कवय: किं न पश्यन्ति: ‘ऋतम्भरा के सौ द्वीप’

(अमरत्व के निर्वाण का विलुप्त आख्यान)

समीक्षित पुस्तक: ऋतम्भरा के सौ द्वीप (उपन्यास)
लेखक: आरती लोकेश
प्रकाशक: नोशन प्रेस चेन्नई
संस्करण वर्ष: 2022 ई.
मूल्य: ₹ 325.00
पृष्ठ संख्या: 207

समीक्षक- अरुण कुमार निषाद


संस्कृत की एक सूक्ति है कि-‘कवयः किं न पश्यन्ति’ अर्थात् ' जहाँ न जाय रवि, वहाँ जाय कवि ।" यह बात डॉ. आरती लोकेश पर यथार्ह (फिट) बैठती है । सद्य प्रकाशित उनका उपन्यास ‘ऋतम्भरा के सौ द्वीप’ पढ़ने को मिला। इस उपन्यास लेखिका में प्रेम, रहस्य, टूटते-बिखरते परिवार, एकल माता-पिता, दैवीय शक्तियाँ का चमत्कार, अंधविश्वास, प्राकृतिक चिकित्सा, भ्रष्टाचार,तस्करी, भ्रूणहत्या आदिवासी विमर्श, छात्र राजनीति आदि को समेटने का प्रयास किया है और उसमें वे पूर्ण रूप से सफल भी हुई हैं।

आरती गोयल लोकेश
इस उपन्यास की नायिका ऋतम्भरा है (लोहिताक्ष इसके पति का नाम है, दीत्यांगना इसी की पुत्री है। दीत्यांगना की सौतेली मान का नाम मृणालिनी तथा सौतेली बहन का नाम ऋतुपर्णा है। ऋतम्भरा की भी एक सौतेली बहन है जिसका नाम त्रिशांगदा है)। जो सद्द्वीप की राजकुमारी है। भारत के गुजरात राज्य के तटवर्ती सीमा से लगभग 750 किलोमीटर दूर अरब सागर के मध्य सौ छोटे-बड़े द्वीपों के समूह को शद्द्वीप कहा जाता था। यह द्वीप रत्नों की खान के लिए प्रसिद्ध था। ऋतम्भरा की माँ का नाम शहजादी (अनश्वरा) है।

गोमंतिक कर्मा एक प्रजा पालक राजा था उसने,‘धराभारहर्त्रे कंसहर्त्रे’ मन्दिर कार जीर्णोद्धार तथा पुनर्निर्माण कराया। (यहाँ पुस्तक में पुनर्निर्माण की जगह पुननिर्माण लिखा हुआ है) ‘अलनुज़ुम मस्जिद का निर्माण कराया गिरजाघर का भी निर्माण कराया, पृष्ठ 5-6।

अरुण कुमार निषाद
इस उपन्यास में भुखमरी का भी वर्णन है। अंग्रेजों को शायद इस द्वीपसमूह का तथा इस पर भारतीयों के निवास का पता भी न चला होता अगर भुखमरी के चलते शतदीप के इन प्रवासियों ने समुद्री जहाजों को लूटने का काम न किया होता, पृष्ठ 5।

गोमन्तिक कर्मा के बाद उसका पुत्र विश्वकर्मा राजा हुआ। वह एक अहंकारी तथा निरंकुश राजा था। वह इतना निरंकुश शासक था कि जो भी उसके विरुद्ध विद्रोह करता था उसे वह मौत के घाट उतार देता था। भले ही वह उसका सगा क्यों न हो। उसने अपने पिता,चाचा, भाई, चचेरे भाई पत्नी (हैफ्सी) तक को मौत के घाट उतार दिया। जब राजा आलसी घमंडी और अहंकारी हो जाता है तो राज्य में भुखमरी की स्थिति आ जाती है। ऐसी स्थिति में पेट भरने के लिए लोग तरह-तरह के असामाजिक कार्य करते हैं। देहव्यापार (वेश्यावृत्ति) ऐसी स्थिति में ही उत्पन्न होता है। शहजादी के साथ विश्वकर्मा का समागम ऐसी ही परिस्थिति का परिणाम था।

ऐसी ही निरंकुशता का वर्णन महाकवि बाणभट्ट ने ‘कादम्बरी’ (शुकनासोपदेश) में तथा महाकवि दण्डी ने ‘दशकुमारचरितम्’ में (वृद्ध मंत्री वसुरक्षित द्वारा राजा अनन्तवर्मा को उपदेश देना और अनन्तवर्मा द्वारा वसुरक्षित का अपमान तथा धूर्त विहारभद्र को अधिक महत्त्व देना) किया है।

‘अपरिणामोपशमो दारुणो लक्ष्मीमद:।’ अर्थात् लक्ष्मी जनित मद ऐसा दारुण होता है कि वृद्धावस्था में भी शान्त नहीं होता। (शुकनासोपदेश)

‘...उस अर्धपरिपक्व उत्तम देवगन की पिपासा ने विचलित कर दिया …।’ पृष्ठ 9

उस रात विश्वकर्मा किसी रानी के पास न गए। शहजादी के कच्चे कचनार तारुण्य के मखमली बिछौने को रौंदकर वासना को शांत किया। एक रात में अधिखिली कली की कान्ति पदतले मुरझाए फूल सी सिकुड़ गई और उसकी कोमल देह सूजकर नारियल सी कठोर हो गई। विश्वकर्मा ने घाट-घाट का पानी पिया था। किन्तु तृष्णा और तृप्ति की ऐसी अनुभूति उसे पहले कभी न हुई थी…..।’पृष्ठ 9

कामवासना व्यक्ति को पतित से पतिततम बना देती है। कामवासना के वशीभूत वह अपनी सन्तान को भी नहीं पहचानता। विश्वकर्मा अपनी पुत्री त्रिशांगदा पर भी कुदृष्टि रखने लगा था, पृष्ठ 19।

विश्वकर्मा ऋतम्भरा को भी त्रिशांगदा की मदद करने के जुर्म में कैद करवा देता है, पृष्ठ 22। वह त्रिशांगदा के नाना नानी को भी मौत के घाट उतार देता है, पृष्ठ 24। त्रिशांगदा ने ऋतम्भरा को ढूंढने की जिम्मेदारी ब्रिटेन की एक जासूसी एजेंसी के दो जासूसों जिबरॉल्ड और नोर्बर्ट को दिया। ऋतम्भरा को गौमुखी किले में नजरबंद किया गया था। कोलियाक के पास ऋतम्भरा पर हमला शद्द्वीप जलसेना द्वारा ही किया गया था, पृष्ठ 127। ॠतम्भरा के पलायन में शहजादी की भूमिका को असंदिग्ध मानकर उसका शीश धड़ से अलग करवा दिया जाता है, पृष्ठ 127।

उसकी (विश्वकर्मा की) चार रानियाँ थीं - 1.यशंवदा, 2.कात्यायनी, 3.हैफ्सी (यह एरिथ्रिया की निवासी थी जहाँ पर वह पर्यटन विशेषज्ञ थी, वहीं उसे विश्वकर्मा से प्रेम हो जाता है और वह उससे प्रेम विवाह कर लेती है। यहाँ निदा फ़ाज़ली साहब का एक शेर याद आता है कि- “होश वालों को खबर क्या जिन्दगी क्या चीज है/इश्क कीजे फिर समझिए जिन्दगी क्या चीज है।” हैफ्सी की पुत्री का नाम त्रिशांगदा था।) और 4.शहजादी (वास्तविक नाम अनश्वरा, यह निष्कलुष मन्दिर के पुजारी की बेटी और राजपुरोहित अनिर्वाण मिहिर की भतीजी थी)।

‘निर्जल सरसिज’ उपन्यास की दीत्यांगना का जन्म ‘ऋतम्भरा के सौ द्वीप’ उपन्यास के द्वितीय अध्याय में होता है। दीत्यांगना लोकिताक्ष और ऋतम्भरा की पुत्री थी, पृष्ठ 41। दीत्यांगना मेडिकल के क्षेत्र के साथ-ही साथ साहित्यिक गतिविधियों में भी रुचि लेती थी। ‘कलारविंद’ नाट्य संस्था के किए वह नाटक लिखती है। उस नाटक में अभिनय भी करती है। नाट्य संस्था के निदेशक कुशाग्रकान्त के सहयोग से उसका इलाज चंडीगढ़ में होता है।

लेखिका की मेडिकल में रुचि भी इस उपन्यास के माध्यम से पता चलती है। स्त्री रोगों का जितने गहराई से वर्णन लेखिका ने किया है वह बिना अध्ययन के संभव नहीं है। पृष्ठ 76, कीमो जैसे चिकित्सा विज्ञान के शब्द उनके वृहद् ज्ञान का ही परिणाम है। पृष्ठ 103

ऋग्वेद मन्त्र और मनुस्मृति के श्लोक भी कहीं-कहीं उद्धृत किये गए हैं। पृष्ठ 36

प्रथम प्रणय का वर्णन लेखिका ने बहुत खूबसूरती के साथ किया है। ‘... उन्होंने ऋतम्भरा का हाथ पकड़ लिया। एक तरंग ने ऋतम्भरा के हाथ से प्रवेश कर उसके तन में कंपन भर दिया। इस आंदोलन से हृदय के आडोलन तीव्र हुए और नेत्रों में लाल रेशमी रेखाएँ बन आईं। वह चाहकर भी हाथ छुड़ाने का कोई उपक्रम न कर पाई और न चाहकर भी समीप खिंच आई…।” पृष्ठ 54

उपन्यास में रोचकता लाने के लिए लेखिका ने नोर्बर्ट और ऋतम्भरा दैहिक मिलन करवा दिया है। उनके तन में .....उसे आगोश में भर लिया ....नोर्बर्ट की आँखों में खुमारी चढ़ने लगी ...।पृष्ठ 119

नारी मनोविज्ञान और पुरुष मनोविज्ञान का बहुत ही मनोहारी चित्रण इस उपन्यास में हुआ है। आदिवादी संस्कृति का अत्यन्त विस्तृत वर्णन इस उपन्यास में देखने को मिलता है। आदिवासियों के खानपान, रहन-सहन आदि पर काफी अच्छी जानकारी इस उपन्यास से मिल सकती है।

उपन्यास का ‘रेकी’ शब्द उत्तर भारत के ‘झाड़फूंक’ (ओझाई-सोखाई) से काफी मिलता जुलता है। संस्कृत साहित्य के सुप्रसिद्ध लेखक डॉ. प्रवीण पण्ड्या के रूपक ‘उज्जयिनीवीरम्’ में धरम नामक पात्र भी ‘उज्जयिनीवीर’ का आवाहन करता है।

लेखिका का भौगोलिक ज्ञान भी काबिले तारीफ़ है। जो इस उपन्यास में की स्थान-स्थान पर परिलक्षित होता है।
क्रिम्स्ट्री नोर्बर्ट की पत्नी थी जो उसी की तरह एक जासूस थी। क्रिम्स्ट्री को नोर्बर्ट का ऋतम्भरा से मिलना-जुलना पसंद नहीं था। उसे संदेह था कि ऋतम्भरा उसके पति पर अधिकार जमाना चाहती है। कोई भी स्त्री होगी वह एक महिला-पुरुष की मित्रता पर ऐसे ही सोचेगी।

अस्पताल द्वारा बच्चों के चोरी की घटना का भी जिक्र हुआ है, पृष्ठ 87। सोवियत संघ के ‘नोवोमेचेव यूनिवर्सिटी’ का भी जिक्र हुआ है। जो मेडिकल की पढाई के लिए प्रसिद्ध था। कीमती लकड़ी और रेत की तस्करी का वर्णन भी मिलता है, पृष्ठ 113। मछुआरों की दीन हीन दशा का भी वर्णन है, पृष्ठ 128। पंजाबी त्यौहार लोहड़ी की झलक भी देखने को मिलती है, पृष्ठ 130-131। प्रवासी मजदूरों के वीजा में दलालों की भूमिका पर भी सवाल उठाया गया है, पृष्ठ 149। प्रवासी मजदूरों की आर्थिक स्थिति भी देखने को मिलती है, लाश तक लेने के लिए उनके परिवार के पास पैसे नहीं होते पृष्ठ 152। अवैध सम्बन्ध से पैदा हुए शिशुओं की स्थिति को भी लेखिका ने दिखाया है, पृष्ठ 172।
पुरोहित अनिर्वाण मिहिर के पास ऐसी बहुत सारी सामग्री सुरक्षित थी जो ऋतम्भरा के खोज में सहायक सिद्ध हुई। पृष्ठ 125

चूँकि हैफ्सी के माता पिता इटली के थे इसलिए हैफ्सी को वहाँ की भाषा ‘तिग्रिन्या’ उसे आती थी। उसने यह भाषा अपनी पुत्री त्रिशांगदा को और त्रिशांगदा ने इसको ऋतम्भरा को थोड़ी-थोड़ी सिखा दिया था। अपने कैद होने पर त्रिशांगदा ने ऋतम्भरा को इसी भाषा में पत्र लिखा था।

इस उपन्यास में प्रूफ्ररीडिंग की कमी दिखती है। पुस्तक प्रकाशन से पहले लेखिका को इस पर ध्यान देना चाहिए था। यथा-पृष्ठ 40,42, 48,100, 102,108, 110,160,162,168,170 एकदम खाली है। कहीं-कहीं टंकण सम्बन्धी त्रुटियाँ भी नजर आती हैं। अत: की जगह कई स्थानों पर अंत: शब्द देखने को मिलता है। यथा-पृष्ठ 121,125 । टापू की जगह टापु लिखा है। पृष्ठ 185

\विश्वविद्यालयी वातावरण का जीता जगाता उदाहरण भी देखने को मिलता है। प्राकृतिक आपदा हो या सामाजिक, राजनीतिक घटाटोप हो या आर्थिक, सबसे अधिक और दीर्घकालीन प्रभाव शिक्षा व्यवस्था पर ही पड़ता है। पृष्ठ 63

कहीं-कहीं भावानुसार सुन्दर सूक्तियों का प्रयोग भी देखने को मिलता है। इत्र, मित्र और चरित्र अधिक देर तक मूक नहीं रह पाते,पृष्ठ 18। असमय मिली सम्पन्नता तथा कुपात्र को सहज लब्ध वैभव, मनुष्य को दुराचारी बना देता है, पृष्ठ 20। हिमाशिलाएँ सिन्धु में कितनी भी गहरी हों, उनका शीर्ष पानी से बाहर आ ही जाता है, पृष्ठ 22। श्रद्धा और विश्वास से बड़ी कोई ताकत नहीं होती, पृष्ठ 71। मानव को मानव बनाने के लिए अपने देवत्व को बढ़ाना पड़ता है, पृष्ठ 52। मनुष्य समय को नियोजित करता है जबकि समय सबसे बड़ा नियोजक है, पृष्ठ 61। कृतज्ञता के भाव पढ़ने के लिए भाषा नहीं, उधार हृदय साधन बनता है, पृष्ठ 89। समय से पहले और भाग्य से आगे कोई नहीं निकल सकता, पृष्ठ 91।

इस उपन्यास के विश्लेषण से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि डॉ. आरती लोकेश साहित्यिक जानकारी के साथ-ही-साथ देश -दुनिया के बारे में काफी गहरी जानकारी रखती हैं। उनका सामान्य ज्ञान गजब का है। उन्हें साहित्य, दर्शन, चिकित्सा विज्ञान इत्यादि का सम्यक ज्ञान है। वे स्वयं में एक इनसाइक्लोपीडिया हैं।

उपन्यास का अन्त भारतीय परम्परा के अनुसार सुखद हुआ है । दीत्यांगना बस अपनी माँ ॠतम्भरा और मौसी त्रिशांगदा मिल जाती है। नोर्बर्ट और उसकी पत्नी क्रिम्स्ट्री का पुर्मिलन हो जाता है। ॠतम्भरा अपने पति लोहिताक्ष से मिल जाती है।

डॉ. आरती लोकेश कृत इस उपन्यास को पढ़ने के पश्चात् उनके अन्य उपन्यास पढ़ने की तीव्र उत्कण्ठा मन में जागृत होती है । ‘ऋतम्भरा के सौ द्वीप’ और ‘निर्जल सरसिज’ उपन्यास एक दूसरे के पूरक हैं ‘ऋतम्भरा के सौ द्वीप’ उपन्यास ‘निर्जल सरसिज’ उपन्यास के पढ़े बिना अधूरा है।पाठकों को असली आनन्द तभी आएगा जब वे दोनों उपन्यास पढेंगे। आप इसी प्रकार अपनी कृतियों से हिन्दी साहित्य को समृद्ध करती रहें।
इति शुभम्।

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