेय राघव नाम के पीछे भी एक कहानी है। उन्होंने अपने पिता रंगाचार्य के नाम से रांगेय लिया और अपने स्वयं के नाम राघवाचार्य से राघव शब्द लेकर अपना नाम रांगेय राघव रखा। उनके साहित्य में जो सादगी परिलक्षित होती है वैसे ही उनका जीवन दिखाई पड़ता है वे सीधा-सादा और सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत करते थे।

एक बार रामदरश मिश्र जी से साक्षात्कार किया तो उन्होंने मंतव्य था कि लेखक को किसी वाद, या विचारधारा से नहीं बंधना चाहिए लेखक सबका होता है, लेखक न संघी होता है, न ही कांग्रेसी या कोई अन्य। लेखक की स्वयं की दृष्टि होती है। लेखक का काम होता है गलत का विरोध करना। आप स्वयं को किसी एक विचारधारा में नहीं बांध सकते। लेखक की नजर में सब रहता है। उसकी दृष्टि में कुछ छिपा नहीं होता। उसका फर्ज होता है कि वो तठस्थ होकर लिखे। रांगेय राघव सामान्य जन के ऐसे ही रचनाकार थे जो समूचे जीवन किसी वाद से नहीं बंधे। उन्होंने अपने ऊपर मढ़े जा रहे मार्क्सवाद, प्रगतिवाद और यथार्थवाद का विरोध किया। उन्होंने स्पष्ट कहा था, “मैंने न तो प्रयोगवाद और प्रगतिवाद का आश्रय लिया और न ही प्रगतिवाद के चोले में अपने को यांत्रिक बनाया।“ कहा जा सकता है कि वह मूलतः मानवीय सरोकारों के लेखक हैं।

रांगेय राघव के रचनाकर्म पर दृष्टि डालें तो पता चलता है कि उन्होंने अपने अध्ययन से, अपने दौर के इतिहास से, मानवीय जीवन, मनुष्य के दुःख-दर्द-पीड़ा और उस चेतना, जिसके भरोसे वह संघर्ष करता है, अंधकार से जूझता है, उसे ही सत्य माना, और उसी को आधार बनाकर साहित्य रचना की। उन्हें अपने युग से आगे का लेखक माना जाता था। उनके लेखन की प्रगतिशीलता के चलते उन्हें प्रेमचंद के बाद हिन्दी साहित्य का युग प्रवर्तक लेखक माने लिया गया।

उन्हें उनके रचनाकर्म के लिए कई पुरस्कार-सम्मान मिले, उन्हें 1947 में हिंदुस्तानी अकादमी पुरस्कार, 1954 में डालमिया पुरस्कार, 1957 और 1959 में उत्तर प्रदेश शासन पुरस्कार, 1961 में राजस्थान साहित्य अकादमी पुरस्कार और 1966 में मरणोपरांत महात्मा गांधी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

रांगेय राघव को ऐतिहासिक उपन्यास लिखने में महारथ हासिल थी, उन्होंने ने केवल ऐतिहासिक उपन्यास लिखे, बल्कि ऐसे ऐतिहासिक उपन्यास लिखे जिनके चरित्र महिलाओं से जुड़े थे। रांगेय राघव ने इन ऐतिहासिक या पौराणिक पात्रों को एक स्त्री के नजरिए से देखा। उन्होंने ‘गदल’ कहानी लिखी, जो आधुनिक स्त्री-विमर्श की कसौटी पर खरी उतरती है। राघव के उपन्यासों के  नाम उनके पात्रों से जुड़ी महिलाओं के नाम पर थे। जैसे ‘भारती का सपूत’ जो भारतेंदु हरिश्चंद्र की जीवनी पर आधारित है। ‘मेरी भव बाधा हरो’ कवि बिहारी के जीवन पर आधारित है, ‘लखिमा की आंखें’ जो विद्यापति के जीवन पर आधारित है। तुलसी के जीवन पर आधारित ‘रत्ना की बात।’ ‘लोई का ताना’ जो कबीर जीवन पर आधारित है। गोरखनाथ के जीवन पर आधारित कृति है ‘धूनी का धुआं।’ ‘यशोधरा जीत गई’ जो गौतम बुद्ध पर लिखा गया है। ‘देवकी का बेटा’ जो कृष्ण के जीवन पर आधारित है। उन्होंने ‘कब तक पुकारूं’ और ‘धरती मेरा घर’ जैसे आंचलिक उपन्यास भी लिखे। 13 वर्ष की आयु में लेखनारंभ करने वाले राघव 23-24 वर्ष की आयु में ही अभूतपूर्व चर्चा का विषय बन गए। सन 1942 में बंगाल के अकाल पर लिखी उनकी रिपोर्ट 'तूफानों के बीच' काफी चर्चित रही। रांगेय ने कुल मिलाकर डेढ़ सौ से अधिक पुस्तकें लिखीं।

उनके बहुआयामी रचना संसार में कहानी संग्रह: देवदासी, समुद्र के फेन, जीवन के दाने, इंसान पैदा हुआ, पाँच गधे, साम्राज्य का वैभव, अधूरी मूरत, ऐयाश मुर्दे, एक छोड़ एक, धर्म संकट; उपन्यास: मुर्दों का टीला, हुजूर, रत्न की बात, राय और पर्बत, भारती का सपूत, विषाद मठ, सीधा-सादा रास्ता, प्रतिदान, काका, अंधेरे के जुगनू, लोई का ताना,  उबाल, कब तक पुकारूँ, पराया, आंधी की नावें, धरती मेरा घर, अंधेरे की भूख, छोटी-सी बात, बोलते खंडहर, पक्षी और आकाश, बौने और घायल फूल, राह न रुकी, जब आवेगी काली घटा, पथ का पाप, कल्पना, प्रोफ़ेसर, दायरे, मेरी भाव बाधा हरो, पतझड़, धूनी का धुआं, यशोधरा जीत गई, आखिरी आवाज़, तथा देवकी का बेटा खास हैं।
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