मानवीय मूल्यों की सशक्त अभिव्यक्ति – “मैंने तुम्हें माफ किया”

समीक्षक : शिवांगी


मैंने तुम्हें माफ किया (कहानी संग्रह)
लेखक: रमाकांत शर्मा
प्रकाशक: अद्विक पब्लिकेशन, दिल्ली – 110092
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डॉ. रमाकांत शर्मा ने अब तक नब्बे के आसपास कहानियाँ लिखी हैं। समय-समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित उनकी कहानियों के सात संग्रह सामने आ चुके हैं  और उन्हें पाठकों का अच्छा प्रतिसाद भी मिला है। ‘मैंने तुम्हें माफ़ किया’ उनका सातवाँ कहानी संग्रह है जिसमें उनकी चौदह कहानियों का आनंद लिया जा सकता है। विशेष बात यह है कि हर कहानी बिना प्रवचन दिए कोई न कोई ऐसा संदेश देती है, जिसमें मानवीय मूल्य निहित हैं।

सरल भाषा और रोचक शैली में लिखी गई डॉ. रमाकांत शर्मा की कहानियों की विशेषता उनकी पठनीयता है जो पाठक को शुरू से अंत तक बांधे रखती है। उन्होंने इतनी सारी कहानियाँ लिखी हैं, पर कहीं दोहराव नजर नहीं आता। उनकी कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता उन्हें विश्व प्रसिद्ध कहानीकार ओ’हेनरी के समकक्ष ला खड़ा करती है और वह है, लगभग हर कहानी का चौंकाने वाला अंत।

संकलन की पहली कहानी “मैंने तुम्हें माफ किया” पिता के जीवनकाल में बनी गलतफहमी और उनकी मौत के बाद उसके निवारण की अद्भुत कहानी है। पिता की आत्मा अपने पुत्र के शोक के नाटक को देखकर अचंभित है। जिंदा रहते पिता को हमेशा इस बात की शिकायत रही कि बेटा उसका इलाज नहीं करवाना चाहता। अब उनकी आत्मा पुत्र के इस नाटक को बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी कि तभी जब पिता के दोस्त के सामने पुत्र सच का बयान करता है, तो मृतक की आत्मा स्तब्ध रह जाती है और कह उठती है, “उफ, क्या सोच रहा था मैं। काश मुझे यह सच पता होता। आखिर, उनके न किए गए अपराध के लिए उन्हें माफ करने का अपराध तो ना हुआ होता मुझसे। अगर मैं आत्मा न होता तो शायद मैं भी फूट-फूट कर रो रहा होता। बेटे, अनजाने में यह अपराध मुझसे हुआ है, बस इतना कह दो, जाओ मैंने आपको माफ किया, तभी मेरी आत्मा शांति से आगे का सफर तय कर पाएगी।“

संकलन की दूसरी कहानी ‘भैरवी’ पढ़ते समय लगता है कि यह रोमांस और अधूरे प्रेम की कहानी है, पर जैसे-जैसे कहानी अंत की ओर बढ़ती है, यह अंधविश्वास और माँ की अतुलनीय ममता का बेमिसाल दस्तावेज बनती जाती है। संकलन की अगली कहानी ‘चुप रहो तुम’ मानव मन का बारीकी से विश्लेषण करती है। कहानी की आत्मा इन शब्दों में प्रकट होती है, “चुप रहो तुम”, ये साधारण शब्द नहीं हैं। ये मुँह पर लगा दिया गया तिहरा टेप है, जो मुँह से निकलते शब्दों पर रोक लगाता है, बोलने का अधिकार छीनता है, भावनाओं का कत्ल करता है, विचारों का गला घोंटता है और अंदर ही अंदर ऐसी छटपटाहट भर देता है, जिससे असह्य घुटन पनपती है और मनोमस्तिष्क पर पाला सा छा जाता है।“

‘दादी किताब पढ़ने बैठ गयी होगी’ दादी के उस मार्मिक अतीत की कहानी है, जिसे उन्होंने बड़े जतन से अपने सीने में छुपा रखा था। भावावेश में जब वह अपने अतीत के पन्ने अपनी पोती के सामने खोलती है तो वह दादी की संवेदनाओं की छुअन अपने भीतर तक महसूस करने लगती है। यह कहानी जहाँ दादी के साथ हुए सलूक के प्रति आक्रोश उपजाती है, वहीं उनकी संवेदनाओं के साथ एकाकार होकर द्रवित भी करती है।

राजा होने का मतलब प्रजा को अपना गुलाम मानना और संवेदनहीन होना नहीं है। कहा जाता है कि राजा ईश्वर का प्रतिनिधि होता है। प्रजा के दु:ख-दर्द को समझना, न्याय करना, रक्षा करना और उसकी सुख-सुविधा का ख्याल रखना उसकी जिम्मेदारी होती है। खुद को शासक और प्रजा को शासित की तरह देखने वाला राजा निर्दयी और कठोर बन जाता है और कभी भी प्रजा का सम्मान हासिल नहीं कर पाता। “राजा साहब” कहानी का राजा प्रजावत्सल है। यह कहानी मनोरंजक तो है ही, आज के तथाकथित राजाओं को अपनी जिम्मेदारियाँ समझने और जनता के प्रति उचित व्यवहार करने का गूढ़ संदेश भी देती है।

संकलन की एक अन्य कहानी ‘किसी और मिट्टी की बनी’ एक अनाम और अनजान रिश्ते की बेहतरीन कहानी है। सचमुच कभी-कभी खून के रिश्तों से भी बड़े हो जाते हैं ऐसे रिश्ते जिनकी नींव नि:स्वार्थ प्रेम और ममत्व पर टिकी होती है।

बढ़ती उम्र मनुष्य के भीतर शारीरिक कमजोरियों के साथ मानसिक कमजोरियाँ भी बढ़ाती जाती है और यहाँ तक कि उसकी दृढ़ मान्यताओं को भी खंडित कर जाती है। कहानी ‘भीतर से कितना कमजोर है आदमी’ इस सत्य को बहुत सलीके से उद्घाटित करती है। यह कहानी जीवन के यथार्थ को तो सामने लाती ही है, वृद्धावस्था में अकेलेपन और उससे उपजे डर का मार्मिक चित्रण भी करती है।

‘डबडबायी आँखों की मुस्कान’ उस पत्नी की कहानी है जो अपने पति और उसके बड़े भाई के बीच बिगड़े संबंधों को बहाल करने में अपना जी-जान लगा देती है। पर, अपने बड़े भाई से बुरी तरह नाराज पति को मनाने में हर बार असफल रहती है। अन्तत: हठी पति के एक छोटे से कदम में उसे आशा की किरण दिखाई देती है और पति का यह कदम उसकी आंखों में आंसुओं के साथ मुस्कान भी दे जाता है।

अनावृष्टि एवं अतिवृष्टि के फलस्वरूप उत्पन्न अकाल के कारण किसानों की आत्महत्या पर आधारित कहानी ‘बित्तेभर की चिड़ियाँ’ किसानों के मर्मांतक दर्द को सामने लाने के साथ-साथ उन्हें आत्महत्या के बजाय जीवन की स्वरलहरियों को सुनने की प्रेरणा देने वाली उत्कृष्ट कहानी है।

‘मेरे हीरो:काशी भैया’ चरित्र प्रधान कहानी है। सुदर्शन युवक काशीनाथ अपनी खूबसूरती पर भरोसा करके हीरो बनने मुंबई तो पहुंच जाता है, किन्तु वहाँ की गन्दगी उसे रास नहीं आती और वह अपने शहर लौट आता है। लोगों के ताने सुनकर उसकी जिंदगी अजाब हो जाती है। वह अपनी जिंदगी से हताश होने लगता है। लेकिन, उसे खुद भी पता नहीं था कि वह छोटा-मोटा नहीं, बहुत बड़ा हीरो बनने के लिए पैदा हुआ है।

‘खुशी ढ़ूंढ़ते हुए’ कहानी गाँव में रहने वाले मजदूर परिवार मांगी लाल, उसकी पत्नी शामली और किशोर बेटी फूलमती की कहानी है। फूलमती पर जमींदार की बुरी नजर को लक्ष्य कर यह परिवार रातोंरात गाँव छोडकर शहर आ जाता है। शहर में मांगीलाल को धर्मशाला में चपरासी एवं उसकी पत्नी को साफ़—सफाई का काम मिल जाता है और फूलमती को धर्मशाला के सेठ द्वारा चलाए जाने वाले स्कूल में नि:शुल्क पढ़ाई की सुविधा। वह पढ़-लिखकर खूब कमाना और सारी खुशियाँ अपने और अपने माता-पिता के दामन में डालने का लक्ष्य लेकर चलती है। वह एयर होस्टेज बन भी जाती है। लेकिन, खुशियाँ ढूंढ़ने के इस क्रम में वह लक्ष्य पाने के लिए स्वयं को हर खुशी से दूर कर लेती है। इस कहानी में जीवन के इस महत्वपूर्ण पहलू को शिद्दत से उभारा गया है कि किसी एक लक्ष्य को पाने के लिए सिर्फ उसी में डूब जाना सारी खुशियों के झोली में आ जाने की गारंटी नहीं हो सकता। कहानी की ये पंक्तियाँ बहुत कुछ सोचने-समझने को मजबूर कर देती हैं, “खुशी के पैमाने वक्त के साथ बदलते हैं माइ फ्लावर। मैं मानता हूं कि पास में पैसा हो तो जिंदगी को बेहतर बनाया जा सकता है, पर जिंदगी को सही ढंग से जीना ही उसे खुशनुमा बना सकता है। छोटी-छोटी खुशियाँ भी बहुत मायने रखती हैं, लेकिन जब हम केवल एक लक्ष्य पर ही अपनी सारी खुशियाँ टिका देते हैं तो खुद को अकेला कर लेते हैं..... जैसे छोटी-छोटी बूंदों से सागर बनता है, वैसे ही जिंदगी का सागर भी इन छोटी-छोटी खुशियों की बूंदों से आकार लेता है।“ 

‘ईदी’ कहानी जहाँ आतंकवाद का पर्दाफाश करती है, वहीं एक मासूम प्रेम कहानी भी है। गंगा-जमुनी तहजीब और एकता का बयान करती यह सकारात्मक सोच की बेहतरीन प्रस्तुति है। इसमें उर्दू शब्दों का प्रयोग बहुतायत से हुआ है, लेकिन इससे कहानी के प्रवाह में कहीं भी बाधा नहीं आई है, बल्कि उसे प्रामाणिकता ही मिली है। इसी संकलन की एक अन्य कहानी ‘मुट्ठी भर इंद्रधनुष’ एकतरफा प्रेम की अनूठी कहानी है। इसे पढ़ते समय पाठक को अपना जमाना याद आए बिना नहीं रहता।

संकलन की अंतिम कहानी ‘घिरा हुआ वजीर’ प्राइवेट इंटर कॉलेज में फिजिक्स पढ़ाने वाले शिक्षक कृष्णदयाल उपाध्याय की कहानी है। यह कहानी उस शिक्षक की कहानी है जो सारी जिंदगी ईमानदारी पढ़ाता रहा और ईमानदारी जीता रहा। पर, परिस्थितियाँ उसे इस कदर मजबूर कर देती हैं कि वह अपने अंतर्मन की आवाज के विरुद्ध जाकर कॉलेज के चेयरमैन की गलत बात मानने के लिए बाध्य हो जाता है। कहानी में उपाध्याय जी और उनके शिष्य के बीच का यह वार्तालाप बहुत कुछ कह जाता है, “जब वजीर चारों तरफ से घिर जाता है तो मात निश्चित होती है। पर सर, सिर्फ एक मात से कुशल खिलाड़ी घबरा नहीं जाता, जीतने के लिए वह फिर से सन्नद्ध हो जाता है, फिर से बिसात बिछाता है और सामने वाले के लिए चुनौती बनकर खडा हो जाता है, वह जीतता है सर”।
इस संकलन की सभी कहानियाँ अपने-आप में बेमिसाल हैं। जरूर पढ़ें।

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