तीन कविताएँ: संदीप राशिनकर

संदीप राशिनकर
कविता 1

न जाने क्या क्या
न जाने
क्या क्या
लेते / समेटते / सहेजते
रहे हैं हम
यहाँ तक आते आते!

प्राथमिकता
प्रासंगिकता के
समय के साथ
बदलते क्रम में
घर में / जीवन में
न जाने
कहाँ, किधर, किस कोने में
संदर्भहीन हो
सकुचाकर
सिमट गयी हैं
वे तमाम चीजें / प्रसंग
जिन्हें हम ताउम्र
लेते / समेटते / सहेजते
रहे हैं 
यहाँ तक आते आते!

सच है, 
वर्षों से
छूना / सहेजना तो दूर
देखा भी नहीं है उन्हें
जिन्हें रखते रहे हम
हरदम सामने आँखों के
और सजाते / सहलाते / निहारते
रहे हैं हम
यहाँ तक आते आते!

आज मैं
घर के उन
अँधेरे / अनदेखे / अनछुए
कोनों में
जाना चाहता हूँ
हटाना चाहता हूँ
जमे मकड़ी के जाले
और खोलना चाहता हूँ
विस्मृति के ताले
चाहता हूँ धूल हटाकर
झाड़ पोंछकर साफ़ करूँ
मोहित हो निहारूँ / बतियाऊँ
व आत्मियता से
हाथों में ले सहलाऊँ 
उन सब
चीजों / स्मृतियों / क्षणों को
जिन्हें
जीवन भर सहेजा है मैंने
यहाँ तक आते आते !
***


कविता 2

यहाँ तक आते आते 
मैं मानता हूँ
बँटता रहा हूँ
चप्पे चप्पे पर
और खटता रहा हूँ
जुटाने में
दुनियावी सुविधाएँ!

बाँटता रहा हूँ
खुद को
और होता रहा हूँ उपस्थित
उन मौकों को भुनाते
अपने व्यक्तित्व के
उपयोगी हिस्से के साथ!

अपने स्वार्थों
अपनी लिप्साओं
अपने लालच
अपनी सुविधाओं के लिए, 
उम्र भर न जाने
कहाँ कहाँ, कब कब
और कैसे कैसे
बाँटता रहा हूँ खुद को
अपने होने से
बिलकुल अलग!

यहाँ तक आते-आते
न जाने
बँट चुका हूँ मैं 
कितने हिस्सों, कितनी किश्तों
कितने रिश्तों या
कितने मुखौटों में!

अब याद नहीं
स्वार्थ सिद्धि के लिए
किया गया उम्रभर
खुद का बिखराव,
खुद के टुकड़े!

पर अब
जोड़ना चाहता हूँ
स्वयं के बिखरे टुकड़े
बिखरते विचार
बदलते व्यवहार
और
खंड खंड हुए
अपने व्यक्तित्व को!

मैं चाहता हूँ
दुनिया में
जैसे आया था समग्र
वैसे ही
समग्रता में हो
मेरा प्रयाण भी!!
***


कविता 3 - बड़े ही न हों बच्चे

हम चाहते हैं
हमारे, परिवार के
परिचितों के
बड़े ही न हो बच्चे
जिससे
हम खुश रहें देखकर
बच्चों का तुतलाना
घुटनों पर चलना
लड़खड़ाना
अबूझ आवाजों
इशारों वाली भाषा में
संवाद करना
जानना, समझना, बूझना
वह सब कुछ
जो
निरागस, मासूम बच्चा
हमसे चाहता है कहना!

हम चाहते हैं लेना
उन
बाल क्रीड़ाओं का आनंद
और चाहते हैं
रमना
उनके भोलेपन, 
उनकी निरागसता में!

अब बच्चों के
बड़े होने को तो
नहीं जा सकता रोका
तो क्या
ऐसा नहीं हो सकता
कि हम
रोक लें / सहेज लें
हमारा बचपन,
रखें हम जिंदा
हममें मौजूद
उस बच्चे को
रखते हुए अक्षुण्ण
वह तमाम
भोलापन, निरागसता, मासूमियत
जो हममें थी
बचपन में!
***

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