वैश्विक मानव मन की परतों को खोलता कहानी संग्रह - कथारंग

समीक्षक: हरिप्रकाश राठी


कथारंग – देश देशांतर की कहानियाँ और विमर्श
समालोचक: मुकेश दुबे
संपादक: हंसा दीप
प्रकाशक: हंस प्रकाशन, दरियागंज, नयी दिल्ली 
hansprakashan56@gmail.com 


सामने है जो लोग उसे बुरा कहते हैं, 
जिसे देखा ही नहीं उसे खुदा कहते हैं।। - सुदर्शन फ़ाकिर

साहित्य की विभिन्न विधाओं में कथाकला का विशेष महत्व है। हर कथा में कथ्य के साथ एक महान दर्शन भी होता है। यही कारण है कि कहानी कालातीत होती है। कहानी जीवन के सत्य को हृदय में उतारने की कला ही तो है। ख्यात कथाकार हंसादीप का वैश्विक कथा-संकलन ‘कथारंग’ मुझे कुछ दिन पूर्व डाक से मिला था। 17 कहानियों के इस कथा-संग्रह में 8 कथाकार अप्रवासी भारतीय हैं, 3 मध्यप्रदेश से, 2 राजस्थान से, तथा एक-एक पंजाब, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, व महाराष्ट्र से हैं। संयोग से राजस्थान के दोनों कथाकार मैं एवं प्रगति गुप्ता जोधपुर से हैं। इसकी समालोचना ख्यात आलोचक एवं विद्वान मित्र मुकेश दुबे ने की है।

हंसा दीप द्वारा सम्पादित यह संग्रह मानव के चेतन-अवचेतन में सेंध लगाकर वैश्विक मानव मन की परतें तो खोलता ही है भारत के वैदिक उद्घोष ' सोऽहम् सोऽहम्' अर्थात् मैं वही हूँ जो तू है के वैश्विक भाव को भी सिरे से प्रतिष्ठित करता है। सत, रज एवं तम के मनोवैविध्य में रची इस दुनिया में मनुष्य सर्वत्र एक-सा है। मृगमरीचिका की तरह कई बार दूर-देशांतर की दुनिया एवं चकाचौंध हमें आकर्षित करती है पर वहाँ बसे लोग यह शिद्दत से महसूस करते हैं कि वस्तुतः असल सुख अपनी माटी की महक है, यह लौटने का भाव कई बार इतना तीव्रतर हो जाता है कि व्यक्ति वहाँ फँस जाने पर सिर भारत में एवं धड़ विदेश में महसूस करता है। 

सुधा ओम ढींगरा द्वारा लिखी संग्रह की पहली कहानी ' कमरा नम्बर 103' इस छुपी बात की कलई खोल देती है कि वतन से दूर होने का दर्द क्या है? अस्पताल नर्सेज टेरी एवं एमी के इस कमरे को वस्तुतः कैथेरसिस/रेचन कक्ष कहना लाजमी होगा जहाँ ये सखियाँ अस्पताल की विसंगतियों की तो चर्चा करती ही है, भारतीय एवं अन्य मरीजों की पीड़ा भी बयान करती है। सरल भाषा में लिखी इस कहानी का कथारस आपको बरबस पढ़ने को बाध्य करता है। समालोचक मुकेश दुबे की पंक्तियाँ यहाँ गौरतलब हैं 'सिर्फ बाहरी चोट से ही नहीं, भावनात्मक आघात से भी मस्तिष्क की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है।' ये आघात हमारे विश्वास को चकनाचूर कर देते हैं। कहानी चिकित्सा जगत के व्यवसायीकरण, संतानों की संवेदनहीनता, प्रवासी माता-पिता की मजबूरियाँ, आदि बातों को शिद्दत से उजागर करती है। कहानी का संवेदना पक्ष अत्यंत प्रबल है।

संग्रह की दूसरी कहानी 'अधूरा घर' किसी ग़ज़ल के शेर ' पा जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है ' का दिलचस्प बयान है। पत्नी घर में हो तो घर की मुर्गी दाल बराबर है पर उसके बिना हर वस्तु नीरस एवं फीकी है। जड़-चेतन का यह मौन, अनूठा संवाद दाम्पत्य प्रेम एवं सुख का मूल है। जिसके बिना हम ही नहीं घर की एक-एक वस्तु अर्थहीन लगे, वही तो सच्चा प्रेम है। आज वह होती तो यह होता, वह होता यह 'अधूरा घर' पूर्ण चन्द्र की तरह खिल उठता। इस कहानी की सरल भाषा इस बात को प्रतिष्ठित करती है कि कहानी कथारस से प्रभाव पकड़ती है, उसे लिखने के लिए प्रांजल भाषा नहीं चाहिए, कथ्य मजबूत हो तो किरदार सरल भाषा में भी मुखर हो उठते हैं। गोविंद सेन को बधाई।

महावीर राजी की तीसरी कहानी 'तंत्र' इस निष्कर्ष उक्ति को प्रतिष्ठित करती है कि ‘एक गरीब इसलिए गरीब है कि वह गरीब है।’ यहाँ से उठने के लिए उसे साहस जुटाकर आर्थिक समीकरण बदलने होंगे एवं यह साहस किया है कहानी के मुख्य किरदार 'झुमकी' ने। हक न मिले तो छीन लो, यह जगत तो मरे को मारता है। ईश्वर उनकी मदद करता है जो खुद अपनी मदद करते हैं। यह कहानी संदेशप्रद तो है ही उस सरकारी व्यवस्था की भी पोल खोलती है जो गरीब का जीवन बदलने को बहुत कुछ कहती है पर तंत्र ऐसा करने नहीं देता। कहानी इसी तंत्र पर प्रहार करती है।

दिव्या माथुर द्वारा लिखी संग्रह की चौथी कहानी 'हब्शन' जहाँ विदेशों में कार्य कर रही अकेली स्त्रियों की व्यथा को उजागर करती है वहीं यह भी उजागर करती है कि जीवन जीने के पैटर्न्स, अंदाज़, मेनरिज्म हर जगह जुदा होते हैं एवं जब तक हम इन्हें अच्छी तरह समझ नहीं लेते, उनके व्यवहारों को हमारे चश्मे से ही देखते हैं। यह पूर्वाग्रह एक विचित्र भय पैदा करता है। इसे समझ लेने के बाद ही हब्शन का भीतरी, उज्ज्वल पक्ष बाहर आता है। इस कहानी का संवेदना पक्ष अत्यंत प्रबल है। लंदन में बच्चों के साथ कार्य कर रही भारतीय महिला की समस्याएँ, गिल्ट एवं हब्शन के असल चेहरे ने कहानी को मुकम्मल तो बनाया पर कहानी उस चरम बिंदु तक नहीं पहुँची जहाँ पहुँचने की पूरी गुंजाइश थी।

संग्रह की पाँचवी कहानी ' नाम बड़े और दर्शन छोटे' एक ऐसी दिलचस्प कहानी है जो संवादों में ही आज की इस महत्वपूर्ण समस्या को उजागर कर देती है कि किस तरह बाजारवाद न सिर्फ हमारे चिरपोषित संस्कारों को लील गया है, संवेदना को भी लील गया है। मनी एट एनी कॉस्ट इज द स्लोगन नाउ...हमें हर हाल में धन मिले भले इसके लिए कोई समझौता करना पड़ जाए.. जिसको मरना है मरे हमारी बला से। कहानी समाज में बढ़ती अश्लीलता, ड्रग व्यापार एवं बढ़ते व्यापार के नेपथ्य में छुपी यौनिकता का भी बेबाक बयान है। समाजवाद अब बाजारवाद में बदल गया है एवं यहाँ बिक्री बढ़ाने के लिए सभी समझौते हो रहे हैं। कहानी के अंत तक आते कथाकार कह ही देती है... प्राचीन युग की नगरवधू संस्कृति पार्टी गर्ल तक पहुँच गई है। थ्रिल एवं फन के नाम पर छुपी वैश्यावृति, ज़िगालो आदि चुपके से औसान जमा रहे हैं। नये वक्त की यह आहट खतरनाक है। सुषमा मुनीन्द्र की नदी की तरह बहती यह कहानी अंत तक न सिर्फ बांधे रखती है, सिहरन एवं रोमांच भी पैदा करती है।

संग्रह की छठी कहानी ' इंतज़ार' सत्तर वर्षीय ऐसी एकाकी स्त्री की कथा-व्यथा है जिसकी एकमात्र संतान रानू माता-पिता से विद्रोह कर अपने पसंद के साथी का चयन कर कनाडा चली जाती है। नाज़ों से पली यह एकमात्र संतान इतनी निष्ठुर, असंवेदनशील बन जाती है कि उसके माँ-बाप न सिर्फ उसकी हर बात मानते हैं, तिल-तिल घुटते भी हैं। इसी दुख में पिता का निधन हो जाता है। रानू पिता के निधन पर भी नहीं आती है “...माँ के कहने पर उत्तर आता है... कोशिश करूंगी आने की, तो माँ कहती है, कोशिश नहीं बेटा आओ! तुम्हारे पापा थे वे...” आँखें नम कर देती है। इसी दरम्यान एक किराएदार मोहिनी उसके घर में फुहार बनकर आती है एवं उसे अतीत को भुलाकर जीना सिखाती है। वह उसकी हर बात का ध्यान रखती है, उसे परिस्थितियों से लड़ना सिखाती है। यह एकाकी स्त्री उसमें रानू देखती है एवं उससे एक स्नेहिल तादात्म्य बना लेती है। शाम वह उसका शिद्दत से इंतज़ार करती है, वह चाहती है मोहिनी उसे मम्मी कहे पर इसी बीच मोहिनी का स्थानांतरण हो जाता है, वह फिर अकेली हो जाती है। कहानी में माँ का चिंतन ...संस्कार देने में भूल हुई है क्या? अब लेता कौन है संस्कार? परिभाषा बदल गई है संस्कारों की...हमारी पीढ़ी ने अपने से बड़ों को भी सहा और अपने बच्चों को भी सहना पड़ रहा है.. कहानी को परवान चढ़ाते हैं। आशा पाण्डेय ने आज की पीढ़ी से त्रस्त माँ-बाप की व्यथा, कशमकश का सुंदर बयान किया है, ऐसी संवेदनशील कहानी के लिए वे बधाई की पात्र हैं।

बर्मिंघम ब्रिटेन में रहने वाली शैल अग्रवाल की कहानी ' आधे-अधूरे ' अल्जाइमर पीड़ित पत्नी छवि की व्यथाओं से उपजे पति रोहन का ऐसा भाव-संसार है जहाँ पति उसे केअर होम छोड़ते हुए, घर में अकेले रहते हुए पल-पल उसे याद करता है। पत्नी भी हर समय यही सोचती हैं कि कहीं भूलने की आदत बढ़ने के साथ मैँ पति को ही न भूल जाऊँ। भावनाओं के इस उतार-चढ़ाव का शैल ने क्या खूब वर्णन किया है। मेडफॉर इच अदर कपल वस्तुतः ऐसे ही होते हैं जो मन से, भावों से एक-दूसरे को समर्पित होते हैं। बहुधा स्त्री लेखिकाएँ पुरुष के क्रूर मन की गाथाएँ लिखती हैं पर शैल ने पुरुष मन के सुंदर, भावनात्मक पहलू को खूबसूरती से उकेरा है। जीवन कभी-कभी यकायक रुक जाता है। मनुष्य अंततः क्षयमान माटी का मजबूर पुतला ही तो है, पर हमारी भावनाएँ तब भी रिश्ते को ज़िंदा रखती है एवं यही सच्चा प्रेम है। केअर होम से घर लौटते हुए रोहित का चिंतन... उसकी आँखों की नमी रास्ते भर सवाल पर सवाल पूछती रही... बहुत कुछ बयाँ करता है। कहानी का भावसंसार प्रबल हो तो कहानी पाठक को पकड़ कर रखती है एवं इस पकड़ का तानाबाना बुनने में शैल का कौशल देखते बनता है। कोई न कोई दुख सबसे चिपका है, हम सभी 'आधे-अधूरे' हैं पर हमारा भाव, हमारी संवेदना हमें पल-पल जिजीविषा देती है।

कथा जगत में यकायक प्रवेश कर धूमकेतु की तरह निखरने वाली प्रगति गुप्ता की कहानी ' उसका आना' भाग्य, भवितव्यता एवं मानवी जीवट का अद्भुत मेल है। मनुष्य क्या सोचता है, भाग्य में कुछ और होता है एवं नियति के मंसूबे कुछ और होते हैं। गर्भपात से बची एक बच्ची वेदिका पैदा होने पर आशाओं के प्रतिकूल एक बीमारी, स्पास्टिक सीपी, से पीड़ित हो जाती है। मानसिक पक्षाघात से पीड़ित इस बच्ची को माँ चुनौती मानकर बड़ा करती है। उसको पालने में हुई पीड़ा से ही ऊर्जा प्राप्त कर अन्य ऐसे ही बच्चों के लिए एक नर्सिंग होम का निर्माण करती है जहाँ ये बच्चे पल सके लेकिन दुर्भाग्य से इसी बीच उसकी अपनी बच्ची वेदिका का अवसान हो जाता है। इतना होने पर भी वह विचलित नहीं होती वरन नियति के मंसूबों को समझती है कि किस तरह 'उसका आना' लोककल्याण का हेतु बन गया है। इस महती कार्य के लिए सरकार द्वारा पुरस्कृत होते हुए माँ नम हो जाती है कि किस तरह एक बच्ची ने उसके जीवन में आकर उसके जीवन को रूपांतरित किया, आत्मा का उन्नयन किया। कहानी के कुछ अंश... जब बच्चे स्वस्थ और होशियार होते हैं तो सबके होते हैं, बीमार होते ही सिर्फ माँ के हो जाते हैं... आँखें नम करते हैं। कहानी माँ की ताकत को भी उद्घाटित करती है कि माँ बच्चे के लिए हर हद तक जाकर दुख सह लेती है। प्रगति ने कहानी का संदेश इन पंक्तियों में खूब पिरोया है ...हर विशेष बच्चा एक उद्देश्य से हमारे घर में जन्म लेता है। हमारे कुछ कर्ज उससे जुड़े होते हैं जिन्हें उतारने के लिए ईश्वर ऐसे बच्चों को भेजता है। कहानी में... टेलीफोन के दूसरी ओर वह मुस्करा दिए एवं सम्मान प्राप्त कर वेदिका की तस्वीर में उसके पांव छूना जैसी विसंगतियाँ भी लगी हालांकि कहानी के सुंदर प्रवाह में ये त्रुटियाँ अखरी नहीं। ऐसी भावप्रवण, लोकोपकारी कहानी के लिए प्रगति बधाई की पात्र है।

मन के अज्ञात कोनों में कभी-कभी ऐसा अप्रगट प्रेम पल्लवित होता है जिसकी जड़े पाताल से भी गहरी होती हैं। अनेक बार इसके पात्र बिछुड़ कर बहुत दूर चले जाते हैं। मनुष्य मृगमरीचिका की तरह महत्वाकांक्षाओं के पीछे भागता है। मानस की पंक्तियाँ 'मायामृग के पाछे धावा' यहाँ प्रासंगिक है। मन-हिरन अनेक बार चौकड़ियाँ भरता हुआ कहाँ से कहाँ निकल जाता है पर प्रेम की वह आंच भीतर कहीं राख में ढके कोयले की तरह सुलगती रहती है। वह अपनी गर्लफ्रैंड से तीस वर्ष बाद मिलता है तो उस समय की यादें ताज़ा हो उठती हैं जब तीस वर्ष पूर्व स्कूल से भागकर वे मीठी ख़िरनियों को चुनने जंगल जाते थे। उनकी बातें तब ख़िरनियों से भी मीठी होती थी। तीस वर्ष बाद वे मिलते हैं तो वही मिठास जहन में घुलती है पर तब तक दोनों का परिवार बन चुका होता है। किशोर प्रेम का कच्चापन इस कहानी में न सिर्फ बयाँ हुआ है यही कच्चापन उनके पुनर्मिलन पर उसी रूप में उभर कर आता है। कहानी का यह कच्चापन, भाषा का बचकानापन ही इस कहानी में कच्ची मिट्टी की सुगंध की तरह पाठक के मन को महकाता है। इसे मैं कच्ची कहानी, अच्छी कहानी कहूंगा। कल-कल पानी की तरह बहती संग्रह की इस नोवी कहानी ' खिरनी ' के लिए मनीष वैद्य को बधाई। सच, प्रेम इस जगत की प्रबलतम संवेदना है जो बुझाए न बुझे की तरह एक बार डेरा डाल दे तो इसका उखड़़ना मुश्किल है।

संग्रह की दसवीं कहानी 'क्या रिश्ता था तुमसे मेरा' इंसानियत के ज़ज़्बे से लबरेज़ है। यह कहानी एक महत्वाकांक्षी युवक गुरमीतसिंह की है जिसे विदेश जाने का तो जुनून होता है पर वह वहाँ की तकलीफों से बेखबर होता है। वह डेनमार्क पहुँचता है एवं उसे पत्नी सुखविंदर के निःधन की सूचना मिलती है। उसकी मकान मालकिन बेंटे एवं वहाँ का भारतीय समुदाय न सिर्फ उसके दुःख में शरीक होता है, उसकी भरपूर मदद भी करता है। वह दूसरा विवाह करता है एवं कालांतर में उसका पूरा परिवार वहीं बस जाता है। जीवन के उत्तरार्द्ध में वह मकान मालकिन बेंटे की सेवा करता है एवं भारतीय साहित्य एवं समुदाय को वहाँ प्रोन्नत करता है। कहानी प्रारम्भ में जिस तेजी से चली बाद में घटना प्रधान होकर रह गई तथापि मानवी संवेदना एवं यह अहम तथ्य कि अच्छे मनुष्य हर जगह हैं कहानी में हावी रहा। कहानी के वाक्यांश ...चंद डॉलर जेब में, एक बैग कंधे से लटकाकर, अपनी कच्ची गृहस्थी छोड़कर... एक शाम अपने हमउम्र युवकों के साथ रवाना हुआ.., निर्धन युवकों की उड़़ती महत्वाकांक्षा का सजीव चित्रण है। कहानी यह भी उद्घाटित करती है कि मनुष्य जहाँ एवं जिनके बीच दाना-पानी लिखा हो वहीं पहुँच जाता है।

संग्रह की ग्यारवीं कहानी 'महाकाल' में मधु संधु ने कोरोना महामारी का त्रासद वर्णन करते हुए यह भी बताने का प्रयास किया है कि ऐसे समय में भी मनुष्य की दुष्प्रवृत्तियाँ नहीं मरती। बहू के माता-पिता के मरने की खबर से बहू तो दुखी है पर समधि खुश है कि बेटे को धन मिलेगा। डॉक्टरों, व्यवस्थाओं की लूटमारी का भी ज़िक्र है। कहानी कोरोना काल का लोमहर्षक बयान है पर घटना प्रधान होने से कहीं-कहीं कहानीपन से चूकती है। कथातंतु, प्रवाह एवं सस्पेंस भी कहानी के महत्वपूर्ण अंग हैं।

संग्रह की बारहवीं कहानी ' पिंजरे' मेरी ही कहानी है। इस कहानी को वर्ष 2021 में कथाबिम्ब पत्रिका द्वारा वर्षभर की कहानियों में सर्वश्रेष्ठ कहानी घोषित करते हुए मुझे कमलेश्वर-स्मृति कथा-सम्मान दिया गया था। इस कहानी पर विद्वान समालोचक मुकेशजी दुबे की सम्मति ‘कथारंग’ में सन्नद्ध है।

जब हम अपने देश में होते हैं तो हम कैसे इतराते हुए से रहते हैं। माँ-बाप, मित्र, रिश्तेदार नाज नखरे उठाते हैं, हम उन्हें दरकिनार कर देते हैं। विदेश में कोई भारतीय अथवा हिंदीभाषी वैसे तो दिखता नहीं पर कदाचित दिख जाए तो हम पीछा तक कर उसे पकड़ते हैं, उसके बारे में जानते हैं, उसके साथ कॉफी पीते हैं। इस कॉफी में अनायास उन सब रिश्तों की मिठास घुल जाती है जिन्हें हम छोड़ आए हैं। वंदना मुकेश ने दिलकश अंदाज़ में इस कहानी को पिरोया है। कहानी के प्रारंभ में उसके अकेलेपन को बयाँ करती पंक्तियाँ क्या खूब है... मौसम आज फिर बेहद उदास था, सूरज देवता रजाई में ऐसे दुबके थे...चेहरा सिकुड़ गया। यही उदासी उसके बाहर आकर एक हिंदीभाषी मॉरीशस मूल के आदमी से परिचय प्राप्त कर मिट जाती है। उसके दिखते ही वह उसका पीछा करता है। दोनों की वार्ता के बाद रेचन का सुख दोनों को प्रफुल्लित करता है। अजनबी शहर में किसी एक अपने का मिल जाना किसी महान सुख से कम नहीं होता। वंदना ने इस सुख को बहुत सुंदर शब्दों के तानेबाने पर बुना है... उसे लगा उसका दिल उछल कर हाथ में आ जाएगा। सामने से आता व्यक्ति सांवले रंग का था... आज इतने दिनों में वह पहली बार गुनगुना रहा था। कमरे में घुसकर उसने बत्ती जलाई तो वहाँ रोशनी ही रोशनी हो गई आदि-आदि वाक्यांश कहानी की जान है। कहानी में कथ्य, प्रवाह, सस्पेंस, अंजाम देखते बनता है। ट्विस्ट इन द टेल की तरह कहानी का अंत सुंदर बन पड़ा है।

आज के युग में जहाँ अपने भी स्नेह नहीं देते अरुण अर्णव खरे की कहानी ' चरखारीवाली काकी' एक ऐसी स्त्री की कहानी है जो विवाह के मात्र पाँच दिन बाद विधवा हो गई लेकिन अपने सुंदर, सहयोगी स्वभाव के चलते गांव में सबकी काकी बन जाती है। काम की कीमत है नाम में क्या रखा है? वह हर स्त्री के दुख, बुरे दिनों में न सिर्फ उसकी मदद करती है, ढाढ़स भी बंधाती है। गांव का कोई उत्सव हो चरखारीवाली काकी ने कह दिया मैं हूँ तो वह है... जब तलक मैं हूँ कोनऊ काम की चिंता करबै की जरूरत नाई है जीजी... अपनो से ज्यादा अपनापा था उसमें... जैसे वाक्य किरदार को परवान चढ़ाते हैं। काकी सहानुभूति से आगे समानुभूति में उतरती है... मैं जब इंजीनियरिंग करने इंदौर जा रहा था, अम्मा से ज्यादा दुखी काकी नज़र आ रही थी ...उसके प्रगाढ़ स्नेह को बताते है। विवाह पर विधवा होते हुए भी, तमाम विरोधों के मध्य नायक उसे तिलक करने को कहता है, इतना ही नहीं विवाह के फेरों के बीच उसके निःधन का समाचार मिलने पर नायक फेरे होने के बाद के सभी रिवाज आगे करने की कहकर उठ जाता है। खून के रिश्ते ही रिश्ते नहीं होते, असल रिश्ते वे हैं जो हमें स्नेह से सींचते हैं। ऐसी भावप्रवण कहानियाँ इन दिनों कम देखने को मिलती है।

देह धरण को दंड है सब काहू को होय. .. और यह दण्ड है दुःख जो कुछ लोगों की नियति बन जाता है। कहानी फ्लैशबैक में चलती है जहाँ सुषमा अपने घर के एक-एक सदस्य का अवसान होते हुए देखती है, माँ-बाप, जीजी, जीजा सब। उसका एकमात्र भाई व्यावसायिक असफलता के चलते घर से लापता हो जाता है। सुषमा किसी तरह एक विद्यालय में नौकरी पाती है एवं यहीं प्रिंसिपल आंटी बनकर उसका अवलम्ब बनती है। इसी दरम्यान किसी रेलवे प्लेटफ़ॉर्म पर उसका भाई कुली रूप में मिल जाता है। कथाकार अनुराग शर्मा ने कहानी में गरीबी का लोमहर्षक वर्णन किया है एवं यह भी कि इन सब के मध्य कई परिवार संस्कारों से समझौता नहीं करते। गरीबी के चलते सगे-रिश्तेदार भी विलुप्त हो जाते हैं। कहानी की पंक्तियाँ – “उस भूमिहीन, धनहीन, आरक्षणहीन परिवार के पास संपति के नाम पर पैतृक छ्प्पर के अलावा मात्र उनके संस्कार और शिक्षा ही थे... बीस दिन घर चलता था... बाकी के दस दिनों की पूर्ति पूर्वजों द्वारा गढ़े भांति-भांति के उपवासों द्वारा होती थी” परिवार की भीषण गरीबी को बयाँ करता है। अंत में जब सुषमा को कुली 'मुटल्लो' पुकारता है तब सस्पेंस उजागर होता है। कहानी भोगा हुआ यथार्थ लगती है जिसमें कुछ बातें ट्विस्ट की गई है। बहरहाल एक संवेदनशील कहानी 'मुटल्लो' के लिए अनुराग शर्मा को बधाई।


फिबोनाची शृंखला पर बुनी आरती लोकेश की कहानी 'फिबोनाची प्रेम' एक ऐसा प्रेम त्रिकोण है जहाँ अंततः पृथ्वी सौर मंडल से दूर होकर सूर्य से विलग हो जाती है। दो चचेरी बहनों की इस कहानी में सुनन्दा अपनी बहन रंजिनी के लिए हर त्याग करती है यहाँ तक कि अपने प्रेम का भी। कहानी के अंत होते रंजिनी इसे ताड़ लेती है एवं उसी सिद्धांत जिस पर तीनों अनुसंधान कर रहे होते हैं उनके जीवन में घटित हो जाता है। कहानी में आरती ने प्रेम की ताकत के साथ स्त्री के त्याग का भी बखूबी बयाँ किया है।

“सुख के सब साथी दुख के न कोई”, इस भाव को हंसादीप ने अपनी कहानी 'पेड़' में बहुत सलीके से पिरोया है। चार घरों को छाया देता एक पेड़ तूफान में उखड़ जाता है। पहले सभी इस पेड़ से घर का परिचय देते थे, उनके घर की शोभा, मूल्य भी इस पेड़ से बढ़ोतरी पाती थी। पेड़ छाया देता, संरक्षण भी देता। यही पेड़ जब तूफान में गिर जाता है तो इसको उठवाने की, खर्च की जिम्मेदारी कौन ले? इसी बिम्ब से कथानायक ने अपने पापा को याद किया कि वे जीवन भर चार संतानों के लिए जीते रहे, हर तरह का त्याग किया लेकिन माँ के मरने के बाद चार भाईयों में बँट गए। सभी उनके जाने का इंतजार करते। उनकी मृत्यु कोरोना से होती है एवं वे बिना बच्चों का कन्धा लिए सरकारी ट्रक में जाते हैं। पेड़ को भी चार सरकारी ट्रक कटवा कर ले जाते हैं। इस कहानी की संवेदना एवं शब्दों की बानगी देखते बनती है... हमारी हर जरूरत को हमारे कहने से पहले समझने वाले पापा से क्या यह अंदरूनी बात छिपी होगी... धीरे-धीरे चूल्हे बँटते गए… पापा न उड़ते समय को रोक पाए, न जाते हुए बच्चों को, न ही अपनी ढलती उम्र को... में कहानी का भाव शिखर छू गया है। 

कुल मिलाकर हंसादीप का यह ‘कथारंग’ देशी-विदेशी कहानियों का एक खूबसूरत गुलदस्ता है जिसमें कल्पना एवं अनुभवों के बहुरंगी फूल लगे हैं। इसमें अधिकांश 'बहुत अच्छी' कहानियाँ हैं, कुछ 'अच्छी' एवं कतिपय साधारण भी है। यह कहानियाँ संवेदनाओं का सैलाब हैं, तथा सुंदर भाव से लबरेज हैं एवं पठनीय ही नहीं संग्रहणीय भी है। जितनी मेहनत से हंसा ने कहानियों को चुना है उतने ही परिश्रम एवं एकाग्रता से मुकेशजी ने हर कहानी की समालोचना की है। ऐसी ईमानदार, भावप्रवण समीक्षाएँ बहुत कम देखने में आती हैं। ऐसे भी कम देखने को मिलता है जब कहानी की समीक्षा कहानी जितनी ही रसमय बन जाए। मैं सभी लेखकों एवं मेरी ओर से विद्वानद्वय का आभार प्रगट करता हूँ।
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हरिप्रकाश राठी
जोधपुर
ईमेल: hariprakashrathi@yahoo.co.in

2 comments :

  1. राठी जी आपने कहानियों को पढ़कर बहुत अच्छी सटीक समीक्षा की है। मेरी कहानी पर आपके विचाओं के लिए आभार। मुकेश दुबे जी ने भी संग्रह में हर कहानी पर अपने विस्तृत रूप से अपने विचार रखे है। कुल मिला कर सभी कहानियां अपनी सार्थकता सिद्ध करने में सफल रही हैं। हंसा दीप जी ने अच्छे कहानिकारों की कहानियों को एक संग्रह में जगह देकर पाठकों के लिए सामग्री एक जगह उपलब्ध करवा कर अच्छा काम किया हैं।

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  2. राठी जी आपने सभी कहानियों की बहुत अच्छी सटीक समीक्षा की। मेरी कहानी "उसका आना" पर आपके विचार पढ़ने को मिले बहुत आभार। संग्रह में मुकेश दुबे जी की भी विस्तृत समीक्षा है। सभी कहानियों की अच्छे से आकलन करने की कोशिश की गई हैं। हंसादीप ने अच्छे रचनाकारों को एक संग्रह में लाकर पाठकों के लिए विशेष काम किया है। सभी के लिए बहुत शुभकामनाएं और बधाई।

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