अमरेन्द्र सुमन की तीन कविताएँ

अमरेन्द्र सुमन

अमरेन्द्र सुमन


1. मालकिनें

बाहर से जितनी उदार दिखती हैं वे
दिल और दिमाग से नहीं होतीं उतनी उदार।

आटे में शक्कर की तरह 
जरूर घुले होते हैं उनके शब्द 
असहजता ओढ़े किंतु एक-एक शब्द के 
हुआ करते हैं कई-कई अर्थ। 

एक वामपंथी तानाशाह की तरह 
मालकिनें रखती हैं घरों की निगरानी
जिनकी नजरों से गुजरे बगैर नहीं बढ़ा जा सकता आगे।

जितने हल्के में मालकिनें 
सुझाती हैं मालिकों के लिए छोटे-बड़े काम 
उतनी ही कड़ाई से छिन लेती हैं वे उनका आराम।

मालिकों की तुलना में 
लक्ष्मण रेखा की तरह होते हैं 
मालकिनों के आदेश, उनके एक-एक निर्णय 
जिसको नकार पाना मुश्किल ही नहीं 
नामुमकिन भरा होता है।

यह दीगर बात है
कि मालकिनों के बिना 
महफूज भी नहीं रहता कोई घर 
घर का गणित, मनोविज्ञान और समाज शास्त्र।

हँसने-मुस्कुराने को आतुर 
गमलों की फूल-पत्तियाँ तक।
***

2. औरतें होती हैं जन्मजात मनोवैज्ञानिक

शंका और
संभावनाओं में
वे जीती हैं पूरी उम्र।

पूरे विश्वास में भी ढूंढ़ लेती हैं 
मर्दों की वादाखिलाफी।

वे जानती हैं उनकी जात
दो कौड़ी की उनकी औकात।

वे यह भी जानती हैं 
किन-किन वजहों से मर्द 
होते हैं अक्सर कमजोर और लाचार
रेत के कंधों पर टिकी होती है 
उनके विचारों की बुनियाद।

यह कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं कि 
औरतें होती हैं एक जन्मजात मनोवैज्ञानिक
एक कुशल दार्शनिक।

वे जानती हैं
साड़ी के पल्लू से बाँधे रखना
मर्दों की आदतों की उन्मादी टिक्की।
***


3. एक छोटी सी चूक

(1)
एक छोटी सी चूक
पहाड़ सी चिंता को देती है जन्म।

मिट्टी पलित कर देती है 
वर्षों की साधना।

हिला देती है
मजबूत इरादों की बुनियाद।

एक देगची खीर में
एक कनवाँ किरासन तेल की तरह
छोड़ जाती है अपना दुष्प्रभाव एक छोटी सी चूक।

(2)
दौड़ में अपने से आगे बढ़ते हुए 
नहीं देखने वालों की कोई कमी नहीं 
कोई कमी नहीं पीठ पीछे छुरा घोंपने वालों की।

इस मुहिम में 
अपने-पराये सभी एक जैसे।

फूँक-फूँककर तुम्हें ही चलना होगा मेरे बच्चे ..!
बिना थके तुम्हें ही लगानी होगी लंबी दूरी की दौड़ 
जहाँ खत्म हो जाती है आगे बढ़ने की सारी संभावनाएं उनकी।

अपनी उम्मीदों पर
खरा उतरना होगा तुम्हें ही।

(3)
जीवन में संघर्ष ही
हार पर जीत है

गिरकर
उठना ही
जगत की रीत है।
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संपर्क: मणि विला, प्राइमरी स्कूल के पीछे, केवट पाडा (मोरटंगा रोड), दुमका, झारखंड, भारत

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