लघुकथाओं का खजाना - तमाशबीन बने व्यक्ति और समाज को दिशा देने वाली कृति

समीक्षक: सिद्धेश्वर


पुस्तक: लघुकथाओं का खजाना
द्वितीय संस्करण: 2022
लेखक: योगेंद्रनाथ शुक्ल
प्रकाशक: किताब घर, 24/4855, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-110002
पृष्ठ संख्य:hyaa 184
मूल्य: सजिल्द: ₹280.00



लघुकथा के रचना विधान और इसके तकनीक पर अविरत बहस जारी है। इधर सोशल मीडिया पर लघुकथाओं की तादाद बढ़ती ही जा रही है। वह भले ही "लघु" हों और उनमें "कथा" भी हो, तो भी उन्हें लघुकथा नहीं माना जा सकता ।इसका कारण यह है कि इसकी अपनी एक अलग सृजन प्रक्रिया है ।लघुकथा यदि अपने में व्यक्त यथार्थ का चुभन पाठक को नहीं करा पाती, तो वह श्रेष्ठ नहीं कही जा सकती।

"लघुकथा का खजाना" को पढ़ते समय यह सहज ही अनुमान लग जाता है कि डॉ योगेंद्रनाथ शुक्ल लघुकथा के प्रति कितने सजग और गंभीर हैं। हमारे जीवन में घटने वाली छोटी-छोटी बातों को भी यदि गंभीरता से पकड़ा जाए तो लघुकथा में जान आ जाती है। कृति की लघुकथाएँ इसका प्रमाण हैं। "सफेद गुलाब" छह:,सात पंक्ति की लघुकथा होने के बावजूद, समाज के बदलते सोच को बखूबी दर्शा देती है। पाश्चात्य संस्कृति हमारे देश में अपना अधिकार कितना जमा चुकी है। प्रेम के रिश्तो को कोई भी आजीवन चलाना नहीं चाहता। यह "सफेद गुलाब" इसी का प्रतीक है। एक बड़ा सा बोर्ड लगाकर दुकानदार ने अलग-अलग रंगों के गुलाब के लिए भिन्न-भिन्न स्लोगन दिए थे।प्रेम की गहराई बताने वाले लाल गुलाब। प्रेम में अपनापन जताने के लिए गुलाबी गुलाब। प्रेम पर गर्व करने वाले नारंगी गुलाब तो दुकान में खूब बिके परंतु सफेद गुलाब (जिसे दुकानदार ने प्रेम के रिश्ते को आजीवन चलाने वाला, स्लोगन दिया था) नहीं बिका। आज का युवा पश्चिमी देशों की भांति मांसल प्रेम को ही प्रमुख मान बैठा है। यह एक बहुत बड़ी समस्या के रूप में हमारे समक्ष आ गया है, जिसे हम आज सड़कों और बगीचों में खुलेआम देख रहे हैं।

सिद्धेश्वर
लेखक में शिल्पगत प्रतिभा है, इसीलिए तो इतनी गहरी बात को उसने सफेद फूल के माध्यम से बता कर वह हमें चेतावनी दे रहा है कि यदि इसी तरह सब कुछ चलता रहा, तो हमारी संस्कृति खंडो-खंडो में बिखरती चली जाएगी और हम विश्व में बनी पहचान को खो देंगे। ऐसी अनेक लघुकथाएँ हैं, जो भले ही आकार में छोटी हैं, परंतु गहराई लिए हुए हैं।

कोरोना काल में लिखी गई एक लघुकथा "भूख" है जो जबरदस्त मारक क्षमता रखती है। पाठक के हृदय पर गहरा प्रभाव प्रभाव छोड़ती है। पूरे कोरोना कॉल अपने में समेटे, उस समय की विभीषिका को दर्शाने वाली यह लघुकथा यह बताती है की भूख में व्यक्ति की मनोदशा कैसी हो जाती है, कि वह मरे जानवर का मांस खाने के लिए भी विवश हो जाता है। आदमी की पैरों के पंजों से खून निकल रहा था, वह चार सौ किलोमीटर पैदल चलकर अपने गाँव जा रहा था। शहर का निरीक्षण करने के लिए निकले जिलाधीश महोदय जब उस आदमी को मरे जानवर का मांस खाते हुए देखते हैं, तो उनका शरीर सिहर उठता है। उसकी मदद करते हैं, उसे गाँव भेजने की व्यवस्था करते हैं, उसे खाना देते हैं वह चला जाता है परंतु उस आदमी का चेहरा, उसके आंसू, उसके पैरों से निकलता हुआ खून उनके दिमाग से नहीं हट पाते। इस एक लघुकथा से सारे कोरोना काल को भलीभांति समझा जा सकता है। वह त्रासदी दायक समय इस लघुकथा में सिमट आया है।

देश के सैनिक जब युद्ध में शहीद होते हैं, तो आम जन मानस भी उसकी पीड़ा को भोगता है। "जयकारे" लघुकथा यही तो व्यक्त करती है। जो लेखक इन दिनों बड़ी लघुकथा लिखने पर बल दे रहे हैं, उन्हें इस कृति की आरंभिक "जयकारे"," महापुरुष", "जान" "बोली", "मैन्यू बोर्ड" और "शीर्षक" लघुकथाओं को अवश्य पढ़ना चाहिए। आज देखा जा रहा है कि छोटी और बड़ी लघुकथाओं का विवाद तथाकथित लेखक अनावश्यक रूप से खुद को चर्चा में लाने के लिए कर रहे हैं, जबकि यह लेखक के कौशल पर निर्भर करता है कि वह कम शब्दों में भी श्रेष्ठ प्रभाव उत्पन्न कर सकता है।

डॉ योगेंद्रनाथ शुक्ल जी की यह खासियत है कि वह सिर्फ एक लीक को पकड़कर नहीं चलते, बल्कि विविध विषयों का चुनाव कर बहुत ही आसानी से ऐसी जीवंत लघुकथा का सर्जन कर देते हैं, जिसे पाठक आसानी से भुला नहीं पाता। "उस्ताद", "कन्फेशन", "चूल्हे में गया धर्म", "कैमरा", "युद्ध", "मैंन्यू बोर्ड", जामुन का पेड़ आदि ऐसी अनेक लघुकथाएँ हैं, जिनके बारे में यदि अलग-अलग व्याख्या की जाए तो बड़ा सा ग्रंथ निकल सकता है। समाज के बरअक्स समाज की उथल-पुथल को डॉक्टर शुक्ल ने अपनी कथाओं में उभारा है।उनकी लघुकथाओं में विचार, कथ्य और भाषा का सटीक अनुपात दृष्टिगोचर होता है, जो उन्हें श्रेष्ठता प्रदान करता है। लेखक की लघुकथाएँ कभी पाठकों की कोमल संवेदनाओं को सहलाती हैं ("मातृछाया ","श्रवण कुमार", "चाहत", "जज्बा", "सिरफिरा") कभी वे हमारे भीतर खामोशी से दस्तक देती हैं, तो कभी वे व्यंग्य बाण से समाज के किसी विशिष्ट वर्ग को आहत करती हैं ("बोली", "शीर्षक", "इंडिया", "प्रजातंत्र", "मेंन्यू बोर्ड", "दिवसों का दर्द", "कैमरा", "भड़ास", "दारू") कभी यह पाठकों को संघर्ष करने की प्रेरणा देती हैं ("उस्ताद", "मार्गदर्शक", "सपने", "शिकारी", "जिंदादिली"), कुछ लघुकथाएँ हमें उस दिशा में सोचने पर मजबूर कर देती हैं ("अपनी अपनी नियति", "चॉकलेट-डे", "सफेद गुलाब", "टूटता भ्रम", "ओफ", "जीत-हार") कुछ हमें हमारे देश की मिट्टी से जोड़ने का प्रयास करती हैं ("मजाक", "बदलते नायक", "किताब", "मूर्ति", "बेसहारा", "गिरगिट"," खून सनी दीवारें", "जामुन का पेड़", "भारतीय, "सवाल", "बेनूर भारत माता") कुछ लघुकथाएँ पर्यावरण पर आधारित हैं ("बांझ", "पानी", "कौवे", "अत्याचार", "तब्दीली", "खुदगर्ज", "गाय") युद्ध की विभीषिका संदर्भित भी कुछ प्रभावी लघुकथाएँ हैं ("युद्ध", "परिंदे", "शहीद स्मारक", "हिंदुस्तानी", "पृथ्वी का कलंक") लेखक का किताबों के प्रति जो स्नेह है, वह भी कुछ लघुकथाओं में दिखाई देता है ("किताब", "शो-पीस", "दुर्दिन ","एक नया सुकरात") भूख की विभीषिका को दर्शाने वाली लघुकथाएँ भी इस संग्रह में शामिल हैं ("भूख", "तकदीर", "रोटी")। डॉक्टर शुक्ल की लघु कथाएँ कसी और मझी हुई हैं। ऐसा लगता है कि समाज का शायद ही कोई ऐसा कोना होगा जिसमें लेखक की दृष्टि नहीं गई हो।

इस कृति की भूमिका में लेखक ने लघुकथा से संदर्भित जिन बिंदुओं को उठाया है, वह लघुकथा विधा और इसके लेखकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। हो सकता है कि लघुकथा के तथाकथित मठाधीशो को वह रुचिपूर्ण न लगे, पर उनकी बातें बहुत बेबाक हैं और उपयोगी भी। अपने प्रासंगिक वक्तव्य में डॉक्टर शुक्ल ने कहा है कि लघुकथा भले ही कहानी का छोटा रूप है, किंतु इसका छोटा फलक अपने अंदर कहानी जैसा ही बड़ा फलक छुपाए रखता है।

डॉ शुक्ल जी का विचार है कि लघुकथा में घटना का वह रूप उभर कर सामने आता है, जैसा कहानी या उपन्यास में नहीं उभर पाता। वे लिखते हैं कि लघुकथा में लगा "लघु" विशेषण अपने आप में विलक्षण है, क्योंकि यही लघुकथा को ऊंचाई प्रदान करता है, इसी लघुता में ही प्रभुता छिपी होती है। उन्होंने उदाहरण भी दिए हैं कि जिस तरह मंत्र कितना भी छोटा होता है लेकिन उसका प्रभाव विस्तृत होता है। सूक्ति अत्यंत लघु होती है किंतु वह बहुत विशाल रूप लिए होती है। लेखक कहता है कि लघुकथा, दोहे अथवा उर्दू के शेर की पंक्तियां मुर्दों में जान फूंक देती हैं, जो कई बार बड़े-बड़े महाकाव्य, खंडकाव्य, उपन्यास या कहानी नहीं कर पाते।

अपने प्रासंगिक वक्तव्य के आलेख में डॉ शुक्ल ने लघुकथा संदर्भित जिन सवालों को उठाया है वह लघु कथा की समृद्धि और विकास के लिए जरूरी भी जान पड़ते हैं। उनके कुछ सवाल,जैसे क्या आज का लघुकथाकार सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्व के प्रति सजग है? क्या वह जनजीवन को जागृत करने वाली लघुकथाओं को लिख रहा है? क्या लेखक राष्ट्र निर्माण का लक्ष्य लेकर अपने लघु कथा लिख रहा है? अथवा वह पुरस्कारों या तथाकथित लेखकों को खुश करने के लिए तो नहीं लिख रहा? कहीं लघुकथाकार अति बौद्धिकता का सहारा लेकर आधुनिक कविता की तरह जनमानस से लघुकथा को दूर तो नहीं कर रहा? क्या उसकी लघुकथा में शोध, बोध और क्रोध का उचित मेल हुआ है? ऐसे अनेक सवाल डॉ शुक्ल ने अपने आलेख में उठाए हैं।

सरल शब्दों और सहज शिल्प में गहराई वाली उनकी लघुकथाएँ है। वे साहित्य और समाज की दूरी पाटने, संवेदनशील समाज की स्थापना के लिए वह लेखकों से ऐसी ही लघुकथाएँ चाहते हैं। निसंदेह उनका यह आलेख लघुकथा के संदर्भ में सोच के अनेक दरवाजे खोलता है। मुख्य पृष्ठ का कलेवर भी अच्छा बन पड़ा है। हिंदी, उर्दू तथा अंग्रेजी के ख्यात लेखक जोगिंदर पाल की यह टिप्पणी दृष्टव्य है-"डॉक्टर योगेंद्र नाथ शुक्ल की लघुकथाएँ जन जीवन से जुड़ी है, जिनमें हमारे समाज की सच्ची तस्वीरें खींची गई है। साधारण घटना को भी वह ऐसे ताने बाने से बुनते हैं कि वह आकर्षक बन जाती है ।वह एक दृष्टि में पढ़े जाने वाली नहीं, बल्कि रुक- रुक कर समझने और रसास्वादन लेने वाली है। उनका सहज शिल्प, गहरा चिंतन उनकी लघुकथाओं को ऊंचाई प्रदान करता है।"कुल मिलाकर डॉक्टर शुक्ल की यह कृति तमाशबीन बने व्यक्ति और समाज को एक नई दिशा देगी इसमें कोई संदेह नहीं।
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सिद्धेश्वर
सिद्धेश सदन, किड्स कार्मेल स्कूल के बाएँ, द्वारिकापुरी रोड नंबर 2, पोस्ट:बीएचसी, हनुमान नगर कंकड़बाग पटना 800026,
चलभाष:92347 60365

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