आत्मकथा-अंश: टाट-पट्टी और मासूम सपनों वाला बचपन

प्रकाश मनु

प्रकाश मनु

हमारे स्कूल का नाम था—पालीवाल विद्यालय, पर हम उसे बोलते थे, छोटा पालीवाल स्कूल। यानी पुराने जमाने की कच्ची या आज की नर्सरी से लेकर कक्षा पाँच तक का स्कूल। इसके बाद छठी कक्षा से बारहवीं तक का जो स्कूल था, उसे उत्तर प्रदेश में स्कूल न कहकर कॉलेज कहा जाता था, इंटरमीडिएट कॉलेज। मगर हम लोग बातचीत में इसे कहा करते थे, बड़ा पालीवाल स्कूल। यह हमारे घर से कहीं अधिक दूर था। करीब-करीब शहर के आखिरी छोर पर। क्षेत्रफल तथा छात्रों की संख्या के हिसाब से भी यह बहुत बड़ा था। मेरे समय में ही इसमें दो-ढाई हजार से ज्यादा विद्याथी थे और सौ से ज्यादा अध्यापक थे। छठी कक्षा से मुझे इसी में पढ़ना था।
पर कच्ची से पाँचवीं तक की पढ़ाई छोटे पालीवाल स्कूल में ही हुई। स्कूल की बिल्डिंग ही छोटी सी थी, जिसमें खेल-कूद की कोई जगह न थी। स्कूल का अपना कोई खेल का मैदान नहीं था। हमारे स्कूल के सामने अग्रवाल धर्मशाला थी। उसके आगे का हिस्सा खुला था, बाकी दो ओर चहारदीवारी सी थी। बस, वही हमारा खेल का मैदान था। चूँकि वह ज्यादा बड़ा नहीं था, और वहाँ भागने-दौड़ने की गुंजाइश नहीं थी, तो अकसर हम वहाँ कबड्डी खेलते थे। और धीरे-धीरे मैं कबड्डी का अच्छा खिलाड़ी बन गया था।
स्कूल में टाट-पट्टी पर बैठकर हम पढ़ते थे, और वे टाट-पट्टियाँ इस कदर हमारे मन और स्मृतियों में छा गई थीं, कि स्कूल का मतलब ही हमें लगता था, टाट-पट्टियों पर बैठकर पढ़ाई। स्कूल का कोई और अर्थ तब समझ में आता ही नहीं था। और वे टाट-पट्टियाँ शुरू से अंत तक खड़िया और स्याही के धब्बों से इस कदर लबरेज थीं कि उनका कोई रंग भी था, बिल्कुल ध्यान में नहीं आ रहा। अलबत्ता, एक बार जब स्कूल में किसी बड़े अधिकारी का इंस्पेक्शन होना था, तो मुझे याद है, बिल्कुल नई-नकोर टाट-पट्टियाँ बिछाई गई थीं। उनके लाल, हरे, नीले रंग की चमक अब भी स्मृतियों में दर्ज है। फिर नई टाट-पट्टियों की मन को लुभाने वाली एक खास महक भी थी। नाक में गुदगुदी सी करने वाली।
हम खूब खुश थे, पर चाहते हुए भी उनसे हमारे दिलों का कोई आत्मीय रिश्ता नहीं बन पा रहा था। शायद इसलिए कि उनके साथ एक परायापन भी जुड़ा था। आखिर हमारा सनातन रिश्ता तो उन्हीं धूसर टाट-पट्टियों से ही था न, जिसके रंग बिला गए थे और हम उन्हें देखने के इस कदर आदी थे, कि टाट-पट्टी का कोई और रूप भी हो सकता है, यह दिमाग में कहीं अँटता ही न था।
संयोग से इंस्पेक्शन वाले दिन जो नई टाट-पट्टियाँ बिछाई गई थीं, वे अगले ही दिन हटा ली गईं और समेटकर हैडमास्टर जी के दफ्तर के साथ वाली कुठरिया में बंद हो गईं, जहाँ ऐसी ही बेशकीमती चीजें पड़ी रहती थीं। उस कुठरिया पर एक मोटा सा ताला लटकता रहता था, जिसकी चाबी हैडमास्टर साहब के कब्जे में होती थी। अलबत्ता हमारा रिश्ता उन धूसर टाट-पट्टियों से पूरे पाँच सालों तक बना ही रहा, जिनके रंग न जाने कब, कहाँ बिला गए थे। और हमारे सपनों तक में वे इसी रूप में आती थीं। हालाँकि सपने उनमें खासी जादूगरी भी भर देते थे, जिससे हम उन टाट-पट्टियों पर बैठे-बैठे एकाएक आसमान में उड़ने लगते थे। बादलों के बीच सैर करते थे, और दुनिया-जहान के न जाने कौन-कौन से अजूबे देखकर वापस लौटते थे, तो मन में एक पुलक और थरथराहट सी व्याप जाती थी।
इसी तरह काठ की तख्ती, खड़िया और मिट्टी का बुदक्का हमारी स्कूली पढ़ाई की सबसे खासुलखास चीजें थीं, जिनके बिना पढ़ाई की शुरुआत ही नहीं हो सकती थी। आखिर पढ़ाई का बिस्मिल्लाह इन्हीं के सहारे ही तो संभव था। इनमें काठ की तख्ती को तवे की कालिख से हम रँगते थे। फिर इस पर बड़े कायदे से काँच का बना घोटना या घुटन्ना फेरा जाता था, जिससे पट्टी चिकनी हो जाती थी। अब उस पर लिखने में सुभीता था। पर इससे भी बड़ी बात यह कि पट्टी पर घुटन्ना फेरने से तख्ती पर लगी कालिख हमारे कपड़ों और शरीर पर नहीं लगती थी। मैं नहीं जानता कि एक आने में मिलने वाले काँच के उस मामूली से घुटन्ने का आविष्कार किसने किया था। पर जिसने भी किया हो, उसके प्रति मेरा मन कृतज्ञता से भरा हुआ है, क्योंकि उसी के कारण रोज-रोज कपड़ों और शरीर में लग सकने वाली कालिख से हम और हमारा बचपन बच सका। यों यह मामूली सी दिखने वाली चीज भी हमारी उस छोटी सी, मासूम दुनिया की एक असाधारण शै थी।
अब रही बात मिट्टी के बुदक्के की, तो यह मिट्टी की बनी एक छोटी लुटिया सरीखा था, जिसमें पानी और खड़िया डालकर हम अपनी नेजे वाली कलम को किसी मथनी की तरह गोल-गोल घुमाकर मिलाते थे। हम बच्चों का यह भी एक प्यारा खेल ही था। और जब सारे बच्चे मिलकर खड़िया घोलने के आनंदमय खेल में लगे हों, तो मजे-मजे में खड़िया घोलते अपने पास बैठे सहपाठी को चिढ़ाते हुए, “खड़िया-खड़िया मो पे, पानी-पानी तो पे...!” गाने का आनंद कैसा निराला हुआ करता था, इसकी कल्पना की जा सकती है।
खड़िया गाढ़ी हो तो काली-काली तख्ती पर सफेद खड़िया से लिखे गए साफ-सुथरे दूधिया अक्षर कैसे चाँदी सरीखे चमकते थे, और आँखों में कैसा सुकून सा भर देते थे, यह बता पाने की सामर्थ्य मुझमें नहीं है। तख्ती के एक तरफ वर्णमाला और दूसरी तरफ गिनती लिख लेने पर, हमें बारी-बारी से उसे मास्टर जी को दिखाना होता था। बाद में पट्टी को पानी से धोकर सुखाना जरूरी था, ताकि उस पर नया पाठ लिखा जा सके। यह खेल भी कम आनंदपूर्ण न था, जिसे और भी लालित्यपूर्ण बनाने के लिए हमारे होंठों पर पट्टी सुखाने का यह नाटकीय किस्म का कथात्मक गीत सुरसुरा उठता था—
सूख-सूख पट्टी, चंदन गट्टी,
राजा आया, महल चिनाया।
महल के ऊपर झंडा गड़वाया,
झंडा गया टूट, रानी गई रूठ।
सूख सूख पट्टी, चंदन गट्टी,
झंडा फिर लगाएँगे, रानी को मनाएँगे।
जाहिर है, पट्टी सूखने में समय लगता है। पर वह समय किसी व्यग्र प्रतीक्षा में क्यों बिताया जाए? क्यों न उसे किसी नन्ही-मुन्नी कहानी से ही सही, सरस और कौतुकपूर्ण बना दिया जाए? यह बात जरूर किसी ऐसे बच्चे के मन में आई होगी, जो किताबी कीड़ा न होकर, थोड़ा कल्पनाशील होगा। एक साथ पढ़ाई और जिंदगी का रस लेना जानता होगा। उसी आदि बाल कवि ने खेल-खेल में यह अमर बाल कविता रच डाली होगी, जिसने बाद की न जाने कितनी पीढ़ियों के बचपन को अनजाने में ही रस और आनंद से भर दिया।
कौन था इस नाटकीय कविता का रचयिता वह आदि बाल कवि, हम नहीं जानते। पर मन ही मन उसे प्रणाम कर लेने में तो मैं कोई बुराई नहीं समझता। बल्कि ऐसा करना अपने सुखद बचपन के लिए आभार और कृतज्ञता प्रकट करना है, और इकहत्तर बरस की उम्र में ऐसा करते हुए मैं अपने हृदय और आत्मा में एक निर्मल शांति और ठंडक महसूस कर रहा हूँ।
इसके अलावा स्कूल में पहाड़े वाला पीरियड जो शायद आखिरी पीरियड होता था, हमें बहुत प्रिय था। पहाड़े याद कराने के लिए हमें स्कूल के चारों ओर बनी एक गैलरी में खड़ा कर दिया जाता था। यहाँ हम सभी समवेत स्वर में पहाड़े दोहराते थे। हमसे कहा जाता था कि खूब जोर से बोलो! और बच्चों को कोई जोर से बोलने की स्वतंत्रता दे दे, फिर देखो उनका उत्साह और आनंद। तो सच्ची-मुच्ची मजा आ जाता था। इस तरह छुट्टी से पहले ही हम छुट्टी का मजा पा जाते थे। पहाड़ों को इस कदर बार-बार याद करने का ही यह नतीजा था कि इस मामले में हमने कभी मार नहीं खाई।
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[2] लिपि का अजीब गड़बड़झाला

एक बात और याद पड़ती है कि दूसरी या तीसरी में हमारी पाठ्यपुस्तकों में बड़ा बदलाव हुआ था और उससे बहुत अफरातफरी मची थी। हम बच्चों को भी पाठ याद करने और उन्हें मन में पक्का करने में मुश्किल आई थी। सच तो यह है कि हम बच्चे बेवजह कुछ गड़बड़ा-से गए थे और अध्यापक भी हिंदी की लिपि से इस अनावश्यक छेड़छाड़ से कुछ खुश नहीं थे। यह मुश्किल संभवतः इसलिए आई कि हिंदी की देवनागरी लिपि को लेकर कुछ प्रयोग उन दिनों चल रहे थे। मेरा खयाल है कि काका कालेलकर तथा कुछ और विद्वानों ने सुझाव दिया कि देवनागरी की लिपि की मुश्किलें दूर करने के लिए इसमें कुछ सुधार किए जाएँ।
और वे सुझाव क्या थे? याद पड़ता है कि इसमें कुछ मात्राओं को लेकर सुझाव दिए गए थे। इनमें एक सुझाव छोटी इ की मात्रा को लेकर था। हिंदी में छोटी इ की मात्रा अक्षर के बाईं लगती थी ओर इससे कुछ परेशानी महसूस होती थी। तो सोचा गया कि बाकी सारी मात्राएँ तो बाद में लगती हैं, अकेली यही मात्रा है जो पहले लगती है। इस मुश्किल को खत्म किया जाए। तो इसके लिए हल यह निकाला गया कि इ की मात्रा जो अक्षर से पहले लगती है, वह भी अब दाईं ओर ही लगेगी। यानी छोटी इ हो या बड़ी ई, मात्राएँ अब दाईं ओर ही लगेंगी। पर हाँ, छोटी इ की मात्रा कुछ छोटी होगी और बड़ी ई की बड़ी। मोटे शब्दों में, छोटी इ की मात्रा का डंडा छोटा, बड़ी ई की मात्रा का बड़ा।
पर इससे और मुश्किल बढ़ गई। इसलिए कि लिखते समय जल्दी में डंडा छोटा-बड़ा हो जाता था और तय करना मुश्किल था कि यह छोटी इ या या बडी ई। फिर इसी तरह ए और ओ को लिखने का ढंग भी बदला। अब इन्हें अ पर ए या ओ की मात्राएँ लगाकर लिखने का चलन शुरू किया गया। पर यह भी नहीं चल पाया। पाठ्यपुस्तकें जो कुछ विद्वानों के सुझावों के आधार पर बनी थीं, बुरी तरह पिटीं और नाकामयाब हुईं। उन्हें वापस लेना पड़ा।
पर हम बच्चों के दिल-दिमाग में नई और पुरानी लिपि को लेकर जो भ्रम पैदा कर दिया गया, उसका क्या किया जाए? बहुत समय लगा उससे मुक्त होने में।
एक और छोटी सी याद इस बात की है कि वैसे तो हमारे स्कूल में कोई यूनिफॉर्म नहीं थी और किसी और तरह का बंधन नहीं था, पर कभी-कभी अध्यापक साफ-सफाई वगैर की चिंता कर लेते थे। याद पड़ता है कि एक अध्यापक की निगाह मेरे पैरों पर गई, जिन पर धूल और मिट्टी की परतें-सी जम गई थीं और उन्हें शायद कभी ढंग से धोया न गया था। उन्होंने वहीं से ही कहा, “तुम्हारे पैर कैसे हो रहे हैं, चंद्रप्रकाश? कल से इन्हें अच्छी तरह साफ करके आना।”
सुनकर मुझे बड़ी शर्म सी आई। उनकी बात एकदम ठीक थी। मेरे पैर अकसर धूल से सने होते थे और उन पर मिट्टी भी चढ़ जाती थी। पर मुझे कभी इसकी परवाह ही न होती थी। कभी इस पर ध्यान जाता ही नहीं था। कपड़े तो रोजाना धुले और साफ-सुथरे ही पहनता था, नहाता भी था। पर यह नहाना कुछ ऐसे होता था जैसे शरीर पर जल्दी-जल्दी पानी डाल लिया और झट गुसलखाने से बाहर आ गए। नहाने का मतलब शरीर की रगड़-रगड़कर अच्छी तरह सफाई होती है, यह पता ही न था।
आश्चर्य, माँ ने भी कभी इस पर ध्यान नहीं दिया। इस बारे में उनका भी नजरिया था कि जैसा भी है, ठीक है। हमें रगड़-रगड़कर नहलाने-पोंछने की तरफ उनका ध्यान न था। उनके पास वैसे भी बहुत काम रहते थे। खासकर इतने बड़े टब्बर के लिए रोज तीन टाइम खाना बनाना। बहुत संतानें थीं। सब एक-दूसरे के सहारे पल जाती थीं और यों जिंदगी की गाड़ी आगे बढ़ती जा रही थी।
फिर एक दिक्कत यह थी कि शुरू से ही मुझे चप्पलें पसंद थीं। जूतों में मेरा जी घुटता था। चप्पलें भी ज्यादातर हवाई चप्पलें ही होती थीं। उनमें पैर एकदम खुले होते थे और फिर जाहिर है, वे रास्ता चलते धूल और कीचड़-मिट्टी से सन जाते थे। वैसे भी होता यह है कि चेहरा हम चमका लेते हैं और पैर उपेक्षित ही रह जाते हैं। उनकी तरफ कम ध्यान जाता है। तो मैंने माँ से कहा, “मास्टर जी ने कल पैर साफ करके ही स्कूल आने के लिए कहा है।”
माँ ने कहा, “कोई बात नहीं। मैं गरम पानी से तेरे पैर धो देती हूँ।”
माँ ने उसी समय पानी गरम किया। फिर गरम पानी से मेरे पैरों को खूब अच्छी तरह रगड़-रगड़कर धोया। बड़े दिनों बाद उनमें साबुन लगा था। तो पता नहीं, कितनी मैल की परतें थीं, जो उतरती चली गईं। फिर तो पैरों का हुलिया ही बदल गया। मुझे खुद यकीन नहीं आ रहा था, कि ये मेरे ही पैर हैं?
अगले दिन उन अध्यापक ने देखा तो खुश होकर कहा, “आज तो पैर साफ करके आए हो। ऐसे ही रखा करो।”
पर मैंने उनकी बात पर बहुत ध्यान दिया हो, ऐसा बिल्कुल नहीं है। इसलिए कि जिंदगी का ढब ही वह नहीं था। शुरू से लगता था, शरीर का क्या, जैसा चल जाए, सो ठीक। हाँ, कपड़े जरूर साफ धुले होते, हमेशा जगमग करते हुए। पर इसमें मुझे कौन-सा श्रेय जाता था? यह सारी मेहनत तो माँ और भाभियों की थी।
हाँ, एक कमी जरूर थी और वह यह कि उन दिनों रूमाल लेकर मैं नहीं जाता था। यह जानता भी न था कि रूमाल भी एक जरूरी चीज है। किसी ने बताया ही नहीं। कक्षा में किसी और को भी रूमाल का इस्तेमाल करते नहीं देखा। इससे औरों को क्या मुसीबतें आती या न आती थीं, पर मेरे लिए बड़ी भारी मुसीबत थी। वह यह कि नाक पोंछने का कोई साधन मेरे पास न था। इससे सामान्य दिनों में तो मुश्किल आ ही जाती थी, पर जिन दिनों जुकाम होता, तब तो आफत ही आ जाती थी। मेरी हथेलियाँ और बाँहें या फिर कमीज की बाँहें अकसर नाक पोंछने से खराब हो जाती थीं। पर मैंने उस बारे में कुछ सोचा ही नहीं। रूमाल जैसी छोटी चीज इसका समाधान हो सकती है, यह बात न मेरे ध्यान में आई और न घर वालों के मन में। शायद उस समय इसे विलासिता ही समझा जाता हो।
पर आज यह सोचकर कि मेरी हथेली का पीछे वाला हिस्सा या बाँहें तब किस कदर बुरी हालत में होती थीं, बहुत बुरा लग रहा है। और मैं सोचता हूँ, काश, उस समय किसी ने इस बारे में मुझे या मेरे घर वालों को चेताया होता, तो कितना अच्छा होता!
तो खैर, शायद उसी का नतीजा है कि न सिर्फ मैंने उस बात को याद रखा, बल्कि घर से बाहर जाते हुए मेरे खीसे में अकसर दो-दो रूमाल होते हैं, ताकि एक खो जाए, तो दूसरा काम आ जाए। घर से बाहर जाते हुए रूमाल साथ रखना अकसर मैं नहीं भूलता, बल्कि बच्चों को भी याद दिला देता हूँ कि “बेटे, हैंकी रख लिया ना?” बच्चे समझ नहीं पाते कि पापा को यह क्या रोग है, पर मैं बचपन की अपनी तकलीफ उन्हें कैसे समझाऊँ?
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[3] विजयी विश्व तिरंगा प्यारा

अपने छोटे पालीवाल स्कूल की जिन और बातों की याद आ रही है, उनमें स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस की याद भी है। इन दोनों ही राष्ट्रीय पर्वों पर प्रभातफेरी निकलती थी। हम रास्ते भर गीत गाते चलते थे, “झंडा ऊँचा रहे हमारा, विजयी विश्व तिरंगा प्यारा...!” यह प्रभातफेरी हमारे स्कूल से शुरू होकर बड़े पालीवाल तक जाती थी। हम इसे प्रभातफेरी के अलावा जुलूस भी बोलते थे। चूँकि यह जुलूस बहुत सवेरे निकलता था, इसलिए दो-एक बार ऐसा भी हुआ कि मैं स्कूल गया तो पता चला कि जुलूस जा चुका है। इस पर बड़ा बुरा लगता था, और हम आगे से जल्दी तैयार होकर स्कूल पहुँचने का निश्चय-सा करते थे।
बड़े पालीवाल स्कूल में पहुँचने पर हमें सभा-मैदान में बैठाया जाता और फिर बहुत सारे कार्यक्रम होते। प्रधानाचार्य रामगोपाल पालीवाल जी और कुछ अन्य अध्यापकों के भाषणों के अलावा देशभक्ति के गीत-कविताएँ भी सुनाई जातीं। बच्चे भी तरह-तरह के कार्यक्रम पेश करते। खेल-कूद प्रतियोगिताएँ और दौड़ भी होती थी। फुटबॉल, वालीबॉल तथा हाकी का खेल पहलेपहल वहीं देखने का मौका मिला। खेल और विभिन्न प्रतियोगिताओं में जीतने वालों को इनाम दिया जाता। पर न जीतने वाले भी खाली हाथ न जाएँ, इसलिए उन्हें भी कुछ न कुछ दिया जाता था।
ऐसे ही एक बार मुझे होल्डर मिला था, जिसमें एचजी का निब फँसाकर आप सुंदर सुलेख लिख सकते थे। तब पैन के बजाय होल्डर से लिखने का ही रिवाज था। होल्डर सस्ता ही होता था, शायद इकन्नी का आ जाता था, पर गणतंत्र दिवस पर इनाम के रूप में प्रधानाचार्य से मिला होल्डर कितनी खुशी की बात थी, इसे आज मैं शायद ठीक-ठीक बता ही नहीं सकता। और हाँ, स्वतंत्रता-दिवस या गणतंत्र दिवस का कार्यक्रम संपन्न होने पर हमें चलते-चलते बूँदी के लड्डू या फिर केले भी मिलते थे। उन्हें खाते हुए हम पैदल घर की ओर जाते थे, जो खासा दूर था। पर साथ ही मन खुशी से उमग रहा होता था। इसलिए भी कि प्रधानाचार्य जी छोटे-बड़े दोनों स्कूलों में अगले दिन की छुट्टी की भी घोषणा कर देते थे।
वाह, क्या मजे की बात...! वे दिन ही कुछ ऐसे थे कि छुट्टी की बात सुनते ही मन में मिसरी सी घुल जाती थी, और ऐसी मुस्की छूटती थी कि शायद होंठ औ आँखें ही नहीं, हमारी गालों पर भी हँसी बिखर जाती थी।
शायद इसलिए कि छुट्टी माने खेलकूद की मस्ती। छुट्टी माने आजादी, और यह आजादी हमें किस कदर प्रिय थी, क्या इसे दुनिया की कोई भी भाषा ठीक-ठीक अभिव्यक्त कर सकती है। शायद नहीं। शायद बचपन इसी का नाम है।
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[4] इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं

हमारे स्कूल यानी पालीवाल विद्यालय के हैडमास्टर तिवारी जी थे, जिनकी मुझे बहुत अच्छी तरह याद है। पाँचवीं कक्षा में वे हमें हिंदी पढ़ाते थे। वे पुरानी परंपराओं वाले और बड़े पौढ़े हुए अध्यापक थे। अकसर कुरता-धोती पहनते थे, और वह उन पर खूब जँचता भी था। तिवारी जी बच्चों को बड़े प्यार से पढ़ाते थे। हमारे घर वे कमलेश दीदी को ट्यूशन पढ़ाने आते थे और कभी-कभी मुझे भी साथ बैठा लेते थे। मुझे वे बहुत प्यार करते थे और अकसर मेरी तारीफ भी करते थे कि “यह बच्चा तो बड़ा होशियार है!”
तिवारी मास्टर जी की दो बातें नहीं भूलतीं। एक तो उन्होंने पाँचवीं कक्षा के लगभग आखिरी दिन रामचरित मानस से लिया गया पाठ ‘परशुराम-लक्ष्मण संवाद’ पढ़ाया था और इतना रस लेकर और इतने नाटकीय ढंग से पढ़ाया था कि मैं रस से सराबोर हो गया था। उस समय मैं भूल ही गया था कि क्लास-रूम में बैठा हूँ। लगता था कि रामलीला के मैदान में बैठा हूँ और अपने सामने होती रामलीला को देख रहा हूँ। बल्कि कहना चाहिए कि रामलीला में भी वह आनंद मुझे कभी न आया था, जो उस दिन तिवारी जी से राम-लक्ष्मण संवाद वाला पाठ पढ़कर आया था।
अहा, लक्ष्मण और परशुरामजी के वे तुर्की-ब-तुर्की संवाद भी क्या खूब थे! एकदम फड़कते हुए, और उनमें तुलसी का एक अलग ही रूप है। पर उनमें छिपे जादू की पहली झलक तिवारी जी के कारण मैं देख सका। “इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं, जे तरजनी देखि मुरझाहीं...!” जैसे संवादों के भीतर कैसा विट छिपा है, कैसा तीखा व्यंग्य-कटाक्ष, पहलेपहल तिवारी जी की बदौलत ही मैं जान पाया। अध्यापक अगर खुलकर पढ़ाए, खुली भंगिमाओं के साथ, तो काव्य का छिपा हुआ मर्म भी खुल पड़ता है।
तब मैं बहुत छोटा सा था। साहित्य का क, ख, ग भी न जानता था। पर पहली बार तभी मैं यह समझ पाया कि तुलसीदास कितने बड़े कवि हैं, और मन ही मन, मैंने उनकी काव्य-प्रतिभा को प्रणाम किया।
मुझे बड़ी हैरान हुई थी, ऐसे बढ़िया ढंग से तिवारी जी ने पहले क्यों नहीं पढ़ाया...या कि वे हमेशा ऐसे ही क्यों नहीं पढ़ाते? मैं पूरी तरह से उनके जादू की गिरफ्त में था और पछता रहा था कि पहले उनकी इस कला से क्यों नहीं परच पाया? अगर ऐसा होता तो तिवारी मास्टर जी से जुड़े कुछ और भीगे हुए लम्हे मेरी स्मृतियों की पिटारी में सुरक्षित होते। हालाँकि तिवारी जी उस दिन कैसे लगे थे और उनका वह लक्ष्मण-परशुराम-संवाद पढ़ाना कितना अद्भुत था, इसकी एक छवि मैंने अपने उपन्यास ‘यह जो दिल्ली है’ में मास्टर इतवारीलाल के रूप में दर्ज की है।
तिवारी मास्टर जी से जुड़ी दूसरी बात यह है कि उसी दिन उन्होंने एक बड़ी मार्मिक बात कही थी, जिसे मैं आज तक नहीं भूला। उन्होंने कहा था कि अध्यापक के जीवन की एक बड़ी अजब-सी पहेली है। वह यह कि अध्यापक तो वहीं रह जाता है, जबकि उसके पढ़ाए विद्यार्थी कहाँ से कहाँ पहुँच जाते हैं। फिर हमारी ओर इशारा करते हुए बोले, “कहीं तुम लोग भी ऐसे ही तो नहीं हो? क्या तुम भी कुछ हो जाओगे तो हमें भूल जाओगे कि अब कौन मास्टर जी और कहाँ के मास्टर जी! रास्ते में मिलोगे तो दूसरी और मुँह करके निकल जाओगे कि कहीं नमस्ते न करना पड़ जाए!”
उनके मुँह से यह बात सुनकर मैं विगलित हो गया था और भीतर ही भीतर बड़ी कचोट-सी महसूस की थी। बस, आँसू ही नहीं उमड़े, लेकिन मैं पूरी तरह हिल गया।
आज भी मैं यह सोचकर परेशान हो जाता हूँ कि एक अध्यापक की यह कैसी नियति, कैसी विडंबना है जिसकी ओर उन्होंने बड़े ही चुभते हुए शब्दों में इशारा किया था। मुझे निश्चित रूप से लगता है कि वह समाज जो अपने अध्यापकों का सम्मान नहीं कर सकता, कभी बड़ा समाज नहीं बन सकता। और तो और, उसे जिंदा समाज भी क्या कहा जाना चाहिए?
कहना न होगा कि मैं छोटे पालीवाल स्कूल से बड़े पालीवाल स्कूल में पढ़ने गया तो तिवारी जी के यही शब्द मेरे साथ थे, बल्कि पीछा कर रहे थे।
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पाँचवीं कक्षा में मैं फर्स्ट आया था। इस बात की मुझे बड़ी खुशी थी। मैंने अपने दोस्त हरिओम को बताया तो वह बोला, “मैं भी फर्स्ट आया हूँ।” कहकर उसने झट से अपना रिजल्ट कार्ड दिखा दिया। सचमुच उस पर भी लिखा था, ‘पास्ड फर्स्ट डिवीजन’। तो यानी कि मेरे अलावा कुछ और बच्चे भी फर्स्ट आए थे। यह माजरा क्या है, मुझे समझ में नहीं आया था।
उन्हीं दिनों हैडमास्टर तिवारी जी घर आए तो उन्होंने मुझे समझाया कि मैं फर्स्ट डिवीजन में पास हुआ हूँ, जैसे कि तीन-चार और बच्चे भी पास हुए हैं। पर फर्स्ट डिवीजन का मतलब क्लास में अव्वल आना यानी फर्स्ट पोजीशन नहीं है, बल्कि बहुत अच्छे नंबरों में पास होना है। तब उनकी बात ठीक-ठीक समझ में नहीं आई थी कि यह फर्स्ट डिवीजन भला क्या होती है। पर धीरे-धीरे बात समझ में आ गई।
छोटे पालीवाल स्कूल की कुछ बातें और मुझे याद हैं। एक तो यह कि स्कूल के चारों तरफ एक पतला गलियारा सा था। मेरा खयाल है कि वह तीन-चार फुट से ज्यादा चौड़ा न होगा। उसी में होकर हम अपनी-अपनी कक्षाओं में पहुँचते थे। छुट्टी होने पर भी उसी में से होकर बाहर आना होता था। वहीं हम लोग स्कूल की छुट्टी से पहले जोर-जोर से पहाड़े दोहराते थे। दूसरा यह कि जिन बरामदेनुमा कमरों में हमारी कक्षाएँ लगती थीं, उनके सामने थोड़ा खुला स्थान भी था, जहाँ कभी-कभी शनिवार को हम लोग इकट्ठे होते थे, और फिर वहाँ विद्या परिषद जैसे कार्यक्रम होते थे।
मुझे याद है कि विद्या परिषद में एक छोटे से भोले-भाले बच्चे अशोक ने चूँ-चूँ चिरैया का किस्सा सुनाया था। उसमें इतनी बार चूँ-चूँ चिरैया आया था कि उस दिन से अशोक का नाम ही ‘चूँ-चूँ चिरैया’ पड़ गया था। अब तो हर बच्चा उसे चूँ-चूँ चिरैया कहकर ही बुलाता था। अशोक भी इस बात का बुरा नहीं मानता था और चूँ-चूँ चिरैया सुनते ही फिक्क से हँस देता था।
विद्या परिषद के अलावा सुबह की प्रार्थना भी स्कूल के उसी खुले आँगन में होती थी। पर वह स्थान इतना छोटा था कि हम लोग मुश्किल से उसमें अँट पाते थे। अगर मैं भूल नहीं रहा, तो सुबह की प्रार्थना, आधी छुट्टी, और फिर पूरी छुट्टी के समय बजाया जाने वाला पीतल का घंटा भी स्कूल के इसी खुले आँगन में लटकता रहता था। उससे कुछ ही दूर हेड मास्टर तिवारी जी का कमरा होता था, और वही स्कूल का दफ्तर भी था।
स्कूल से बाहर निकलते ही सड़क पर सिंधी की दुकान थी, जहाँ हम बच्चों को अपनी मनपसंद चीजें मिल जाती थीं। आधी छुट्टी के समय हम दौड़कर वहाँ जाते थे और अपनी इकन्नी या अधन्ना निकालकर मनपसंद चीज लेकर खाते थे। इस समय बच्चों से घिरा वह सिंधी दुकानदार इतना व्यस्त हो जाता था कि उसकी मदद के लिए उसकी पत्नी को भी वहाँ आना होता था। वह सिंधी स्त्री कमीज के साथ सलवार न पहनकर पाजामा पहनती थी, इस बात पर मेरा ध्यान गया था और यह बात मुझे कुछ विचित्र लगी थी।
अलबत्ता देर तक उस दुकान पर बच्चों की फरमाइशें गूँजती रहतीं, “मुझे खट्टी-मीठी गोलियाँ चाहिए, मुझे संतरे वाली गोलियाँ दो, मुझे चने, मुझे रामदाने के लड्डू, मुझे मूँगफली...!” और वह सिंधी दुकानदार बड़ी शांति से सबकी फरमाइशें पूरी करता। हमारे पास कुल एक इकन्नी या अधन्ना होता था और उसी से हमारी सारी मनोकामनाएँ पूर्ण हो जाती थीं।
छोटे स्कूल के दिनों की एक बात यह भी याद पड़ती है कि एक दिन हमारे स्कूल में बड़ा हल्ला था कि ‘जी, चोर पकड़ा, चोर पकड़ा गया। आधी रात को चोर आया था, मगर पकड़ा गया और उसे हैडमास्टर साहब के साथ वाले कमरे में बंद कर दिया गया है। अब पुलिस आएगी उसे पकड़ने!’
बच्चे तरह-तरह की रहस्य और विचित्रताओं से भरी बातें कर रहे थे, जिनमें बड़ी गरमी, बड़ी उत्तेजना थी। पर उन सबका सार यही था कि कोई चोर स्कूल में चोरी करने के इरादे से घुसा था। उसे स्कूल के पीयन ने बड़ी दिलेरी दिखाते हुए पकड़ लिया और कमरे में बंद कर दिया। बाहर से ताला लगा दिया, ताकि वह भाग न सके।
हम सब बच्चे उस चोर को देखने के लिए उत्सुक थे, तकि जरा देखें तो कि ये चोर नामक प्राणी होते कैसे हैं? उनका चेहरा कैसा होता है? हमें जाने क्यों लगता था कि चोर का चेहरा हमारी तरह नहीं, बल्कि तवे की कालौंच की तरह एकदम काला होता होगा और सिर पर सींग न भी हों, तो उसी तरह का कुछ न कुछ तो जरूर होता होगा जिससे दूर से ही पता चल जाता होगा कि यह रहा चोर। मगर अफसोस, जिस कमारे में चोर को बंद किया गया था, उसमें बार-बार झाँककर देखा तो मालूम पड़ा कि वह तो एक दुबला-पतला मरियल-सा लड़का है।
अरे, यह है चोर!...ऐसा होता है चोर? हम सबने एक-दूसरे से कहा और एक अव्यक्त हैरानी से भर गए कि अगर यही चोर है तो काले कंबल और काले चोर वाली उन कहावतों का क्या किया जाए, जो हमारे भीतर गहरे धँसी थीं और हमें लगातार डराया करती थीं।
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छोटे पालीवाल स्कूल के कुछ अध्यापकों के बारे में पहले बता चुका हूँ। पर कुछ बातें अभी और भी स्मृतियों में अटकी हुई हैं। एक तो यह कि हमारे स्कूल के ज्यादातर अध्यापक गाँव की पृष्ठभूमि के थे और वे किसानी परिवारों से आते थे। इसलिए उनके कपड़े, बोलना-चालना और रहन-सहन भी उसी तरह का था। अकसर सादा सा पाजामा और ऊपर कमीज। ज्यादातर अध्यापकों की यही वेशभूषा थी। और वे कपड़े भी प्रायः मलगुजे होते था। बल्कि कई बार तो लगता था, जैसे वे खेतों में काम करते-करते स्कूल में पढ़ाने चले आए हों। कपड़े प्रेस किए हुए हों, इसका तो खैर प्रश्न ही न था। वे साफ और उजले हों, यह भी शायद जरूरी न था। ऐसे कुछ अध्यापकों की मुझे याद है, जो शायद मीलों चलकर अपनी साइकिल से स्कूल पढ़ाने आया करते थे।
अध्यापकों की तनखाएँ भी तब शायद ज्यादा न थीं। इसलिए फसलों के समय अपने खेतों पर काम करने के लिए या फिर ऐसे ही किसी जरूरी काम से वे बीच-बीच में लंबी छुट्टियाँ भी ले लेते थे। इससे हेडमास्टर तिवारी जी कई बार नाराज हो जाते थे। मुझे याद है कि इसी तरह एक अध्यापक लंबे अंतराल के बाद स्कूल आए थे और वे अपनी साइकिल एक ओर खड़ी करके पढ़ाने के लिए हमारी कक्षा में आए थे। तिवारी जी को पता चला तो वे उसी समय हमारी क्लास में पहुँचे और उऩ अध्यापक को उन्होंने पढ़ाने से बरज दिया था। उन्हें अपनी उसी साइकिल से, जिससे वे आए थे, वापस लौट जाना पड़ा था। हम बच्चों को बात कुछ समझ में आई थी, कुछ नहीं, पर मन इससे काफी दुखी हुआ था।
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[5] स्मृतियों में अटका एक चेहरा

बचपन में पालीवाल स्कूल की यादों को खँगालता हूँ तो एक व्यक्ति अकसर याद आता है। कोई चालीस-पैंतालीस बरस गुजर गए, पर मैं उसे भूल नहीं पाया। याद पड़ता है कि तब मैं कक्षा दो या तीन में पढ़ता होऊँगा। बारिशों के दिन थे और शायद स्कूल से बाहर निकलते ही बारिश आ गई थी। मैं दौड़कर स्कूल के पास ही एक घर के चबूतरे पर आ खड़ा हुआ जिसके ऊपर छज्जा था। वहाँ पहले से एक व्यक्ति खड़ा था। प्रभावपूर्ण चेहरे वाला एक लंबा, पतला आदमी। उसने गौर से मुझे देखा, फिर पास बुलाया। मैं उसके पास गया तो वह फिर गौर से मेरा चेहरा देखने लगा। फिर माथा। फिर अचानक बोला, “तुम्हारे चेहरे पर विदेश जाने की रेखाएँ हैं। एक दिन तुम्हारा बड़ा नाम होगा।” कहकर उसने मेरी पीठ थपथपाई।
मुझे बड़ी हैरानी हुई। ठीक-ठीक समझ में नहीं आ रहा था कि यह कह क्या रहा है, क्यों कह रहा है? तो भी उसका कहना जाने क्यों मुझे अच्छा लग रहा था और लग रहा था कि यह कोई अच्छा, भला व्यक्ति है।
बारिश खत्म हुई और मैं जाने लगा तो उस व्यक्ति ने एक बार फिर मेरा कंधा थपथपाया और कहा, “मेरी बात याद रखना और घर जाकर अपनी माँ और पिता जी को बताना।”
याद पड़ता है कि मैंने घर पर जाकर बताया भी था—शायद माँ को। उन्हें बड़ी हैरानी हुई थी। विदेश-यात्रा की मुझे रंच-मात्र इच्छा नहीं है और अपना देश छोड़कर जाने की कल्पना—भले ही वह कुछ दिनों के लिए क्यों न हो, मुझे तकलीफ देती है। पर जाने क्यों वह विलक्षण ज्योतिषी मुझे कभी नहीं भूला। भले ही उसने गलत भविष्यवाणी की थी, क्योंकि न मैं कोई नामचीन व्यक्ति हूँ और न कभी विदेश गया, न वैसा सोचा ही।
पर मेरा मन कहता है कि वह कोई भला और सच्चा ज्ञानी व्यक्ति था। कम से कम आज के लालची और धंधेबाज ज्योतिषियों जैसा तो हरगिज न था। मुझसे पैसे लेने की गरज से उसने कुछ नहीं कहा था और न ऐसी किसी बात का जिक्र किया था। एक और मजे की बात यह है कि उसने सिर्फ दूर से ही मेरा माथा देखकर भविष्यवाणी की थी, हाथ की रेखाएँ वगैरह कतई न देखी थीं।
दुनिया में एक से एक हैरान कर देने वाले लोग हैं। एक से एक अच्छे, भले और विचित्रताओं से भरे। इसीलिए तो यह दुनिया ऊपर से सीधी-सरल लगते हुए भी इतने रहस्यों और संभावनाओं से भरी है। और शायद इसीलिए यह दुनिया इतनी खूबसूरत है।
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प्रकाश मनु
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