अहिंसक सभ्यता के लिए ज़रूरी तत्व है जल

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

लेखक भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं एवं सेतु संपादन मंडल के सम्मानित सदस्य हैं। आप अहिंसा आयोग के समर्थक एवं अहिंसक सभ्यता के पैरोकार भी हैं।

पञ्चतत्वों से बनी हमारी शरीर हमारे लिए एक उपहार है। ऐसा कहते हैं कि इस उपहार को देवता भी पाना चाहते हैं और वह इस रहस्यमयी जीवन के संघर्ष से होकर अपनी अनुभूतियों में मनुष्य होने का अर्थ जानना चाहते हैं। उसी पञ्चमहाभूतों में शामिल है जल। जल हमारे शरीर के निर्मिति में सम्मिलित है और बिना जल के इस शरीर का सत्य जाना नहीं जा सकता। इस शरीर को सतत बनाए भी नहीं रखा जा सकता। और सच तो यह है कि बिना पानी के इस सृष्टि की सततता की कल्पना नहीं की जा सकती। 
जल है तो कल है। बिना जल के हमारा जीवन आगे बढ़ ही नहीं सकता। मनुष्य की सबसे हिंसक चेतना का विस्तार इस मायने में भी माना जा सकता है क्योंकि उसने अपने जीवन के प्रवाह को ही दूषित करने से नहीं चूका। मनुष्यों ने ही हमारे प्रकृति के जल और उसके महत्त्व को किनारे करके जी लेने की कोशिश की। अहिंसा और जल का संबंध यही है कि मनुष्य अपने जीवन के प्रति कम से कम हिंसक न बने। इस श्रेष्ठ जीवन रक्षक व जीवन संवर्धक तत्व को बचाने के लिए संयुक्त राष्ट्र में सम्मेलन हुआ और उसमें दुनिया भर से अपील की गयी कि जल बचाओ। जल सुरक्षित करो। जल रहेगा तो हम रहेंगे। सबसे अहम बात यह है कि इस महासम्मेलन में 700 से अधिक संस्तुतियाँ हुईं और जल बचाने की पुरजोर वकालत भी हुई। इसके महत्त्वपूर्ण पैरोकार चबा कोरोसी की अपील बहुत मायने रखती है कि जल-निधि के लिए हम सब जल-बजट बनाएँ। जल संरक्षण के लिए निवेश करें।

जल के महात्म्य को समझना इसलिए आज आवश्यक है क्योंकि जल के बिना हम जो भी अपनी तरक्की की बात सोच रहे हैं वे सब वृथा हैं। मिथ्यालाप पर पहले बात हो चुकी है, सच में ऐसी बातें मिथ्यालाप बन जाती हैं। अहिंसक समाज ही इस मिथ्यालाप से बचकर संकल्प के साथ अपने जीवन और प्रकृति के समस्त जीवों के कल्याण के लिए कार्य करते हैं। आज प्रमाण देने का वक़्त आ गया है कि हम और आप कितने अहिंसक हैं। यदि पानी के बगैर एक भी व्यक्ति मर रहा है तो इसका यदि संदेश जाता है कि हम कहीं न कहीं हिंसक सी प्रवृत्ति के शिकार हो गए हैं। इस जल संकट को इसलिए ज्यादा समझने की जरूरत है।

हमारे शास्त्रों में जल के महात्म्य को बताते हुये गंगा की वंदना की गयी है-
नमामि गंगे तव पाद पंकजं,
सुर असुरै: वन्दित दिव्य रूपम्।
भुक्तिम् च मुक्तिम् च ददासि नित्यम्,
भाव अनुसारेण सदा नराणाम्।

सांसारिक सुख, आनंद और मोक्ष के लिए गंगा को हमेशा स्तुत्य समझा गया। इसका अर्थ है हमारे पूर्वज जल के संजीवनी गुण की स्तुति करते थे। वे हमेशा इसलिए जल संरक्षण के लिए अपने आसपास ऐसी व्यवस्था रखते थे जिससे जल हमारे सुरक्षित हों। पेड़ लगाते थे। अधिक वृक्ष संपदा होने से हमारे यहाँ की जलवायु सुंदर हुआ करती थी। लेकिन अब संयुक्त राष्ट्र में जल के संकट को चिन्हित किया जा रहा है। इसके पीछे हमारी कहीं न कहीं उपभोग की संस्कृति जिम्मेदार है और साथ ही हमारे द्वारा की जा रही वृक्षों की पुरजोर कटाई जिम्मेदार है। इसकी वजह से हमारी जलवायु आज चिंता का विषय बनी हुई है।

मनुष्य ने अपनी जल संस्कृति को जब से प्लास्टिक ऑफ दि वाटर कल्चर में स्वीकार कर लिया है, उसे यह एहसास नहीं रहा कि उसे जल कुओं, तालाबों, नहरों, नदियों और अन्य जलाशय के उपयोगी व्यवस्थाओं से बचाना है। पानी की यह कमी इसलिए हो गयी है। पानी दूषित जो हो गया है, वह एक अलग समस्या है। बड़ी-बड़ी इंडस्ट्री के जरिये पानी को संक्रमित करने की कोशिश हमारे जल-चक्र को नष्ट कर चुकी हैं। इससे यह लगता है कि मनुष्य अपने आचरण में हिंसक हुआ है तो विभिन्न संघर्ष दिख रहा है लेकिन जो अदृश्य है वह उससे भी भयानक हिंसक होने का प्रमाण दे रहा है। इस गलतफहमी में भी वह है कि जो वह कर रहा है उसका असर उसे है लेकिन शायद ऐसा नहीं है, आने वाली पीढ़ी के लिए भी उसका यह कृत्य हिंसक है। सभ्यता विमर्श में इस जल संस्कृति के जुड़ाव की यदि संभावनाएं और विकल्प नहीं तलाशे गए तो हमारे लिए बड़ा संकट है। प्रकृति का बज्रपात होगा तो फिर यह कहना ठीक नहीं होगा कि प्रकृति कुपित हो गयी है और इसलिए हम चक्रवात, भीषण बाढ़, दरकती धरती या पहाड़ के शिकार हो रहे हैं। बल्कि सच तो यह है कि मनुष्य ने नगर और गाँव में अपने स्वत्व को खोया है, इसे आज समझना होगा। उसने जल बचाने और पेड़ लगाने से ज्यादा धरती के ऊपर अपना कब्जा बनाने का जो रुख अपनाया है उससे हमारा विनाश होगा।

अहिंसक समाज जल संस्कृति के साथ रहता था। अहिंसक समाज के लोगों ने अपने जीवन के लिए जितने नगर बसाये वे सब नदियों के किनारे थे। अब समय कुछ और हो गया है। हमारा जीवन मल्टीप्लैक्स में कैद है। मल्टीस्टोरी बिल्डिंग में कैद है। मल्टी-डिजीज के साथ मल्टीपल कंज़्यूमर कल्चर में कैद है। हम संघर्ष और तनाव में रहना ठीक समझ रहे हैं। इसके पीछे हमारी लॉजिक है कि हम तरक्की करेंगे। हमारी सन्तानें ज्यादा तरक्की करेंगी। लेकिन सोचें कि क्या यह सच है? सच में क्या हम अपनी तरक्की में स्वयं को शामिल कर चुके हैं क्या? एक बात यह नहीं समझ में आती कि चिपको आंदोलन फिर क्यों शुरू हुआ था? क्यों चंडी भट्ट और गौरा देवी पेड़ों से चिपककर पेड़ बचाने की बात कर रहे थे? क्यों सुंदरलाल बहुगुणा चिपको आंदोलन के माध्यम से जल जमीन और जंगल बचाने की बात कर रहे थे? यह मानकर चलिये कि यह सब जो हुआ है वह बहुत ज्यादा समय की बात नहीं है। यह हज़ार पाँच सौ वर्षों की भी बात नहीं है। यह हमारे बीच ही अभी कुछ समय पहले किया गया आंदोलन है। 
पानी के लिए जो हमारे हिंसक स्वभाव थे उसे तलाशने की यह कोशिश थी। बहुत से लोग आज भी पानी बचाने और उसे संरक्षित करने के लिए आवाज़ उठा रहे हैं लेकिन विडम्बना यह है कि हम अपने विनाश पर तुले हैं और वे बातें नहीं सोच पा रहे हैं जिसे हमें आज करने की ज़रूरत है। हमारे पीढ़ियों को ज़रूरत है। इसके पीछे के कारणों को जितना जल्दी मनुष्य समाज समझ सका वह अपने भविष्य को संवार लेगा। जितना जल्दी सी दिशा में सकारात्मक भाव से सक्रिय होगा, अपने कल को संवार लेगा। यह उसके अहिंसक समाज निर्माण का कदम है। पानी के लिए युद्ध होगा तो हिंसा और रक्तपात ही होंगे। पानी के लिए युद्ध न हो इसके लिए हमारे अहिंसक स्वभाव और अहिसंक सभ्यता के साथ पानी और प्रकृतिक संसाधनों के हिफाजत पर ध्यान देना आज हमारी जरूरत बन गया है।

यह हमें नहीं भूलना चाहिए कि जल, मानवाधिकारों और लैंगिक समानता से भी जुड़ा है और इसलिए इसे, वैश्विक राजनैतिक एजेंडा के केन्द्र में रखे जाने की ज़रूरत है-यह शब्द एंटोनियो गुटेरेस के हैं। संयुक्त राष्ट्र के एक रिपोर्ट के मुताबिक यूएन मुख्यालय में यह सम्मेलन 22 से 24 मार्च तक आयोजित किया गया, जिसमें दो हज़ार से अधिक सरकारी प्रतिनिधियों, वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, नागरिक समाज समूहों, आदिवासी समुदायों, निजी सैक्टर के सदस्यों और युवा प्रतनिधियों ने विविध परिप्रेक्ष्यों को साझा किया। संयुक्त राष्ट्र में आर्थिक एवं सामाजिक मामलों के अवर महासचिव, ली जुनहुआ ने शुक्रवार को बताया कि जल कार्रवाई एजेंडा में विविध क्षेत्रों में लगभग 700 संकल्प लिए गए हैं, जिनमें क्षमता निर्माण, निगरानी व्यवस्था, और बुनियादी ढाँचों को सुदृढ़ बनाए जाने समेत अन्य उपाय हैं। यह इतनी बड़ी कोशिश और संकल्प यह हमें स्मरण दिलाते हैं कि संसार भर के लोग जल के महत्व को समझें और इस दिशा में स्थायी कदम उठाएँ। इस सम्मेलन के मनोविज्ञान को समझें तो यह लगता है कि मनुष्य द्वारा मनुष्यों के लिए सोचा जाने वाला यह मानवीय कार्य है। यह एक तरह से संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष की ओर से अहिंसक समाज बनाने की कोशिश है इसके बावजूद यदि दुनिया के लोग सचेत नहीं होते हैं और अपने जल बचाने की और उसे उपयोगी रखने की मुहिम में शामिल नहीं होते हैं तो हमारे पूरी पृथ्वी के लिए चिंताजनक बात होगी।

सार्वभौमिक सोच के लोग सदैव पञ्चमहाभूतों के साथ आकार अपने जीवन में सृष्टि के समस्त अवयवों की रक्षा के लिए अपनी ऊर्जा का उपयोग करते हैं। इंसान के बस में उसके अहिंसक होने के लिए और अहिंसक समाज बनाने के लिए यत्नशील होने का सबसे बड़ा प्रमाण है कि वह सभी के हित में सोचे, बरते और कार्य करे। यह उसके अच्छे गुणों का लक्षण है। सत्य का अनुगमन, अनुशीलन और आत्मसातीकरण करने की यह एक प्रक्रिया है जो निरंतर ही मनुष्य के लिए वरदान साबित हो सकती है। अहिंसा एक मनुष्य का आभूषण है। लेकिन यदि पञ्चमहाभूतों से बना मनुष्य इस सृष्टि में रहेगा, यह सृष्टि रहेगी तभी तो कुछ भी संभव है। इसलिए यह तो जीवन के बने रहने का सवाल है और पानी के बिना यह संभव कदाचित नहीं है। अब हमें यह तय करना है कि हम अपने होने का क्या उपाय ढूंढते हैं और जो निहायत ज़रूरी है उसे बनाए कैसे रख सकते हैं। कहते हैं जल है तो जीवन है। जीवन है तो हम सब की कोई संस्कृति है। हम सबकी संस्कृति है तो ही हम सबके होने का अर्थ है। यह प्रवाह हमें ही कायम रखना है।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।