समीक्षा: 'भीड़ और भेड़िए’ - धारदार व्यंग्य रचनाओं का संग्रह

विजय कुमार तिवारी


समीक्षित कृति: भीड़ और भेड़िए (व्यंग्य संग्रह)
व्यंग्यकार: धर्मपाल महेन्द्र जैन
मूल्य: ₹ 260,00 
वर्ष: 2022, सजिल्द, पृष्ठ संख्या 136
प्रकाशक: भारतीय ज्ञानपीठ एवं वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली

व्यंग्य विधा साहित्य की चर्चा में है। आज व्यंग्यकार सार्थक व्यंग्य लेखन कर रहे हैं और साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं। व्यंग्य लेखन का इतिहास बहुत प्राचीन है और हर भाषा में भरपूर लिखा जा रहा है। दरअसल हम अपने आसपास के जीवन में विद्रूपता देखते हैं, मन दुखी होता है, असंतोष उभरता है, उस मनोभाव को कई रसों से सराबोर करके व्यंग्य के रूप में प्रस्तुत करते हैं। एक तरह से रचनाकार उन विद्रुपताओं, विसंगतियों के विरूद्ध सचेत करता है। व्यंग्य लेखन द्वारा रचनाकार समाज को संदेश देता है और इसका प्रभाव बहुत तेजी से दिखने लगता है। व्यंग्य असरदार होता है और अपनी ओर आकर्षित करता है। यह समाज की भयावह और पतनशील प्रवृत्तियों पर हथौड़े की तरह चोट करता है। कबीर ने तत्कालीन समाज की कुरीतियों और आडम्बर पर खूब व्यंग्य किया है। हरिशंकर परसाई, शरद जोशी सहित अनगिनत लोगों ने व्यंग्य लेखन को खूब समृद्ध किया है।

धर्मपाल महेंद्र जैन
हाल ही में सियाराम व्यंग्य भूषण सम्मान से सम्मानित बहुचर्चित व्यंग्यकार श्री धर्मपाल महेन्द्र जैन जी के व्यंग्य संग्रह 'भीड़ और भेड़िए' का दूसरा संस्करण वाणी प्रकाशन ने प्रकाशित किया है। मध्य प्रदेश के झाबुआ में जन्मे धर्मपाल वर्तमान में कनाडा के टोरंटो में रहते हुए साहित्य सृजन कर रहे हैं। उन्होंने अपने आसपास के समाज को, लोगों को, उनके सुचिन्तन-कुचिन्तन को देखा, समझा और प्रभावी तरीके से हमारे सामने रखा है। लगातार उनकी सक्रियता रही है और उनका सृजन-कार्य सतत होता रहा है। उन्होंने जीवन के संघर्षों के बीच, बिना निराश हुए, बिना थके लिखा है और खूब लिखा है। देश की शायद ही कोई महत्वपूर्ण पत्रिका, अखबार हो जहाँ उनकी रचनाओं को स्थान न मिला हो। सुखद है, 'विचार ही व्यंग्य को व्यंग्य बनाता है' शीर्षक के अन्तर्गत भूमिका के तौर पर श्री ज्ञान चतुर्वेदी जी ने सारगर्भित टिप्पणी की है। स्वयं श्री धर्मपाल महेन्द्र जैन जी ने 'मेरी वैचारिक दृष्टि' लेख लिखकर अपना वृहद दृष्टिकोण पाठकों को समर्पित किया है। धर्मपाल महेन्द्र जैन जी को अलग से किसी परिचय की जरूरत नहीं है, सतत सृजनशीलता, सक्रियता और वैविध्यपूर्ण चिन्तन ने उन्हें व्यंग्य विधा के आकाश पर सम्मानपूर्वक बिठा रखा है। 'भीड़ और भेड़िए' में उनके छोटे-छोटे कुल 52 व्यंग्य संग्रहीत है। उनमें प्रतीकों, बिम्बों के सहारे सच्चाई को व्यंग्य में उतारने का हुनर है, उनकी भाषा-शैली अलग प्रभाव दिखाती है और हिन्दी साहित्य में व्यंग्य विधा समृद्ध हो रही है।

विजय कुमार तिवारी
'भीड़ और भेड़िए' संग्रह का पहला व्यंग्य है और पुस्तक का नामकरण भी इसी नाम से हुआ है। कहा जाता है कि मनुष्य ईश्वर की श्रेष्ठ कृति है। विचारक मनुष्य पर विचार करते हुए तुलना में पशुओं, जानवरों को ला खड़ा करते हैं। यह उनकी मजबूरी है क्योंकि मनुष्य को समझने के लिए उससे श्रेष्ठ भौतिक तौर पर कुछ दिखता नहीं, अन्तर्यात्रा की समझ है नहीं और बहिर्यात्रा में पशु-जानवर और प्रकृति ही है। जैन जी स्वीकारते भी हैं, "मैं आदमी से ज्यादा भेड़ों के बारे में जानता हूँ और दावे से कह सकता हूँ कि भेड़ों से वफादारी की शत-प्रतिशत उम्मीद की जा सकती है।" है न बेहतरीन व्यंग्य, लेखक द्वारा वर्तमान सम्पूर्ण परिदृश्य पर? 'प्रजातंत्र की बस' में प्रयुक्त परिभाषाएँ और मनोविज्ञान ने धारदार दृश्य उपस्थित किए हैं। ऐसा लगता है मानो मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन व्यंग्य बनकर रह गया है। जैन सर की यह सबसे बड़ी सफलता है क्योंकि उन्होंने विशेष तरह का चश्मा लगा लिया है। उनके लेखन में मनुष्य की, समाज की और देश की त्रासदी चित्रित हुई है। 'दो टाँग वाली कुर्सी' में कुर्सी माध्यम बनी है और मनुष्य के बारे में चिन्तन चल रहा है। धर्मपाल जी के व्यंग्य की यह शैली है, वे वस्तुओं के साथ सम्पूर्ण संभावनाएँ तलाशते हैं और मनुष्य के लिए उपयोगिता पर विचार देते हैं। वे दृश्य दिखाते हैं, प्रश्न खड़ा करते हैं, उम्मीद करते हैं, लोग अपनी समस्याओं को समझें, समाधान खोजें और सुखी, आनंदित हो। उनके द्वारा प्रस्तुत विवेचनाएँ सहज ही समझ में आ जाती हैं और लोग चल रही विसंगतियों की तह तक पहुँच जाते हैं। कहावतें, मुहावरे और लोकोक्तियाँ उनके लेखन का वजन बढ़ा देते हैं। हाँ, सहमत-असहमत हुआ जा सकता है परन्तु उनके व्यंग्य की धार से बचा नहीं जा सकता।

सामयिक और धारदार व्यंग्य लेखन की बानगी है 'भैंस की पूँछ' जिसमें आज का मनुष्य अपने यथार्थ स्वरूप में उभरा है। हमारे आसपास रसीलाजी और सुरीलीजी जैसे लोग भरे पड़े हैं- वे दोनों हिंदी की भैंस को सीधे थन से पकड़ना चाहते हैं। समृद्ध व्यंग्य लेखन की कड़ी में 'पहले आप सुसाइड नोट लिख डालें' धर्मपाल जैन जी का व्यंग्य निबंध है। सफल व्यक्ति वही है जो स्वयं पर, अपनी विधा पर लिखने, कहने का साहस करे। धर्मपाल जी में यह हुनर और हिम्मत है। एक तरह से अच्छा ही है, स्वयं को खूब गाली दे लो, बाहर वाले निश्चित ही महान कहने लगेंगे। आत्महत्या जैसे विधान की एक-एक परत खोल कर रख दी गयी है और इससे दूर रहने की अद्भुत सलाह दी गयी है मानो बार-बार कोशिश की गयी हो और भय या इतर अनेक कारणों के चलते हिम्मत न हुई हो। व्यंग्य में डूबा यह प्राणी पूरे घर का सुख-चैन छिन लिया होगा, उसे तो जिधर देखो, व्यंग्य ही दिखाई देता है। 'मनुष्य हूँ तो स्वतंत्र ख्याल का हूँ,' सारे झमेले की जड़ यही है। कहीं पढ़ा है, किसी ने आगाह किया, वह मनुष्य है, सोचता भी है। कोई सोचना शुरु करे, ख्याल स्वतंत्र हों, व्यंग्य के अलावा और क्या उत्पादन होगा। 'नये देवता की तलाश में' पढ़कर नहीं लगता, जैसे हम हैं, जैसा हमारा लेखक है, वैसी ही यह सम्पूर्ण सृष्टि है, वैसे ही देवता हैं। हो सके तो व्यंग्यकार के ज्ञान को गम्भीरता से लें और नये सिरे से तलाश करें।

भानुमती ने कुनबा जोड़ा, धर्मपाल जैन जी ने यही किया है। आइंस्टीन का फार्मूला चुनाव के फार्मूले में घुसेड़ दिया है, लोग तो कहेंगे ही क्योंकि ऐसे कोई नहीं सोचता, "माफिया का प्रबंधन सरकार से बेहतर होता है, वहाँ नौकरशाह जो नहीं होते या कोई सरकार कहे कि माफिया राज की नकेल कस देगी तो सरकार की नकेल भीतर बैठे लोग ही कस देंगे।" धर्मपाल महेन्द्र जैन जी का पूरा का पूरा व्यंग्य लेखन इसी घुसेड़ने के सिद्धान्त पर आधारित है। उन्होंने स्वयं कहा है, "मैं व्यंग्य में नई विधा घुसाना चाहता हूँ, व्यंग्य भौतिकी।" साहित्य-रस में डूबने वालों को भौतिकी! इससे बढ़िया व्यंग्य कभी सुना नहीं। बहुत सुन्दर निबंध बन पड़ा है। 'इसे दस लोगों को फारवर्ड करें' दुनिया का तो पता नहीं, हमारे देश में प्रचलित फार्मूला है। व्यंग्यकार कथ्य-कथानक के विस्तार के साथ-साथ भाषा का भी विस्तार करता है, वैसे भी हमारे देश में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग किये बिना बात बनती नहीं है। इतना बड़ा व्यंग्यकार भला कैसे चूके? जैन जी अपने शब्द-ज्ञान का स्रोत भी बताते हैं, "उच्च कोटि का ज्ञान लादकर हाट समूह में आता हूँ। यहाँ कचरा-बगदा श्रेणी के ज्ञान का भी स्वागत है। मैंने यहीं से तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशज और अपशब्द सीखे हैं।" जैन जी की विशेषता और विशेषज्ञता का कायल सभी होते जा रहे हैं क्योंकि बिना लाग-लपेट, डंके की चोट पर अपना ज्ञान बांटते हैं, खास धमक के साथ। एक छोटे से निबंध के लिए दुनिया भर से उदाहरण भर देना उनकी अद्भुत क्षमता है। पूरी दुनिया कोरोना काल से गुजरी है, आक्सीजन, वेंटिलेटर जैसे शब्द खूब चर्चा में रहे हैं। अद्भुत व्यंग्य उभरा है उनकी लेखनी से। लाख विरोधों और कमियों के बावजूद आज उन्हें श्रेष्ठ नहीं तो बड़ा व्यंग्यकार मान ही लेना चाहिए। विज्ञान के अध्येता की तरह परत-दर-परत अपना व्यंग्य प्रस्तुत करते हैं और हर वाद, पंथ, सबको चमत्कृत करते हैं। 

निबंध भी कहानियों की तरह बुने जा सकते हैं, यह जैन जी को पढ़ते हुए अनुभव किया जा सकता है। किसी भी विषय को इस तरह सम्पूर्णता में देखना और व्यंग्य निकाल लाना, सहज काम नहीं है। 'दिमाग अपना हो या दूसरों का' में उनकी भाव-प्रवणता, संयोजन, तार्किकता और हथौड़ा मारने की कला सब कुछ व्यापक तरीके से दिखाई देता है। लेखक की दृष्टि से कुछ भी छूटता नहीं है और कम शब्दों में बड़ा चित्र दिखा देते हैं। उनकी शैली स्पष्ट है और प्रायः सभी रचनाएँ एक ही ढर्रे पर विषय-वैविध्यता के साथ उपस्थित हैं। हो सकता है, कुछ पाठक या विद्वतजन नाक-भौं सिकोड़ें, इसकी चिन्ता नहीं करनी है। दिमाग को लेकर इतना सटीक वर्णन अद्भुत है। यदि जैन सर को कोई गुलाब मिल जाये तो मूल तत्व से इतर बहुत कुछ करते रह जायेंगे। हाँ, एक बेहतर व्यंग्य अवश्य पाठकों को मिल जायेगा। 'ऐ तंत्र, तू लोक का बन', 'कोई भी हो यूनिवर्सल प्रेसिडेंट' या 'समझदार को सदाबहार इशारा' जैसी रचनाएँ समान भाव संप्रेषित करती हैं परन्तु पाठक को बाँधे रहती हैं। 'साठोत्तरी साहित्यकारों का खुलासा' शीर्षक में जैन जी कुछ पकाने वाले हैं। अपने बचाव के लिए पहले ही अस्वीकरण लिख दिया ताकि कोई बवाल न मचे। यह प्रयोग नया न भी हो, विरल तो है ही। साठोत्तरी मतलब साठ बसंत पार, जिसका ज्ञान और उम्र स्थिर हो गया हो। बताना चाहते है कि वे अजायबघर नहीं हैं, वे साहित्य के पहरेदार रहे हैं। उनके मन में प्रेम का अजस्र स्रोत बहता है, वे रीतिकाल को रतिकाल का पर्याय मानते हैं। जीवन की सभी स्थितियों में, साठोत्तरी योद्धाओं को हर कोण-दृष्टिकोण से खूब समझ-बूझकर लिखा है। जैन जी कदम-दर-कदम जो झेल रहे हैं, उसी का खुलासा हुआ है। सशक्त व्यंग्य निबंध है। यह जिस चिन्तन मुद्रा या धरातल का लेखन है, उसकी व्याख्या इस निबंध में खूब हुई है। उम्मीद है, लोग उनकी मनःस्थिति को समझेंगे, उन्हें मंच देंगे, पुरस्कृत करेंगे, गलत हों तो भी ताली बजायेंगे, महिला लेखिकाएँ खुलकर मिलेंगी और युवा अपना समय देंगे। निश्चित ही उनका शेष जीवन सुखद होगा।

'शर्म से सिकुड़ा घरेलू बजट' व्यंग्यकार की अच्छी रचना है, मानवीय पक्ष खूब उभरे हैं, मजबूत सम्बन्ध हैं, नारी को उचित स्थान मिला है- वे मुस्कराईं तो मैं भी मुस्कराया, मुस्कराना मुफ्त में हो जाता है। बजट की शब्दावली में साहित्यिक व्यंग्य लिखकर लेखक ने कमाल कर दिया है। 'होली कथा का आधुनिक संस्करण' पौराणिक घटनाओं पर आधारित रोचक व्यंग्य है। जैन जी की अपनी शैली है, कथा कहने में प्रवाह है और आज की जनता की नब्ज पहचानते हैं। उन्हें कोई चुनौती भी नहीं है, देश की पौराणिक कथाओं पर जितना चिंतन कर सकें और जो मन करे, लिखें। 'वाह-वाह संप्रदाय के तबलीगियों से' व्यंग्य निबंध में समकालीन जीवन और आज की यथार्थ स्थिति का चित्रण हुआ है। यहाँ वह शब्दावली है जिसके सहयोग से व्यंग्यकार ने वस्तु-स्थिति को समझाया है, सुन्दर व्यंग्य रचा है और हम बाध्य हैं कहने को- अद्भुत व्यंग्य, अद्भुत व्यंग्यकार। 'हम जीडीपी गिराने वाले' व्यंग्य से स्पष्ट है, व्यंग्यकार को विज्ञान ही नहीं अर्थशास्त्र का भी ज्ञान है, बड़ी बात है कि उन्हें कहीं से भी व्यंग्य निकाल लाने में महारत है। शब्दावली का ज्ञान, स्पष्ट चिन्तन, सामाजिक संरचना की समझ और अनुभूत को व्यक्त करने की कला, सबने मिलकर श्री धर्मपाल महेन्द्र जैन को रचा है। उनमें वह साहस है, जो उचित लगा, बेधड़क लिखा, खुलकर लिखा। किसी भी व्यंग्यकार की यही असली ताकत होती है।

'ऐसे साल को जाना ही चाहिए' में घटनाओं का ब्यौरा बिल्कुल सही है, बहुत मेहनत से लिखा, सजाया गया है और वर्ष भर की विसंगतियों पर व्यंग्य-बाण छोड़े गये हैं। हमारी सारी विधाओं के केन्द्र में मनुष्य, उसके सुख-दुख होते हैं, होने भी चाहिए क्योंकि वह भोक्ता है। वह कर्त्ता बने, जिम्मेदारी उठाए, राष्ट्र-निर्माण में भागीदार बने, ऐसी चेतना जगाने की जरूरत है। कब तक मुफ्तखोर बन दूसरों का मुँह ताकते रहेंगे? जैन जी के इस व्यंग्य के अंतिम पैरा को खूब ध्यान से पढ़ने की जरूरत है। 'हाईकमान के शीश महल में' गुड्डू भैया प्रवेश कर ही गये, अपनी आत्मा उनके चरणों में रख दी और वे आत्मा विहीन प्रतिमा के योग्य बनने की दिशा में बढ़ने लगे। हमारे देश में 'हाईकमान' का कानसेप्ट खूब प्रचलित है। इस व्यंग्य को पढ़कर लोग हाईकमान के शीशमहल के भीतर की प्रक्रिया समझ जायेंगे। सुन्दर व्यंग्य बन पड़ा है। राजनीति से जुड़ी 'बागड़बिल्लों का नया धंधा' व्यंग्य से हमारी आँखें खुलेंगी। अलग से कुछ भी कहने की जरूरत नहीं है,बहुत सटीक चित्रण हुआ है, हमारी सीमाओं पर ऐसी ही स्थिति है और प्रधानमंत्री, अप्रधानमंत्री की लड़ाई जारी है। भ्रम और अंधेरा दोनों बिम्ब अच्छे हैं। जैन जी के तर्क व्यंग्य को धारदार बनाते हैं और बागड़बिल्लों का धंधा चल रहा है। 'काश साहब आये होते' व 'लॉकडाउन में दरबार' दोनों रचनाएँ अपनी-अपनी तरह से पाठकों के भीतर गहरी उतरती हैं, झकझोरती हैं और विचलित करती हैं। यहाँ भी व्यंग्यकार का काम महाभारत काल में गये बिना नहीं चलता। सरकारी आंकड़ों को लेकर अद्भुत व्यंग्य उभरा है।

'चापलूस बेरोजगार नहीं रहते','माल को माल ही रहने दो' और 'बेरोजगार विपक्षीजी' जैसी रचनाएँ बताती हैं, देखो, खुद लोग कैसे व्यंग्य के पात्र हो जाते हैं। जैन जी सलाह देते हैं, व्यंग्य देखिए, "सत्तारूढ़ पार्टी में घुसने से एक फायदा यह है कि सीबीआई से सुरक्षा ऑटोमेटिक मिल जाती है। अंत में कहते हैं, बिना जिम्मेदार और योग्य बने विपक्षियों की बेरोजगारी दूर होने वाली नहीं है। चापलूस की परिभाषा और उपयोगिता सबको ज्ञात है। दुनिया भर में चापलूसों की इतनी मांग है कि कोई भी चापलूस बेरोजगार नहीं रहता। चापलूसी पर ज्ञान पाने के लिए जैन जी को खूब पापड़ बेलने पड़े होंगे। आज वे सफल हैं। वैसे ही माल शब्द पर शोध उनकी बड़ी उपलब्धि है। विस्तृत अनुभव, भाषा-ज्ञान, व्याकरण और बुद्धिजीवियों के बीच मंचीय उपस्थिति, वरना हमें कहाँ से मिलता अद्भुत व्यंग्य। 'बुद्धिजीवियों के जुलूस में' लेखक भी शामिल है। सरकार का विरोध बुद्धिजीवी होना है, वहाँ वर्ग भेद नहीं होता। सीएम के साथ फोटो अखबारों में छपा, आश्वासन मिला, पत्नी मुदित हुई क्योंकि वह भी बुद्धिजीवी बन गई। बुद्धिजीवी के व्यंग्य की तरह 'व्यंग्यकारी के दाँव-पेंच' में पहलवानी से लेकर साहित्य के अखाड़े तक खूब पेंच या पंच हैं। गुरु की सीख देखिए, "अरे छोटिया! व्यंग्य लिखने में तगड़े शरीर से सब कुछ नहीं होता। शब्दों को पकड़ने की फुर्ती होनी चाहिए। उनसे चालबाजियाँ बनानी और उनकी रंगबाजी बतानी आनी चाहिए। फिर धीरज से सुरसुरी छोड़नी आनी चाहिए।"

'किसी के बाप का कश्मीर थोड़ी है' व्यंग्य चमत्कृत करता है और व्यथित भी। देश का कोई भी हिस्सा हो, सुख-शान्ति होनी चाहिए। जैन जी की पीड़ा देखिए- वे कश्मीर बेच रहे हैं। देश मौन है, कश्मीर मौन है, सरकार मौन है। वे खुलेआम बेच रहे हैं। 'डिमांड ज्यादा है, थाने कम' निविदा के सम्बन्ध में जबरदस्त व्यंग्य है। शब्दावली का ज्ञान दुरुस्त है। बिल्कुल ऐसा ही होता है। 'हिंदी साहित्य का कोरोना गाथा काल' शीर्षक से उन्होंने सुन्दर व्यंग्य लिखकर चमत्कृत किया है- कोरोना गाथा काल नई दुनिया और नए साहित्य के उद्भव का प्रारंभिक काल है। धर्मपाल जैन जी की विशेषता है, वे गम्भीर से गम्भीर विषय को सहज बनाते हैं, अपनी शैली में, सारी जटिलताएँ पाठकों के सामने व्यंग्य के रूप में परोस देते हैं। 'पेशोपेश में हैं महालक्ष्मी जी' के माध्यम से धर्मपाल जैन जी ने मनुष्य के विरुद्ध सभी जीव-जन्तुओं के विचारों का व्यंग्यात्मक स्वरूप अद्भुत और पाठकों को आनंदित करने वाला है। उसी तरह 'श्रेय लेने की महाप्रिय परंपरा' लोगों की रुचियों और संभावनाओं पर जबरदस्त व्यंग्य है। उनका अगला व्यंग्य देखिए 'फक्कड़ों की जिंदगी जीना चाहें तो।' शुरुआत करने की आदत सदा की तरह अपनी संस्कृति और परंपराओं पर है, सो ब्रह्मा जी आयेंगे ही। भारतीय व्यंग्यकारों के लिए सबसे प्रिय चरागाह यही है, खूब चरते हैं और जुगाली करते हुए संग्रह के संग्रह छपवाते हैं। जैन जी की महानता है, छौंक बघार कर शीघ्र ही वर्तमान के परिदृश्य को समेटने लगते हैं। उनकी निगाह से कुछ भी अनदेखा नहीं रहता और उनके सहज व्यंग्य बाण से सभी चोट सहलाते मिलते हैं। यह उनकी खूबी है, सर्वाधिक लहूलुहान स्वयं या साथ रहने वालों को करते हैं। 'दिल्ली है बिना फेफड़े वालों की' का व्यंग्य सहज ही लोग स्वीकार कर लेते हैं क्योंकि सारी बातें तर्कसंगत हैं। दिल्ली दिल वालों की है। बेड खाली नहीं होंगे तो कॉरिडोर में पड़े-पड़े इलाज करवा लेंगे और बिना फेफड़ों के भी जिंदगी जी लेंगे।

सफल व्यंग्यकार वही है जो नये-पुराने, दाएं-बाएँ कहीं से भी व्यंग्य खोज निकाले। बिना ड्राइवर के ट्रेन चलाने की चर्चा शुरु हुई, दूर देश कनाडा में बैठकर जैन साहब ने अपनी कलम सम्हाल ली। आदि से अंत तक सब कुछ लिख डाला, जितना दिमाग में था। खुशी हुई कि अब नेताओं का वर्चस्व नहीं रहेगा, व्यवस्था से लोग हटाये जायेंगे जो बाधाएँ खड़ी करते हैं। खतरा व्यंग्यकार पर भी है, संपादक ने कहा, हम बिना व्यंग्यकार के ही व्यंग्य लिखवा लेंगे। 'परदेस में अचार-पराठे वाले' के माध्यम से प्रवासी भारतीयों द्वारा कला, संस्कृति, साहित्य, विज्ञान या राजनीति हर क्षेत्र में परचम लहराकर धर्मपाल जी को व्यंग्य में झंडा गाड़ने का सुअवसर दिया है। देश-विदेश में पड़ने वाले प्रभावों की खुलकर चर्चा हुई है, हमारी बुद्धि, मानसिकता, चातुर्य, धूर्तता सब कुछ जगजाहिर है। विदेश प्रवास से जुड़ा कोई भी प्रसंग छूटा नहीं है जिसपर जैन जी की व्यंग्य दृष्टि न पड़ी हो। 'बिन बारूद की तीली' या 'भूलोक के हैकर' जैसी व्यंग्य रचनाएँ पाठकों को अलग तरीके से हिलाती-डुलाती हैं। उसी कड़ी में 'ऑक्सफोर्ड में छा गई आत्मनिर्भरता' को भी देख सकते हैं। आत्मनिर्भरता पर इतना विस्तृत चिंतन शायद ही किसी ने किया हो, इसे विश्वव्यापी बनाने का श्रेय लेखक को दिया जा सकता है। जैन जी ने चिर प्रश्न उठाया है- देश के फूफा की तलाश और उत्तर खोजने में सारे रिश्तों को खंगाल डाला है। जैसे नाटक देखने का अपना सुख है वैसे ही व्यंग्य पढ़ने का भी सुख हो। उनका मत है- सुरक्षित लिखो और सुखी रहो। हमारे पौराणिक उद्धरणों के आधार पर व्यंग्य उपजाने का प्रयास है, स्वर्गलोक का सर्वर हैक हो गया है। संवाद शैली में सारे प्रसंग धर्मपाल जी के व्यंग्य के उदाहरण हैं। आधुनिक तकनीक के प्रयोग को लेकर व्यंग्य है 'आवाज आ रही क्या'। बेबीनार या टीवी बहसों में अक्सर हमने यह समस्या देखी है। समस्याएँ तो हैं परन्तु इसके लाभ भी कम नहीं है। किसी छोटी से छोटी रचना में बड़ा दृश्य दिखाने की क्षमता व्यंग्यकार में है और उनके सटीक उद्धरणों को कोई नकार नहीं सकता।

'जिधर जगह उधर मात्रा' में काव्य लेखन पर व्यंग्य है। इस सूक्ष्म और चिंतनपरक विवेचना से हिन्दी व्यंग्य संसार धन्य हो गया है। व्याकरण, मात्रा, लिंग आदि पर शोध अद्भुत है। ऐसे ही नहीं, धर्मपाल महेन्द्र जैन जी व्यंग्याकाश में छाए हुए हैं। 'संविधान को कुतरती आत्माएं' में चरित्र चित्रण, भाषा प्रयोग और उदाहरण द्वारा समर्थन, जैन सर की व्यंग्य कला का नमूना है। यहाँ पार्टी है और सारे लोग आत्मा के रूप में बदल दिये गये हैं क्योंकि ह्विप जारी कर दिया गया है। संविधान की रक्षा के लिए समर्पित आत्माएँ चाहिए। इस प्रसंग को तनिक ध्यान से देखिए- 'संविधान' का जरा-सा हिस्सा कुतरो तो 'विधान' बचता है। उसे कुछ और कुतरो तो 'धान' बचता है। कुतरते रहने की प्रक्रिया निरंतर रहे तो धन दिखता है, विपुल धन। 'आदानम् प्रदानम् सुखम्' अर्थात् आदान और प्रदान दोनों ही सुख के कारक हैं। यहाँ रिश्वत पर व्यंग्य है। हमारे पाठकों को सब पता है, वे सब समझ रहे हैं और व्यंग्य पढ़ते हुए हुनर सीख रहे हैं। 'शस्त्र मानव मारते हैं पर शास्त्र--' का व्यंग्य देखिए- आदमी ने तमाम तरह के शस्त्र बनाए। जब वे नाकाफी हो गये तो शास्त्र बनाए। ऐसे अनेक उदाहरणों के हथौड़े मारे गये हैं और व्यंग्यकार ने अपनी मान्यता स्थापित करने की कोशिश की है। 'वैशाली में ऑक्सीजन कंसंट्रेटर' व्यंग्य में त्राहिमाम है, राजा, मंत्री, सेनापति, साम्राज्य, विपक्ष सब हैं। महामंत्री अमेरिका से उपहार में मिले आक्सीजन कंसंट्रेटर महाराज को देता है। राजा, रानी के प्रेम में है, रानी सेनापति के लिए मरी जा रही है। उधर सेनापति विपक्ष की कद्दावर नेत्री के प्रेम में है। नेत्री प्रियतम एंकर से राजा का सारा रहस्य बताकर ऑक्सीजन सुपुर्द करती है। एंकर नगरवधू के प्रेम में है। नगरवधू राजा के पास पहुँचती है। राजा भर्तृहरि के जीवन के इस प्रसंग को आधार बनाकर धर्मपाल जी ने आज की व्यवस्था पर करारा व्यंग्य किया है।

कोरोना काल के उपरांत मंदिरों के पट खुलने लगे, लोगों की आस्था लौट आयी। 'पुण्य छूट पर बिक रहा है' इसी पर आधारित व्यंग्य है। श्रद्धा-भक्ति, दान-दक्षिणा, मन्दिर के बाहर बैठे याचक, भीतर के पुरोहित, पुजारी सबकी दिनचर्या शुरु हो गयी। नीच का शनि और खराब राहु के लिए अनुष्ठान, ज्योतिषी के वेबपेज पर पैकेज, जैन जी ने खूब पापड़ बेला है। इसी से मिलता-जुलता 'संस्कृति के नशीले संस्कार' व्यंग्य है जिसमें फिर से जैन जी को मौका मिल गया है, देश की संस्कृति पर विवेचना करने का। कनाडा, अमेरिका और भारत सब उनके जेहन में है और नशे का बढ़ता व्यापार भी। परत-दर-परत व्यंग्य के माध्यम से उन्होंने सारा रहस्य खोल कर रख दिया है। 'भाल, तिलक सब छीनी रे' अद्भुत व्यंग्य है। उनके व्यंग्य गम्भीर होते हैं, चोट करते हैं यानी जिसको पकड़ लेते हैं, बखिया उधेड़ देते हैं। साहित्य जगत में तिलक लगाने की परंपरा है। इसी को लेकर धर्मपाल जी ने चोट की है। 'अमेरिका-मैं सांस नहीं ले पा रहा' नामक व्यंग्य में सत्ता है, उसका सारा तामझाम है। मरघट की आग पर राख डाल दी गई है। व्यंग्यकार का मत है, कोई भी सत्ता ताकतवर होकर अपनी जनता की नहीं हो सकती। लेखक सांस खींचता है, महसूस करता है, सांस तो है पर इसमें आजादी नहीं है। यह जीवन तो देती है पर इसमें प्राण नहीं है। व्यंग्य के माध्यम से व्यंग्यकार बहुत कुछ खोलकर दुनिया के सामने रख देता है। ऐसे व्यंग्य विरले लिखे जाते हैं। 'चार हजार नौ सौ निन्यानबे मित्र' आज की सोशल मीडिया से जुड़ा व्यंग्य है। कुछ पंक्तियाँ देखिए-फेकबुक पर चार बार हो आया हूँ, वाट्सएप पर तीन बार और ट्विटर तो सदा-सर्वदा खुला ही रहता है। फेसबुक में चार हजार नौ सौ निन्यानबे मित्र हो चुके हैं। भौतिक मित्र, आभासी मित्र सहित सामाजिक मीडिया की शब्दावलियों से भरा यह व्यंग्य हमें सजग तो करता है परन्तु कोई इससे दूर होना नहीं चाहता।

इस तरह देखा जाये तो धर्मपाल महेन्द्र जैन जी आज की पीढ़ी के सफल और प्रतिष्ठित व्यंग्यकार हैं। उनकी सधी हुई भाषा, विशेष शैली, हिन्दी, अंग्रेजी, भोजपुरी के शब्दों का प्रयोग पाठकों को चमत्कृत करता है। छोटे-छोटे वाक्य और गहन विषय, उनकी दक्षता प्रमाणित करते हैं। जैसे हम किसी ऊँचे स्थान से तराई को पूर्णता में देख पाते हैं वैसे ही धर्मपाल जैन जी विदेशी धरती से भारत को अतिरिक्त भाव से समझते हैं। श्री धर्मपाल महेन्द्र जैन जी के सतत सक्रिय लेखन के लिए मेरी शुभकामनाएँ हैं और बधाई भी।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।