अहिंसा और डॉ. आंबेडकर के अहिंसक आंदोलन

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

लेखक भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं एवं सेतु संपादन मंडल के सम्मानित सदस्य हैं। आप अहिंसा आयोग के समर्थक एवं अहिंसक सभ्यता के पैरोकार भी हैं।

अहिंसा कोई ऐसी चीज नहीं है कि उसे अमुक व्यक्ति धारण कर सकता है और अमुक नहीं कर सकता, उसके लिए वर्ज्य है। इसके उदाहरण हमारे शास्त्रों में मिलते हैं। राम के साथ केवट के प्रेम पूर्ण आग्रह हो, शबरी के बेर खिलाने की आत्मीयता हो या फिर मंदोदरी का राम के साथ संवाद में प्रतिरोध किंतु अहिंसक प्रतिरोध हो। उन सबमें हम अहिंसा की एक रौशनी पाएंगे। इसी प्रकार जब हमारे देश में अशोक का दौर आता है तो भयानक हिंसा के बीच अहिंसा अचानक ज्यादा महत्व वाली हो जाती है। आज़ादी के दिनों में गाँधी जी की अहिंसा ज्यादा लोकप्रिय रही किंतु डॉ. आंबेडकर का अहिंसक प्रतिरोध रेखांकित ही नहीं किया जाता जैसे उनके आंदोलन में दिखता है। वह तो सादा और अहिंसक आंदोलन था। हम जानते हैं कि बाबासाहेब कौन थे। डॉ. आंबेडकर एक भारतीय न्यायविद्, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ और समाज सुधारक हैं, जिन्होंने व्यवस्थित रूप से महिलाओं, श्रमिकों के प्रति सामाजिक भेदभाव के खिलाफ अभियान चलाया। हम जानते हैं कि डॉ. आंबेडकर भारत के संविधान के मुख्य वास्तुकार थे, और उन्होंने भारत गणराज्य के पहले कानून और न्याय मंत्री के रूप में भी कार्य किया। 20वीं सदी के कई अग्रणी वैश्विक महत्वपूर्ण विचारकों में से एक डॉ. आंबेडकर माने जाते हैं। दलित व बौद्ध आंदोलन के लिए भी बाबासाहेब आंबेडकर अग्रणी व्यक्ति रहे हैं। आंबेडकर औरों के बारे में सोचते हुए अपने जीवन का हर पल समर्पित और बलिदान कर दिया यह हम सभी जानते हैं। वह जीवन भर दलितों की मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहे हैं, ऐसा देखने को मिलता है। संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष के रूप में उनको भारत का नया संविधान लिखने की ज़िम्मेदारी दी गयी, यह उनके लिए बहुत अहम बात थी। उस संविधान में आंबेडकर ने संवैधानिक गारंटी प्रदान की। व्यक्तिगत नागरिकों के लिए नागरिक स्वतंत्रता का एक विस्तृत प्रतिवेदन, साथ-साथ सबकी सुरक्षा, धर्म की स्वतंत्रता, अस्पृश्यता का उन्मूलन और सभी उन चीजों का बहिष्कार जो भेदभाव के कारण बनते हों, इसका डॉ. आंबेडकर ने सदैव ध्यान रखा। आंबेडकर ने व्यापक आर्थिक और सामाजिक अधिकारों के लिए संघर्ष किया। महिलाओं के लिए लड़ाई लड़ी। 
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण भारत के सामाजिक-आर्थिक असमानताओं और अभावों को मिटाने की आशा की ज्योति बनी। इन उपायों के माध्यम से भारत के दलित वर्गों के लिए अवसर वह ढूंढ रहे थे। लेकिन इन सबसे ज्यादा अहम बात है कि डॉ. आंबेडकर दलित आंदोलन की नींव और मुख्य वास्तुकार के रूप में जाने जाते हैं। आंबेडकर उत्पीड़ित वर्गों के अभाव के अर्थशास्त्र के बारे में बहुत चिंतित थे। गौतम बुद्ध, महात्मा ज्योतिबा फुले, नारायण गुरु, पेरियार ई. वी. रामासामी और छत्रपति शाहूजी महाराज के साथ भीमराव आंबेडकर सभी उत्पीड़ितों की लड़ाई लड़ते हुए हमें मिलते हैं किन्तु आंबेडकर ने एक समेकित आर्थिक विकास योजना के लिए लड़ाई लड़ी। सामाजिक आंदोलन उन्होंने जो चलाया वह कदाचित कई और लोगों ने किया लेकिन उनके आंदोलन की मुख्य बात यह थी कि उन्होंने जाति व्यवस्था, और ब्राह्मणवादी मूल्यों के खिलाफ दलित आंदोलन का नेतृत्व किया। 
अब जैसा कि सब मानते हैं कि भारतीय जाति-विरोधी बुद्धिजीवी नेता आंबेडकर का आंदोलन उनके लिए एक आंदोलन भर नहीं था बल्कि सही मायने में देखा जाए तो वे दलितों की आवाज़ किस दिशा में बढ़ सकती है इसपर ध्यान दे रहे थे। जाति-आधारित दलितों के अग्रदूत के रूप में इसीलिए बाबासाहेब शुमार किए जाते हैं। धन के समान वितरण, उद्यम का वितरण हो या निजी उद्यम स्थापित करने की बात, बाबासाहेब के आंदोलन इस बात के लिए थे कि समाज के उत्पीड़ितों का भी स्वाधीन मन अपनी निजता के साथ जी सके। 
भारत में उस दौर में कोई भी अन्य दलित नेता दलित आंदोलन का उतना प्रभावी ढंग से नेतृत्व नहीं करता जितना आंबेडकर करते हैं, यह बात हमें मिलती है। हमें उत्पीड़ितों के ऐतिहासिकता का अवलोकन करते हुए महाड़ सत्याग्रह मिलता है जिसे आंबेडकर ने 1924 में किया। उस आंदोलन की सबसे अहम बात यह थी कि यह संघर्ष पानी की सहज प्राप्ति उत्पीड़ितों को भी हो, इसके लिए थी। शूद्र समाज का भी व्यक्ति पानी पी सके पोखर, तालाब से इसके लिए थी। उत्पीड़ित जो एक ऐतिहासिक ढांचे के भीतर काम करते थे लेकिन वे सबकुछ स्पर्श करने के अधिकारी नहीं थे। आंबेडकर ने उन्हें उनका सम्मान दिलाने का जो यत्न किया वह अद्भुत था। सबसे बड़ी बात यह है कि यह आंदोलन गांधी के 6 अप्रैल, 1930 में किए गए दांडी मार्च से तीन साल पहले किया जाता है। इसको यदि विश्लेषण किया जाए तटस्थ भाव से तो एक बात यह भी निकालकर आती है कि गांधी ने नमक सत्याग्रह किया अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति के लिए और आंबेडकर ने उनसे पहले जो पानी के लिए संघर्ष किया वह तो भारतीय व्यवस्था के सामाजिक-सांस्कृतिक अनुबंधों से मुक्ति के लिए थी जो अस्पृश्यता और छुआछूत जैसी बुराइयों में जकड़ी हुई थी। जाति-आधारित समाज में जातियों की ही अपनी बनाई व्यवस्था से मुक्ति के लिए था यह सत्याग्रह। दलितों की मुक्ति के लिए, उनकी स्वाधीन संसाधनों और प्रकृति द्वारा उपलब्ध साधनों की पहुँच के लिए यह आंदोलन था। 
महाड़ सत्याग्रह डॉ. आंबेडकर की अगुवाई में 20 मार्च 1927 को महाराष्ट्र राज्य के रायगढ़ जिले के महाड़ स्थान पर हुआ था। लेकिन हजारों की संख्या में अछूत कहे जाने वाले लोगों ने डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में सार्वजनिक तालाब चावदार में पानी पिया। इसे तो सभी जानते हैं लेकिन इसके ऐतिहासिक पक्ष को सबको जानना ज़रूरी है। मामला यह था कि अगस्त 1923 में, बॉम्बे लेजिस्लेटिव काउंसिल ने जब एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें कहा गया था कि विभिन्न वर्गों के लोगों को सरकार द्वारा निर्मित और अनुरक्षित स्थानों का उपयोग करने की अनुमति दी जानी चाहिए। महाड़ के लोगों ने, जो बॉम्बे प्रेसीडेंसी के ही हिस्सा थे इस अधिनियम को लागू करने के लिए अपनी नगर परिषद में प्रस्ताव पारित कराये। लेकिन सवर्ण हिंदुओं के विरोध के कारण प्रशासन उसे लागू करने में विफल हो गया। बहिष्कृत हितकारिणी सभा ने डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में महाड़ में ही इस बिन्दु पर एक सम्मेलन आयोजित किया। इसमें एक हजार से अधिक लोग इकट्ठे हुए। इस सम्मेलन के अंत में, वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि यह सभा चावदार तालाब जाएंगे और पानी पिएंगे। डॉ. आंबेडकर द्वारा संचालित पानी के अधिकार के लिए महाड़ सत्याग्रह हेतु वे सभी चावदार तालाब पर गए जहां अछूतों के समान सामाजिक अधिकार हासिल करने के लिए विरोध थे, जाकर पानी पीकर इसके खिलाफ एक शांतिपूर्ण विरोध दर्ज़ कराया।  
दरअसल, सामाजिक व्यवस्था में शूद्र, अछूत, शोषित शब्द डॉ. आंबेडकर के कानों में चुभते थे। उस दौर में जो सामाजिक व्यवस्था थी उसमें जो एक वर्ग को अस्पृश्य कहकर उसे निचले स्तर का होने का एहसास कराया जाता था, वह बातें उन्हें चुभती थीं। डॉ. आंबेडकर इससे अपने समाज को निकालना चाहते थे। वह चाहते थे कि किसी भी जलाशय में ऊंची जाति के लोग ही जल स्पर्श कर सकते हैं, यह तो ठीक बात नहीं है। इस खाई को पाटने के लिए ही महाड़ आंदोलन हुआ और शांतिपूर्ण तरीके से किया गया आंदोलन हुआ सबसे बड़ी बात यह थी। आंबेडकर के उन दिनों जो ब्राह्मण जाति के अभिन्न मित्र थे वे भी इस आंदोलन के हिस्सा थे। प्रतिरोध की अपनी विशेषता थी लेकिन वह एक प्रतीकात्मक प्रतिरोध था लेकिन बाबासाहेब की वास्तविक लड़ाई का अंत तो बाम्बे हाईकोर्ट से सन 1937 में हुआ। 10 साल पहले जो उन्होंने के चावदार तालाब पर जाकर अपना प्रतिरोध दर्ज़ कराया हाईकोर्ट ने उसका ऐतिहासिक फैसला 10 साल बाद दिया किन्तु वह उस संकल्प की जीत थी जो बाबासाहेब ने हजारों अछूत लोगों और अस्पृश्यता समाप्त करने वाले लोगों के साथ लिया था।
भारतीय इतिहास में न्याय मिलने की अपनी विसंगतियाँ हैं। बाबासाहेब ने 10 साल लड़ाई लड़ी, सफल हुए लेकिन आज जो अभी भी अस्पृश्यता हमारे समाज में बनी हुई है उसका क्या, सोचने वाली बात यह है। आर्थिक गैर-बराबरी अभी भी उत्पीड़ितों, वंचितों के खाते में अपनी उपस्थिति बनाए हुए है उसका क्या? एक और सत्याग्रह 1930 में डॉ. आंबेडकर ने किया था जो नासिक के प्रसिद्ध कलाराम मंदिर में अछूतों का प्रवेश के लिए था। बाबासाहेब के महाड़ सत्याग्रह हो या नासिक के कलाराम मंदिर प्रवेश उससे यह बात आज भी ज़रूर सीखने को मिलती है कि सबसे पहले संकल्प धारण करो, लोगों में उसके बारे में जागरूकता फैलाओ, उन्हें सत्य और असत्य के भेद को समझाओ, प्रतिरोध भी करना पड़े तो करो और इसके साथ ही साथ न्यायालय में अपनी उपस्थिति बनाते हुए कानूनी रूप से अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए सतत लगे रहो। लेकिन विडम्बना यह है कि आज इतना सबकुछ करने के लिए जो भी सामाजिक आंदोलन के नेतृत्वकर्ता हैं, वे धैर्य नहीं रख सकते। जागरूकता के लिए समय नहीं दे सकते क्योंकि बहुत कुछ शॉर्टकट पाने और अधिक पा जाने की लालसा किसी लक्ष्य को धैर्यपूर्वक संघर्ष कर पाने से रोकती है। बाबासाहेब से जो सीखने वाली बात है वह यही है कि शांतिपूर्ण स्वभाव के साथ धैर्य रखो और अपने उद्देश्यों को धूमिल न होने दो। अब खुद सोचिए कि वे उन बेजुबान दलितों की बात करते हैं जिनकी आवाज आज तक नहीं सुनी गई। हिंदू समाज में न केवल उनकी आवाज को अनदेखा और अनसुना किया गया बल्कि उनकी उपस्थिति को भी खारिज कर दिया जाता था। सामाजिक समानता की वकालत करने के लिए अनेक आंदोलन आज देखने को मिलेंगे लेकिन वह प्रतिबद्धता और किसी परिणाम तक पहुँचने की जो जिजीविषा डॉ. आंबेडकर में थी, वह आज के इस प्रकार की लड़ाई लड़ने वालों में आ जाए तो अधिकार और मजबूती से उत्पीड़ित-जन के मिलने लगते। उत्पीड़न का दंश झेलने के बाद भी विभिन्न परिस्थितियाँ सहते रहने की आदत न डालनी पड़ती। सबसे अहम बात यह है कि भय, वंचना और असहज होने की स्थितियाँ भारत से यदि चली जातीं, तो देश और तरक्की की राह पर जाता। हमारा भारत ज्यादा विकसित भारत बन पाता। 
महाड़ सत्याग्रह मेरी दृष्टि से एक अहिंसक सत्याग्रह था। गांधी जी ने अपने आंदोलन को सदैव अहिंसक बताया। वह दिखता भी है किंतु बाबासाहेब ने कभी दावा नहीं किया अपितु उन्होंने अहिंसक रूप से चवदार तालाब पर जो प्रतिरोध किया वह खुद अपनी परिभाषा गढ़ता है, वह किसी से प्रमाण पत्र की अपेक्षा नहीं करता। यदि समाज सुधारक इस अहिंसा की ध्वनि को अबाध आगे बढ़ाते तो भारत में उत्पीड़ितों का समाजशास्त्र अहिंसक समाजशास्त्र के रूप में अभिव्यक्त होता और मजबूती भी उसको मिलती। यह सही है कि उत्पीड़ितों ने कोई भयानक हिंसा भारत में की इसका कोई बड़ा उदाहरण नहीं है किंतु जिस लालच की बात पूर्व में बताई गई है वह भी अहिंसक तो नहीं है, वह हिंसा की कोटि में आती है। इसीलिए बाबासाहेब के सपने को जैसा वह अहिंसक अपरिग्रह वाला समाज चाहते थे उसे उनके अनुयायियों ने नहीं अपनाया और सपना ध्वस्त हुआ।
भारत में इस युग में भी बहुत से नैतिक लोग हैं जो बाबासाहेब के नैतिक बोध को समझते हैं। वे लालच के वशीभूत होकर कोई भी संग्रह के लिए अपनी नैतिकता नहीं खत्म करना चाहते। इस हिंदुस्तान को उन्हीं गुणीजन से अपेक्षा है, उम्मीद है। वे बाबासाहेब के अहिंसक सभ्यता के वाहक बनेंगे, ऐसी उम्मीद है और आने वाले समय में बाबासाहेब पुनः अपनी परोक्ष उपस्थिति दर्ज करते हुए अपने संदेशों के माध्यम से ज्यादा लोगों में विश्वास के सूत्र बन सकेंगे, यह भी संभावना है।

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