बाल मनोविज्ञान की कसौटी पर खरी उतरती कहानियों का संग्रह: आत्म विश्वास की जीत

समीक्षक: उषा शर्मा “प्रिया”


समीक्ष्य कृति: आत्मविश्वास की जीत (बाल कहानी संग्रह)
ISBN: 978-81-943924-5-3
लेखक: डॉ दिनेश पाठक शशि
पृष्ठ संख्या: 64
मूल्य: ₹ 100.00
संस्करण: 2019
प्रकाशक: जवाहर पुस्तकालय मथुरा
—----------------------

दिनेश पाठक ‘शशि’
समय परिवर्तनशील है। समय के साथ-साथ मनुष्य की जरूरतों और उन्हें पूरा करने के साधनों को एकीकृत करने में भी परिवर्तन हुआ है।

एक सच यह भी है कि बाल मन की उत्कन्ठा, उत्साह, उत्सुकता, जिज्ञासा तक पहुंचना हर साहित्यकार के सामर्थ्य की बात नहीं है। अपनी लेखनी से बच्चों के लिए उनके मनोनुकूल लिखने में सामर्थ्यवान , बिना उपदेश दिए सहज ही शिक्षा दे देने में कुशल उ प्र हिन्दी संस्थान लखनऊ के बाल साहित्य के सर्वोच्च पुरस्कार बाल साहित्य भारती सहित अनेक राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त वरिष्ठ साहित्यकार डॉ दिनेश पाठक शशि बाल साहित्य के एक कुशल चितेरे साबित हुए हैं। इन्होंने बालमन की हठधर्मिता और जिज्ञासा को समझते हुए बहुत ही सरल भाषा में कहानी संग्रह - "आत्म विश्वास की जीत" की कहानियों का सृजन किया है।
विशेषरूप से उनकी कहानियाँ ज्ञानवर्धक संवादों से युक्त व एक अनुभवी लेखक की कसौटी पर खरी उतरती हैं।

उनका कहानी संग्रह, "आत्मविश्वास की जीत" में कुल 6 बाल कहानियाँ संग्रहीत हैं। संग्रह की पहली कहानी- "आलस का परिणाम बुरा" में आलस्य के बुरे परिणामों की ओर इशारा करते हुए सहज में ही आलस्य न करने की सीख भी दे दी है।

उसी प्रकार शीर्षक कहानी “आत्मविश्वास की जीत” के माध्यम से जीवन में कभी भी निराश न होने की सीख दी है कि जीवन में उतार-चढाव, अच्छा-बुरा समय आता ही रहता है लेकिन हमें कभी भी हार न मानकर हमेशा आगे बढ़ते रहना चाहिए।

संग्रह की तीसरी कहानी 'थैंक्यू मैम' में वर्तमान समय की विषम समस्या, मोबाइल फोन पर अत्यधिक चिपके रहने और फलस्वरूप आवश्यक कार्यों के लिए समय न निकाल पाने के दुष्प्रभाव को रेखांकित किया है। धैर्य, कथानायक, के प्रतिदिन समय से विद्यालय न पहुँच पाने के मूल में उसकी माँ का यही मोबाइल प्रेम है जिसके कारण वह अपने पुत्र को समय से टिफिन तैयार नहीं कर पाती है और देर से आने के लिए उसके पुत्र को प्रतिदिन सजा मिलती है। पर विद्यालय की पेरेंट्स-टीचर मीटिंग में जब उन्हें ही कसूरवार ठहराया जाता है तो उन्हें अपनी भूल का एहसास होता है।

डॉ दिनेश पाठक शशि ने इस कहानी में अच्छी बात यह की है कि विद्यालय में कक्षा अध्यापिका द्वारा सही एवं दो-टूक बात कहने का साहस जुटाया गया है अन्यथा बालक की मूल समस्या अनसुलझी ही रह जाती।
एक और कहानी ‘वाह क्या आइडिया” के माध्यम से पड़ोसीधर्म को महत्वपूर्ण सिद्ध करते हुए समस्या को सुलझाया गया है। पड़ोसी पर विश्वास, जीवन की कठिनाइयों पर विजय पाने में सहायक बनता है।

संग्रह की शेष दो कहानियों के शीर्षक हैं-"समाधान" और "आप ठीक कह रही हो मॉ"। समाधान में उन माता-पिता को सीख है जो पूरे वर्ष तो अपने बच्चों की पढ़ाई के प्रति उदासीन बने रहते हैं पर परीक्षा के दिनों में उन पर खूब चीखते चिल्लाते हैं। इस कहानी में -अंग्रेजी कहावत "स्लो एण्ड स्टडी विन द रेस" के सिद्धांत को सहज ही समझाने का प्रयास किया गया है।

उषा शर्मा
सभी कहानियों को सरल और बोलचाल की भाषा में लिखा गया है। अत: बच्चे जब इन कहानियों को पढ़ना शुरु करते हैं तो अंत तक पढ़ने हेतु उनकी उत्सुकता बनी रहती है।

कहानियों की भाषा शैली ऐसी है कि बच्चे, किशोर और बड़े सभी रुचि से इन्हें पढ सकते हैं । निःसन्देह कहा जा सकता है कि लेखक ने बाल मनोविज्ञान और मनोरंजन दोनों का ध्यान रखते हुए इन उपयोगी कहानियों को रचा है।

पुस्तक में प्रसारित सन्देश बहुपयोगी हैं जो बाल पाठकों को भी अवश्य ही लाभान्वित करेंगी।
पुस्तक का आवरण नयनाभिराम एवं कहानियों के साथ छपे चित्र विषय के अनुरूप व आकर्षक हैं। हिन्दी साहित्य जगत में पुस्तक का सर्वत्र स्वागत होगा, ऐसी आशा है।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।