शिवदयाल जी की 'एक और दुनिया' की तलाश

समीक्षक: विजय कुमार तिवारी


समीक्षित कृति: एक और दुनिया होती (उपन्यास)
उपन्यासकार: शिवदयाल
मूल्य: ₹ 250.00 रुपये
प्रकाशक: अनन्य प्रकाशन, दिल्ली


साहित्य में औपन्यासिक विधा का अपना महत्व है। दुनिया भर में उपन्यास खूब लिखे गये हैं,लिखे जा रहे हैं और हिन्दी साहित्य उपन्यास लेखन से समृद्ध होता रहा है। जीवन की जटिलताएँ, जीवन चेतना,जीवन का विस्तृत स्वरूप,चरित्रों का पूर्ण चित्रण, भावनाओं की पूर्ण अभिव्यक्ति आदि के लिए जिन विस्तारों की आवश्यकता होती है,उसकी पूर्ति उपन्यास लेखन द्वारा ही संभव है। विस्तार में गये बिना,जीवन की गुत्थियों को खोले बिना,हर प्रसंग का उल्लेख किए बिना रचनाकार का मन संतुष्ट नहीं होता या जो कहना चाहता है,कह नहीं पाता। ऐसे हालात में विस्तृत फलक का उपन्यास लिखकर ही वह संतुष्ट होता है। चरित्र आधारित उपन्यास, ऐतिहासिक उपन्यास, सामाजिक उपन्यास, यथार्थ कथ्य-कथानक के उपन्यास, मनोवैज्ञानिक चिन्तन के उपन्यास आदि के साथ अब तो भावनाओं और गहरे राजनीतिक अनुभवों को समेटे नाना तरह के उपन्यास लिखे और पढ़े जा रहे हैं। कथ्य-कथानक के साथ-साथ जीवन के छोटे से छोटे सन्दर्भ उपन्यास में होते हैं। उपन्यास लेखन की यही सबसे अच्छी खूबसूरती है कि उपन्यास में मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन उभरता है या कोई कालखण्ड,कोई घटनाक्रम विस्तार पाता है। कभी-कभी कहानियाँ भी औपन्यासिक पृष्ठभूमि लिए होती हैं जो अपने भीतर बहुत कुछ समेटे रहती हैं। यह विवाद का नहीं,समझने की बातें हैं और साहित्यिक लोग समझते भी हैं।

विजय कुमार तिवारी
पटना, बिहार से बहुचर्चित व प्रतिष्ठित साहित्यकार शिवदयाल जी का नवीनतम उपन्यास "एक और दुनिया होती" को पढ़ने का सौभाग्य मिल रहा है। उन्होंने साहित्य की अनेक विधाओं में सृजन किया है और बच्चों के लिए भी साहित्य रचा है। बाल पत्रिका का संपादन करते हैं और उनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। इस उपन्यास में उन्होंने अपनी ओर से कोई भूमिका या आत्म-कथन जैसा कुछ भी नहीं लिखा है। इस तरह पाठकों, समीक्षकों, आलोचकों का दायित्व बढ़ गया है। शुरू की चंद पंक्तियों को पढ़ते हुए संकेत मिलने लगता है,कोई जलजला गुजरा है या कोई ऐसा दौर जिसमें बहुत कुछ बिखर गया है। निश्चित ही इसके पीछे उनके अपने अनुभव रहे होंगे,उनके किसी संघर्ष या किसी सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन जैसे प्रवाह के बाद की विचलित करती परिस्थितियाँ रही होंगी,कुछ सुधरा होगा तो बहुत कुछ बिगड़ा या धराशाई हुआ होगा। किसी भी लेखक द्वारा इस तरह सोचना या बीते घटनाक्रमों पर विचार करना और ऐसा उपन्यास का कथ्य-कथानक ढूँढ लाना चमत्कृत/अचंभित करता है। धीरता,गंभीरता के साथ उनकी दृष्टि ही है,उन्होंने उपादेयता को समझते हुए इसका निरूपण किया है और यह उपन्यास हमारे सामने है।

लेखक का मानवीय सरोकार,दार्शनिक चिन्तन और आत्म-मूल्यांकन महत्वपूर्ण पक्ष है। उन्हें लगता है,फिर से सब कुछ सोचना-समझना होगा, शायद अपने बारे में अपना ही निष्कर्ष बदलना पड़े। व्यक्ति-विकास की यह कोई बड़ी दृष्टि है। शिवदयाल जी के पात्रों-अमृत,शेखर और स्वय यानी प्रेम के बीच के संवाद,घटनाक्रम का प्रवाह रोचक है। सम्पूर्ण उपन्यास प्रेम द्वारा  वाचन-शैली में है। क्रान्ति को लेकर पूछे  गये प्रश्न के उत्तर में अमृत कहता है-"आँख रहते अंधे बने हुए हो। जरा दृष्टि विस्तार करो तो पता लगे कि क्रान्ति की जरुरत पहले कभी इतनी नहीं थी जितनी आज है।" अमृत के चरित्र के बारे में जानने का प्रसंग भी रोचक है,वर्ग-संगठन और क्रान्ति को भी। पात्रों की अपनी मजबूरी है और अन्तर्द्वन्द भी। पिता-पुत्र संवाद,प्रेम की स्थिति का चित्रण और शेखर-प्रेम संवाद लेखक के हालात व मनोविज्ञान की समझ दर्शाते हैं। गुरु ही शिष्य को नहीं सिखाता,शिष्य भी सिखाता है गुरु को। प्रेम ने स्वयं लिखा है- "उस विद्यार्थी ने जो मेरा प्रशिक्षण किया वह बाद में मेरे काम आया।" छात्र-आंदोलन प्रसंग में पात्रों के चित्रण के साथ हास्य-व्यंग्य,भय-उत्साह सब कुछ सहज तरीके से है।

झुग्गी-झोपड़ियों में पूरा दिन बीताने के बाद शेखर को अनुभव हुआ- "हमारे यहाँ बहुत गरीबी है। जानवरों की तरह लोग रहते हैं,कीड़े-मकोड़ों की तरह।" यह कोई नई चेतना है जो शिवदयाल जी के पात्रों के बीच उभर रही है,उन्हें सोचने पर, प्रश्न उठाने पर मजबूर कर रही है। स्वर में कोई वेदना है और उसका मर्म स्पर्श कर रहा है। प्रेम बुनियादी बात करता है-"तय यह करना है शेखर, कि हम अपने जीवन से क्या चाहते हैं।" शिवदयाल जी पारिवारिक संघर्षों,आपसी सम्बन्धों और उन सबके बीच उपजी संवेदनाओं का सुन्दर चित्रण करते हैं। व्यवस्था को बदल देने की कोई गहरी सोच जड़ जमाए हुए है। अश्लील पोस्टरों के खिलाफ अभियान ने प्रदेश भर की जागरूक महिलाओं का ध्यान खींचा है। प्रदेश में दूसरा नरसंहार होता है। यह हर तरह से बड़ी चुनौती है। खद्दरधारी नेताओं की उपस्थिति को शिवदयाल जी धनखेतों में बगुलों के उतरने की तरह व्यंग्य करते हैं। नरसंहार का वीभत्स दृश्य सबको रुला दिया है। सहसा अमृत नारा लगाता है-'जो जमीन को जोते-बोए---' दूसरों ने पूरा किया-'वही जमीन का मालिक होए--'।यह उपन्यास अपने तरीके से इन समस्याओं पर विचार करता है-"क्या जातीय घृणा ही इसके मूल में है? नहीं-नहीं। असली बात है वर्चस्व को चुनौती,प्रभुत्व-हरण का भय, क्योंकि सामंतवाद आर्थिक हितों को कई तरह के सामाजिक-सांस्कृतिक आवरणों में छुपा कर रखता है।" प्रेम-अपूर्वा संवाद के द्वारा ऐसे आंदोलनों, संघर्षो की वस्तुस्थिति स्पष्ट हो रही है। शिविर प्रसंग कम रोचक नहीं है, अपूर्वा,प्रेम सभी उपस्थित हैं और सभी अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान देना चाहते हैं।

एक और महत्वपूर्ण पक्ष है उपन्यासकार के लेखन में,वह अपने स्त्री-पुरुष पात्रों में सौन्दर्य के साथ भीतरी जहनीयत,संकल्प,प्रतिबद्धता और हास्य-विनोद सबका सम्मिश्रण करते हैं। प्रेम-विनय के बीच का संवाद संघर्ष व सृजन तथा श्रमणवाद-सन्यास को लेकर है। आगे क्रान्ति पर चिन्तन शुरू होता है-"हमारे यहाँ बहुत विद्रोह हुए परन्तु कभी क्रान्ति नहीं हुई। 1857 का अनुभव भी स्वतंत्रता का,मुक्ति का संग्राम बना,क्रान्ति का नहीं।" वैसे ही भू-स्वामित्व,वाणी-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आदि के साथ राज-सत्ता से अपेक्षा रही कि वह धर्म व नीति के अनुसार आचरण करे। शिवदयाल जी बार-बार जाति में समस्याओं की जड़ें देखते हैं,लिखते हैं-"जाति आखिर बंद वर्ग ही तो है। इससे समाज जड़ बना और परिवर्तन का निषेध किया।" विनय समाज की श्रेणीबद्धता की ओर ध्यान खींचता है। शिविर के दौरान रेडिकलिज्म हावी है। शांतिमयता और अहिंसा को लेकर भी बातें हो रही हैं। ऐसे शिविरों का अपना मनोविज्ञान होता है। विनय कुछ साथियों के अति उत्साह, जल्दबाजी और रुमानियत की चर्चा करता है। कल्पना जी प्रेम को अपने तरीके से जोड़ना चाहती हैं-'बड़े उद्देश्यों के लिए बलिदान भी बड़ा करना पड़ता है। आप जैसे साथियों की बड़ी जरुरत है।' स्त्री-पुरुषो के बीच की आत्मीयता को लेकर कुछ लोग चर्चा करना चाहते है जैसे अमृत और शिप्रा काफी करीब दिखते हैं। बोधगया में जमीन को लेकर शिवदयाल जी लिखते हैं-हमारा संघर्ष भूमि सुधार से आगे व्यवस्था परिवर्तन की ओर बढ़े। शिविर में बहुत से प्रस्ताव पास होते हैं और बहुतो को भिन्न-भिन्न जिम्मेदारियाँ दी जाती हैं। शिशिर और कल्पना ने सहजीवन जीने की घोषणा की है। तालियाँ बजती है। प्रेम के मन में अपूर्वा को लेकर भाव आकार ले रहे हैं। अपूर्वा किसी उहापोह में है और उसकी चिंता अपनी जगह गलत नहीं है।

यह उपन्यास बिहार की पृष्ठभूमि पर है और शिवदयाल जी के गहरे अनुभव हैं इसके पीछे। उन्होंने बहुत श्रम-शोध किया है और साहस भी। किसी भी आंदोलन पर लिखना सहज नहीं होता और शब्दावलियों की यथार्थ व्याख्या चुनौती होती है। भाषा-शैली,भावनाएं,संवेदनाएं और उनके पीछे की गहरी दृष्टि या चिन्तन इस उपन्यास को महत्वपूर्ण बनाते हैं। सबसे अधिक रोचक है-संवाद-शैली। बहन मिनू की शादी को लेकर प्रेम के घर का प्रसंग भावुक कर देने वाला है। औसत या गरीब विद्यार्थियों की स्थिति का शिवदयाल जी ने मार्मिक चित्रण किया है। राधेश्याम जी बीमार हैं,दवा के लिए पैसे नहीं हैं। ऐसे में मिल जुलकर व्यवस्था हो रही है। उन्हें बोधगया जाना है। आंदोलनकारियों की यही समस्या है,वे अपने स्वास्थ्य की चिंता नहीं करते। उनकी अपने-अपने घरों मे बोझ जैसी स्थिति है।

शिवदयाल जी विश्वविद्यालयों में ध्रुवीकरण को लेकर लिखते हैं-यहाँ भी निहित स्वार्थों के आधार पर उसी प्रकार का ध्रुवीकरण है जैसा कि समाज में, राजनीति में है। यहाँ छात्रों के प्रगतिशील समूह है तो कट्टर सामंती सोच के विद्यार्थी भी हैं। फसल कटाई को लेकर मठ और संगठन के लोगों के बीच भिड़न्त हुई थी। आगे विशाल प्रदर्शन की योजना बन रही थी ताकि लगे,चीजें करवट बदल रही हैं और नया कुछ हुआ चाहता है। नया मुद्दा भी जोर पकड़ रहा है-पिछड़ी जातियों को सरकारी नौकरियों मे आरक्षण। इस क्रम में लेखक की दृष्टि सामाजिक-आर्थिक संरचना पर जाती है। शेखर का पिता के साथ विवाद पर प्रेम जी कहते हैं-"वे तुमसे डरते हैं शेखर! उन्हें लगता है जैसे तुम उनकी अथॉरिटी को चैलेंज कर रहे हो जब तुम इस सिस्टम को चैलेंज करते हो तो।" संघर्ष रुका नहीं था, हर लड़ाई अन्याय के खिलाफ थी जो कहीं न कहीं व्यवस्था परिवर्तन से जुड़ी थी। स्त्री-संगठन के मुद्दे,धर्म और नीति के खिलाफ मोर्चे खुल रहे थे। धर्म नामक संस्था के खिलाफ मोर्चा खोलने की वकालत हो रही थी। उनका कहना था कि अदृश्य के प्रति भय ने इस संस्था को जन्म दिया है। और सर्वाधिक खून बहा है धर्म के नाम पर। धर्म,ईश्वर और राजनीति को लेकर संवाद-चिन्तन रोचक है और शिवदयाल जी की भीतरी सोच-समझ दिखता है। उनकी शैली ही है,गंभीर बातों के बीच कोई प्यार,शादी जैसी मधुर चर्चा माहौल को सरस कर देती है। अपूर्वा अपनी शादी की बात सुना रही है और प्रेम बाबू बेचैनी महसूस कर रहे हैं। स्वाभाविक है,इन स्नेहिल पलों के चित्रण में शिवदयाल जी अधिक पारंगत लगते हैं।

शिवदयाल जी पूरी संवेदना और सच्चाई के साथ विचारों को जोड़ रहे हैं और दबी जबान उनका चिन्तन भी चल रहा है। संगठन के लोगों की अपनी कमजोरियाँ और समस्याएं हैं,बनवारी को घुटनो का आपरेशन करवाना है,कुछ साथी जेल में हैं,राधेश्याम को टीबी हुआ है,अमृत जी पेचिश के शिकार हैं और गरीबी की बीमारी तो सबको है। सुखद है,सभी उम्मीद में जी रहे हैं। अमृत ने कहा-'अब मंजिल साफ दिख रही है,यही कह सकता हूँ।' उसके बाद गंभीर बातचीत, गंभीर संवाद,थोड़ा सरस हास्य जोड़ते जाना शिवदयाल जी की अपनी शैली है। अमृत और शिप्रा प्रसंग लेखक ने पूरी संजीदगी से लिखा है,पूरी कशमकश,पूरी मनोवैज्ञानिकता के साथ। कहानी का यह मोड़ पाठकों को बताता है कि आंदोलन-संगठन के स्त्री-पुरुष भी हृदय रखते हैं,अपने परिवार-समाज से जूझते हैं और अक्सर अपना भीतरी प्रेम होम कर देते हैं।

बनवारी के घुटने का ऑपरेशन प्रसंग मार्मिक है। स्थिति भयानक थी और अंत वही हुआ जो होना था। बनवारी के जीवन के अंत का दृश्य समाज की निष्ठुरता, सरकारी तंत्र की कर्महीनता पर अमृत ने कहा-'प्रेम,यह वास्तव में एक सर्वहारा का अंत था। उसी की ऐसी अन्त्येष्टि हो सकती है।' शिवदयाल जी लिखते हैं-इतनी गहरी ग्लानि का बोध पहले कभी नहीं हुआ। कभी भी हर किसी के साथ कुछ भी हो सकता है। अर्चना ने भरी बैठक में कहा था-"हमें यह मानकर,स्वीकार कर चलना चाहिए कि कभी भी कुछ भी हमारे साथ घटित हो सकता है। मैं जब भी घर से निकलती हूँ तो मन ही मन अपने को तैयार करती हूँ कि मेरे साथ कुछ भी हो सकता है,रेप तक।'" अपूर्वा झुग्गी-झोपड़ियों में शिक्षा के काम में लगी है। साँवली-गोरी लड़कियों को लेकर हास्य-व्यंग्य रोचक है और हमारे समाज की सच्चाई भी। कल्पना-शिशिर का सह-जीवन असह्य-जीवन बन चुका है। इस पर संगठन में खूब चर्चा है। उधर दिल्ली मे फिर कांग्रेसियों की सरकार बन गई है और समाजवादियों की सरकार गिर गई है। उस दौर पर यह उपन्यास अपने तरीके से विचार करता है और उन कारणों पर चिन्तन करता है। प्रेम को क्षेत्र में जाना है और कार्यालय का काम देखना है। शिवदयाल जी उजागर करते हैं-"निम्न जातियों के बीच भी सामाजिक दूरियाँ थीं।" प्रेम बाबू किसी दार्शनिक चिन्तन में हैं-'लोग कहते हैं मैं सफलता की कसौटी पर खरा उतरा हूँ। पद-प्रतिष्ठा है। सुघड़ पत्नी है,सुंदर प्यारा बच्चा है। सब कुछ तो है जिसकी अभीप्सा किसी की हो सकती है। हाँ,सब तो है। लेकिन वह 'सब'क्या वही कुछ है जिसकी कामना मुझे रही है? यही कुछ है मेरे स्वप्नों का फलित?" प्रेम जी विस्तार से चिन्तन करते हैं और जो हुआ है, उसे स्वीकार करते हैं।

प्रेम को फसल काटने का प्रत्यक्ष अनुभव होने वाला है। अर्चना भी आई हुई है। आज का नेतृत्व उसे ही करना है। नारा लगने लगा-"जमीन किसकी? जोत उसकी।" अचानक गोली चलने की आवाज आई। तय हुआ,आधे लोग फसल काटते रहेंगे और आधे लोग फायरिंग करने वालों को खदेड़ेंगे। संगठित भीड़ के आगे वे टिक नहीं सके और भाग खड़े हुए। प्रह्लाद ने बताया-असली बात तो जमीन पर दखल लेने की है। अब जोताई-बुवाई होगी। अगले दिन आम सभा हुई। दारूबाजी को खत्म करने का निर्णय हुआ। स्त्री-पुरुष के बीच समता पर जोर दिया गया। शिवदयाल जी ने आर्थिक,सामाजिक और पारिवारिक हालातों पर, विपन्नता पर खुलकर लिखा है-इतनी फटेहाल स्त्री। लापता पति की बाट जोहती,सुखी आँखों से क्षितिज निहारती कि यह आज का दिन भी गया। शिवदयाल जी का बिम्ब-चयन और व्यक्तित्व चित्रण देखिए-'क्या संयोजन था। अर्चना जैसी अग्निशिखा और शिशिर जैसा हिमशैल,फुलेसरी जैसा अधीर तो सुमंत जैसा हर कदम फूँक-फूँक कर रखने वाला शख्स।' शिवदयाल जी संगठन की लड़कियों के मन को टटोलते रहते हैं और बातचीत में हास-परिहास उनकी अपनी शैली है।

स्थितियाँ बदल रही थीं। मठ कानूनी लड़ाई हार चुका था। ऐसे संकेत मिलने लगे कि दस हजार एकड़ की बेनामी जोत अब गरीबों-भूमिहीनों में बंट कर रहेगी। संगठन में श्रेय लेने की होड़ शुरू हो गई। अमृत ने सुझाव दिया-'आंदोलन की बागडोर अब स्थानीय साथियों को सँभालनी चाहिए।' उपन्यास में असम आंदोलन पर टिप्पणी की गई है। प्रेम बाबू अपनी पूर्व दुनिया में लौट आये हैं। बीमार हैं,कमजोर हैं,घोर कष्ट और अकेलेपन में दिन बीत रहे हैं। मन में प्रश्न उठता था,कोई देखने क्यों नहीं आया। अमृत आया। उसके पिता नहीं रहे। उसने कहा-"हममें अब वह आग क्यों नहीं है प्रेम? सफलता निश्चित दिख रही है तो एक-दूसरे की गलतियाँ क्यों ढूँढ रहे हैं हम? हम इसी पड़ाव पर चूक जाना क्यों चाहते हैं?" उपन्यास कहीं-कहीं पात्रों को उस स्तर तक चित्रित नहीं कर पाया है जितना उनका संघर्ष है। कहीं-कहीं प्रवाह टूटता हुआ दिखता है। प्रश्न तो हैं परन्तु उत्तर नहीं है। विरोधाभास की स्थिति है। संगठन में बिखराव के लक्षण दिखने लगे हैं। शायद इसके पीछे व्यक्तित्वों की टकराहट है। शिवदयाल जी बीच-बीच में प्रकृति में खोते हैं,आसमान देखते हैं,चाँद देखते हैं,क्षितिज के रंग देखते हैं और उन्हें अपनी कोई खोई हुई बहुमूल्य वस्तु के मिल जाने की सुखानुभूति होती है। अपूर्वा आ रही है। प्रेम बाबू उल्लसित हैं और उसे छू लेना चाहते हैं। ऐसे पलों में जैसे भाव होते हैं,जैसे संवाद होते हैं, जैसे दृश्य और घटनाएं होती है, शिवदयाल जी पारंगत हैं।

शिवदयाल जी की विशेषता यह भी है,बिना लाग-लपेट के घर-परिवार और अपने मन की हालत लिख डालते है,"किताबों में अपने छुपने की जगह ढूँढता रहा,और छुपना भी किससे? अपने आप से।" हर किसी के लिए यह बड़ी त्रासदी है,पीड़ादायक होती है और ऐसे में मनुष्य टूट जाता है। पानी की जमीन्दारी यानी मछुआरों को लेकर प्रेम और विनय में बात हो रही थी। जल माफियाओं की तूती बोलती है। बाईस उपजातियों में बँटे मछुआरों को एक करना है। वे देश भर में चल रहे आंदोलनों,देश की राजनीतिक स्थितियों और अनेक अन्तर्राष्ट्रीय गतिविधियों की चर्चा करते हैं। मुद्दे बहुत हैं और कोई समाधान दिखाई नहीं दे रहा है। पूरी दुनिया उलझी हुई है। यह वह दौर था जब अपने देश में प्रधानमंत्री इंदिरागाँधी की हत्या हो गई।

प्रेम बाबू को नौकरी मिल गई। वे विन्ध्य पर्वतमाला की उपत्यकाओं में पहुँच गए। उन्हें बिजली यूनियनों से डील करना है,नेताओं से मिलना-जुलना है और स्वयं को उस निर्माणाधीन परियोजना के लिए उपयुक्त प्रमाणित करना है। उन्हें कुछ मुहावरे याद आ रहे हैं,जैसे पावर मिलती नहीं,छीनी जाती है,हासिल की जाती है। काम न कर,फिकर कर,फिकर भी क्यों कर,फिकर की जिकर कर। शिवदयाल जी ने देश की राजनीतिक पार्टियों के आधार पर श्रमिक संगठनों के कार्यकलापों,उनके वर्चस्व, प्रतिद्वन्दिता और इतिहास पर लिखा है। यह कोई विशेषता ही कही जायेगी,लेखक के पास व्यापक दृष्टि है,चिन्तन है और समझ भी। साहबानो का मामला,राम-मन्दिर का मामला सुर्खियों में था। प्रेम ने सम्बन्धित अधिकारियों को परियोजना से जुड़ी अनियमितताओं,जरुरतों को लेकर पत्र लिखना शुरू कर दिया। प्रेम ने कहा-"मैं जात-पात,धर्म,धन लिंग के आधार पर भेदभाव  और अलगाव का घोर विरोधी हूँ।" शिवदयाल जी जाति को लेकर बहुत सोचते हैं और इसे बड़ा अवरोध मानते हैं। इसके अलावा देह-व्यापार,सूद का कारोबार जैसी बीमारियाँ इन औद्योगिक कोयलांचल में पसरती गई हैं। यह उपन्यास उस मर्म को भी छूता है जिसमें पढ़े-लिखे, नौकरीशुदा दलित अपने गाँवों से विमुख हो रहे हैं। नेहरु को लेकर बी के सिंह ने बहुत कुछ कहा---नेहरु देश में न समाजवाद ला सके न ही पूंजीवादी। --नेहरु की विश्व दृष्टि ने भारत को भारत भी नहीं रहने दिया। गाँधी के ग्राम-स्वराज  और भारत के आर्थिक पुनर्निर्माण को कूड़ेदान में डाल दिया। --कश्मीर का मामला उलझ गया। --चीन ने जमीन हथिया ली। --शायद ही किसी एक देश ने अपने किसी नेता की रुमानियत, स्वप्नजीविता की इतनी बड़ी कीमत चुकाई होगी। प्रेम को लगा,उन्होंने नेहरु को कभी इस तरह देखा ही नहीं।

अरसा बाद अपूर्वा का मार्मिक पत्र मिलता है। उसने लिखा है-'खालीपन में सृजन के देवता बसते हैं।' नरेश मेहता की कहानी में एक कथन है-'स्त्री तुम्हें और क्या दे जो उसे भी तुम मनुष्य समझ सको।' 'त्यागपत्र' उपन्यास में जैनेन्द्र को समझने की कोशिश करते हैं शिवदयाल जी और अपूर्वा के प्रश्नों को सुनते हैं। यह एक गंभीर विवेचना है और अपूर्वा ने अपनी ओर से सब कुछ कहा है। अपूर्वा को लेकर प्रेम बाबू सोचते रहते हैं। उन्होंने अपूर्वा को पत्र लिखा। शिवदयाल जी के पत्र साहित्य की धरोहर है। अपूर्वा-प्रेम का सम्बन्ध मित्रता तक सीमित नहीं रह गया है। इसे शिवदयाल जी ने साहित्यिक मोड़ दिया है और पाठकों के सामने खूब उड़ान भरा गया है। नायिका-नायक संवाद,दृश्य चित्रित करने में शिवदयाल जी पारंगत है।

तत्कालीन सरकार ने चंद रुढ़िवादियों और कट्टरपंथियों के दबाव में संसद में कानून बनाकर न्यायालय के आदेश को निरस्त कर दिया। शिव दयाल जी की शैली है,ऐसी बैठकों,संवाद या वाद-प्रतिवाद के माध्यम से आंदोलनों,जन-सरोकार के मसलों पर खुली बातचीत करते हैं। समान नागरिक संहिता भी उनके विचार का मुद्दा है। रामजन्मभूमि का मुद्दा भी जोर पकड़ रहा है। शिवदयाल जी बड़ी सधी हुई बात लिखते हैं-'राजनीति में हमेशा साथी ही नहीं होते,प्रतिस्पर्धी भी होते हैं,राग-द्वेष से भरे हुए जो कटु से कटु आलोचना कर सकते हैं।'

प्रेम की सोच और परियोजना में जो चल रहा है,तालमेल नहीं है। बड़े अधिकारी कुछ और चाहते हैं। हमारे देश की यह बड़ी बीमारी है। अधिकांश वही करना चाहते हैं जिसमें समाज का अहित हो और उनका उल्लू सीधा हो। स्वाभाविक है प्रेम जैसे लोगों को तनाव व विरोध झेलना पड़ेगा। अमृत का पत्र मिला है। उसने विस्तार से बहुत कुछ लिखा है। शिवदयाल जी की यह भी कोई शैली है जो प्रभावित करने वाली है। पत्र के माध्यम से अमृत का आत्म-चिन्तन झकझोरने वाला है और हर आंदोलनकारी के लिए कोई संदेश है- क्रान्ति ऐसे लोगों से संभव नहीं-शक्की और अविश्वासी लोगों से। किसी भी व्यक्तित्व के लिए बड़प्पन होता है यदि वह अपनी चूको को समझता और स्वीकार करता है। अमृत स्कूल,जलस्रोतों,स्वास्थ्य जैसी जरुरतों के लिए संघर्ष जारी रखना चाहता है। शिवदयाल जी संघर्ष के मनोविज्ञान को खूब समझते हैं। अमृत ने अपनी पूरी जीवन यात्रा ही लिख डाली है। जय प्रकाश नाराय़न के आंदोलन की कहानियाँ भी। वे छात्रों से,युवाओं से कहते थे-'तुम्हारी माँगें बिना व्यवस्था बदले पूरी नहीं हो सकती।' जेपी के विचारों का सारांश अत्यन्त महत्वपूर्ण है। अमृत की दार्शनिकता देखते बनती है। वे सुभाष चंद्र बोस की बात लिखते हैं-'जन्म लेते ही जिस कातर कंठ से हम रो पड़ते हैं,वही इस पार्थिव बंधन के प्रति हमारे विद्रोह का पहला स्वर है।' इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने एक निर्णय में प्रधानमंत्री के लोकसभा सदस्य के रूप में निर्वाचन को अवैध ठहराया। जेपी का आंदोलन राष्ट्रव्यापी हो चुका था। 25 जून1975 को देश में आपातकाल घोषित कर दिया गया।  पत्र में वह सब कुछ उद्धृत हुआ है जो उस समय हुआ था।  जेपी नहीं रहे। अमृत समाजवाद के लिए तत्कालीन सोवियतसंघ के नेताओं की बातें लिखते हैं और अपने देश के लिए कोई समाधान खोजते हैं। गोर्बाचेव की बातों में अमृत को कोई सकारात्मकता दिखाई देती है। उन्होंने प्रेम को सूचित किया-इन दिनों ग्रामीण क्षेत्रों में विकास सम्बन्धी गतिविधियाँ चलाने के लिए कुछ एजेन्सियाँ सक्रिय हुई हैं।  यह पत्र नहीं बल्कि  दस्तावेज है,आंदोलन का,विचारों का, तत्कालीन सामाजिक-राजनैतिक परिदृश्यों का और ऐतिहासिक सन्दर्भो  का भी। यह पत्र इस उपन्यास की प्राण-चेतना है। सहमत-असहमत होना संभव है परन्तु उन स्थितियों को समझना जरुरी है,भले ही किसी विशेष मतानुसार प्रतिपादित किया गया है। शिवदयाल जी के पात्र सोवियतसंघ में हो रहे बदलाव से उम्मीदें बाँधे बैठे थे जबकि वह स्वयं बिखर कर रह गया है।

शिवदयाल जी अपने लेखन में कभी-कभी असहज करती सहजता परोसते हैं। कोई व्यक्ति मिलने आया है,उसने कहा-अपूर्वा मेरी बहन है। शादी के तौर-तरीकों पर काफी विवाद हुआ। हम रजिस्टर्ड शादी चाहते थे जबकि दोनों के घर वाले कुछ जरुरी रस्मों के लिए आग्रही बने रहे। इस बेरस्मी शादी से कोई खुश नहीं था। उनकी शादी का साल अजब था। भागलपुर में दंगे हुए थे। मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू की जा रही थीं। राम रथयात्रा गुजरात के सोमनाथ से शुरू हो गई थी,उसे अयोध्या पहुँचना था। प्रेम की बी के सिंह के साथ खूब बहसें-विमर्श चलता रहता था। गरमागरम बहसों के बीच बहुत कुछ कहा और सुना जा रहा था। शिवदयाल जी ने शायद अपने चिन्तन का निचोड़ प्रस्तुत किया है,उपन्यास के अंतिम दौर में। कोई माने या न माने समझने के लिए पढ़ें तो सही।

प्रेम-अपूर्वा,पति-पत्नी के बीच के मधुर संवाद और समझदारी लेखक ने बेहतरीन तरीके से लिखा है। प्रेम बाबू को अपूर्वा का गुनगुनाना पसंद है। अपूर्वा कहती है-आप बहुत ज्यादा सोचते हैं, आपके सोचते रहने से ही क्या यह दुनिया बदल जायेगी? उसने लड़कियों को पढ़ाना शुरू कर दिया है। राम रथयात्रा को बिहार में रोक लिया गया। शिवदयाल जी लिखते हैं-नये प्रकार का नेतृत्व बिहार में आकार ले रहा है जिसका प्रकट झुकाव निम्नवर्ग की ओर है,लेकिन पूरी तरह जातीय आधार पर। आगे उन्होंने विस्तार से तत्कालीन बदलावों पर विचार किया है। लिखते हैं-एक धारा कितनी धाराओं में विभक्त हो गई। नेतागिरी बहुत बढ़ गई है। अपूर्वा ने आत्मीय क्षणों में धीरे से कहा-'किसकी चिंता करते हैं आप,अपने पर कोई दबाव नहीं रखिए। मेरी तरफ से बिल्कुल नहीं। जहाँ आप हैं,वहाँ मैं-।'प्रेम बाबू भीग से गए हैं। अखबार में सच्ची खबर छपी है- "जालसाजी में प्रख्यात कार्यकर्ता अंदर।" अमृत को जमानत मिल गई थी। उन्हें बुखार है,दम फुल रहा है। वह दुबला और निस्तेज दिख रहा था। शिवदयाल जी दो पुराने मित्रों के हालात और मिलन दृश्य को जीवन्त और मार्मिक तरीके से लिखा है। अमृत ने कहा-सोचो प्रेम,मेरा सारा तप निष्फल नहीं हो गया? इसे निष्फल होना भी नहीं कहेंगे,यह तो कलंकित होना हुआ न? प्रेम ने पूछा-आखिर कैसे हुआ यह सब?

रामपुर,भूमि आंदोलन के समय का जाग्रत गाँव,एक पंचायत। इसके अंतर्गत सत्रह गाँव हैं। आंदोलन खत्म हो चुका है,जमीनें बँटने के बाद। कल के भूमि मजदूर आज छोटे और सीमांत किसान बन गए हैं। उनमें आत्मविश्वास और आत्मगौरव आया है। उनका जीवन स्तर सुधरा है। किसानी करना सहज भी नहीं है,सालोंसाल लगे रहना पड़ता है। कुछ लोगों ने तो अपनी जमीनें दलालों को बेचनी शुरू कर दी है और पैसा शराब,जुए में जा रहा है। अमृत वहीं ठहर कर इस पंचायत को आदर्श बनाने की योजना में जुड़ा है। आये दिन अधिकारियों से पाला पड़ता रहता है,वे उसे समस्या खड़ा करने वाले के रूप में देखते हैं। स्थानीय कामरेड्स के लिए अमृत बाहरी की तरह है। कोई विदेशी संस्था अमृत को ग्रामीण विकास के लिए आर्थिक मदद करना चाहती है। मन में यह भाव भी है,यदि ऐसा होता है तो पूरे क्षेत्र का विकास हो जायेगा। अमृत ऊहापोह में है। लाभार्थी लोग संस्था के पक्ष में होते गये,उसका काम शुरू हो गया और अनुदान भी मिले। अचानक एक दिन पुलिस गिरफ्तारी का फरमान लेकर आई। अमृत हतप्रभ,यह क्या है? उस पर कोष के उपयोग में अनियमितता और जालसाजी का आरोप लगा है। जिन बिलों के माध्यम से लेन-देन और भुगतान हुआ है,वे फर्जी पाए गए हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि इन सब पर अमृत के हस्ताक्षर हैं। प्रशासन के लोगों को भी मनचाहा शिकार मिल गया। छह सप्ताह जेल में रहना पड़ा। यह सर्वाधिक त्रासदी थी,उसे कलंकित किया गया है। प्रेम दुखद कहानी सुन रो पड़ता है। शिवदयाल जी लिखते हैं- "भारत देश दूसरे रास्ते चल पड़ा है। यह रास्ता समाजवाद से दूर ले जाने वाला है। नई आर्थिक नीति की घोषणा की गई है। यह उदारवाद, निजीकरण और भूमंडलीकरण की त्रिआयामी नीति है।" साथ ही उन्होंने तत्कालीन परिस्थितियों पर अपनी बेबाक टिप्पणियों के साथ देश भर में हो रहे घटनाक्रमों का उल्लेख किया है। अमृत मार्मिक उत्तर देता है-तुम्हें क्या लगता है प्रेम,मेरी जरुरत है किसी को? "हाँ अमृत! तुम्हारी जरुरत है और तुम बचे भी रहोगे," प्रेम ने मुस्कराते हुए कहा।

शिवदयाल जी ने विशेष कालखण्ड को लेकर देश की राजनीति, विशेष रूप से बिहार की राजनीति पर सशक्त उपन्यास लिखा है। देश उस दौर से गुजरा है,वह त्रासदी देखी है और खास वैचारिक चिन्तन ने खूब हवा दी है। सम्पूर्ण उपन्यास स्थानीय बोली,हिन्दी,अंग्रेजी,भोजपुरी के शब्दों,वाक्यों से भरा हुआ है। उनके लेखन की शैलियाँ प्रभावित और आकर्षित करती हैं। अधिकांश पात्र घटनाओं के हिसाब से उपस्थित-अनुपस्थित होते रहते हैं। क्रांति या आंदोलनों से जुड़े लोगों की सक्रियता, संघर्ष, आर्थिक तंगी, गरीबी और असहाय होना आदि का बखूबी चित्रण हुआ है। सैद्धान्तिक पक्षों को समझाने की खूब कोशिश हुई है और स्त्री पात्रों की भूमिका महत्वपूर्ण है। कहीं-कहीं प्रवाह की समस्या है। वैचारिक मतभेद उभरना स्वाभाविक ही है। एक संदेश शायद यह भी है कि ऐसे आंदोलनों के कर्ता-धर्ता लोगों का अंतिम हस्र ऐसा ही होता है,सफलता मिलने के बाद उन्हें विस्मृत किया जाता है या रास्ते से हटाने की कोशिशें होती हैं। श्रेय, उसका लाभ लेने वाले दूसरे शामिल हो जाते हैं और कतिपय संकल्पित लोग अपना जख्म सहलाते रह जाते हैं।


1 comment :

  1. पुस्तक पढ़ने की रुचि जगाती अत्यंत सारगर्भित समीक्षा।

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