साहित्य का अर्थ एवं स्वरूप

सैयद दाऊद रिज़वी

सैयद दाऊद रिज़वी

शोधार्थी हिंदी विभाग, अँग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद, भारत

 
मानव के जीवन की समवेत अभिव्यक्ति उसके समाज-गठन द्वारा होती है, जिसके निर्माण के पश्चात इसे संचालित और नियंत्रित करने के लिए उसने कुछ नैतिक मूल्यों, नीतियों और नियमों को रचा तथा जिनके आधार पर समाज का उत्थान और विकास हुआ। लेकिन कालांतर में समय के साथ कुछ नीति-नियम परिवर्तित नहीं हुए और वे रूढ़ होते गए। इन्हीं रूढ़ नीति-नियमों के फलस्वरूप समाज और उसकी विभिन्न इकाइयों में कई प्रकार की व्यवस्थाओं और सत्ताओं ने जन्म लिया। इन व्यवस्थाओं ने समाज को व्यवस्थित करने के बजाय उसे खंडित कर दिया। इन व्यवस्थाओं ने समाज में सत्ता और राजनीति की नींव रखी। पहले जहाँ समाज के अस्तित्व की कल्पना मनुष्य के उद्धार और विकास के लिए की जाती थी वहीं अब उसकी कल्पना सत्ता और राजनीति के लिए की जाने लगी। सत्ता और राजनीति के बिना समाज को अधूरा समझा जाने लगा। समय के साथ समाज में अनेक प्रकार की सत्ताओं ने जन्म लिया। इन सत्ताओं में पितृसत्ता, मातृसत्ता, वंशवादी सत्ता, सामंती सत्ता, धर्म सत्ता आदि लक्षित हुए और इन्होंने अपने अस्तित्व और वर्चस्व को स्थापित करने तथा उसे बनाए रखने के लिए समाज में व्याप्त व्यवस्थाओं का सहारा लिया। जैसे धर्म एक ऐसी व्यवस्था थी जिसका संबंध मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन से था लेकिन अब उसी धर्म का प्रयोग मनुष्य ने अपनी सत्ता स्थापित करने के लिए प्रारम्भ कर दिया। मनुष्य ने धर्म को तोड़-मरोड़ कर अपने स्वार्थानुसार उसमें अनेक अंध-विश्वासों, पाखंडों और रीति-रिवाजों को जन्म दिया। राजनैतिक स्वार्थों की पूर्ति करने की प्रवृत्ति ने धर्म में सांप्रदायिकता को अंकुरित किया और सामाजिक धार्मिक हितों वाले धार्मिक समुदाय की यह छद्म चेतना समाज के अभिजन की राजनैतिक आर्थिक प्रतिस्पर्धा की सत्ता प्रेरित अभिव्यक्ति में संचालित हो गई। रचनाकार ने इस घालमेल को समझा तथा साहित्य के पटल पर लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना कर लोगों की विवेकपरक सोच पर बल दिया। साहित्य ने वर्चस्व के प्रत्येक स्वरूप और तंत्र की विवेचना की। उसके प्रतिरोध की परंपरा को स्वर दिया।     

किसी भी भाषा में ऐसे शब्द हालांकि कम होते हैं, जिनका अर्थ निराकार होते हुए भी त्रि-विमीय हो परंतु जब भी ऐसे शब्दों के अर्थ और स्वरूप को स्पष्ट करने का प्रयत्न किया जाता है तो यही अपेक्षा रहती है कि स्वरूप की व्यापकता पूर्ण रूप से मुखर हो। हिन्दी का ‘साहित्य’ शब्द भी इसी प्रकार का है, जिसका अर्थ जितना गहरा है, उतना ही व्यापक भी है। वास्तव में यह अन्य शब्दों की तरह केवल एक शब्द ही नहीं है बल्कि एक ‘विशिष्ट शब्द’ है जो ‘सहित’ का भाववाचक रूप है और व्युत्पत्ति की दृष्टि से जिसका अर्थ है, ‘सहित्यस्य भाव: साहित्य’ अर्थात् सहित होने का भाव। कोशीय आधारों पर देखने से स्पष्ट होता है कि साहित्य के अर्थ का मूल भाव भी लगभग समान है। ‘इन्साईक्लोपीडिया ऑफ वर्ल्ड लिट्रेचर’ के अनुसार, “अनुभव का भाषिक शैली द्वारा सम्प्रेषण साहित्य है।”  ‘डिक्शनरी ऑफ लिटरेरी टर्मज़’ के अनुसार, “साहित्य वह है जो केवल लिखने की होड़ में लिखी गईं कृतियों से ऊपर हो।”  ‘विशाल शब्द सागर’ के अनुसार, “किसी भाषा या देश के उन समस्त ग्रन्थों, लेखों आदि का समूह अथवा सम्मिलित राशि जिसमें स्थायी उच्च और गूढ़ विषयों का सुन्दर रूप से व्यवस्थित विवेचन हुआ हो”  को साहित्य कहेंगे। ‘हिन्दी शब्द सागर’ उन सभी प्रकार के ग्रन्थों को साहित्य बताता है - “जिनमें सार्वजनिक हित सम्बन्धी स्थायी विचार रक्षित रहते हैं।”  और ‘मानक अंग्रेजी हिन्दी कोश’ साहित्य के अन्तर्गत उन कृतियों को लेता है, “जिनका महत्त्व रूप विधानगत सौन्दर्य अथवा प्रभाव से हो।”  कोशों के उक्त अनुशीलन के बाद जो बात स्पष्ट होती है वह यह कि साहित्य अनुभव से जन्म लेता है, विधानगत रूप से सुंदर एवं उदात्तगुण सम्पन्न होता है और हितकारी होता है। किंतु साहित्य केवल यही नहीं होता बल्कि इसके अलावा भी बहुत कुछ साहित्य की परिधि में आता है।

साहित्य जीवन की वास्तविकताओं का ब्यौरा देता है। वह सामाजिकों के दुःख-सुख को इस प्रकार प्रतिपादित करता है कि उसमें नवीन तथ्यों का प्रकटीकरण होता है। भावविहल तथा आन्दोलित करने की शक्ति से परिपूर्ण साहित्य परिवर्तन की ताकत रखता है और इसके लिये जो मूल बनता है, वह है साहित्य को रचने वाले का अनुभव जो उक्त सृजन हेतु कच्चे माल के रूप में कार्य करता है। एक रचयिता द्वारा अनुभव को कच्चा माल केवल साहित्य-रचना के विचार से नहीं बनाया जाता बल्कि वह उस (अनुभव) से सम्पूर्णता के साथ गुज़रने के लिये रचना रूप में उसे संरक्षित भी करता है। “साहित्य व्यक्ति द्वारा अपने सामाजिक अनुभवों को समझने के लिये की गई कोशिश है, अत:, यह पहले किसी विशेष अनुभव में से गुजरता है फिर पूर्णत: संतुलित समग्र सामाजिक परिदृश्य को उजागर कर देता है।”

साहित्य का रचयिता वर्ग सामान्य प्राणी से अधिक संवेदनशील, ग्रहणशील, चिंतनशील और एक विशेष पैनी दृष्टि वाला होता है। समाज में रहते हुए जब वह विभिन्न प्रकार की घटनाओं, स्थितियों और परिवेश से गुजरता है तो उनसे अछूता नहीं रहता बल्कि गहन रूप से प्रभावित होता है। इसी प्रभाव से साहित्यकार का रचना-संसार जन्म लेता है। वह अपने अनुभवों की पड़ताल करते हुये कुछ विचारों तक पहुँचता है पर केवल विचारों की अभिव्यक्ति से ही सृजनधर्म पूरा नहीं हो जाता, अर्थात् सभी प्रकार के अभिव्यक्त विचार साहित्य नहीं हैं। यह, “वह रचना है जिसमें कोई सच्चाई प्रकट की गई हो, जिसकी भाषा प्रौढ़, परिमार्जित एवं सुन्दर हो और जिसमें दिल और दिमाग पर असर डालने का गुण हो।”  अनुभव, विचार और अभिव्यक्ति साहित्य के मुख्य आयाम होते हैं। इन आयामों से ही साहित्य के आगे अनेक उप-आयाम निकलते हैं।

साहित्य शब्द की एक अन्य विशेषता है कि वह युग और परिवेशानुसार अपना अर्थ विस्तार करता रहा है। इसीलिये महावीर प्रसाद द्विवेदी, “ज्ञान-राशि के संचित कोश को ही साहित्य कहते हैं”  महादेवी वर्मा के विचार से, “साहित्य मनुष्य की शक्ति-दुर्बलता, जय-पराजय, हास-अश्रु और जीवन-मृत्यु की कथा है।”  रामविलास शर्मा मानते हैं कि “साहित्य जनता की वाणी है। उसके जातीय चरित्र का दर्पण है। प्रगति-पथ में बढ़ने के लिए उसका मनोबल है। उसकी सौन्दर्य की चाह पूरा करने वाला साधन है।”  यानी साहित्य के विषय में एक बात सहजता से स्वीकृत है कि समाज से परे साहित्य का कोई अस्तित्व नहीं है। पश्चिमी साहित्यकारों में अंग्रेजी विद्वान वर्सफील्ड का मत है कि “Literature is the brain of humanity.” (साहित्य मानव समाज का मस्तिष्क है)”  कॉलरिज इसके अन्य गुणों के साथ-साथ शैली पक्ष भर भी विशेष बल देते हुए कहते हैं कि “सर्वोत्तम शब्दों का सर्वोत्तम क्रम ही साहित्य है”  अंग्रेजी चिंतक फोर्ड मैडॉक्स फोर्ड लिखते हैं, "सृजनात्मक, कल्पनाशील या काव्यात्मक कृत्य के लिये हम साहित्य शब्द का प्रयोग करते हैं, साहित्य का गुण, संक्षेप में मानवता का गुण है, यह गुण है जो व्यक्ति और व्यक्तियों के बीच, मानव हृदय के रहस्य और हमारे उतार-चढ़ावों की कहानी सम्प्रेषित करता है।"  वास्तव में, “सामाजिक जीवन की सरंचना स्वंय में बहुत संश्लिष्ट है, जिसमें हमारे अनुभवों और विचारों को प्रभावित करने वाले ज्ञान-विज्ञान के सूत्र परस्पर अनुस्यूत हैं। साहित्य इस संश्लिष्ट सामाजिक जीवन की सर्वाधिक सक्षम कलात्मक अभिव्यक्ति है।"

अत: उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर निष्कर्षत: कहा जा सकता कि है, ‘साहित्य जीवन की आलोचना है।’ एक ऐसी कलात्मक अभिव्यक्ति है जो उदात्तगुण सम्पन्न और सर्वहितकारी होती है तथा जिसमें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आशिक या पूर्णत: वैचारिक अथवा व्यवहारिक परिवर्तन की क्षमता होती है। 
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संदर्भ:

1.  इन्साईक्लोपीडिया ऑफ वर्ल्ड लिट्रेचर, न्यूयार्क, फ्रेड्रिक अंगर पब्लिशिंग कं०, 1973, पृ. 276 
2.  डिक्शनरी ऑफ लिट्रेरी टम्ज, दिल्ली, इण्डियन बुक कं०, 1973, पृ० 359 
3.  विशाल शब्द सागर, दिल्ली, न्यू इम्पीरियल बुक डिपू, 1966, पृ. 1440 
4.  हिन्दी शब्द सागर, वाराणसी, नागरी मुद्रण, 1973, पृ० 5093 
5.  मानक अंग्रेजी हिन्दी कोश, प्रयाग, सम्मेलन मुद्राणलय, 1971, पृ० 803 
6.  Literature is an attempt made by men to understand their social experience, it is thus more of a victim to that particular experience than illumininating a fully balanced account of the complete social scene.
जॉन हाल, द' सोशॉलोजी ऑफ लिट्रेचर, न्यूयार्क, लांगमैन इंक०, 1979, पृ० 36 
 7. प्रेमचन्द, साहित्य का उद्देश्य, इलाहाबाद, हंस प्रकाशन, 1954, पृ. 2 
8.  नामदेव उतकर 'नादेड़ी', आठवे दशक की हिन्दी कविता में समाज बोध, पृ० ॥
9.  उद्धृत, श्यामसुन्दर, मधु वर्मा, बृहत् सूक्तिकोश, पृ. 1246 
10.  रामविलास शर्मा, विराम चिन्ह, पृ. 141 वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, द्वितीय संस्करण 2002
11.  Hukum SinghLiterary Essays, p.12, 1962
12. नामदेव उतकर 'नादेड़ी', आठवें दशक की हिन्दी कविता में समाज बोध, पृ० ॥ 
13.  It is therefore in the sense of creative, imaginative or poetic work that we shall henceforth employ the word literature, the quality of literature, in short, is the quality of humanity. It is quality that communicates between man and men, the secret of human hearts and the story of our vicissitudes. 
फोर्ड मैडॉक्स फोर्ड, मार्च ऑफ लिट्रेचर, लंदन, जॉर्ज रेलन एण्ड अनविन लिमि०, 1947, पृ. 15 
14.  समकालीन कविता : संप्रेषण: विचार: आत्मकथ्य - वीरेंद्र सिंह, पृ 143  


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