कविता: माँ

शिवालिका अग्रवाल
आज मैं वो बताऊंगी जो मेरी आप बीती है 
मेरे घर में जो रहती है वो हमको देख जीती है 
थी बस बीस की ही वो जब उसने बेटी जाई थी 
न उम्र से न अकल से वो ये समझ पायी थी 

बेटी हाथ में ली जब वो मोती आँख से निकला 
वो दुःख दर्द वो बालपन ये परी देख सब भूला
बड़े नाज़ों से लाड़ों से नन्ही जान को पाला 
जो दूजी लक्ष्मी आयी तो सभी ने फिर से कह टाला 

वो माँ ही थी अकेले जिसने सबसे दूर था रखा
न बेटे बेटी का ये घाव हमने था कभी चखा 
जो फिर मैं भी आयी तो सारा गाँव रोया था 
कलंक नाम माँ का और बेटी तीन ढोया था 

जान हम तीनों में बसाये उसने ज़ख्म झेला था 
यह दुनिया बेटे को चाहे यहाँ हर घर ही मैला था 
क्या कोई बेटा ऐसा हो सकेगा धरती पर ओ माँ 
के जिसको बेटियों ने तेरी पीछे छोड़ा होगा न

तुझे जो तीर काटे था हाँ उसको हमने तोड़ा है 
सिर्फ तू ही है वो जिसने सारा कुनबा जोड़ा था 
न तू ये सोच के तू आम है ये बात झूठी है
हमारी आस पूरी करने तू तारे सी टूटी है 

जो कोई पूछ लेता है कि मेरी माँ कैसी है 
तो कह देती हूँ हर माँ की ही तरह प्यार जैसी है 

कभी देखा है तुमने देवी धरती पर भी आती है
मेरी जो माँ है उनसे यहाँ पर भी जीत जाती है 
माँ तो माँ है सब की ही माँ तो ख़ास होती है 
पर क्या मेरे जैसी माँ ही सबके पास होती है

जो रो लूँ तो वो रोती है जो हँस लूँ तो वो हँसती है 
सबके बाद सोती है सबसे पहले जगती है 

क्या हम बोलें क्या लिखें क्या पहने क्या सोचें 
ये तेरी चाह थी कि हम अपनी अहमियत न भूलें 

हमे पिंजरे को तोड़कर उड़ना है न रुकना है 
जो रोके टोके उसको भूलकर आगे ही बढ़ना है 
न कोई था न कोई है जो साँसों से समझ लेगा 
हमारी आह के पीछे जो कारण है वो पढ़ लेगा 

तेरा हर बात पर हाँ-हाँ ही कहकर मुस्कुरा देना 
वो सारे शौक और आराम हसकर ठुकरादेना 
कहूँ जितना भी तेरे आगे माँ हर लफ्ज़ छोटा है 
तूने आग में जलकर हमे सोने सा सींचा है 

ये मौके आज आये हैं जो हम भी कह सके ये सब 
के तेरी आँखों के नीचे के घेरे मुस्कुराये अब 

मेरी पहचान क्या है माँ की मैं परछाई जैसी हूँ 
क्या-क्या बताऊँ तुमको मैं मेरी माँ सी कैसी हूँ 
मेरी साँसों से भी ज्यादा वो मेरा साथ देती है 
कोई छींटा हो दुःख का साफ़ वो आँचल से करती है 

मैं कहती जाऊंगी पर लफ्ज़ मेरे ख़त्म न होंगे 
हम माँ के जैसे हैं किसी के भी भक्त न होंगे I
***

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, रुड़की, उत्तराखण्ड के मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान विभाग में अंग्रेजी साहित्य में शोधरत शिवालिका ने अंग्रेजी साहित्य में ही स्नातक दिल्ली विश्वविद्यालय एवं परस्नातक इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से किया है। 
ईमेल – s_agarwal@hs.iitr.ac.in
ट्विटर - @ShivalikaAgarw2
इन्स्टाग्राम – @shivalikaagarwal


No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।