स्वराज और हिन्दी

डॉ. अंगदकुमार सिंह

अंगदकुमार सिंह

असिस्टेण्ट प्रोफ़सर (हिन्दी), जवाहरलाल नेहरू पी.जी. कॉलेज, बाँसगाँव, गोरखपुर (उ.प्र.), भारत - 273403

शोधपत्र  सार:
‘स्वराज’ शब्द का प्रयोग स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान ख़ूब प्रचलन में आया जिसका प्रथम प्रयोग स्वामी दयानन्द सरस्वती ने किया था। भारत को स्वतन्त्रता 1947 में मिल गयी पर भाषा के स्तर पर अभी भी हम पिछड़े हुए नज़र आते हैं। भाषा किसी देश की संस्कृति को ख़त्म न होने देने वाले कोष के समान है। हिन्दी ने भारतीय धरती के रूप-रंग, रस-गन्ध आदि का समय-समय पर एहसास कराया तो अवसादग्रस्त मन को विशिष्ट ऊर्जा भी प्रदान की। इतना ही नहीं द्वन्द्व और संशय की स्थिति आने पर इसने संघर्षशील रहने और सृजन करने की प्रेरणा दी। आज स्वराज है फिर भी हिन्दी को जो स्थान मिलना चाहिए वह नहीं मिल पा रहा है। बरहाल अंग्रेजों से जूझते, संघर्ष करते ये अख़बार दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और मासिक बनकर प्रकाशित होते तथा इनके माध्यम से हिन्दी स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी बनी। हिन्दी-पत्रकारिता की प्रसवभूमि बंगाल रही तथा हिन्दी के टाइप का निर्माण प्रथमतः बंगाल के श्रीरामपुर ज़िले में पंचानन कर्मकार द्वारा किया गया और हिन्दी का प्रथम पत्र ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ 30 मई, 1826 ई. को श्री जुगल किशोर शुक्ल के सम्पादन में ही यहीं से प्रकाशित हुआ। हिन्दी आज़ाद हिन्द फ़ौज की भाषा थी तो सन्तों की भी, अंग्रेज़ों से लड़ने की भाषा थी तो स्वतन्त्रता संग्राम और राष्ट्रीयता की भी, स्वदेशी की भाषा थी तो स्वराज्य स्थापन की भी।

की वर्ड:
स्वराज, हिन्दीभाषा, संस्कृति, ग़ुलामी, राष्ट्रीय चेतना।

साहित्य-समीक्षा:
‘स्वराज’ शब्द का प्रयोग स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान प्रचलन में आया जो स्वाधीनता और आत्म-निर्णय लेने की क्षमता विकसित करता है। इसका सर्वप्रथम प्रयोग स्वामी दयानन्द सरस्वती ने किया तो 1916 में बालगंगाधर टिळक ने। उन्होंने होमरूल लीग स्थापना के साथ ही यह भी कहा कि, ‘‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।’’ आगे चलकर 1920 में महात्मा गांधी ने अपने विचार रखते हुए स्पष्ट किया कि, ‘‘मेरा स्वराज भारत के लिए संसदीय शासन की माँग करता है, जो वयस्क मताधिकार पर आधारित होगा।’’ दूसरे शब्दों में गांधी जी के मतानुसार ‘‘स्वराज का अर्थ जनप्रतिनिधियों द्वारा संचालित ऐसी व्यवस्था जो जन-आवश्यकताओं और जन-आकांक्षाओं के अनुरूप हो।’’ महात्मा गांधी का यह सपना 15 अगस्त, 1947 को पूरा हुआ और जनप्रतिनिधियों द्वारा संचालित व्यवस्था लागू हुई।

भारत को स्वतन्त्रता 1947 में मिल गयी पर भाषा के स्तर पर अभी भी हम पिछड़े हुए दिखते हैं। हमलोग यह भूल जाते हैं कि भाषा ही है जो किसी भटके हुए के लिए  अन्धेरे में प्रकाश का काम करती है तो व्यक्ति और समाज के मध्य सरस एवं सजीव संवाद बनाने का भी, साथ ही परम्परा को आधुनिकता से मिलाने का भी। भाषा किसी देश की संस्कृति को ख़त्म न होने देने वाले कोष के समान है। हिन्दी ने इस देश की भाषा-सम्बन्धी सभी गुणों को आत्मसात् किया तो भारतीय परम्परा, संस्कृति एवं विचार की धरोहर को अपने भीतर संजोया भी तथा अक्षुण्ण बनाने का अभियत्न किया और स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान ग़ुलामी और अन्धकार, हताशा और दुःख से लड़ने का औजार भी बनी। हिन्दी ने भारतीय धरती के रूप-रंग, रस-गन्ध आदि का समय-समय पर एहसास कराया तो अवसादग्रस्त मन को विशिष्ट ऊर्जा भी प्रदान की। इतना ही नहीं द्वन्द्व और संशय की स्थिति आने पर इसने संघर्षशील रहने और सृजन करने की प्रेरणा दी।

स्वराज प्राप्ति और अंग्रेज़ी शासन की ख़िलाफ़त करने के लिए देश के नायकों ने विचार-मन्थन के पश्चात यह तँय किया कि सबसे पहले एक सामान्य भाषा का विकास और विस्तार किया जाय जिसके द्वारा सम्पूर्ण देश के लोगों को जोड़ा जा सके। सभी नायकों का ध्यान लोगों की सर्वमान्य भाषा हिन्दी की ओर गया। राजा राममोहन रॉय ने हिन्दीभाषा पर अपने विचार स्पष्ट करते हुए कहा है कि, ‘‘इस समग्र देश की एकता के लिए हिन्दी अनिवार्य है’’1 तो जस्टिस केशवचन्द्र सेन ने ‘सुलभ समाचार’ (1973) में लिखा कि, ‘‘उपाय यही है कि भारत में एक ही भाषा का व्यवहार हो। इस समय जितनी भाषाएँ भारत में प्रचलित हैं उनमें हिन्दीभाषा सारी जगह प्रचलित है। इस हिन्दीभाषा को अगर भारतवर्ष की एकमात्र भाषा बनाया जाय, तो यह काम (स्वराज) सहज ही और शीघ्र सम्पन्न हो सकता है।’’2 आर्य समाज के प्रवर्तक महर्षि दयानन्द, थियोसोफिकल सोसाइटी की संस्थापिका एनी वेसेण्ट, राष्ट्रीय स्वाधीनता के आकांक्षी बालगंगाधर तिलक एवं उनके उत्तराधिकारी एन. सी. केलकर, महाराष्ट्र के महापण्डित डॉ. भण्डारकर, वीरविनायकदामोदर सावरकर, काका कालेलकर और आगे चलकर महात्मा गांधी आदि गुजरात और महाराष्ट्र के चिन्तकों ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा या स्वराज की भाषा बनाने की दिशा में सार्थक प्रयत्न किया तथा बाल गंगाधर तिलक ने अपने विचार स्पष्ट करते हुए कहा था कि, ‘‘राष्ट्र के संगठन के लिए आज ऐसी भाषा की आवश्यकता है जिसे सर्वत्र समझा जा सके। किसी जाति को निकट लाने के लिए एक भाषा का होना महत्त्वपूर्ण तथ्य है। एक भाषा के माध्यम से ही आप अपने विचार दूसरों तक व्यक्त कर सकते हैं।’’3 तो महर्षि दयानन्द जी ने भी कहा था कि, ‘‘भाई मेरी आँखें तो उस दिन को देखने के लिए तरस रही हैं जब कश्मीर से कन्या कुमारी तक सब भारतीय एक भाषा समझने और बोलने लग जाँय।’’4

‘वन्दे मातरम्’ जैसे राष्ट्रीय गीत के प्रणेता वंकिमचन्द्र ने ‘बंग-दर्शन’ में लिखा कि, ‘‘हिन्दीभाषा की सहायता से भारतवर्ष के विभिन्न प्रदेशों के मध्य में ऐक्य-बन्धन संस्थापन करने में समर्थ होंगे वही सच्चे भारतबन्धु पुकारे जाने योग्य हैं’’5 तो राष्ट्रगान के सृजनकत्र्ता रवीन्द्रनाथ चटर्जी ने माना है कि, ‘‘हमें उस भाषा को राष्ट्रभाषा के रूप में ग्रहण करना चाहिए जो देश के सबसे बड़े भूभाग में बोली जाती है और जिसे स्वीकार करने के लिए महात्मा जी ने हमसे आग्रह किया अर्थात् हिन्दी। इस विचार से हमें एक भाषा की आवश्यकता भी है।’’6 हिन्दी के पक्ष में जोरदार वकालत करने वाले बाबू सुभाषचन्द्र बोस ने जो कहा वह विचारणीय है-‘‘अगर आज हिन्दी मान ली गयी है तो वह अपनी सरलता, व्यापकता और क्षमता के कारण। वह किसी प्रान्त विशेष की भाषा नहीं, बल्कि सारे देश की भाषा हो सकती है।’’7 हिन्दी के प्रति ऐसे ही विचार डॉ. राजेन्द्रलाल मित्र, राजनारायण बोस, भूदेव मुखर्जी, नवीनचन्द्र रॉय जैसे बंगाली नेताओं के भी आये।

भारत को आधुनिक आज़ादी 20वीं शताब्दी में मिली। भारतीय सन्दर्भ में बींसवीं शताब्दी का पूवार्द्ध महात्मा गांधी का पर्याय माना जाता है। गांधी जी एक प्रखर  आस्थावान राष्ट्रवादी चिन्तक थे। राष्ट्रीय चिन्तन का कोई ऐसा पक्ष नहीं जो उनसे अछूता रह गया हो। भाषा पर भी उन्होंने बहुत ही संवेदनशीलता के साथ विचार करते हुए राष्ट्रीय स्तर पर अपनी भाषा को सम्मान देना उचित माना तथा तत्कालीन समय में हिन्दी भारत की प्रचलित भाषा थी। इसीलिए इसे ही समूचे राष्ट्र में व्यवहार की भाषा होनी चाहिए। वे हमेशा कहा करते थे कि, ‘‘हिन्दी का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है।’’8 1936 में गांधी जी ने हिन्दी के राष्ट्रभाषा रूप और स्वराज पर जो कुछ कहा वह तब भी प्रासंगिक था आज भी  है और भविष्य में भी रहेगा। उनका स्पष्ट मत था कि, ‘‘अगर हिन्दुस्तान को सचमुच आगे बढ़ना है तो चाहे कोई माने या न माने राष्ट्रभाषा तो हिन्दी ही बन सकती है, क्योंकि जो स्थान हिन्दी को प्राप्त है वह किसी और भाषा को नहीं मिल सकता। अगर स्वराज्य अंग्रेज़ी बोलने वाले भारतीयों का और उन्हीं के लिए होने वाला हो तो निस्सन्देह अंग्रेज़ी ही राष्ट्रभाषा होगी, लेकिन अगर स्वराज्य करोड़ों भूखों मरने वाले निरीक्षरों और दलितों तथा अन्त्यजों का हो और उन सबके हित होने वाला हो, तो हिन्दी ही एकमात्र राष्ट्रभाषा हो सकती है।’’9 ख्यातिलब्ध राजनीतिज्ञ और साहित्य मनीषी कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने अपना मत स्पष्ट करते हुए कहा है कि, ‘‘हिन्दी ही हमारे राष्ट्रीय एकीकरण का सबसे शक्तिशाली और प्रधान माध्यम है यह किसी प्रदेश या क्षेत्र की भाषा नहीं है, बल्कि समस्त भारत में भारती के रूप में ग्रहण की जानी चाहिए।’’10

  15 अगस्त, 1947 को भारत ग़ुलामी की बेड़ियों को काटकर आज़ाद हुआ और 26 जनवरी, 1950 को अपने संविधान के साथ गणराज्य भी बना। भारत के प्रथम राष्ट्रपति बाबू राजेन्द्र प्रसाद कहते थे कि, ‘‘मैं हिन्दी के प्रचार, राष्ट्रभाषा के प्रचार को राष्ट्रीयता का अंग मानता हूँ।’’11 हिन्दी के प्रति एकदम समर्पित व्यक्ति राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन का रहा है इनके ही प्रयत्नों का परिणाम है-‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग’। इस सम्मेलन ने हिन्दी के लिए बहुत से कार्य किये इसीलिए टण्डन को हिन्दी का प्रहरी कहा जाता है। भारतीय संविधान के प्रणेता और आधुनिक दलित चेतना के अगुवा डॉ. भीमराव अम्बेडकर भी मातृभाषा के समर्थन और पोषक थे। वे कहते थे कि, ‘‘जनता में एक भाषा के माध्यम से ही एकता आ सकती हैं। दो भाषाएँ जनता को निश्चय ही विभाजित कर देंगी। यह एक अटल नियम है। भाषा के माध्यम से संस्कृत सुरक्षित रहती है। चूँकि भारतीय एक होकर सामान्य संस्कृति के विकास करने के आकांक्षी हैं। अतः सभी भारतीयों का अनिवार्य कर्तव्य है कि वे हिन्दी को अपनी भाषा के रूप में अपनाएँ।’’12 डॉ. अम्बेडकर ने बहुत पहले ही यह सन्देश दे रखा है कि जिस की प्रासंगिकता आज भी विचारणीय है। उनकी चेतावनी थी कि, ‘‘यदि समय रहते ऐसा न किया गया तो यूरोप के बलकान राज्यों की तरह इस देश के भी टुकड़े-टुकड़े हो जायेंगे।’’13

  केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय में राष्ट्रीय पुरस्कार वितरण समारोह के अवसर पर भारत के राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने 22 मार्च, 1993 को जो कहा वह किसी के लिए आज भी प्रासंगिक है-‘‘हिन्दीभाषा को जानना हमारा राष्ट्र धर्म है। मेरा विश्वास है कि हमारे देश के लोग राष्ट्रीय हित के उच्चभावों से प्रेरित होकर इस दिशा में अपना दायित्व निभायेंगे।’’14 राष्ट्रभाषा हिन्दी की प्रगति और प्रसार के लिए अनेक पत्रिकाओं ने अपना अमूल्य योगदान दिया है, जैसे- ब्राह्मण, हिन्दी प्रदीप, भारत मित्र, विशाल भारत, आज, अभ्युदय, केसरी, नव जीवन, संघर्ष, प्रताप आदि। ये सभी एक ओर राष्ट्रीय आन्दोलन को गति देने का काम करते थे तो दूसरी और हिन्दी को राष्ट्रव्यापी बनाने में भी समर्पण का परिचय दे रहे थे।

      आज अपना राज है या कि हिन्दुस्तान पर हिन्दुस्तानियों का राज है फिर भी हिन्दी को जो स्थान मिलना चाहिए वह नहीं मिल पा रहा है। अभी भारत सरकार ने आदेश दिया कि हिन्दी का प्रयोग देश के सभी प्रदेशों के लोग करेंगे तो वहीं पहले के समय वाली कहावत ‘ढाक के तीन पात’ सामने आ गयी और अहिन्दी भाषियों को सामने खड़ा कर दिया गया तथा यह दलील दी गयी कि हिन्दी के सम्पूर्ण भारत देश पर प्रतिष्ठित हो जाने से शेष प्रादेशिक भाषाएँ पनप नहीं पायेंगी। इसके प्रत्युत्तर में सिर्फ़ यही जवाब पर्याप्त है कि समस्त भारतीय भाषाओं में हिन्दी ही एक ऐसी भाषा है जो उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक के सम्पूर्ण भू-भाग में बोली और समझी जाती है तथा सभी क्षेत्रों के लोग इसे आदर देते हैं। गौर से निरीक्षण किया जाय तो हमें प्राप्त होगा कि गैर हिन्दीभाषी लोगों का हिन्दी और उसके साहित्य के प्रति अधिक योगदान रहा है, यथा- प्रभाकर माचवे, मुक्तिबोध, डॉ. गोपालन्, बालकृष्ण राव, बालशौरि रेड्डी, डॉ. भास्करन, यशपाल, उपेन्द्रनाथ अश्क, क्षितिमोहन सेन, रामानन्द चटर्जी, सुरेशचन्द्र समाजपति, नागेन्द्रनाथ बसु, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, बन्धुबान्धव उपाध्याय, सुनील गंगोपाध्याय, केशवचन्द्र सेन, रमेशचन्द्र दत्त, स्वर्णकुमारी घोषाल, बुद्धदेव बसु, अशोककुमार भट्टाचार्य, गोपालवेदान्त शास्त्री, अमृतलाल चटर्जी, तारामोहन मित्र, राजेन्द्रलाल मित्र, श्यामसुन्दर सेन, नारायणदास भौमिक तथा प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. सुनीतिकुमार चटर्जी ने हिन्दी को राष्ट्रीय फलक पर आसीन कराने में मदद की। डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी तो हिन्दी को पूरे देश के लोगों के अनुभव का हिस्सा बनाना चाहते थे। भारतीय जन-जागरण और स्वदेश प्रेम को पल्लवित करने तथा हिन्दी को राष्ट्रीय आन्दोलन की भाषा बनाने में पत्र-पत्रिकाओं की बहुत सक्रिय भूमिका रही है। देश को स्वतन्त्र कराने के लिए राजनैतिक संघर्ष उस समय चरम पर था। आन्दोलन, सत्याग्रह, धरना, जुलूस, स्वन्त्रता आन्दोलन के अभिन्न हिस्से थे तो पत्रकार, पत्रिकाएँ और अख़बार की भूमिका इनसे कमतर नहीं थी। इन पत्रिकाओं और समाचार- पत्रों की स्पष्ट घोषणा थी कि, जब बन्दूक सामने हो, तो तुम अख़बार निकालना चाहिए। अकबर इलाहाबादी की बड़ी प्रसिद्ध ग़ज़लोक्ति है- ‘‘खींचो न कमानो को न तलवार निकालो/ जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो।’’

   बरहाल अंग्रेजों से जूझते, संघर्ष करते ये अख़बार दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और मासिक बनकर प्रकाशित होते तथा इनके माध्यम से हिन्दी स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी बनी। हिन्दी-पत्रकारिता की प्रसवभूमि बंगाल रही तथा हिन्दी के टाइप का निर्माण प्रथमतः बंगाल के श्रीरामपुर ज़िले में पंचानन कर्मकार द्वारा किया गया और हिन्दी का प्रथम पत्र ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ 30 मई, 1826 ई. को श्री जुगल किशोर शुक्ल के सम्पादन में ही यहीं से प्रकाशित हुआ।
   प्रो. रामदरश राय ने अपनी पुस्तक ‘भाषाविज्ञान और हिन्दीभाषा’ में बहुत ही सारगर्भित बात कही है कि, ‘‘हिन्दी जो आज कई सौ वर्ष पहले से भारतीय वाणी का शृंगार करती आयी है तथा जिसे सम्प्रति हम ‘राष्ट्रभाषा हिन्दी’ की सम्मानित उपाधि प्राप्त किये हुए हैं उसके प्रति हमारी आस्था अनुरागपूर्ण और दायित्वपूर्ण होनी चाहिए। भाषा और साहित्य दोनों ही स्तरों पर आज हिन्दी का क्षितिज इतना चौड़ा हुआ है कि उसके राष्ट्रीय अस्तित्व की स्वीकृति में किसी को कोई सन्देह नहीं होना चाहिए। विदेशी शासन से हम अपने को मुक्त मानते हैं किन्तु क्या हम कभी विदेशी भाषा की दासता से मुक्त हो सकेंगे? यदि नहीं तो राष्ट्रीय भावना और राष्ट्रीयता की बात करना बेमानी और छद्मपूर्ण स्वांग कहा जायेगा। अंग्रेज़ी आज भी हमारी पराधीनता का दंश है। अनेक देश आज भी हमारी राष्ट्रभाषा और राष्ट्रीयता पर सन्देह करते हैं। वास्तविकता में एक भाषा या विषय के रूप में अंग्रेज़ी का अध्ययन बुरी बात नहीं है परन्तु, भारतीय परिवेश और उसके बाहर भी अंग्रेज़ियत की वकालत करना सबसे शर्मनाक बात है। भारत की बौद्धिक और सांस्कृतिक समृद्धि हिन्दी और उसके उद्गम-स्रोत की भाषाओं में देखी जा सकती है। अर्थात् भारत की सांस्कृतिक भाषा और राष्ट्रीय चेतना की भाषा के रूप में हिन्दी को सौ प्रतिशत स्वीकृति मिलनी चाहिए।’’15

निष्कर्ष:
समग्रतः हिन्दी आज़ाद हिन्द फ़ौज की भाषा थी तो सन्तों की भी, अंग्रेज़ों से लड़ने की भाषा थी तो स्वतन्त्रता संग्राम और राष्ट्रीयता की भी, स्वदेशी की भाषा थी तो स्वराज्य स्थापना की भी। 

सन्दर्भ:
1. राय प्रो. रामदरश , भाषाविज्ञान और हिन्दीभाषा, भवदीय प्रकाशन, फैजाबाद, संस्करण, 2005, पृष्ठ 247
2. वही, पृष्ठ 247  
3. वही, पृष्ठ 248
4. वही, पृष्ठ 248
5. वही, पृष्ठ 248
6. वही, पृष्ठ 248
7. वही, पृष्ठ 248
8. वही, पृष्ठ 248
9. वही, पृष्ठ 249
10. वही, पृष्ठ 250 
11. वही, पृष्ठ 250 
12. वही, पृष्ठ 251
13. वही, पृष्ठ 251 
14. वही, पृष्ठ 251-252
15. वही, , पृष्ठ, 252-253 

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