श्रमिक दिवस की शुभकामनाएँ

अनुराग शर्मा
कपड़े अपने घर के हैं, धब्बे दुनिया-भर के हैं
मस्जिद तो बनवा ली थी, पत्थर सब मंदिर के हैं
सैयद ज़मीर ज़ाफ़री
सन् 1947 में हुए विभाजन, खून-खराबे, और विशाल जन-पलायन की पृष्ठभूमि में भारत से अलग हुए पड़ोसी देश पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति आजकल बहुत बुरी है। इस बुरे समय में पाकिस्तान का एक नया पक्ष भी सामने आने को बेचैन दिख रहा है जो भारत, जम्मू-कश्मीर और बांग्लादेश के बारे में पाकिस्तान के सरकारी दृष्टिकोण पर पुनर्विचार चाहता है। अंग्रेज़ जब तक भारत में रहे राजनीति की शतरंज की बिसात पर अपने पिट्ठुओं को बिठाते रहे। भारत छोड़कर जाते समय भी उन्होंने ऐसा करने का भरपूर प्रयास किया और असफल होने पर इस्लाम के नाम पर जिन्ना के सहयोग से पाकिस्तान बनाया जिसे भविष्य में "किराये के लड़ाके" के रूप में इस्तेमाल किया जाना था। पाकिस्तान के इस भाड़े के टट्टू वाले चरित्र को बनाये रखने के लिये हिंसा, और अहंकार की संस्कृति के साथ-साथ एक और बात बहुत ज़रूरी थी, वह थी नये पाकिस्तान की जनता के मानस में बचे रह गये हज़ारों साल पुराने हिंदुस्तान का अंश का देशनिकाला। और यह काम जिन्ना के बाद भी अनेक स्तरों पर जारी रहा। कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियाँ हों, या खालिस्तान के नाम पर हुए आतंकवाद को हवा देना, या भारतीय मूल की समस्त लिपियों का उन्मूलन, या फिर उर्दू के नाम पर अन्य सभी भारतीय भाषाओं का दमन, पाकिस्तानी मनोवृत्ति का मूल आधार भारत को अपना पैदायशी दुश्मन बताना और भारतीयता के हर चिह्न को मिटाना ही था। वहाँ यही पढ़ाया जाता रहा कि भारत ने उन्हें कभी स्वीकार नहीं किया जबकि निर्विवाद तथ्य यही है कि भारत यदि पाकिस्तान को स्वीकार नहीं करता तो पूरे ब्रिटिश ज़ोर, और पाकिस्तान-समर्थकों द्वारा ताउम्र दंगे-फ़साद करने के बाद भी पाकिस्तान का निर्माण असम्भव था। पाकिस्तान को किसी भी अन्य देश की औपचारिक मान्यता से पहले भारत की मान्यता मिली इसीलिये भारतीय ज़मीन पर एक ऐसे राष्ट्र का जन्म हो सका जिसका आधार ही भारत-विरोध था। इसी भारत-विरोध के लिये पाकिस्तान में भारत को हिंदू, और हिंदुओं को अविकसित, क्रूर, और अन्यायप्रिय दर्शाया जाता रहा। उदार विचारधाराओं के साथ अनुदार हादसे होना स्वाभाविक है। पाकिस्तान भी ऐसा ही हादसा था। काठ की हाण्डी बार-बार नहीं चढ़ती, लेकिन पाकिस्तान ने दशकों तक बार-बार चढ़ाई।

पाकिस्तान के जन्म से लेकर आज तक पाकिस्तान का प्रमुख राष्ट्रीय व्यवसाय भाड़े के सैनिक तैयार करना ही रहा, और इस व्यवसाय की पहली परीक्षा पाकिस्तानी सेना द्वारा ब्रिटिश सहयोग से तब स्वतंत्र जम्मू-कश्मीर राज्य पर कराये गये कबायली हमले द्वारा हुई और आतंक के प्रतीक बन चुके इस देश पर पहला प्रहार 9/11 की आतंकी घटना के परिणामस्वरूप अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश द्वारा तत्कालीन पाकिस्तानी तानाशाह जनरल मुशर्रफ़ को अपनी हरकतें न रोकने पर वापस पाषाण युग में भेज देने की धमकी के साथ हुआ। धमकी काम आयी और तानाशाह ने अपने यू-टर्न की सार्वजनिक घोषणा टीवी पर उर्दू में एक लम्बा भाषण देकर की। वह भाषण अमेरिका के प्रमुख चैनलों ने लाइव दिखाया था। मुख्य बात यह थी कि उस भाषण में मुशर्रफ़ ने स्वीकार किया कि यह यू-टर्न उनकी मजबूरी है और मौका आने पर वे फिर उठ खड़े होंगे। और वही हुआ भी। अमेरिकी को आतंक-विरोधी सहयोग देने के नाम पर पाकिस्तान ने फिर से उगाही शुरू की लेकिन आतंकवाद के शैतान को पालना बंद नहीं किया। यहाँ तक कि उस समय के सबसे बड़े आतंकवादी ओसामा-बिन-लादेन को भी पाकिस्तान ने ही गुपचुप पनाह दी। यह बात अलग है कि अमेरिका ने न केवल ओसामा को पाकिस्तान में घुसकर मारा, इस बहाने पाकिस्तान का धोखा जगज़ाहिर हुआ और भाड़े के सैनिक देश की बची-खुची इज़्ज़त भी मिट्टी में मिल गयी।

भाषा और लिपि के सवाल पर पूर्वी पाकिस्तान में असंतोष बना रहा। पाकिस्तान बनाने के लिये सैकड़ों किलोमीटर तक साइकल कैम्पेन करने वाले शेख मुजीबुर्रहमान के बहुमत को नकारे जाने के बाद शुरू हुए दमन ने भारत को एक नये शरणार्थी संकट में झोंका लेकिन बांग्लादेश की स्वतंत्रता ने एक बार फिर यह साबित किया कि जिन्ना का दो-क़ौमी नज़रिया एक फ़्रॉड के अलावा कुछ नहीं था।

गिलगित-बाल्टिस्तान से लेकर बलोचिस्तान तक आज पूरे पाकिस्तान में भारत से अलग होने के औचित्य पर सवाल उठ रहे हैं। पाकिस्तानी जनता ने हर जंग में भारत को हराने के पाकिस्तानी दावों पर भी सवाल उठाने शुरु कर दिये हैं और अब वे आतंक के धंधे में झोंके जाने वाले पाकिस्तानियों को बेहतर विकल्प दिलाने की मांग भी कर रहे हैं।

अमेरिका में मुझे अनेक पाकिस्तानियों से मिलने का मौका मिला है। कई अनजान पाकिस्तानी तो पहली बार मिलने पर अपने को भारतीय ही बताते थे और अपने मूल-स्थान का नाम पूछने पर भारत के उस शहर का नाम बताते थे जिसे छोड़कर उनके पुरखे पाकिस्तान गये थे। बातें खुलने पर पता लगता था कि वे भारतीय नहीं, पाकिस्तानी हैं, और पाकिस्तान जाने की अपने पुरखों की मूर्खता पर शर्मिंदा हैं।
तारेक फ़तह
(20 नवम्बर 1949 - 24 अप्रैल 2023)
आरम्भ में संसार रंगहीन था। फिर, ईश्वर ने भारत का निर्माण किया - तारेक फ़तह
अनेक पाकिस्तानी ऐसे भी हैं जिन्होंने कभी भारत का विभाजन नहीं चाहा, न स्वीकारा, न वे भारत छोड़कर पाकिस्तान गये। उनका दुर्भाग्य यह था कि वे जहाँ जन्मे, जहाँ रहे, वह क्षेत्र पाकिस्तान बना दिया गया। ये लोग पाकिस्तान में रहते हुए भी आतंकवादी विचारधारा वाली प्रशासनिक नीतियों से संघर्ष करते रहे और देश-निकाला मिलने पर पश्चिम में रहकर भी संसार को आतंकवाद और मज़हबी-कट्टरता के खतरों से आगाह कराते रहे। ऐसे ही एक विचारक-पत्रकार कैनैडा निवासी तारेक फ़तह ने खुद को सदा "भारतीय" मुसलमान ही माना। इस माह कैंसर के कारण उनका देहांत हो गया है। सेतु परिवार की ओर से संवेदनाएँ!

सेतु के रचनाकारों का वर्णक्रम बहुत विस्तृत है। अधिकांश प्रेषण अत्युत्त्म होते हैं। तो भी प्रकाशन के लिये आने वाली कुछ सामग्री में वर्तनी सम्बंधी अनेक भूलें दिखाई देती हैं। इन्हीं में से एक है  पर तथा की मात्राओं का अंतर न पहचानना। किसी अच्छी रचना को इस प्रकार की त्रुटियों के कारण अस्वीकृत करना सही नहीं लगता लेकिन हर रचना का एक-एक शब्द देखकर उसे ठीक करना सम्पादकों के लिये एक सज़ा से कम नहीं होता है। सेतु सम्पादन मण्डल इस विषय में अब तक अत्यंत धैर्य से काम लेता रहा है लेकिन रचनाकारों से मेरा विनम्र निवेदन यही है कि कृपया उनके धैर्य की डोरी को बहुत न खेंचें। आपकी सुविधा और त्वरित संदर्भ के लिये कुछ शब्द यहाँ दे रहा हूँ। कृपया ध्वनि के अनुसार रु (र+ उ) व रू (र+ ऊ) का अंतर देखकर, उसे पहचानकर सही लिखने का प्रयास करें - 

रु (र+ उ): रुपया, रुग्ण, पुरुष, रुष्ट, रुचि, अभिरुचि, शुरुआत, चारु, रुसवाई, रुकना
रू (र+ ऊ): रूप, स्वरूप, रूह, दुरूह, रूस, रूसी, ज़रूरी, शुरू, रूठना, मसरूफ़

मई आने पर श्रम दिवस की याद स्वाभाविक है लेकिन भारतीय परिप्रेक्ष्य में 10 मई 1857 को मेरठ से आरम्भ हुए भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की याद भी स्वाभाविक है। हमारे स्वतंत्र और उज्ज्वल भविष्य के लिये आत्मोत्सर्ग करने वाले सभी बलिदानियों को नमन!  

शुभाकांक्षी,
सेतु, पिट्सबर्ग
30 अप्रैल 2023 ✍️

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